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सोमवार, 30 अगस्त 2021

माज़िद हैदरी कान खोलकर सुन ले भारतवर्ष में औरंगजेब सबसे पहला तालिबानी आतंकी था

एक राष्ट्रीय चैनल पर  तथाकथित कश्मीरी पत्रकार माज़िद हैदरी ने एक डिबेट शो के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा कि - *"बाबर ने देश को ताकतवर बनाया और औरंगजेब ने देश को एकता प्रदान की।"* 
माज़िद हैदरी जैसे मुगलों की यह नाजायज़ टेस्ट ट्यूब बेबीज शायद इस बात से अंजान हैं कि 362 वर्ष पहले सत्ता के लालची और कट्टरपंथी औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दाराशिकोह का सर कलम करवा दिया था। आज हम तालिबान की जिस अमानवीयता और हैवानियत का नंगा नाच अफगानिस्तान में देख रहे हैं, अबसे 362 वर्ष पहले वही क्रूरता और पाशविकता का सबसे बड़ा और पहला उदाहरण औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दाराशिकोह का सर कलम करवाकर दिया था।  भारत के इतिहास में एक योद्धा और एक कवि के तौर पर दाराशिकोह का अपना महत्व है। भारत के इतिहास में दाराशिकोह को एक आदर्श मुसलमान माना जाता है। संस्कृत और फारसी के विद्वान दाराशिकोह ने गीता और 52 उपनिषदों का पहली बार संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया था। इसके बाद ही पूरी दुनिया भारतीय सनातन संस्कृति  के महत्व को समझ पाई थी। लेकिन कट्टरपंथी तालिबानी आतंकियों और लुटेरों के आदर्श औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर धड़ से अलग कराकर क्रूरता और हैवानियत की सारी सीमाओं को लांघ दिया था। 
यहां उल्लेखनीय है कि दाराशिकोह पर तत्कालीन कट्‌टरपंथी तालिबानी मानसिकता के आतंकियों ने बुतपरस्त (मूर्तिपूजक) होने का आरोप लगाया था। इसी बात का फायदा उठाकर मौकापरस्त मक्कार और धूर्त सत्तालोलुप औरंगजेब ने विद्रोह किया और खुद बादशाह बन गया। 30 अगस्त, 1659 को दिल्ली में दारा शिकोह को मौत की सजा दी गई थी। दारा का सिर काटकर आगरा ले जाया गया और धड़ को दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के परिसर में दफनाया गया था। मुगलकाल में दाराशिकोह के अतिरिक्त अन्य ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें किसी मुगल शहजादे का सिर कलम कर सिर्फ धड़ दफनाया गया हो। दारा शिकोह की इस क्रूरतम हत्या के पीछे वही तालिबानी विचारधारा थी जिसे आज माज़िद हैदरी, शोएब जमाई, शफीकुर्रहमान बर्क़, सज्जाद नौमानी और मुनव्वर राना जैसे तमाम कट्टरपंथी सींचने में लगे हैं। 
दाराशिकोह सही मायने में एक धर्मनिरपेक्ष और विद्वान व्यक्ति था, लेकिन उसकी विद्वता और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा उस समय के तालिबानियों को रत्तीभर रास नहीं आई। आज जो लोग अपने को लिबरल बताते हैं, धर्मनिरपेक्षता और संविधान की दुहाई देते हैं, वह तमाम लिब्रांडू यह बताएं कि दारा शिकोह जैसे धर्मनिरपेक्ष विद्वान का निर्मम हत्यारा आतंकी औरंगजेब क्या किसी सच्चे और ईमानदार धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति का आदर्श हो सकता है?

नाथुराम गोड्से को खूनी हत्यारा और मुगल आक्रांताओं को शांतिदूत बताने वाले माज़िद हैदरी जैसे तमाम "लिब्रांडू बुद्धिजीवियों" को यह मालूम होना चाहिये कि 
जब बाबर इस देश में आया था तब माज़िद हैदरी जैसों के पूर्वज श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण के भक्त रहे होंगे। क्या माज़िद हैदरी, निर्देशक कबीर खान, कथित इस्लामिक स्कॉलर यह बता सकते हैं कि उनका खानदान बाबर और औरंगजेब की किस पीढ़ी से है?

भारत दाराशिकोह के बलिदान को सदैव याद रखेगा। आज भी इस देश में माज़िद हैदरी जैसे औरंगजेब अपने हाथों में कट्टरपंथ की नंगी तलवार लेकर वसीम रिज़वी जैसे तमाम दारा शिकोह के सर कलम करने को तैयार बैठे हैं। हमें आज ऐसे सभी दारा शिकोह की रक्षा करने हेतु दृढ़ संकल्प लेना होगा, तभी इस देश से औरंगजेब की नाजायज़ टेस्ट ट्यूब बेबीज का सफाया हो सकेगा।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

आज़म साहब का यह बयान क्या तालिबानी मानसिकता का परिचायक नहीं था

28 दिसम्बर 2018 को छपे "आज तक" समाचार चैनल की एक ख़बर के अनुसार यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री और सपा नेता आजम खान ने संसद में तीन तलाक पर बहस के दौरान कहा था कि- *“जो मुसलमान हैं, जो कुरान को मानते हैं, वे जानते हैं कि तलाक का पूरा प्रोसीजर कुरान में दिया गया है। हमारे लिए उस प्रोसीजर के अलावा कोई कानून मान्य नहीं है। सिर्फ कुरान का कानून ही मुसलमानों के लिए मान्य है।”*

अब ज़रा तालिबानी विचारधारा को समझिये। तालिबान कहता है कि अफगानिस्तान को इस्लामिक कानूनों (शरिया) के अनुसार ही चलाया जाएगा। अर्थात केवल कुरान का कानून ही तालिबान का संविधान है।
अब ज़रा इन दोनों बातों पर गम्भीरता से विचार कीजिये तो आपको मालूम होगा कि समाजवादी पार्टी के कद्दावर और संस्थापक नेताओं में से एक जनाब आज़म खान साहब ने जो कुछ 2018 में कहा था, बिल्कुल वही आज अफगानिस्तान में तालिबानियों ने दोहराया है। आज़म साहब के उपरोक्त बयान से स्पष्ट है कि भारत के मुसलमानों के लिए कुरान के कानून से ज़्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। मतलब भारत का संविधान मज़हबी कानूनों से ऊपर नहीं है। 
आज़म खान साहब की तरह ही शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब, एसटी हसन साहब जैसे समाजवादी नेताओं के बयान भी आपने पढ़े ही होंगे, उनसे भी यही समझ आता है कि समाजवादी नेताओं की नज़रों में उनका मज़हब और मज़हबी कानून सर्वोपरि है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे तमाम नेताओं के लिए राष्ट्रधर्म से अधिक महत्वपूर्ण मज़हब है, और    भारतीय संविधान से बड़ा मज़हबी कानून है।

बस यही तालिबानी विचारधारा है, जिसे हमारे देश में पुष्पित-पल्लवित किया जा रहा है। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि तालिबानी और अफगानी भी एक समय भाई-भाई ही थे। तालिबान कोई आसमान नहीं उतरा और न ही ज़मीन से पैदा हुआ है, बल्कि वहीं उसी अफ़ग़ानी ज़मीन पर बढ़ता-पनपता रहा और शनैः-शनैः बढ़ते हुए आज एक अजगर बन गया है जिसने आज पूरे अफगानिस्तान को निगल लिया है। जो लोग कल तक इन तालिबानियों के साथ भाईचारा निभा रहे थे, वही आज "चारा" बन रहे हैं।
अफगानिस्तान और अफ़ग़ान के हालातों को  देखने और समझने के बाद भी जो लोग यह समझते हैं कि-

*कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।*

*सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।।*

उनके लिए अल्लामा इक़बाल साहब का एक शेर अर्ज है-

*न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिंदोस्ताँ वालों।*

*तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।।*


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शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

तालिबानियों को यह समझ लेना चाहिए कि कुत्तों के भौंकने से हाथी नहीं डरा करते

हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर से जुड़े कई विकास कार्यों का उद्घाटन और शिलान्यास करते हुए तालिबान का जिक्र किए बिना कहा था कि "आतंक की सत्ता स्थायी नहीं रहती"।
प्रधानमंत्री श्री मोदी का यह कथन ठीक ऐसे समय में आया है जबकि तालिबानी आतंकियों ने क्रूरता और आतंक की समस्त सीमाओं को लांघते हुए अफगानिस्तान पर अपना कब्ज़ा जमा लिया है और अपनी ही सरकार बनाने की घोषणा भी कर दी है।
मोदी जी ने आगे कहा कि- *"भगवान सोमनाथ का मंदिर आज भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिए एक विश्वास है। जो तोड़ने वाली शक्तियां है... जो आतंक के बलबूते सामर्थ्य खड़ा करने वाली सोच है... वह किसी कालखंड में कुछ समय के लिए भले ही हावी हो जाए लेकिन उसका अस्तित्व कभी स्थाई नहीं होता। वह ज्यादा दिनों तक मानवता को दबाकर नहीं रख सकतीं।"*

मोदी जी का यह सच तालिबान को कड़वा लग गया है। तालिबान के प्रमुख नेता शहाबुद्दीन दिलावर ने इसे चुनौती के रूप में लेते हुए दावा किया है कि उसका संगठन सफल रहेगा। पीएम मोदी की बात पर प्रतिक्रिया देते हुए दिलावर ने कहा कि भारत जल्द देखेगा कि तालिबान देश को ठीक तरीके से चला सकता है। 

लेकिन तालिबानी आतंकी यह भूल रहे हैं कि इराक का सद्दाम हुसैन हो या जर्मनी का हिटलर, औरंगजेब हो या जनरल डायर आतंक की सत्ता कभी किसी की स्थायी नहीं रही है।

दिलावर खान जैसे आतंकी यह भी भूल रहे हैं कि सत्ता हथियाना और सत्ता चलाना, दो अलग-अलग मसले हैं। हथियारों और आतंक के बल पर सत्ता तो हथियाई जा सकती है परन्तु उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए रणनीतिक कौशल, कुशल नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। 
इतिहास साक्षी है कि तलवारों के बल पर दौलत और ताक़त तो हासिल हो जाती है लेकिन दिल नहीं जीते जा सकते। और राजनीति वही कर सकता है जो दिलों पर राज करना जानता हो।

तालिबानी नेता ने 'रेडियो पाकिस्तान' को दिए इंटरव्यू में भारत को यह भी चेतावनी दी कि अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल ना दिया जाए। लेकिन यह धमकी देते हुए तालिबानी नेता यह भूल गया कि यह भारत है, तुम्हारी खाला का घर नहीं कि जब चाहोगे धमका दोगे। यह वही कबायली हैं जिन्हें 1947 में भारत के शूरवीरों ने धूल चटा दी थी। तालिबानियों को यह समझ लेना चाहिए कि कुत्तों के भौंकने से हाथी नहीं डरा करते। 
भारत के प्रधानमंत्री जी ने जो कुछ कहा वह केवल उनकी व्यक्तिगत राय नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष की देशभक्त जनता का आतंक और आतंकियों को कड़ा सन्देश है। 

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गुरुवार, 26 अगस्त 2021

आदरणीय मोदी जी यह आपकी राजनीति हो सकती है, राष्ट्रनीति नहीं

परम आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी
सादर प्रणाम

महोदय,
यद्यपि आपकी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र के प्रति आपकी निष्ठा पर संदेह करना ठीक ऐसा ही है जैसे कोई प्रभु श्री हनुमान की श्रीरामभक्ति और निष्ठा पर संदेह करने का दुस्साहस करे।

*परन्तु हम बहुत विनम्रता किंतु पूर्ण दृढ़ता से आपसे जानना चाहते हैं कि अफगानी नागरिकों को भारतवर्ष में शरण देने के प्रति कौन सा राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रहित छुपा हुआ है। यह तो ठीक वैसी ही नीति है जैसी कि स्व. मोहनदास करमचंद गांधी ने भारत-पाक विभाजन के समय शरण देकर की थी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने   बांग्लादेशियों को शरण देकर की थी। आज आप भी बिल्कुल वही सब दोहरा रहे हैं। यह राजनीति तो हो सकती है परन्तु इसे किसी भी दशा में राष्ट्रनीति नहीं माना जा सकता है।* 

