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मई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या वास्तव में मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

मैं छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अपना एजेंडा चलाने वाले "मज़हबी ठेकेदारों" से पूछता हूँ कि रमज़ान जैसे पवित्र माह में हमारे सैन्य अधिकारियों और CRPF के जवानों को शहीद करने वाले आतंकी किस मज़हब से हैं? पूरे देश में कोरोना वायरस को बढ़ाने वाले तब्लीग़ी जमात किस मजहब से ताल्लुक रखती है? तथाकथित हवाला कारोबारी साद किस मजहबी संगठन से जुड़ा है? 100 करोड़ हिंदुओं को 15 मिनट में काटने की धमकी देने वाला अकबरुद्दीन ओवैसी किस मज़हब से है? सोशल मीडिया पर माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात कहने वाला गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र का निवासी एवं बिहार पुलिस मे सेवारत ASI तनवीर खान किस मज़हब का है? अरब देशों के नाम पर खुलेआम धमकी देने वाला जफरुल इस्लाम खान कौन से मज़हब से है? हमारी सेना के जवानों, पुलिसकर्मियों और डॉक्टर्स पर पत्थर फेंकने वाले, उनके साथ गाली-गलौज करने वाले कौन हैं? देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करने वाले शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे कौन हैं? वो 15 करोड़ कौन लोग हैं जो 100 करोड़ पर भारी पड़ने वाले हैं? भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले जिन्...

राजनीति में विरोधी और विरोध को कभी मरने मत दो

आचार्य चाणक्य सहित अनेकों विद्वानों का यह मत है कि सफल होने के लिए अच्छे मित्रों की आवश्यकता होती है और सफलता के शिखर पर पहुंचने के लिए बुद्धिमान शत्रु की ही आवश्यकता होती है। इसलिए यदि आपका विरोधी साहसी, कर्मठ और बुद्धिमान है तो सदैव उसे अपने सम्मुख रखो और यदि मूर्ख है तो उसपर कोई ध्यान मत दो। क्योंकि मूर्ख व्यक्ति से न तो मित्रता अच्छी होती है और न ही शत्रुता। मित्रता और शत्रुता सदैव बुद्धिमान व्यक्ति से ही करनी चाहिए, विशेषकर राजनीति में। क्योंकि राजनीति में विरोधी का बहुत महत्व है, यदि आपका मित्र और विरोधी दोनों ही बुद्धिमान हैं तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। राजनीति में विरोधी और विरोध ही तो सदैव आपको जीवित रखता है, जिसका कोई विरोधी नहीं होता वह राजनीति में शून्य हो जाता है या यूं कहिए कि शत्रुविहीन राजनितिज्ञ मुर्दे के समान होता है। किसी व्यक्ति की ताक़त का अंदाजा लगाना हो तो सदैव उसके शत्रुओं पर विचार करो, जिसके शत्रु ताकतवर होंगे वही व्यक्ति ताकतवर होगा, क्योंकि कमजोर इंसान का कोई शत्रु नहीं होता। जिसकी कोई औक़ात नहीं होती उसका कोई विरोध भी नहीं करता,...

आखिर हम कब तक इन अहसान फरामोश पत्थरबाजों के लिए अपने जांबाजों के प्राणों की आहुति देते रहेंगे

मैं #Indian Govt. से पूछना चाहता हूं कि आखिर हम कब तक "अहसान फरामोश पत्थरबाजों" को बचाने के लिए अपने जाबांजों के प्राणों की आहुति देते रहेंगे? हम कब तक हुतात्माओं को श्रद्धांजलियां अर्पित करते रहेंगे, मातम का ढोंग-ढकोसला करते रहेंगे? हम क्यों खाड़ी देशों सहित तमाम मुस्लिम देशों के समक्ष आत्मसमर्पण की मुद्रा में हाथ उठाकर खड़े हो जाते हैं? हम इज़रायल और यहूदियों से क्यों नहीं सीखना चाहते? हम पाकिस्तान और विपक्ष की आड़ लेकर कब तक अपनी कायरता और नपुंसकता को  छिपाते रहेंगे? इजरायल हमसे हर मामले में छोटा है, परन्तु विश्वभर के अरेबियन टट्टू उसके सामने घुटनों पर आ जाते हैं, क्यों? सारे मानवाधिकारों का ठेका क्या हमने ही ले रखा है? बहुत हो चुका फल-फूल चढ़ाना, विधवा विलाप, अहिंसा-शांति का ढोल बहुत पीट लिया, अब सीधे रण में उतरने का समय है।

सफल होने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध और अहंकार को पूर्णतयः त्याग देना चाहिए

क्रोध और अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े दो शत्रु हैं।क्रोध मनुष्य के विवेक अर्थात उसके सोचने-समझने की शक्ति को समाप्त कर देता है और अहंकार मनुष्य को सही मार्गदर्शन से विमुख कर देता है। क्रोध और अहंकार में डूबा हुआ व्यक्ति सदैव अपना और अपनों का ही अहित करता है। क्रोध और अहंकार मनुष्य को अंधकार की ओर ले जाता है जहां पर मनुष्य अपने अच्छे-बुरे को नहीं देख पाता, वह न भूतकाल से कुछ सीख पाता है और न ही भविष्य को समझ पाता है, वह केवल वर्तमान में ही जीना चाहता है। सफल होने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध और अहंकार को पूर्णतयः त्याग देना चाहिए, क्योंकि सफलता की राह में यह दोनों ही सबसे बड़ा रोड़ा बनते हैं। रावण महा पराक्रमी योद्धा, राजनीति के प्रकांड पंडित, वेद-शास्त्र के महाज्ञाता और  सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ थे परन्तु क्रोध और अहंकार ने उन्हें श्रीराम का विरोधी  बना दिया और जिस रावण के सवा लाख नाती-पोते, सोने की लंका, औऱ उसकी सुरक्षा के लिए समुद्र जैसी खाई थी, वह रावण वानरों और भालुओं की सेना से हार गया।  दुर्योधन जिसके पास भीष्म पितामह, महात्मा विदुर, गुरु द्रो...