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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी तुष्टिकरण किया जा रहा है क्या?

इस देश में तुष्टीकरण की राजनीति की एक बहुत पुरानी परम्परा रही है। "तुष्टिकरण की राजनीति के गॉड फादर" मोहनदास करमचंद गांधी के रोपे गए तुष्टिकरण के पौधे को कांग्रेस और वामपंथ ने ख़ूब पुष्पित-पल्लवित किया। परन्तु अजीब विडम्बना यह है कि जिन लोगों ने गांधीवाद और वामपंथी विचारधारा का पुरज़ोर विरोध कर राजगद्दी प्राप्त की, वही कथित हिंदुवादी सरकारें हिन्दू और हिंदुत्व का गला घोंटने में लगी हैं, उनकी आवाज़ को दबाने का हरसम्भव प्रयास किया जा रहा है। मज़े की बात यह है कि बड़ी चतुराई से सारा ठीकरा कभी ओवैसी पर, कभी केजरीवाल,कभी शिवसेना पर, कभी ममता पर तो कभी कांग्रेस पर फोड़ दिया जाता है।
दिल्ली में जंतर-मंतर पर तथाकथित भड़काऊ नारों के आरोप में श्रीमान अश्वनी उपाध्याय सहित कई हिन्दू संगठनों के नेताओं को गिरफ़्तार किया गया है। कांवड़ यात्रा पर स्वतः संज्ञान लेने वाले माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन नेताओं की हिरासत को वैध माना है।
मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार असदुद्दीन ओवैसी साहब की घोर आपत्ति के पश्चात ही दिल्ली पुलिस-प्रशासन ने हिन्दू नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही की है। यहां सुधि पाठकों के लिये यह जानना परम आवश्यक है कि यह वही ओवैसी साहब हैं जिनके छोटे भाईजान ने कथिततौर पर अपने बयान में कहा था कि - अगर पुलिस को हटा दिया जाए तो 100 करोड़ हिंदुओं को मात्र 15 मिनट में काट दिया जाएगा। वही ओवैसी साहब जिनकी पार्टी के वारिस पठान साहब ने कथितरूप से कहा था कि 15 करोड़ हैं, लेकिन 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इन्हीं असदुद्दीन ओवैसी साहब को भाजपा का "खास सहयोगी" बताया जाता है, और यह भी बताया जाता है कि ओवैसी साहब गृहमंत्री अमित शाह जी के बहुत करीबी हैं।हालांकि हम इस सबकी पुष्टि नहीं करते हैं, लेकिन धुंआ तभी उठता है जब कहीं आग लगी हो।

ज़रा इस पर भी गौर फरमाइए कि NRC-CAA के विरोध में महीनों तक दिल्ली की सड़कों को जाम करने वाले शाहीन बाग़ में चल रहे कथित आंदोलन में जब देश के प्यारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री श्री अमित शाह के विरोध में आपत्तिजनक नारे लगाए जा रहे थे। कुछ कथित शिक्षा मंदिरों में हिंदुत्व की कब्र खोदने की तैयारियाँ चल रही थीं। कश्मीर की आज़ादी की मांग की जा रही थी, तब दिल्ली पुलिस और राष्ट्र्वादी सरकारें कानों में रुई डाले हुए क्यों बैठ गई थीं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी तक जिस प्रकार से कथिततौर पर हिन्दू और देश विरोधी ज़हरीले भाषण दिए जा रहे थे। जिस प्रकार से अभिनेता से लेकर शायर तक ज़हर उगल रहे थे। तब ओवैसी साहब के पेट में दर्द क्यों नहीं हुआ था और न ही दिल्ली पुलिस को कार्यवाही करने का कोई उचित कारण मिल रहा था। कथित किसान आंदोलन की आड़ में क्या-क्या हो रहा है और क्या-क्या हुआ, यहां तक कि दिल्ली पुलिस के जवानों पर प्राणघातक हमले भी हुए, और तो और देश की आन-बान और शान तिरंगे झंडे का भी अपमान हुआ। 
आज भी उस कथित आंदोलन के कारण हजारों-लाखों लोगों का रोज़गार, उनके बच्चों की शिक्षा पर ज़वाल आया हुआ है, उसके बावजूद हमारी राष्ट्रवादी सरकारें कानों में तेल डालकर बैठी हैं। 

अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के अनुसार दिल्ली में ही फ्लाई ओवर पर मज़ार बना दी गई और जब कुछ हिंदुवादी संगठनों और राष्ट्रवादी पत्रकारों ने उसके विरुद्ध आवाज़ उठाई तो दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया, यह किसी से छिपा नहीं है। हालांकि हम ऐसे किसी वायरल वीडियो की कोई पुष्टि नहीं कर रहे, परन्तु कुछ तो हुआ है। 

क्या इस सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तुष्टिकरण कहना अनुचित होगा। शायद नहीं। क्योंकि सब जानते हैं कि दिल्ली पुलिस किसके अंडर में काम करती है और दिल्ली पुलिस को कहां से आदेश प्राप्त होते हैं।
लेकिन हम तो केवल यह जानना चाहते हैं कि आखिर राष्ट्रवादी और हिंदुओं की एकमात्र रक्षक सरकारों की ऐसी क्या मजबूरी है कि उन्हें जंतर-मंतर पर हुए हिंदुवादी और राष्ट्रवादी आंदोलन के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस मजबूरी पर हमें एक शेर याद आता है-

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी उनकी।
यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

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