आप शायद भूल रहे हैं कि राजा परीक्षित को जिस तक्षक नाग ने डसा था वह एक छोटे से फल में सूक्ष्म रूप में राजा परीक्षित के महल में पहुंचा था। परन्तु वहां पहुंचते ही उसने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया और उसी विराट रूप में आकर उसने राजा परीक्षित को डस लिया था। 
भारतवर्ष की सबसे बड़ी विडम्बना यही रही है कि हमने नागपंचमी जैसी कु-परम्पराओं को जीवित रखा जिसमें सांपों को दूध पिलाया जाता है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि सर्प अपना मूलगुण कभी नहीं छोड़ सकता। वह सदा ही जहर उगलेगा। विद्वानों का कथन है कि समस्या को बढ़ने से पूर्व ही उसे समाप्त कर देना चाहिए, परन्तु हम मूर्ख अपने ही काल को पालने-पोसने में लगे रहते हैं।

महोदय, 
इतिहास से सीखना ही बुद्धिमत्ता है, इतिहास को दोहराना महान मूर्खता है। लगता है कि आप अति उदारीकरण की नीतियों के वशीभूत होकर भारत के अंधकारमय भविष्य को नहीं देख पा रहे हैं। आप यह क्यों भूल रहे हैं कि "अति सर्वत्र वर्जयेत" अर्थात अति करने से सदैव बचना चाहिए। 

महोदय,
भारत कोई धर्मशाला अथवा अनाथ आश्रम नहीं है। आप सही मायनों में भारत के नागरिकों के मूल अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का प्रयास कर रहे हैं, जो कि कदापि उचित नहीं है। 
आपको मालूम हो कि भारत आज कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से जूझ रहा है। क्या ऐसी विषम परिस्थितियों में इस प्रकार दूसरों के फटे में टांग अड़ाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित जान पड़ता है?

महोदय,
 भारत में पहले से ही रोहिंग्या मुस्लिम, बांग्लादेशी मुस्लिम सहित तमाम पाकिस्तानी अवैध रूप से घुसपैठ बना चुके हैं, और हमारे अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं। और ऊपर से अब हमें इन अफगानी मुस्लिम शरणार्थियों का दंश झेलना पड़ेगा।
 आखिर हम कब तक अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस भारत सरकारों की इस विनाशकारी "अति उदारीकरण" की भेंट चढ़ाते रहेंगे?? क्या आपको भारत को विश्वगुरु बनाने का एकमात्र यही मार्ग सूझ रहा है। विश्व में 57 मुस्लिम देश हैं, स्वयं तालिबान भी तो मुस्लिम है। उसने तो अपने देश का नाम ही "इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगान" रख छोड़ा है, तब वहां से अफगानी मुस्लिमों को भारत में बसाने का भला क्या औचित्य है?

महोदय, 
सम्भव है कि आज किसी विशेष विदेश नीति के चलते वर्तमान में हमें इसका कोई लाभ हो जाये परन्तु भविष्य में इससे राष्ट्र का अहित ही होना है। शायद आप भूल रहे हैं कि नज़दीक के फायदे के लिए दूर का नुकसान करना, दूरंदेशी का प्रमाण नहीं है। और इस देश की जनता आपको एक दूरदर्शी नेता मानती है।

हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप किसी भी परिस्थिति में भारतवर्ष की 130 करोड़ जनता के विश्वास को टूटने नहीं देंगे।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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बुधवार, 25 अगस्त 2021

जब ब्राह्मणों पर कथित अत्याचार हो रहे थे, तो क्या सतीश मिश्र बांसुरी बजा रहे थे

कन्नौज आए बसपा के राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सांसद सतीश मिश्र ने कहा कि *बसपा की सरकार बनी तो बिकरू कांड की फिर से जांच कराई जाएगी। जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह अविश्वसनीय है। उन्होंने भाजपा पर धर्म के नाम पर झूठ बोलने व ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाया है। बिकरू कांड का हवाला देते हुए कहा कि उसके बाद से ब्राह्मण समाज का उत्पीड़न लगातार बढ़ा है।*

बहुजन समाज पार्टी को बहुत जल्दी ब्राह्मणों और हिन्दू धर्म की चिंता सताने लगी है। अगर सतीश मिश्र जी को ब्राह्मणों की इतनी चिंता है तो वह बताएं कि 2022 विधानसभा चुनाव में वह उत्तरप्रदेश में ब्राह्मणों को कितने टिकट बांट रहे हैं? ब्राह्मणों के नाम पर अरबों-खरबों की संपत्ति बनाने वाले कथित ब्राह्मण नेता यह भी बताएं कि इस बार हाथी पर कितने ब्राह्मणों को बैठाया जायेगा? एक बड़ा सवाल यह है कि इस बार कौन-कौन से ब्राह्मण नेता बिना चप्पलें उतारे बहन कुमारी मायावती जी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त कर पाएंगे?? 
सतीश चंद्र मिश्र जी विकास दुबे को "ब्राह्मणत्व का चेहरा" बनाने पर तुले हुए हैं, लेकिन वह यह भी बताने का कष्ट करें कि इस अपराधी विकास दूबे ने कितने ब्राह्मणों का कत्लेआम किया था? अपराधी विकास दूबे के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने और उसका महिमामंडन करने वाले कथित "ब्राह्मण नेता" जरा यह भी बताएं कि वह "बिकरु कांड" में DSP देवेंद्र मिश्रा की शहादत की चर्चा क्यों नहीं करते? क्या देवेंद्र मिश्र ब्राह्मण नहीं थे? 
एक दुर्दांत अपराधी औऱ क़ातिल को ब्राह्मण समाज का नायक बनाना क्या केवल "राजनीतिक प्रोपेगैंडा" नहीं माना जाना चाहिए??

स्वयंभू ब्राह्मण नेता यह भी बताने का कष्ट करें कि अब ठीक चुनाव के समय ही उन्हें ब्राह्मण समाज पर होने वाले अत्याचार क्यों दिखाई दे रहे हैं? जब ब्राह्मण समाज के लोगों का कथित एनकाउंटर हो रहा था तब बसपा और सपा ने कोई आंदोलन क्यों नहीं किया था? विशेषकर सपा को ब्राह्मण वोट दिलवाने की वक़ालत करने वाले बताएं कि एनआरसी-सीएए के पक्ष में कमीजें उतारकर नंग प्रदर्शन करने वाले सपाईयों ने योगी सरकार की कथित "ब्राह्मण विरोधी गतिविधियों" का विरोध करने के लिए कितने आंदोलन/सत्याग्रह किये हैं?

पिछले चार-साढ़े चार सालों तक अगर ब्राह्मण समाज पर जुल्मों-सितम हो रहे थे तो सपा-बसपाई मुहं में दही जमाये क्यों बैठे थे। क्या इसलिए कि चुनाव से ठीक पहले "ब्राह्मणों की लाशों" पर राजनीति की जा सके. *उत्तरप्रदेश का सुधि ब्राह्मण मतदाता कथित ब्राह्मण नेताओं से इस प्रश्न का उत्तर चाहता है कि जब उत्तरप्रदेश में ब्राह्मण समाज तथाकथित उत्पीड़न और अपमान की आग में जल रहा था, तब विपक्षी दलों के हिमायती कथित ब्राह्मण नेता क्या बांसुरी बजा रहे थे?*

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उद्धव जी ने तो पूरे संत समाज और सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश का अपमान किया था

भाजपा के केंद्रीय मंत्री राणे ने रायगढ़ जिले में जन-आशीर्वाद यात्रा के दौरान कथित तौर पर कहा, *‘यह शर्मनाक है कि मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि आजादी को कितने साल हो गए हैं। भाषण के दौरान वह पीछे मुड़कर इस बारे में पूछते नजर आए थे। अगर मैं वहां होता तो उन्हें एक जोरदार थप्पड़ मारता।’* राणे ने दावा किया कि 15 अगस्त को जनता को संबोधित करते समय ठाकरे यह भूल गए थे कि आजादी को कितने साल पूरे हो गए हैं। उन्होंने कहा कि भाषण के बीच में वह अपने सहयोगियों से पूछ रहे थे कि स्वतंत्रता दिवस को कितने साल हुए हैं।

इस बयान को लेकर महाराष्ट्र में बड़ा बवाल मचा हुआ है। और *"ठाकरे सेना" का यह मानना है कि राणे ने केवल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र का अपमान किया है।*
अब ज़रा तस्वीर का दूसरा रुख़ देखिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे ने मई 2018 में पालघर में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ पर कमेंट करते हुए कहा था कि- *"उन्होंने (योगी आदित्यनाथ ने) चप्पल पहनकर शिवाजी की प्रतिमा को माला पहनाई। मेरा मन किया कि उन्हें उन्हीं की चप्पल से उनके चेहरे पर मारुं। वह कोई योगी नहीं है वह भोगी है। यदि वह योगी होते तो सबकुछ छोड़कर चले जाते और गुफा में जाकर रहते, लेकिन वह जाकर सीएम की कुर्सी पर बैठ गए हैं।"*
यहां उल्लेखनीय है कि योगी जी ने चप्पल नहीं खड़ाऊं पहने हुए थे।

 गोरखधाम पीठ के महंत परम पूज्य श्री योगी आदित्यनाथ के प्रति ऐसे अपमानजनक शब्द "हिन्दू शेर" कहे जाने वाले बाला साहेब ठाकरे के सुपुत्र और शिवसेना प्रमुख श्रीमान उद्धव ठाकरे ने कहे थे। क्या श्री ठाकरे का यह बयान सम्पूर्ण हिन्दू समाज का अपमान नहीं था? क्या उत्तरप्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी के ख़िलाफ़ दिया गया यह बयान सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश का अपमान नहीं माना जाना चाहिए? 
क्या उद्धव जी का यह बयान समस्त हिन्दू साधु-संतों का अपमान नहीं माना जाना चाहिए?

कल तक दूसरों का अपमान करने वाले उद्धव जी की ख़ुद की परछाई पर आज पैर पड़ा तो "ठाकरे सैनिक" चीख पड़े। 

कोई भी सभ्य समाज का व्यक्ति नारायण राणे के वक्तव्य को उचित नहीं ठहरा सकता और न ही हम उसका समर्थन करते हैं। लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि बाला साहेब के उत्ताधिकारी और वीर शिवाजी की भूमि पर जन्मे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को यही नहीं मालूम है कि हमारे देश को स्वतंत्र हुए कितना समय बीत गया है? क्या श्री ठाकरे कभी यह भूले हैं कि वह कुल कितने वर्ष के हो गए हैं? क्या वह कभी अपनी शादी की वर्षगांठ भूले हैं? कभी अपने बच्चों की वर्षगांठ भूले हैं? शायद कभी नहीं भूले हैं। 

सच तो यह है ठाकरे जी पर उनकी बुरी संगत का असर स्पष्ट नज़र आ रहा है। कहीं ठाकरे साहब ने राष्ट्रवादियों का साथ छोड़कर राष्ट्रघातियों का साथ तो नहीं पकड़ लिया?

