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अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उद्धव ठाकरे जी आप दुष्टों की संगति से कब बाहर आएंगे

एक तरफ परम् पूज्य संत श्री योगी आदित्यनाथ और दूसरी ओर श्री उद्धव ठाकरे। दोनों ही के संस्कार सनातनी हैं, दोनों का ही पालन-पोषण सनातन संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं के बीच हुआ है, दोनों की ही आस्था भारतीय जीवन मूल्यों में रही है। दोनों ही अपने-अपने राज्यों के मुखिया हैं, परन्तु अंतर केवल संगति का है जिसके कारण एक का आचरण शुद्ध और सात्विक हो गया और दूसरा धृष्टराष्ट्र की तरह सत्ता के अहंकार और स्वार्थ सिद्धि के वशीभूत होकर अपने राज्य में निरीह और निर्दोष सनातन संस्कृति का चीरहरण होते हुए समझकर भी मुहं में दही जमाये बैठा है। दो साधु-सन्तों की मर्मान्तक चीखें, उनका करुण-क्रंदन, प्राणों को बचाने के लिए उन साधुओं की पुकार भी इस धृष्टराष्ट्र कि अंतरात्मा को झकझोर नहीं पाए। एक व्यक्ति जिसके पिता ने सनातन संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने हेतु जीवनपर्यंत घोर संघर्ष किया उसका पुत्र सत्तालोलुप और स्वार्थ की राजनीति में दुष्टों की संगति कर बैठा।  क्या वह अपने पिता के संस्कारों को भूल गया है? क्या उसकी अंतरात्मा जरा भी नहीं कराहती? दुर्योधन, शकुनि और दुःशासन से घिरा यह धृष्टराष्ट्...

यथा राजा तथा प्रजा, नमन है महान सन्त योगी आदित्यनाथ को

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने माता सीता का परित्याग कर जनता के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया था ताकि जनता यह समझ सके कि किसी भी प्रकार से राजा और प्रजा के बीच कोई भी नियम भिन्न नहीं होता, एक राजा पर भी वही नियम-कानून लागू होते हैं जो कि आम जनता के लिए बनाए गए हैं। इसीलिए प्रभु श्रीराम ने एक धोबी के द्वारा कटाक्ष किये जाने को गम्भीरता से लेते हुए माता सीता को वनवास दिया था। आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री परम् आदरणीय श्री योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने भी एक ऐसा ही सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया जब उन्होंने कोरोना महामारी आपदा के पूर्ण निस्तारण की रणनीति के चलते और लॉकडाउन के कर्तव्यों का पालन करते हुए एक पुत्र के कर्तव्यों का परित्याग कर दिया। उन्होंने जनहित में यह फैसला किया कि वह अपने पूज्य पिताश्री के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। यह वास्तव में बेहद भावुक किंतु प्रेरणादायक उदाहरण है जो इस साधारण सी घटना को न केवल ऐतिहासिक बनाता है अपितु समस्त संसार के समक्ष एक महान राजा के दायित्वों का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। आज कलियुग में ऐसे महान संत वास्तव में पूजने योग्...

यह ट्रम्प का डर नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का हिस्सा है

हमारी संस्कृति हमें सिखाती है "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुःख भाग भवेत।।" अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी मंगल घटनाओं को देखें और किसी को कोई दुःख न हो।  हम हमेशा कहते हैं कि विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो। हमने हमेशा वसुधैव कुटुंबकम की बात की है, हमारी संस्कृति हमें शांति और सद्भावना सिखाती है, हम किसी धर्म विशेष या समुदाय विशेष के लोगों को ही अपना भाई नहीं मानते बल्कि हम सदा से विश्व बंधुत्व की बात करते रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने हमारी उसी संस्कृति और सभ्यता को दृष्टांगत करते हुए, दवाइयों के निर्यात पर से पाबन्दी हटाई है। हालांकि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग जिन्होंने हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति को जन्म दिया, जिन्होंने आतंक को ही अपना धर्म समझा और मानवता को अपनी संकीर्ण विचारधारा के पैरों तले रौंदा है, वह लोग इसे ट्रम्प की धमकी का असर बता रहे हैं, उन्हें लगता है कि हर काम तलवार के जोर पर ही हो सकता है। ये वही लोग हैं जिन्होंने क्रूरता और अन्याय के दम पर राज...