एक राष्ट्रीय स्तर का गंभीर, तथ्यात्मक और प्रमाणिक संपादकीय प्रस्तुत है। भारत आज किसी सामान्य राजनीतिक बहस से नहीं, बल्कि एक मौलिक वैचारिक परीक्षा से गुजर रहा है। यह परीक्षा सत्ता परिवर्तन या चुनावी लाभ की नहीं, बल्कि इस प्रश्न की है कि आधुनिक भारत की सर्वोच्च निष्ठा किसके प्रति होनी चाहिए—दीन या देश, शरिया या संविधान? यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही जटिल और दूरगामी प्रभाव वाला है। भारत का संविधान किसी एक समुदाय, आस्था या पंथ का दस्तावेज़ नहीं है। यह एक नागरिक-राज्य अनुबंध (Social Contract) है, जो विविधताओं से भरे समाज को एक राष्ट्र में बांधता है। संविधान की प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि भारत एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहां धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि राज्य की तटस्थता है। संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन वही अनुच्छेद यह भी स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता “सार्वजन...
The Intellectual | The Spiritual | The Creative