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मंगलवार, 24 अगस्त 2021

भाईचारा शब्द की कीमत वो क्या समझेंगे साहब, जिन्होंने आपको केवल चारा समझ रखा है

"अगर भारत से पुलिस को हटा लिया जाये तो 15 मिनट के अंदर यहां के 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं का खात्‍मा कर सकते हैं।"* यह बयान किसी तालिबान से नहीं आया था और न ही किसी हाफ़िज़ सईद ने दिया था। बल्कि इस बयान को देने वाला एक अहंकारी, कपटी, धूर्त और मक्कार हैदराबादी "भाईजान" था। जिसके बड़े भाईसाहब हमेशा "संविधान" और "भाईचारा" शब्दों को च्युंगम की तरह चबाते घूमते हैं।
"भाईचारा" शब्द इन जैसे "भाईजानों" के लिए "शब्दों का मायाजाल" है, जिसमें उलझाकर यह अपने ही भाइयों को "चारा" बना डालते हैं। जिसकी ताज़ी और बेहतरीन मिसाल अफगानिस्तान में हो रहे जुल्मों-सितम हैं। 
आज हम अपनी आंखों से देख रहे हैं, सुन भी रहे हैं और शायद प्रतिक्रिया में बोल भी रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसे मंजर इतिहास में कोई पहली दफ़ा हो रहे हैं। इससे पहले यह सब इसी भारत में हो चुका है, जिसका सबसे लेटेस्ट उदाहरण कश्मीर है। जहां कश्मीरी हिंदुओं के साथ ठीक वही सुलूक किया गया था जो अफगानिस्तान में यह लोग अपने ही "बिरादरों" के साथ आज कर रहे हैं। अब आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि भारत के जिन हिस्सों में तुर्कों, अफगानों, पठानों और मुगलों का शासन रहा है, वहां के हिंदुओं के साथ कितना अमानवीय और क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया गया होगा। न जाने कितने मासूमों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया होगा, न जाने कितनी अबलाओं की आबरू को रौंदा गया होगा, न जाने कितने नौजवानों को सूली पर टांग दिया गया होगा और न जाने कितने कमज़ोर और बूढ़े लोगों को बेदर्दी के साथ क़त्ल कर दिया गया होगा। लेकिन वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने इस क्रूरतम अत्याचार को बड़ी चतुराई के साथ "गंगा-जमुनी तहज़ीब" जैसे खोखले और बेबुनियाद शब्दों की आड़ में छुपा लिया। और हमें "बापू" के "तीन बंदर" बनाकर बैठा दिया गया, जो इतिहास में कट्टरपंथी बादशाहों के क्रूरतम अत्याचारों को न देख सके, न सुन सके और न ही उसपर कभी कुछ बोलने की कभी हिम्मत जुटा सके। बस अहिँसा की प्रतिमूर्ति बने ख़ामोशी से अपने और अपनों के घरों के फुंकने का तमाशा देखते रहे। एक गाल से दूसरे गाल और दूसरे से तीसरे गाल पर थप्पड़ खाते रहे। और आज तक वही दस्तूर क़ायम है।

आज भी वही हो रहा है, तालिबानी मानसिकता का महिमामंडन किया जा रहा है, बड़ी बेशर्मी से उनकी तुलना भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से की जा रही है, औरतों और बच्चों के साथ वहशियाना हरकतें करने वालों के लिए जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं। 

विडम्बना देखिये कि इस बार भी वही कांगी, वामी और जिहादी इस घिनौने और घृणित मानसिकता के पैरोकार बने हुए हैं। आतंकवाद और आतंकियों का महिमामंडन करने वाले कभी किसी के नहीं हो सकते, जो अपने भाइयों का न हुआ वह तुम्हारा कैसे हो सकता है। जिस दिन भाईजान ताकतवर हो गए उसी दिन से तुम्हारा "चारा" बनना शुरू हो जाएगा।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

सोमवार, 23 अगस्त 2021

चचा शिवपाल की घर वापसी भतीजे के लिए दूर का नुकसान साबित हो सकती है

उत्तरप्रदेश में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुखिया श्रीमान शिवपाल यादव और पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के बीच गठबंधन की बातचीत चल रही है। ऐसा  लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चा से सुनने में आ रहा है। दरअसल, चचा-भतीजे के बीच मसला कुछ यूं है कि एक को कोई ठौर नहीं, दूसरे को कोई और नहीं है। सच पूछिए तो श्री शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के मुहं में ठीक ऐसे ही हैं जैसे सांप के मुहं में छछुंदर, जिसे न उगले ही बनता है और न ही निगले बन पा रहा है। श्रीमान शिवपाल यादव जानते हैं कि अभी तक उनकी पार्टी का कोई जनाधार नहीं है। वह यह भी जानते हैं कि समाजवादी पार्टी में भी उनका अपना कोई अस्तित्व नहीं बचा है और भतीजे अखिलेश के रहते उनका भविष्य भी अंधकारमय ही है। उधर बसपा और भाजपा दोनों को ही चचा शिवपाल की कोई आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस का अपना कोई वजूद नहीं है, तो अगर वह शिवपाल जी से हाथ मिला भी ले तो वही स्थिति होगी जैसे किसी अंधे को कोई लंगड़ा कंधे पर बैठाकर नदी पार करने निकल पड़े।
श्री अखिलेश यादव जानते हैं कि चचा शिवपाल को कोई ठौर नहीं है, वह यह भी जानते हैं कि भले ही चचा खुद एक भी सीट न जीत पाएं लेकिन पूर्वांचल में वह समाजवादी पार्टी को दो-चार सीटों का नुकसान जरूर करवा देंगे। और यूं भी विपक्ष विशेषतः भाजपा चचा-भतीजे की लड़ाई का फ़ायदा ठीक वैसे ही उठा लेगी जैसे कि दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर टुकड़ा उठाकर भाग जाता है। साथ ही साथ परिवार में बिखराव का कलंक भी धुल सकता है। इसलिए श्री अखिलेश यादव किसी भी कीमत पर चचा शिवपाल यादव का हाथ थामना चाहते हैं।
लेकिन वह यह भी जानते हैं कि चचा शिवपाल यादव की समाजवादी पार्टी में पुनः वापसी शिवपाल जी की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पुनः जागृत कर देगी। जो कि भविष्य के लिए दिक़्क़त पैदा कर सकता है।
अखिलेश यादव औऱ उनके चाणक्य चचा रामगोपाल यादव को भी भली प्रकार मालूम है कि राजनीति में कभी-कभी नज़दीक के फायदे के लिए दूर का नुकसान भी उठाना पड़ता है। और फिलहाल शायद यही सोचकर चचा-भतीजे में सुलह के आसार बनते दिखाई दे रहे हैं। 

वैसे कुल मिलाकर चचा शिवपाल की घर वापसी होनी लगभग तय है, बशर्ते कि श्री अखिलेश यादव दूर का नुकसान बर्दाश्त करने की स्थिति में हों।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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रविवार, 22 अगस्त 2021

सोनिया गांधी के इस बयान में उनकी सत्ता के प्रति छटपटाहट स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है

मीडिया सूत्रों के हवाले से ख़बर मिली है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्ष के 19 दलों के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा है कि *"देश की जनता मोदी शासन से मुक्ति चाहती है। इसलिए विपक्षी दलों को एकजुट होकर 2024 के लोकसभा चुनाव पर फोकस करना है।"*

श्रीमती गांधी ने विपक्ष के प्रमुख नेताओं और मुख्यमंत्रियों को वर्चुअल बैठक के जरिए संबोधित करते हुए कहा कि *विपक्षी दलों को 2024 के लोकसभा चुनाव की योजना पर व्यवस्थित रूप से और एकमात्र एजेंडे के तौर पर काम करना है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की अपनी कुछ बाध्यताएँ हो सकती हैं लेकिन चुनौती लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की है और इस चुनौती से निपटने के लिए सब को एकजुट होकर के काम करना है तथा मिलकर मोदी सरकार से देश की जनता को मुक्ति दिलाना है।* श्रीमती गांधी ने कहा कि *विपक्षी दलों को एकजुटता से बहुत बड़ा राजनीतिक युद्ध लड़ना है।* 

यहां गौरतलब है कि श्रीमती गांधी को आज समझ में आया कि देश की जनता क्या चाहती है। काश अगर यह बात श्रीमती गांधी और उनके होनहार विद्वान सुपुत्र श्रीमान राहुल गांधी की समझ में पहले ही आ जाती तो शायद भारत की जनता को श्री नरेन्द्र मोदी जैसा यशस्वी और राष्ट्रभक्त प्रधानमंत्री कभी नहीं मिल पाता। परन्तु कहते हैं कि ईश्वर जो कुछ करता है, भले के लिए ही करता है। श्रीमती सोनिया गांधी शायद यह समझ पाने में असक्षम हैं कि भारत की जनता अब किसी भी विदेशी के हाथ में अपने भाग्य की बागडोर देना नहीं चाहेगी। इस देश की जनता ने लगभग 60 सालों तक खून के घूंट पीकर एक परिवार की तानाशाही को बर्दाश्त किया है। और अब जाकर भारत को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो इस राष्ट्र का प्रहरी बनकर भारत की जनता की रक्षा और देखभाल कर रहा है।
आज कोई चाबी वाला गुड्डा इस देश का प्रधानमंत्री बनने की सोच ही नहीं सकता जिसने 10 वर्षों तक केवल उतना ही किया जितनी कि उसमें चाभी भरी गई थी। श्रीमती सोनिया गांधी शायद भूल रही हैं कि देश की जनता को किसी ऐसे प्रधानमंत्री की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी जो देश के संसाधनों पर केवल एक वर्ग विशेष का ही अधिकार मानता हो। जो समाज में समानता और समरूपता की बात न करता हो।
श्रीमति सोनिया गांधी को समझना होगा कि यदि भारत की जनता को "मोदीराज" से मुक्ति चाहिए होती तो शायद कांग्रेस को छोटे-छोटे दलों के आगे झोली नहीं फैलानी पड़ती। 

दरअसल, श्रीमती सोनिया गांधी के इस बयान में कांग्रेस पार्टी की सत्ता के प्रति छटपटाहट स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। कांग्रेस की सत्तालोलुपता और "नेहरू परिवार" का सत्ता से मोह इस देश की जनता के लिये कोई नई बात नहीं है। इस परिवार की समस्या यह है कि इन्होंने सदैव विलासितापूर्ण राजसी जीवन जिया है, परन्तु श्रीमोदी सरकार के आने के पश्चात वह पूरी तरह से नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। सत्ता के लिए जनता की भावनाओं और अपनों के जीवन से सदैव खिलवाड़ करने वाली कांग्रेस पार्टी आज सत्ता प्राप्ति के लिए ठीक ऐसे ही तड़प रही है जैसे जल से निकली हुई मछली ऑक्सीजन को पाने के लिए तड़पती और छटपटाती है।
श्रीमती सोनिया ने कथिततौर पर अपने बयान में यह भी कहा है कि "चुनौती लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की है।"

 सोनिया जी शायद भूल गईं कि श्री नरेन्द्र मोदी उसी लोकतंत्र की देन हैं। सच तो यह है कि भारत पर अपना एकछत्र राज समझने वाले शाही परिवार की बहू को आज लोकतंत्र का वास्तविक महत्व समझ आ गया है। सोनिया जी जान चुकी हैं कि यह देश नेहरू परिवार से नहीं चलता। उन्हें यह भी समझ आ चुका है कि नेहरू परिवार इस देश का अन्नदाता नहीं है बल्कि नेहरू परिवार को इस देश की जनता ने ही पाला-पोसा है। सोनिया जी को अब तक यह अच्छी तरह समझ आ जाना चाहिए कि "नेहरू परिवार" और "कांग्रेस पार्टी" इस देश के भाग्य विधाता न तो कभी थे और न ही कभी हो सकते हैं। इस देश का भाग्यविधाता केवल इस देश की जनता-जनार्दन है, जिसने भारतीय संविधान के अनुरूप लोकतांत्रिक प्रक्रिया से श्री नरेन्द्र मोदी को इस देश का "चौकीदार" बनाया है और जब तक जनता नहीं चाहेगी, कोई भी "गठबंधन" अथवा "विदेशी ताक़त" माननीय नरेंद्र मोदी का बाल भी बांका नहीं कर सकती है।

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महृषि वाल्मीकि का अपमान केवल दलित समाज का नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत का अपमान है

लिब्रांडू गैंग के दरबारी शायर मुनव्वर राना ने एक चैनल से बात करते हुए कहा कि, *‘वाल्मीकि रामायण लिखने के बाद भगवान बन गए, इससे पहले वह एक डकैत थे, व्यक्ति का चरित्र बदल सकता है. इसी तरह तालिबान अभी आतंकवादी हैं, लेकिन लोग और चरित्र बदलते हैं.’*

