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क्या शफीकुर्रहमान बर्क़ जैसे लोग भारत में तालिबानी विचारधारा को पुष्पित-पल्लवित कर रहे हैं


उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी का "मुगल आक्रांताओं से प्रेम" किसी से छुपा नहीं है। लेकिन सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब ने जिस प्रकार से तालिबानी आतंकियों को "क्रांतिकारी" बताया है वह न केवल बेहद शर्मनाक है बल्कि सच पूछिए तो वह कहीं न कहीं समाजवादी पार्टी के कुछ कट्टरपंथी नेताओं की "तालिबानी" विचारधारा को भी प्रदर्शित करता है। शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब जैसे लोग भारत में एक लंबे समय से कट्टरपंथी विचारधारा को पुष्पित-पल्लवित करने में लगे हुए हैं, लेकिन जिस प्रकार से पिछले कुछ समय से इन नेताओं ने अपनी कट्टरपंथी मानसिकता को उजागर किया है उससे उन तमाम लोगों को सबक़ लेना होगा जो लगातार गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते रहे हैं। जिन्हें लगता है कि "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना" उन तमाम लोगों को शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब और उन जैसे तमाम "कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों" के तालिबानी समर्थक विचारों को गम्भीरता से लेना होगा। 
सम्पूर्ण विश्व जानता है कि तालिबानी आतंकियों द्वारा अफ़ग़ान पर कब्ज़ा कराने में सबसे बड़ा हाथ पाकिस्तान का है। और इसीलिए पाकिस्तान सबसे ज़्यादा ख़ुशी ज़ाहिर कर रहा है। यहां यह भी समझना जरूरी है कि जिन निर्दोष अफगानियों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया और उनकी बहू-बेटियों को सरेआम नीलाम किये जाने की खबरें सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रही हैं, वह अफगानी भारत के शुभचिंतकों में ही से थे। सही मायने में अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्ज़ा अप्रत्यक्ष रूप से भारत की कूटनीतिक हार है और पाकिस्तान सहित तमाम कट्टरपंथी जिहादियों की जीत। ऐसे में जो लोग तालिबान से हमदर्दी अथवा सहमति जता रहे हैं, क्या उन लोगों को भारत का शुभचिंतक माना जा सकता है? यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर कांगी, वामी और "बौद्धिक आतंकियों" के पास कभी नहीं हो सकता है। इसका उत्तर उन लोगों के पास कभी हो ही नहीं सकता जो पाकिस्तान के गीत गाते हैं, जिनकी रैलियों में "पाकिस्तान ज़िंदाबाद" के नारे लगा करते हैं और जो लोग "आईएसआईएस" की विचारधारा से पूर्णतया सहमत रहते हैं।

अफगानिस्तान में भाई के द्वारा भाई का खून बहाकर सत्ताओं पर कब्ज़ा करना "औरंगजेबी मानसिकता" का सबसे ताज़ातरीन उदाहरण है। जिसकी सराहना वह प्रत्येक व्यक्ति कर रहा है जो हमेशा से "मुग़ल आक्रान्ताओं" को अपना मसीहा मानता रहा है, जिसने सदा से "गज़वा-ए-हिन्द" का सपना देखा है और अब अफगानिस्तान पर तालिबानियों का कब्ज़ा होने के बाद उसे अपना वह सपना साकार होता नज़र आ रहा है। यह वही लोग हैं जिनके लिए उनके "मज़हबी कानून" किसी भी देश के संविधान से अधिक महत्व रखते हैं। यह वही लोग हैं जो कश्मीरी आतंकियों को "क्रांतिकारी" का दर्जा देते हैं और जिनके लिए कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है।

 ऐसे तमाम लोगों से अगर आप "भाईचारा", आपसी सौहार्द, शांति-सद्भावना और प्रेमालाप की इच्छा रखते हैं तो आप ठीक उस कबूतर की तरह ही हैं जो बिल्ली के आने पर अपनी आंखें बंद कर लेता है और शायद सोचता है कि बिल्ली उसको नहीं देख पाएगी।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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