राना ने कहा, *‘जब आप वाल्मीकि के बारे में बात करते हैं, तो आपको उनके अतीत के बारे में भी बात करनी होगी. अपने धर्म में आप किसी को भी भगवान बना सकते हैं, लेकिन वह एक लेखक थे और उन्होंने रामायण लिखी. लेकिन हम यहां प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं.’*

इस बयान के बाद राना के खिलाफ धारा 153 ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना), 295ए (किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जान-बूझकर किया गया दुर्भावनापूर्ण कृत्य), 505 (1) (बी) (सामान्य जन या जनता के किसी वर्ग के बीच भय पैदा करना) और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।

मुनव्वर राना के विरुद्ध देशद्रोह की धाराओं में मुकदमा पंजीकृत होना चाहिए। लेकिन यहाँ मुनव्वर राना से भी ज़्यादा बड़े अपराधी वह तमाम मीडिया बन्धु और नेतागण इत्यादि हैं जिन्होंने मुनव्वर राना द्वारा महृषि वाल्मीकि जी के अपमान को केवल दलित समाज के अपमान तक ही सीमित कर दिया। यह ठीक ऐसा ही है जैसे कहा जाता है कि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों  का कत्लेआम किया गया और उन्हें कश्मीर छोड़ने पर विवश किया गया। जबकि सच यह है कि कश्मीर से हिंदुओं का पलायन हुआ था न कि किसी जाति विशेष का।
ठीक इसी प्रकार पवित्र रामायण लिखने वाले महृषि वाल्मीकि केवल दलित समाज के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के पूर्वज थे, उनका अपमान पूरे भारत का अपमान है। 
पवित्र रामायण हिंदुओं का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए पवित्र और पावन धर्मग्रन्थ है। और श्रीराम सभी के हृदय में बसे हैं। वह सभी लोग जिनके हृदय में श्रीराम बसे हैं, उनको महृषि वाल्मीकि अपने गुरु समान ही प्रतीत होते हैं, जिन्होंने श्रीराम के जीवन चरित्र से हम सबको भलीभांति अवगत कराया था।
मुनव्वर राना द्वारा महृषि वाल्मीकि के अपमान को केवल दलित समाज का अपमान मानना बेहद संकुचित और संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। ऐसे में उन तमाम लोगों पर भी कार्यवाही होनी ही चाहिए जो महृषि वाल्मीकि को केवल एक जाति विशेष से जोड़कर देख रहे हैं। क्योंकि ऐसा करके वह हिन्दू समाज को तोड़ने का षडयंत्र रच रहे हैं।
*मुनव्वर राना जैसे लोग "शायर" नहीं बल्कि "शातिर" हैं।* ये किसी समाज या वर्ग विशेष के शत्रु नहीं हैं बल्कि यह पूरे मानव समाज के दुश्मन हैं। मुनव्वर राना जैसे तमाम लोग "बौद्धिक आतंकी" की श्रेणी में आते हैं, जो अपने विचार और वाणी के माध्यम से भारत की एकता, अखंडता और सौहार्द को पलीता लगाने का हरसम्भव प्रयास करते रहते हैं। ऐसे लोगों को उनके असल मकसद में कामयाब होने देना भी स्वयं में एक गम्भीर श्रेणी का अपराध ही है।

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शनिवार, 21 अगस्त 2021

तालिबानी हैवानियत के नंगे नाच को "भाजपा की राजनीति" बताकर अपनी बेशर्मी की चादर से ढकने का असफ़ल प्रयास कर रहे


सोशल मीडिया पर एक बड़ी मुहिम चल रही है जिसमें कांगी, वामी, जिहादी और जयचन्दों ने पूरी ताक़त झोंक रखी है। यह पूरी जमात यह साबित करने पर तुली है कि अफगानिस्तान में हो रहे सम्पूर्ण घटनाक्रम को ढाल बनाकर सत्तापक्ष अपनी तथाकथित नाकामियों को छुपाना चाहता है। साथ ही इस मुहिम के माध्यम से यह भी साबित करने का असफल प्रयास किया जा रहा है कि अफगानिस्तान में ऐसा कुछ भी नहीं है बल्कि वहां तो "तालिबानी क्रांतिकारियों" ने विदेशी शासन को उखाड़ फेंका है और इस्लाम की शांति और सौहार्दपूर्ण सत्ता को स्थापित किया गया है।
 दूसरे शब्दों में कहें तो "तालिबान क्रांतिकारियों" ने अपने अधिकारों को वापस ले लिया है। 

इस मुहिम को चलाने वाले लोगों में लुटियन पत्रकार, दरबारी शायर और लिब्राण्डू गैंग जैसे तमाम तथाकथित बुद्धिजीवी शामिल हैं।

यहां ग़ौरतलब है कि यह वही लोग हैं जो कल तक फलीस्तीन में हमास आतंकियों की "हगास" निकालने वाले इजरायल और उसके राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू को पानी पी-पीकर कोस रहे थे। जब हमास के दावों की हवा निकाली जा रही थी तब इनके पेट में मरोड़ उठ रही थीं। उस समय "मज़हब" ख़तरे में नज़र आ रहा था। उस वक़्त यही "बैद्धिक लिब्रांडू" भारत सरकार से फलीस्तीन का समर्थन करने का दबाव बनाने के लिए मानवाधिकार, नैतिकता और न जाने किस-किस प्रकार का शोर मचा रहे थे। 
उस समय न तो इन्हें राजनीति दिखाई दे रही थी और न ही कोई क्रांति होती दिख रही थी। न महंगाई का ज़िक्र हो रहा था, न बेरोजगारी पर छाती कूट रहे थे, न कथित किसान आंदोलन पर विधवा विलाप कर रहे थे और न ही पेट्रोल-डीज़ल पर चर्चाएं हो रही थीं। क्योंकि उस समय इनका "मज़हब" ख़तरे में था और मज़हब की आड़ में "आतंक" फैलाने वालों का   "बैकबोन" सुजाया जा रहा था। 
आज जबकि अफगानिस्तान में चंद मज़हबी उन्मादियों ने आतंक और हैवानियत की सारी सीमाएं लांघ रखी हैं। सरेआम औरतों की बोलियां लगाई जा रही हैं, बूढ़ों और बच्चों को बड़ी बेदर्दी के साथ क़त्ल किया जा रहा है। जवान औरतों की अस्मत लूटी जा रही है और नौजवान लड़कों को ग़ुलाम बनाया जा रहा है। तब यह लोग इसे "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम" का नाम देकर भारत के महान क्रांतिकारियों, शहीदों और स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शौर्य, बलिदान और त्याग का अपमान करने पर तुले हैं।

कांगी, वामी, जिहादी और सेक्युलरिज्म नामक भेड़ की खाल में छुपे हुए यह भेड़िए तालिबानी हैवानियत के नंगे नाच को "भाजपा की राजनीति" बताकर अपनी बेशर्मी की चादर से ढकने का असफ़ल प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह पब्लिक है साहब, ये सब जानती है।

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गुरुवार, 19 अगस्त 2021

स्वरा भास्कर जैसे लोगों को तस्वीर के दोनों रुख़ देखने चाहिए

भारत में टुकड़े-टुकड़े गैंग और "बौद्धिक आतंकवाद" की सदस्या स्वरा भास्कर ने ट्वीट करते हुए लिखा,"हम हिंदुत्व के आतंक के साथ ठीक नहीं हो सकते और हम तालिबान के आतंकी हमले से टूट गए हैं और पूरी तरह से सदमें में हैं। हम तालिबान के आतंक से शांत नहीं हो सकते और हम सभी हिंदुत्व के आतंक के बारे में नाराज होते हैं। हमारे मानवीय और नैतिक मूल्य पीड़िता या उत्पीड़क की पहचान पर आधारित नहीं होने चाहिए।"

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में टिकटॉक पर वीडियो बनाने वाली एक महिला ने आरोप लगाया है कि यहां स्वतंत्रता दिवस (14 अगस्त) के मौके पर उसके कपड़े फाड़ दिए गए और उसे लोगों ने हवा में उछाला. इसके साथ ही, लोगों ने महिला के साथ जमकर मारपीट भी की. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक महिला अपने छह साथियों के साथ 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर मीनार-ए-पाकिस्तान के पास एक वीडियो बना रही थी, तभी करीब 300 से 400 लोगों ने उन पर हमला कर दिया. इसको लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो ख़ूब वायरल हो रहा है जिसमें साफ़ देखा जा सकता है कि मज़हबी उन्माद से भरे हुए कुछ जाहिल और गुंडे किस्म के लोग किस प्रकार से हैवानियत और बेशर्मी की सारी हदों को पार करते हुए उस महिला के साथ वहशियाना हरकतें कर रहे हैं और अपनी इस बेशर्मी और हैवानियत की वीडियो भी बना रहे हैं। जिसके बाद से ये मसला इंटरनेट की दुनिया में छाया हुआ है. ट्विटर पर भी #minarepakistan ट्रेंड कर रहा है.

यहां हुई दो घटनाओं से तस्वीर के दो रुख़ स्पष्ट नज़र आते हैं। 
पहला यह कि किस प्रकार से स्वरा भास्कर, बरखा दत्त, जया बच्चन, शबाना आज़मी और शाहीन बाग़ सरीखे आंदोलन में भाग लेने वाली दादियों द्वारा भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नारी सम्मान की परम्परा का अनुचित लाभ उठाया जाता है। भारत में स्वरा भास्कर जैसे लोगों को "हिंदुत्व" का आतंक दिखाई देता है। और वह मानवीय और नैतिक मूल्यों की दुहाई देती हैं। लेकिन जिस प्रकार पाकिस्तान में दुर्योधन और दुःशासन बने मज़हबी गुंडों ने आयशा नामक महिला टिक टॉकर का चीरहरण किया है, उस पर स्वरा भास्कर सहित प्रियंका वाड्रा, सोनिया गांधी, जया बच्चन, शबाना आज़मी, बरखा दत्त, रवीश कुमार और पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे दोगलों को सांप सूंघ गया है। वहां जिस प्रकार से मानवीय और नैतिक मूल्यों का हनन हुआ उस पर कोई मुहं खोलने को तैयार नहीं है। वह तमाम लोग जो स्त्री-पुरुष की समानता और नारी मुक्ति आंदोलन चलाते हैं, चुप हैं। वह तमाम कांगी, वामी और महिला कल्याण के पैरोकार जो दिनरात नारी स्वतंत्रता की बातें करते हैं। वह सब ख़ामोश क्यों हैं? दरअसल, ऐसे लोग जिस थाली में ख़ाते हैं उसी में छेद करते हैं।

और दूसरा रुख जो कि स्वरा भास्कर साहिबा को भी समझना चाहिए कि यह हिंदुत्व की संस्कृति और संस्कार ही हैं कि भारत में किसी ने आपके कपड़े नहीं उतारे, आपको हवाओं में नहीं उछाला, आपके नाज़ुक अंगों को नहीं छेड़ा और न ही आपके साथ कभी मारपीट की है, उसके बाद भी आपको हिंदुत्व में आतंक नज़र आता है।
तो फिर सबसे बेहतर होगा कि आप एक बार मीनारे-पाकिस्तान जरूर घूमकर आइये ताकि आपको मालूम तो हो कि आतंकवाद का अजगर कैसा होता है और वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे निगल जाता है। और शांतिप्रिय और सौहार्दपूर्ण मज़हबी गुंडे किस हद तक वहशी हो सकते हैं।

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बुधवार, 18 अगस्त 2021

क्या भारत में यह एक नए तालिबान की सुगबुगाहट है

कोई भी व्यक्ति, व्यक्तियों का समूह अथवा संगठन कभी ताक़तवर नहीं होता, ताक़तवर होती है उस व्यक्ति या संगठन की सोच, उसकी मानसिकता या उसकी विचारधारा। व्यक्ति मिट जाता है, समाप्त हो जाता है परन्तु उसकी सोच, उसकी विचारधारा सदैव जीवित रहती है। इसलिए व्यक्ति को मारने से बेहतर है कि उसकी सोच, उसकी विचारधारा को मार दो। सांप घातक नहीं होता बल्कि उसका वह दांत घातक होता है जिसमें ज़हर होता है। इसलिए सांप को मारने से कहीं अधिक बेहतर है कि उसके उन दांतों को तोड़ दो जिनमें ज़हर भरा है। 

नाथूराम गोड्से ने मोहनदास करमचंद गांधी को मारा था, गांधीवाद को नहीं। कांग्रेस ने उसी गांधीवाद को पुष्पित-पल्लवित किया और उस गांधीवाद को ढाल बनाकर इस देश पर 70 सालों तक हुक़ूमत की। 
तालिबान एक ऐसी ही विचारधारा है। अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उभार हुआ था. *पश्तो भाषा में तालिबान का मतलब होता है "छात्र", खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. माना जाता है कि कट्टर सुन्नी इस्लामिक विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं (मज़हबी इदारों) अर्थात मदरसों के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान पर देवबंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है। तालिबान को खड़ा करने के पीछे अरब देशों से आ रही आर्थिक मदद को जिम्मेदार माना गया था।* शुरुआती तौर पर तालिबान ने ऐलान किया कि इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म किया जाना, वहां शरिया कानून और इस्लामिक राज्य स्थापित करना उनका मकसद है। *यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शुरुआत में तालिबानियों ने अफगान में शांति, प्रेम, सौहार्द और भाईचारे की ही बात की थी जिसके चलते शुरू-शुरू में सामंतों के अत्याचार, अधिकारियों के भ्रष्टाचार से परेशान अफगानी आवाम ने तालिबान में मसीहा देखा और कई इलाकों में कबाइली लोगों ने इनका स्वागत किया लेकिन बाद में तालिबान की कट्टर इस्लामिक विचारधारा और गतिविधियों ने उसकी ये लोकप्रियता भी खत्म कर दी।* लेकिन तब तक तालिबान अपनी जड़ें मज़बूत करने में सफल हो चुका था। 
तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का संगठन है. इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान- अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों यानी मदरसों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं. घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना। पहले मुल्ला उमर और फिर 2016 में मुल्ला मुख्तर मंसूर की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत के बाद से मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंजादा तालिबान का चीफ है. वह तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य मामलों का सुप्रीम कमांडर है. हिब्तुल्लाह अखुंजादा कंधार में एक मदरसा चलाता था और तालिबान की जंगी कार्रवाईयों के हक में फतवे जारी करता था। 

भारत में भी एक विशेष वर्ग तालिबानी विचारधारा को एक लंबे समय से पुष्पित-पल्लवित कर रहा है। तालिबानी किसी देश या क्षेत्र विशेष की विचारधारा नहीं है। बल्कि यह पूरी दुनिया में इस्लामिक शासन को स्थापित करने और कट्टरपंथी सुन्नी विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित करने का वहाबी आंदोलन कहा जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष पढ़ाई-लिखाई की आवश्यकता नहीं है बल्कि  जो कोई भी शख़्स पूरी दुनिया में इस्लामिक हुक़ूमत औऱ कट्टरपंथी सुन्नी विचारधारा से पूर्णतया सहमत है, वही व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह तालिबानी है।

आज जिस प्रकार से समाजवादी पार्टी के एक सांसद और उसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना सज्जाद नौमानी ने तालिबानी विचारधारा को अपना समर्थन दिया है, उससे लगता है कि भारत में भी तालिबानी विचारधारा को प्रोत्साहन मिल रहा है। यह न केवल भारत में एक नए तालिबान की सुगबुगाहट है बल्कि एक बेहद गम्भीर चिंतन का विषय भी है। जिस पर भारत की सरकार और शांतिप्रिय जनता को बहुत  सावधानी पूर्वक विचार करना होगा।

न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दुस्तां वालो।
तुम्हारी दास्तां भी न रहेगी दास्तानों में।।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

क्या BJP अर्थात बैकवर्ड जन पार्टी बन रही है

भाजपा पहले हिन्दू, हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र की बात करती थी, तब वह हिंदुओं की पार्टी कहलाती थी। उसके बाद 2019 में भाजपा ने अपना चोला बदला और राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की दुहाई देनी आरम्भ कर दी, तब वह राष्ट्रवादी पार्टी कहलाने लगी। अब उत्तरप्रदेश में चुनाव होने का बिगुल बजते ही भाजपा ने जिस प्रकार से बैकवर्ड कार्ड खेलना आरम्भ किया है, उससे लग रहा है कि कुछ समय पश्चात BJP का नया नामकरण "बैकवर्ड जन पार्टी" के नाम से होगा। मतलब हिंदुवादी और राष्ट्रवादी पार्टी अब धीरे-धीरे "पिछड़ावादी पार्टी" बनती जा रही है।
अभी तक जितनी सरकारी योजनाएं और कार्यक्रम आए हैं उनका अधिकांश लाभ पिछड़ा वर्ग को ही मिलता नज़र आ रहा है। और तो और सवर्ण वर्ग की कई जातियों को अब पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया है, जिसमें सबसे प्रमुख हिन्दू कायस्थ हैं, जिन्हें पूर्वान्चल में "लाला" कहा जाता है। मजे की बात यह है कि यह अभी भी हमारी समझ से परे है कि इसे कायस्थ जाति का प्रमोशन कहा जाए या फिर डिमोशन? फिलहाल तो सभी अगड़े अपने को पिछड़ा कहलवाने में गौरवांवित अनुभव कर ही रहे हैं।
उत्तरप्रदेश में पिछड़ों की संख्या 42 प्रतिशत है, अब शायद और बढ़ गई होगी। इस पिछड़े समाज पर अभी तक केवल समाजवादी पार्टी का एकछत्र राज चल रहा था, लेकिन अब BJP ने इसमें अंदर तक सेंध लगा ली है। ऐसे में इसका सबसे बड़ा नुकसान समाजवादी पार्टी को हो रहा है।
अब इसके बाद जो एक नया खेल खिलने जा रहा है, उसकी शायद किसी को कोई ख़बर नहीं है। जल्दी ही हम उस नए "खेला" पर प्रकाश डालेंगे। और हमें यकीन है कि अगर BJP अपने उस खेल में सफल रही तो 2022 में उत्तरप्रदेश में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।
अखिलेश यादव और मायावती सहित तमाम विपक्षी दल केवल हवा में कबूतर उड़ाते नजर आएंगे। 
यहां एक और बात बताते चलें कि भाजपा ब्राह्मण समाज को साधने का भी एक गुरुमंत्र तलाश कर चुकी है, सही समय आने पर उसे भी बाहर निकाला जाएगा। 
भाजपा केवल 2022 के लिए सोचकर कोई काम नहीं कर रही है बल्कि यह सारा खेल-तमाशा 2024 के आयोजन की तैयारियों की एक झलक मात्र है। 

फिलहाल तो यह ट्रेलर है,  पिक्चर तो अभी बाकी है मेरे दोस्त।।

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मंगलवार, 17 अगस्त 2021

क्या शफीकुर्रहमान बर्क़ जैसे लोग भारत में तालिबानी विचारधारा को पुष्पित-पल्लवित कर रहे हैं


उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी का "मुगल आक्रांताओं से प्रेम" किसी से छुपा नहीं है। लेकिन सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब ने जिस प्रकार से तालिबानी आतंकियों को "क्रांतिकारी" बताया है वह न केवल बेहद शर्मनाक है बल्कि सच पूछिए तो वह कहीं न कहीं समाजवादी पार्टी के कुछ कट्टरपंथी नेताओं की "तालिबानी" विचारधारा को भी प्रदर्शित करता है। शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब जैसे लोग भारत में एक लंबे समय से कट्टरपंथी विचारधारा को पुष्पित-पल्लवित करने में लगे हुए हैं, लेकिन जिस प्रकार से पिछले कुछ समय से इन नेताओं ने अपनी कट्टरपंथी मानसिकता को उजागर किया है उससे उन तमाम लोगों को सबक़ लेना होगा जो लगातार गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते रहे हैं। जिन्हें लगता है कि "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना" उन तमाम लोगों को शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब और उन जैसे तमाम "कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों" के तालिबानी समर्थक विचारों को गम्भीरता से लेना होगा। 
सम्पूर्ण विश्व जानता है कि तालिबानी आतंकियों द्वारा अफ़ग़ान पर कब्ज़ा कराने में सबसे बड़ा हाथ पाकिस्तान का है। और इसीलिए पाकिस्तान सबसे ज़्यादा ख़ुशी ज़ाहिर कर रहा है। यहां यह भी समझना जरूरी है कि जिन निर्दोष अफगानियों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया और उनकी बहू-बेटियों को सरेआम नीलाम किये जाने की खबरें सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रही हैं, वह अफगानी भारत के शुभचिंतकों में ही से थे। सही मायने में अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्ज़ा अप्रत्यक्ष रूप से भारत की कूटनीतिक हार है और पाकिस्तान सहित तमाम कट्टरपंथी जिहादियों की जीत। ऐसे में जो लोग तालिबान से हमदर्दी अथवा सहमति जता रहे हैं, क्या उन लोगों को भारत का शुभचिंतक माना जा सकता है? यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर कांगी, वामी और "बौद्धिक आतंकियों" के पास कभी नहीं हो सकता है। इसका उत्तर उन लोगों के पास कभी हो ही नहीं सकता जो पाकिस्तान के गीत गाते हैं, जिनकी रैलियों में "पाकिस्तान ज़िंदाबाद" के नारे लगा करते हैं और जो लोग "आईएसआईएस" की विचारधारा से पूर्णतया सहमत रहते हैं।

अफगानिस्तान में भाई के द्वारा भाई का खून बहाकर सत्ताओं पर कब्ज़ा करना "औरंगजेबी मानसिकता" का सबसे ताज़ातरीन उदाहरण है। जिसकी सराहना वह प्रत्येक व्यक्ति कर रहा है जो हमेशा से "मुग़ल आक्रान्ताओं" को अपना मसीहा मानता रहा है, जिसने सदा से "गज़वा-ए-हिन्द" का सपना देखा है और अब अफगानिस्तान पर तालिबानियों का कब्ज़ा होने के बाद उसे अपना वह सपना साकार होता नज़र आ रहा है। यह वही लोग हैं जिनके लिए उनके "मज़हबी कानून" किसी भी देश के संविधान से अधिक महत्व रखते हैं। यह वही लोग हैं जो कश्मीरी आतंकियों को "क्रांतिकारी" का दर्जा देते हैं और जिनके लिए कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है।

 ऐसे तमाम लोगों से अगर आप "भाईचारा", आपसी सौहार्द, शांति-सद्भावना और प्रेमालाप की इच्छा रखते हैं तो आप ठीक उस कबूतर की तरह ही हैं जो बिल्ली के आने पर अपनी आंखें बंद कर लेता है और शायद सोचता है कि बिल्ली उसको नहीं देख पाएगी।

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सोमवार, 16 अगस्त 2021

अखिलेश जी इन्हें पार्टी के गुणगान के साथ-साथ राष्ट्रगान भी सिखाईये

एक वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रहा है। दरअसल वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद तालियां बजाते हुए राष्ट्रीय गान जन–गण–मन की शुरुआत करते हैं। बीच में ही वह राष्ट्रगान भूल जाते हैं और एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं। हालांकि हम इस वीडियो की कोई पुष्टि नहीं करते परन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि जो लोग इस वीडियो को देखकर समाजवादी पार्टी को ट्रोल कर रहे हैं, उन्हें यह जानना और समझना चाहिए कि जिस पार्टी के नेताओं ने सदैव मुगल आक्रांताओं के शौर्यगीत गाये हों, मुगल आक्रमणकारियों के स्मारक बनाये हों, उनसे सही राष्ट्रगान गाने की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। सच पूछिये तो जिन लोगों का यह वीडियो है उन्होंने शायद जिंदगी में पहली बार झंडा फहराया है और राष्ट्रगान भी पहली बार ही गाया है। 
दरअसल सपा कार्यकता केवल "मुलायम परिवार" और "मुगल आक्रांताओं" के ही "गुनगान" करते रहे हैं इसलिये इससे अधिक उन्हें कुछ और याद रखना भी नहीं चाहिए। यह कुछ ऐसा ही है जैसे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को "शाही परिवार" और "चरखे से मिली आजादी" का गुनगान करना सिखाया जाता है। 
आजकल चुनावी मौसम चल रहा है और प्रदेश और देश में डबल इंजन की "राष्ट्रवादी सरकार" है। तब ऐसे में झंडा फहराने का स्वांग रचना कुछ लोगों की मजबूरी बन गया था। अन्यथा अधिकांश लोग तो 15 अगस्त और 26 जनवरी को केवल "सरकारी छुट्टी दिवस" के रूप में मनाते हैं। सच पूछिए तो जो लोग "राष्ट्र" और "राष्ट्रवाद" को नहीं मानते, उसके प्रति निष्ठावान नहीं हैं, उन लोगों को "राष्ट्रगान" कैसे याद रह सकता है। यहां यह भी समझ लेने वाली बात है कि जो लोग संवैधानिक और लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ का सम्मान नहीं कर सकते, वह राष्ट्रगान का मान भला क्योंकर रख सकते हैं।

मजे की बात यह है कि यदि ऐसे लोगों को कुछ समझाने का प्रयास किया जाए तो यह कुतर्कों पर उतर आते हैं और अगर उससे भी काम नहीं चलता तो गाली-गलौच और मारपीट पर भी उतारू हो जाते हैं।

हमारे प्रिय श्री अखिलेश यादव एक युवानेता हैं और उनके अंदर राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी है, ऐसा हमारा मानना है। हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि यदि सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो में थोड़ी सी भी सच्चाई है तो श्रीमान अखिलेश यादव उन तमाम नकारा और राष्ट्र के प्रति उदासीन भाव रखने वाले कार्यकर्ताओ को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएंगे।
अन्यथा प्रदेश की जनता पार्टी को प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखाने को तैयार बैठी है।

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शनिवार, 14 अगस्त 2021

भगवा को बदनाम करने का यह अच्छा रास्ता ढूंढा है इस "योगी महाराज" ने

गाँधीवाद कहता है कि "आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा"। लेकिन लगता है कि उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी के नेताओं को मोहनदास करमचंद गांधी की यह बात फूटी आंख नहीं सुहाई। इसलिए उन्होंने कहा कि "जब तक आप जानवर के साथ जानवर नहीं बनोगे तब तक यह घटनाएं होती रहेंगी।"

कानपुर में एक मुस्लिम रिक्शाचालक के साथ एक हिंदुवादी संगठन के नेताओं द्वारा कथित मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद उस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए, सुरेश ठाकुर "योद्धा" नामक समाजवादी पार्टी के एक छुटभैया नेताजी ने मीडिया के हवाले से यह बयान दिया है। उनका यह बयान "बुलन्द भारत" नामक एक यूट्यूब चैनल के माध्यम से सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रहा है।
सुरेश ठाकुर योद्धा नामक समाजवादी पार्टी के यह नेताजी 2011 में सुश्री मायावती के शासनकाल में बनवाये गए पार्क और स्मारक में पम्प ऑपरेटर के सरकारी पद पर नियुक्त हुए थे लेकिन दिसम्बर 2017 में उन्हें इस पद से बर्खास्त कर दिया गया। अपनी नौकरी वापस पाने के लिए सुरेश ठाकुर ने बहुत हाथपैर मारे लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। तब उन्होंने बर्खास्त कर्मचारियों की नेतागिरी शुरू कर दी और उनके नेता बन गए। इसके साथ ही सुरेश ठाकुर ने अपना मुंडन भी करा लिया और अपने सरनेम के साथ "योद्धा" शब्द भी लगा दिया। 
सुरेश ठाकुर नामक इस बर्खास्त सरकारी कर्मचारी का चेहरा-मोहरा और कद-काठी काफ़ी हद तक वर्तमान मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ से मिलती है। 
इसी बीच इस नकली "बाबा जी" की मुलाक़ात पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख श्रीमान अखिलेश यादव से हो गई। और तभी से यह अखिलेश जी के चहेते भी बन गए। अखिलेश जी ने अपने एक ट्वीट में कहा भी था कि "हम नकली भगवान तो नहीं ला सके लेकिन एक बाबा जी लाये हैं। ये हमारे साथ गोरखपुर छोड़ प्रदेश में सबको सरकार की सच्चाई बता रहे हैं". अखिलेश जी के इस ट्वीट से यह स्पष्ट हो गया कि कल तक नकली समाजवाद और छद्म सेक्युलरिज्म की बात करने वाले अब नकली भगवा का सहारा लेने लगे हैं। या यूं कहिये कि शायद समाजवादी पार्टी इस नकली और ढोंगी भगवाधारी बहरूपिये की आड़ में हिन्दू संत-महात्माओं और भगवा वस्त्रों की पवित्र और पावन छवि को बदनाम करने में जुट गई है। 
कहते हैं कि भेड़िया भले ही भेड़ की खाल पहन ले लेकिन गुर्राना नहीं छोड़ता। क्योंकि कपड़े बदलने से व्यक्ति का चरित्र नहीं बदलता। और अंततः इस नकली भगवाधारी "योगी" ने अपना असली रंग दिखा ही दिया।

श्रीमान अखिलेश यादव जी ने शायद यह कहावत नहीं सुनी- 

सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से।
के खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से।।

https://youtu.be/QjVl6CIVwQM

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गुरुवार, 12 अगस्त 2021

दिशाहीन और नेतृत्व विहीन विपक्ष का अमर्यादित आचरण

विरोध दो प्रकार का होता है- एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। सकारात्मक विरोध करना स्वस्थ लोकतंत्र, सभ्यता और सुसंस्कार की पहचान है। क्योंकि सकारात्मक विरोध हमेशा मर्यादित आचरण और सभ्यता की सीमाओं में किया जाता है। इसलिए सकारात्मक विरोध हमेशा सकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित करता है। जबकि इसके विपरीत नकारात्मक विरोध अमर्यादित आचरण और असभ्यता को जन्म देता है जिससे वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैलती है।
जो लोग निराशा और हताशा की गर्त में डूबे होते हैं वह हमेशा नकारात्मक विरोध करते हैं।
अभी हाल ही में संसद के दोनों सदनों में जिस प्रकार से विपक्ष ने आचरण किया वह पूर्णतया अमर्यादित था, और उनका विरोध पूरी तरह नकारात्मक ऊर्जा को फैलाता चला गया। दरअसल वर्तमान में विपक्ष पूरी तरह से निराशा और हताशा के गर्त में डूबा हुआ है। उसके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिसपर वह सरकार से सकारात्मक और सार्थक चर्चा कर सके। विपक्ष विशेषकर कांग्रेस स्वयं भी जानती है कि जनता का उसपर से पूरी तरह से विश्वास उठ चुका है। आज भारत धीरे-धीरे कांग्रेस मुक्त होता जा रहा है। और जनता के सामने कांग्रेस के राज में हुए तमाम भ्रष्टाचार, घोटाले और झूठ-फरेब की राजनीति का कच्चा चिट्ठा खुल चुका है। और कांग्रेस पूरी तरह से बेनकाब हो चुकी है। लेकिन कांग्रेसी नेता इस सच्चाई को जानकर भी अंजान बने हुए हैं। विपक्ष पूरी तरह से दिशाहीन और नेतृत्वविहीन हो चुका है। जब कोई भी व्यक्ति/समूह दिशा और दशा हीन हो जाता है, तब वह तर्क-वितर्क से बचने लगता है, और जब कोई भी इंसान तर्क-वितर्क से बचने लगता है तब वह कमज़ोर हो जाता है और कमज़ोर इंसान हमेशा कुतर्क करता है, और जब उसके कुतर्क नहीं माने जाते तब वह चीखता है, गाली-गलौज करता है, और अंततः मारपीट पर उतारू हो जाता है। कमोवेश आज यही स्थिति भारत में विपक्ष की हो चुकी है। सम्पूर्ण विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में है, और कांग्रेस का नेतृत्व अभी भी श्री राहुल गांधी के हाथों में है। परन्तु  श्री राहुल गांधी चंद संगठनों और नेताओं का नेतृत्व करने में लगातार असफल रहे हैं, जिसमें उनकी स्वयं की पार्टी के नेता भी शामिल हैं।
स्वयं राहुल गांधी ने लोकतंत्र के मंदिर में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के जबरदस्ती गले पड़ने के बाद किस प्रकार का अश्लील, बेहूदा ईशारा करते हुए अमर्यादित आचरण प्रस्तुत किया था। जिसे पूरी दुनिया ने देखा था। उस समय जो आचरण श्री राहुल गांधी ने किया था, वह उनकी हताशा और घोर निराशा का ही एक नमूना था।
श्रीकृष्ण ने श्रीमद भगवतगीता में कहा है कि श्रेष्ठजन जिस प्रकार का आचरण करते हैं, उनके अनुयायी वैसा ही आचरण दोहराते हैं।
शायद श्री राहुल गांधी जनेऊ धारण करने से पूर्व श्रीमद गीता पढ़ना भूल गए थे।

बहरहाल, विपक्ष का यह दुर्भाग्य है कि उन्हें श्री राहुल गांधी जैसा निराश और हताश नेता मिला और भारत की जनता का भी यह दुर्भाग्य ही है कि उसे एक दिशाहीन और दशाहीन विपक्ष मिला है। जो स्वयं दिशाहीन है वह सत्तापक्ष को कैसे दिशा दिखा सकता है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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बुधवार, 11 अगस्त 2021

डासना को डसने वालों पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई

मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तरप्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के डासना क्षेत्र में स्थित माता के मंदिर में अज्ञात हमलावरों ने मंदिर परिसर में सो रहे महंत यति नरसिंघा नन्द सरस्वती के शिष्य स्वामी नरेशानन्द सरस्वती पर प्राणघातक हमला कर दिया। इस लेख के लिखे जाने तक घायल साधु महाराज की हालत काफी गम्भीर बताई जा रही है।
इससे पहले भी डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहा नन्द सरस्वती की भी हत्या का प्रयास किया गया था और इसीलिए मंदिर की सुरक्षा के लिए वहां हर समय पुलिस का कड़ा पहरा लगा रहता है। परन्तु इतने कड़े पहरे के बावजूद हमलावरों का अपने काम को अंजाम देकर भाग जाना पुलिस सुरक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि हिन्दू समाज के एक धर्मगुरू पर इतनी बड़ी विपदा आई है उसके बावजूद भी "बड़े हिन्दू" क्यों चुप्पी साधकर बैठे हैं। बड़ी घटना पर तो "बड़े हिंदुओं" का बोलना बनता है भाई। उधर सत्तात्रेय गोत्र के जेएनयूधारी पोंगापण्डित भी ट्विटर पर दही जमाये बैठे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल साहब ने भी सहानुभूति और सांत्वना के दो शब्द नहीं कहे। उधर प्रबुद्ध वर्ग को अपने पाले में करने के लिए हाथी पर बैठकर प्रदेश भ्रमण पर निकले "हाथी वाले" मिश्र जी भी खामोश से नज़र आ रहे हैं, या फिर जानबूझकर इस सबको नजरअंदाज कर रहे हैं। क्यों?
शायद इसलिए क्योंकि यह सब जानते हैं कि खून में सना हुआ वस्त्र भगवा रंग का है, अगर यह हरे रंग का होता तो शायद अब तक प्रदेश भर में खून के बदले खून की मांग उठ गई होती। इटैलियन मां-बेटियां छातियाँ पीटकर विधवा विलाप करने लगतीं। "पप्पू भैया" भी ट्विटर-ट्विटर खेलने लगते और "बड़े हिन्दू" के समर्थक भी शर्ट उतारकर सड़कों पर आ जाते। "आप" के टिकट ब्लैकमेलर भी स्याही से मुहं काला करवाने आ जाते और साथ में फर्जी दस्तावेजों की पोटली भी उठाए घूमते। गांधीवादी चमचे मीडिया के सामने अहिंसा, प्रेम और शांति का पाठ पढ़ना शुरू कर देते। गाजियाबाद की सड़कों पर हैदराबादी बिरयानी बंटने लगती और धर्म ख़तरे में आ जाता। ढपली गैंग सड़कों पर उतरकर कान फोड़ने लगता, अवार्ड वापसी गैंग अपने पुराने जंक लगे अवार्ड ढूढंने लगता ताकि वापस किए जा सकें। मां की गोद में बैठे एक शायर साहब को अपनी नानी याद आने लगती। झुठेश कुमार भी अपना "झूठ लाइम टाइम" शो चालू कर देते। स्वरा भाड़कर, बरखा हट, अनुराग कचरापेटी, टर्की प्रेमी आमिर pk सहित तमाम "असहिष्णुता बताओ" गैंग  छाती पीटने लगता।
 कुल मिलाकर हर गांधीवादी, वामपंथी और कथित बुद्धिजीवी को हिन्दू आतंकवाद का ख़तरा पूरे देश पर मंडराते हुए दिखाई देने लगता।

लेकिन हाय री तकदीर, इन बेचारों के हाथ कुछ न लगा, पता नहीं कौन कमबख्त डासना मंदिर में इन "बड़े हिंदुओं" के अरमानों को डस कर भाग गया। काश किसी हरे रंग वाले वस्त्रों पर हाथ साफ किया होता तो चुनावी दाल में और बढ़िया तड़का लगाया जा सकता था।
पर अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।। 

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी तुष्टिकरण किया जा रहा है क्या?

इस देश में तुष्टीकरण की राजनीति की एक बहुत पुरानी परम्परा रही है। "तुष्टिकरण की राजनीति के गॉड फादर" मोहनदास करमचंद गांधी के रोपे गए तुष्टिकरण के पौधे को कांग्रेस और वामपंथ ने ख़ूब पुष्पित-पल्लवित किया। परन्तु अजीब विडम्बना यह है कि जिन लोगों ने गांधीवाद और वामपंथी विचारधारा का पुरज़ोर विरोध कर राजगद्दी प्राप्त की, वही कथित हिंदुवादी सरकारें हिन्दू और हिंदुत्व का गला घोंटने में लगी हैं, उनकी आवाज़ को दबाने का हरसम्भव प्रयास किया जा रहा है। मज़े की बात यह है कि बड़ी चतुराई से सारा ठीकरा कभी ओवैसी पर, कभी केजरीवाल,कभी शिवसेना पर, कभी ममता पर तो कभी कांग्रेस पर फोड़ दिया जाता है।
दिल्ली में जंतर-मंतर पर तथाकथित भड़काऊ नारों के आरोप में श्रीमान अश्वनी उपाध्याय सहित कई हिन्दू संगठनों के नेताओं को गिरफ़्तार किया गया है। कांवड़ यात्रा पर स्वतः संज्ञान लेने वाले माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन नेताओं की हिरासत को वैध माना है।
मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार असदुद्दीन ओवैसी साहब की घोर आपत्ति के पश्चात ही दिल्ली पुलिस-प्रशासन ने हिन्दू नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही की है। यहां सुधि पाठकों के लिये यह जानना परम आवश्यक है कि यह वही ओवैसी साहब हैं जिनके छोटे भाईजान ने कथिततौर पर अपने बयान में कहा था कि - अगर पुलिस को हटा दिया जाए तो 100 करोड़ हिंदुओं को मात्र 15 मिनट में काट दिया जाएगा। वही ओवैसी साहब जिनकी पार्टी के वारिस पठान साहब ने कथितरूप से कहा था कि 15 करोड़ हैं, लेकिन 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इन्हीं असदुद्दीन ओवैसी साहब को भाजपा का "खास सहयोगी" बताया जाता है, और यह भी बताया जाता है कि ओवैसी साहब गृहमंत्री अमित शाह जी के बहुत करीबी हैं।हालांकि हम इस सबकी पुष्टि नहीं करते हैं, लेकिन धुंआ तभी उठता है जब कहीं आग लगी हो।

ज़रा इस पर भी गौर फरमाइए कि NRC-CAA के विरोध में महीनों तक दिल्ली की सड़कों को जाम करने वाले शाहीन बाग़ में चल रहे कथित आंदोलन में जब देश के प्यारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री श्री अमित शाह के विरोध में आपत्तिजनक नारे लगाए जा रहे थे। कुछ कथित शिक्षा मंदिरों में हिंदुत्व की कब्र खोदने की तैयारियाँ चल रही थीं। कश्मीर की आज़ादी की मांग की जा रही थी, तब दिल्ली पुलिस और राष्ट्र्वादी सरकारें कानों में रुई डाले हुए क्यों बैठ गई थीं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी तक जिस प्रकार से कथिततौर पर हिन्दू और देश विरोधी ज़हरीले भाषण दिए जा रहे थे। जिस प्रकार से अभिनेता से लेकर शायर तक ज़हर उगल रहे थे। तब ओवैसी साहब के पेट में दर्द क्यों नहीं हुआ था और न ही दिल्ली पुलिस को कार्यवाही करने का कोई उचित कारण मिल रहा था। कथित किसान आंदोलन की आड़ में क्या-क्या हो रहा है और क्या-क्या हुआ, यहां तक कि दिल्ली पुलिस के जवानों पर प्राणघातक हमले भी हुए, और तो और देश की आन-बान और शान तिरंगे झंडे का भी अपमान हुआ। 
आज भी उस कथित आंदोलन के कारण हजारों-लाखों लोगों का रोज़गार, उनके बच्चों की शिक्षा पर ज़वाल आया हुआ है, उसके बावजूद हमारी राष्ट्रवादी सरकारें कानों में तेल डालकर बैठी हैं। 

अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के अनुसार दिल्ली में ही फ्लाई ओवर पर मज़ार बना दी गई और जब कुछ हिंदुवादी संगठनों और राष्ट्रवादी पत्रकारों ने उसके विरुद्ध आवाज़ उठाई तो दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया, यह किसी से छिपा नहीं है। हालांकि हम ऐसे किसी वायरल वीडियो की कोई पुष्टि नहीं कर रहे, परन्तु कुछ तो हुआ है। 

क्या इस सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तुष्टिकरण कहना अनुचित होगा। शायद नहीं। क्योंकि सब जानते हैं कि दिल्ली पुलिस किसके अंडर में काम करती है और दिल्ली पुलिस को कहां से आदेश प्राप्त होते हैं।
लेकिन हम तो केवल यह जानना चाहते हैं कि आखिर राष्ट्रवादी और हिंदुओं की एकमात्र रक्षक सरकारों की ऐसी क्या मजबूरी है कि उन्हें जंतर-मंतर पर हुए हिंदुवादी और राष्ट्रवादी आंदोलन के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस मजबूरी पर हमें एक शेर याद आता है-

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी उनकी।
यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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मंगलवार, 10 अगस्त 2021

अजय कुमार लल्लू साहब कभी बताएं कि मस्जिद और मदरसों में क्या सिखाया जाता है

बीते सोमवार को नगर क्षेत्र के दशहरा बाग मैदान से कलेक्ट्रेट तक आयोजित 'बीजेपी गद्दी छोड़ो मार्च' कार्यक्रम में बाराबंकी पहुंचे अजय कुमार लल्लू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के पिता को "अब्बा" कहे जाने वाले बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि "मठ और मंदिर में उन्होंने इसी तरह की भाषा को सीखा होगा।" 

अजय कुमार लल्लू साहब की इसमें कोई गलती नहीं है, उनके आका श्रीमान "पप्पू साहब" भी कहा करते हैं कि लोग मंदिरों में लड़कियां छेड़ने जाते हैं। मज़े की बात यह है कि इस बयान के बाद से ही "पप्पू साहब" देश के मंदिरों में माथा टेकते हुए घूमते रहे हैं। अब "लल्लू साहब" के बयान से यह ज़ाहिर है कि उनका यह कहना है कि श्री योगी आदित्यनाथ ने मंदिरों और मठों से "ऐसी भाषा" सीखी है। अर्थात दूसरे शब्दों में मंदिरों और मठों में "अभद्र भाषा" सिखाई जाती है। 
मंदिरों और मठों पर अनर्गल और बेहूदे आरोप लगाना गांधीवादियों, वामपंथियों और सेक्युलर गैंग की तुष्टिकरण की राजनीति और हिन्दू विरोधी मानसिकता का सदा से परिचायक रहा है। ख़ुद "तुष्टिकरण की राजनीति के गॉड फादर" परम पूजनीय स्व. मोहनदास करमचंद गांधी ने मंदिरों में पवित्र कुरान का पाठ कराया था। किंतु क्या गांधी ने कभी किसी मस्जिद अथवा मदरसे में श्रीमद गीता का पाठ करने या कराने का साहस किया था? शायद कभी नहीं।

हिन्दू समाज की सहिष्णुता और उदारवादी विचारधारा का सबसे दुःखद पहलू यह है कि कोई भी "पप्पू" या "लल्लू" हिन्दू संस्कृति और आस्थाओं पर आसानी से कुठाराघात कर देता है।

क्या अजय कुमार लल्लू जैसे हिन्दू विरोधी मानसिकता के नेता कभी इस प्रकार के अनर्गल और बेहूदे आरोप मस्जिद/दरगाह/मदरसे/चर्च/मिशनरी आदि पर लगा पाए हैं या लगा पाएंगे। शायद कभी नहीं। क्योंकि वह जानते हैं कि यदि उन्होंने ऐसी गुस्ताख़ी करने की कभी कोई कोशिश की तो उनके ख़िलाफ़ धड़ और सर जुदा कर दिए जाने के फ़तवे जारी कर दिए जाएंगे और उनके सर की खासी कीमत भी लगा दी जाएगी।
लेकिन हिन्दू समाज गांधी के तीन बंदरों की तरह न कुछ बोलता है, न सुनता है और न देख पाता है। क्योंकि गांधी ने उसे सिखाया था कि एक गाल पर थप्पड़ ख़ाकर दूसरा गाल आगे कर दो। और आज तक हिन्दू उसी सिद्धान्त को अपनाए हुए है।

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सोमवार, 9 अगस्त 2021

उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण सब्जियों में आलू की तरह है

उत्तरप्रदेश के ब्राह्मण समाज का हाल ठीक वैसा ही है जैसा कि सब्जियों में आलू का होता है। आलू हर सब्जी में पड़ता है लेकिन उसका ख़ुद का कोई नाम नहीं होता। उदाहरण के तौर पर सेम के साथ आलू पड़ता है लेकिन सब्जी सेम की होती है, ऐसे ही गोभी में आलू भी पड़ता है लेकिन सब्जी गोभी की ही कहलाती है।
ठीक ऐसे ही सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस और आप लगभग सभी पार्टियों में ब्राह्मण है, लेकिन उसके बावजूद इनमें से कोई भी पार्टी ब्राह्मणों की नहीं कहलाती है। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ब्राह्मण समाज कभी किसी के पीछे चलना पसंद नहीं करता, खुद ब्राह्मण ही ब्राह्मण के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता। और जो लोग ब्राह्मणों के नेता बने घूमते हैं, वह भी अपने को ब्राह्मणों का नेता नहीं बताते। 
बड़े भैया श्री सतीश चंद्र मिश्रा आजकल ब्राह्मणों के एक बड़े हितैषी के रूप में प्रदेश भर में भ्रमण कर रहे हैं लेकिन बड़े भैया श्री सतीश चंद्र मिश्रा में जरा भी हिम्मत है तो वह "बसपा" का नाम "बहुजन समाज पार्टी" से बदलकर "ब्राह्मण समाज पार्टी" रख दें। ऐसे ही समाजवादी पार्टी में जो लोग ब्राह्मणों के नेता बने घूम रहे हैं वह श्रीमान अखिलेश जी से कहें कि वह MY (मुस्लिम-यादव) को छोड़कर BY यानी (ब्राह्मण-यादव) की बात करें। लेकिन अखिलेश जी से ऐसा कहने की हिम्मत कोई नहीं करेगा। क्योंकि सबको मालूम है कि जन्नत की हक़ीक़त क्या है, लेकिन दिल को बहलाने के लिए यह ख़्याल अच्छा है।
आम आदमी पार्टी तो सही मायने में जनाब अमानुतल्ला खान साहब की पार्टी है, उसमें भला ब्राह्मणों का क्या काम? ब्राह्मण तो बस "आप" की पूंछ पकड़े घूम रहे हैं। 

अब अगर भाजपा की बात करें तो भाजपा में डिप्टी सीएम बने श्री दिनेश चंद्र शर्मा बताएं कि उन्होंने ब्राह्मणों को कौन सा वरदान दिया है? ब्राह्मण समाज के लिए श्रीमान दिनेश चंद्र शर्मा का कोई विशेष योगदान हमें तो नहीं दिखाई दिया। अलबत्ता यह जरूर है कि ब्राह्मण समाज को यह भ्रम जरूर है कि उनका एक नेता उत्तरप्रदेश का उपमुख्यमंत्री बना बैठा है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों को कोई लाभ पहुंचा हो तो बताइए। भाजपा को ब्राह्मणों की पार्टी कभी माना ही नहीं गया, अलबत्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज भी ब्राह्मणों का संगठन माना जाता है।

जहां तक प्रश्न कांग्रेस का है तो उसे तो तथाकथित जनेऊधारी दत्तात्रेय गोत्र के पोंगा पंडित श्री राहुल गांधी ने पूरी तरह से नेस्तानाबूत कर दिया है, यह कहकर कि कांग्रेस "मुस्लिम पार्टी" है। ऐसे में कांग्रेस को तो ब्राह्मण पार्टी माना ही नहीं जा सकता है।

कुल मिलाकर ब्राह्मण रहे आलू ही, जो हर सब्जी में पड़कर उसका स्वाद तो बढ़ा देता है लेकिन उसकी ख़ुद की कोई पहचान नहीं होती।
वैसे ब्राह्मणों को आलू ही बने रहने में फायदा है, वरना इनकी कोई भी पहचान नहीं रहेगी। क्योंकि ब्राह्मण को श्राप है कि वह कभी एकजुट और एक नेतृत्व को स्वीकार करके नहीं रह सकता है।

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अखिलेश जी आप तो "बड़े वाले" हैं साहब हम ठहरे "छोटे वाले हिन्दू"

मीडिया सूत्रों से मिली खबरों के अनुसार उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया श्री अखिलेश यादव ने कहा- ''पहले तो मैं जवाब दे दूं, बीजेपी वालों से बड़े हिंदू हम हैं। उनकी जो परिभाषा है हिंदू वाली, वह हमें नहीं चाहिए, जो नफरत फैलाती हो, लड़ाती हो समाज को बांटती हो़, हम उनसे बड़े हिंदू हैं। जहां तक भगवान की पूजा की बात है, आप सैफई का दिखाइए, हमारा जन्म तो अभी हुआ, हमारे यहां मंदिर तो हमारे जन्म से पहले के हैं। नेताजी (मुलायम सिंह यादव) हनुमान जी की पूजा ना जाने कब से करते आए हैं, तो हम हैं ही नहीं हिंदू, केवल भारतीय जनता पार्टी हिंदू है? जो पाप करे वह हिंदू है?''

माननीय अखिलेश यादव ने हिंदुओं की एक नई परिभाषा को जन्म दिया है - "जो पाप करे वह हिन्दू है।" सही है, इसके अलावा उनसे कोई और उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए। अखिलेश जी के परम मित्र श्री राहुल गांधी "हिंदुओं को आतंकी" मानते हैं और अब अखिलेश जी ने अप्रत्यक्ष रूप से "हिंदुओं को पापी" बना दिया है।
श्री अखिलेश यादव कहते हैं कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) हनुमान जी की पूजा एक लंबे समय से करते आये हैं. अखिलेश जी आप "बड़े हिन्दू" हैं इसलिए आप जानते होंगे कि हनुमान जी प्रभु श्रीराम के परम भक्त थे।  अखिलेश जी शायद आपको याद हो कि माननीय नेताजी ने नवम्बर 1990 को श्रीरामभक्तों पर अंधाधुध गोलियां चलवाईं थीं। कोई भी हनुमान भक्त शायद ऐसा कभी नहीं कर सकता था, जैसा माननीय श्री मुलायम सिंह यादव ने किया था। क्या आप इससे सहमत हैं?

श्रीमान अखिलेश जी आपका यह कहना है कि- "उनकी (भाजपा) जो परिभाषा है हिन्दू वाली, वह हमें नहीं चाहिए, जो नफरत फैलाती हो, लड़ाती हो, समाज को बांटती हो, हम उनसे बड़े हिन्दू हैं।
अब प्रश्न यह है कि "बड़े हिन्दू" की क्या परिभाषा है? क्या "बड़ा हिन्दू" वह है जो सिर पर जालीदार टोपी लगाकर, गले में बड़ा सा रुमाल डालकर घुटनों के बल बैठकर रोज़ा अफ्तारी करता हो? क्या वह "बड़ा हिन्दू" है जो आतंकियों को छुड़ाने के लिए दिन-रात एक कर देता हो और हाईकोर्ट से फटकार खाता है। क्या "बड़ा हिन्दू" वह है जो केवल एक वर्ग विशेष की बेटियों को ही अपनी बेटियां मानता है? क्या बाबरी मस्जिद के ख़ास पैरोकार जफरयाब जिलानी साहब का ख़ास दोस्त होना "बड़ा हिन्दू" होने की पहचान है? क्या दंगा पीड़ितों को कड़ाके की ठंड में ठिठुरते हुए छोड़कर सैफई महोत्सव में "नाच-गाने" की गर्मी लेना "बड़ा हिन्दू" होने की पहचान है? हजारों-लाखों हिंदुओं का क़त्लेआम और हिन्दू महिलाओं की इज़्ज़त-आबरू लूटने वाले मुगल बादशाहों की नापाक मानसिकता के प्रतीक चिन्हों को सहेजने हेतु "मुगल म्यूजियम" बनाना "बड़ा हिन्दू" होने की पहचान है? क्या भगवा रंग से नफ़रत करने वाले "बड़ा हिन्दू" होते हैं, या फिर जय श्रीराम के नारे से जिनके कानों में विष घुलता हो उन्हें हम "बड़ा हिन्दू" कह सकते हैं।

श्रीमान अखिलेश यादव को चाहिए कि वह "बड़ा हिन्दू" होने की परिभाषा को और अधिक सुस्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से उत्तरप्रदेश की जनता के " छोटे हिंदुओं" के समक्ष प्रस्तुत करें। क्योंकि जनता इस शब्द को लेकर बेहद "कन्फ्यूजन" की स्थिति में है। आप बेहतर तरीके से इस शब्द की व्याख्या कर सकते हैं साहब, क्योंकि आप तो "बड़े वाले" हैं, हम ठहरे "छोटे से हिन्दू"।

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शनिवार, 7 अगस्त 2021

असदुद्दीन ओवैसी साहब गलती आपकी नहीं है, हम ही अपनी नस्लों को...

अभी बीते शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान एक एंकर ने AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी से श्रीराम मंदिर पर जब सवाल पूछा तो ओवैसी ने जवाब देते हुए कहा- "जब तक हम जिंदा रहेंगे, अपनी नस्लों को बताते रहेंगे कि आजाद भारत में सुप्रीम कोर्ट को धोखा देकर भाजपा ने मस्जिद को शहीद किया था। वो मेरी मस्जिद थी, है और रहेगी।"

ओवैसी साहब ने बिल्कुल सही कहा। एक "सेक्युलर भाईजान" से इसके अतिरिक्त आप कोई और उम्मीद कर भी क्या सकते हैं। गलती तो हमारी है ओवैसी साहब कि हम अपनी पीढ़ियों को यह समझाने में नाकामयाब रहे कि टीपू सुल्तान और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे लोगों की अंग्रेजों से लड़ाई भारत की आज़ादी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि दो आक्रांताओं द्वारा भारत में अपना वर्चस्व  स्थापित करने का युद्ध था। इरफान हबीब और रोमिला थापर सरीखे वामपंथी, जिहादी और छद्म धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारो और कांग्रेसी सरकारों ने बड़ी चतुराई से हमारी पीढ़ियों के दिमाग़ में यह कूट-कूट कर भर दिया कि मुगल बादशाह कोई विदेशी आक्रांता या लुटेरे नहीं थे बल्कि वह तो सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद कराने के लिए उनसे लड़ाइयां लड़ीं और कुर्बानियां दीं।
हम अपनी नस्लों को यह कभी समझा ही नहीं पाए कि बाबर एक विदेशी लुटेरा, आक्रांता और क्रूर शासक था जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं और धार्मिक आस्थाओं को न केवल नष्ट-भ्रष्ट किया बल्कि वह उनकी जगह अपनी गुलामी के प्रतीक भी बना गया जो इस बात की हमेशा याद दिलाते रहेंगे कि भारत पर कभी मुस्लिम आक्रांताओं की हुकूमत हुआ करती थी।

विश्व में भारत ही शायद एकमात्र दुर्भाग्यशाली देश है जिसमें उन तमाम आक्रांताओं, लुटेरों और बलात्कारियों का महिमामंडन किया जाता है जिन्होंने भारत को सदियों तक न केवल ग़ुलाम बनाये रखा बल्कि उसकी हजारों-लाखों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की धरोहरों को भी नष्ट कर दिया था। जिन लुटेरों ने भारत को जी भरकर लूटा और मंदिरों के स्थान पर मकबरों की नींव रखी, हम आजतक उन्हें "महान" कहते हैं, और हमारे इतिहासकार उनकी शान में कसीदे गढ़ने से आज भी बाज नहीं आते।

ओवैसी साहब हमारी गलती यह है कि हम अपनी नस्लों को केवल अंग्रेजी हुक़ूमत के जुल्मों-सितम पर व्याख्यान सुनाते रहे, हमने कभी अपनी नस्लों को यह बताने की कोशिश ही नहीं की कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने किस प्रकार हमारे मासूम बच्चों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया था, नरमुंडों की मीनारें बनवा दी थीं, चोटियों और जनेऊओं की होलीयां जला दी थीं, तक्षशिला और नालंदा जैसी सांस्कृतिक धरोहरों को आग के हवाले कर दिया गया था, किस प्रकार खौलते तेल के कड़ाहों और गर्म रेत डालकर देशभक्तों की जान ली गई। हम अपनी नस्लों को यह समझा ही नहीं पाए कि अय्याश और लम्पट अकबर "महान" कभी नहीं था बल्कि महान तो महाराज राणा प्रताप थे। हमने अपनी नस्लों को अकबर-जोधा के मनघड़ंत और झूठे किस्से सुनाए लेकिन हम उन्हें माता जीजाबाई और वीर शिवाजी की शौर्यगाथा नहीं सुना पाए।

हम सैकड़ों साल बीतने के बाद भी आजतक यह समझने में लगभग पूरी तरह से असफल ही हैं कि हम केवल अंग्रेजों के ग़ुलाम नहीं थे, हम तो मुगलों, अफगानों, तुर्कों, और पठानों से भी अपनी आज़ादी के लिये संघर्ष करते रहे। 
लेकिन अब वह समय आ गया है जब हमें भी अपनी नस्लों को बताना होगा कि किस प्रकार हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम सैंकड़ों सालों तक वनवास में रहे। उस वनवास को समाप्त करने के लिए न जाने कितने श्रीरामभक्तों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उन शूरवीर श्रीरामभक्तों की शौर्यगाथा का वर्णन प्रत्येक रामभक्त को अपनी पीढ़ी को बताना ही होगा।

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