सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या अमित शाह देश की जनता को इन सवालों के जवाब देंगे

आज देश के जो हालात हैं  और हाल ही में दिल्ली में हुई हिंसा को देखने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि क्या माननीय गृहमंत्री अमित शाह अपने दायित्व को सही प्रकार से नहीं निभा पा रहे हैं?  नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद से ही देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और उधर भाजपा भी लगातार चुनाव हारती जा रही है। इन दोनों ही बातों का एक दूसरे से गहरा सम्बन्ध है। दरअसल जब तक भाजपा के चुनावी रणनीतिकार की कमान पूरी तरह से अमित शाह के हाथों में थी तब तक भाजपा एक बाद एक चुनाव जीत रही थी और देश के हालात भी लगभग सामान्य थे। लेकिन जबसे अमित शाह ने गृहमंत्रालय का पदभार सम्भाला है और चुनावी राजनीति छोड़ी है, न देश स्थिर है और न भाजपा।  20 दिसम्बर को एकाएक पूरे देश में एक वर्ग विशेष के लोग सड़कों पर आ जाते हैं और पुलिस पर सीधे-सीधे हमला बोल देते हैं। लेकिन पुलिसकर्मियों के हाथ बंधे होने के कारण वह सीधे रूप से कोई कार्यवाही नहीं कर पाते, उसके बाद शाहीन बाग़ में धरने के नाम पर सड़कों को जाम कर दिया जाता है लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनकर उन्हीं प्रदर्शनकारियों की रक्षा...

नहीं तो हिन्दू, जो 700 वर्षों तक मुसलमानों के ग़ुलाम रहे, मुसलमानों को अपना ग़ुलाम मान लेंगे

महमूद प्राचा सहित कई नौटंकीबाज अक्सर टीवी डिबेट्स में अपने पीछे बाबा साहेब के पोस्टर लगाकर बैठते हैं, शाहीन बाग़ सहित तमाम CAA-NRC विरोध-प्रदर्शनों  में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के पोस्टर लेकर बैठा जा रहा है। उन्हीं बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" नामक पुस्तक में 1920 और '30 के दशकों में मुस्लिम नेताओं के राजनीतिक विचार औऱ व्यवहार को उजागर करने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने अनेक महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं के विचारों के उदाहरण दिए हैं. उनमें से कुल दो नेताओं के विचार यहां प्रस्तुत हैं। मौलाना आज़ाद सोभानी ने सिल्हट में सन 1938 में एक बयान दिया था-  "अंग्रेज धीरे-धीरे निर्बल होते जा रहे हैं और निकट भविष्य में हिंदुस्तान से चले जायेंगे। इसलिए, यदि हमने इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हिंदुओं से अभी से संघर्ष करके उन्हें कमज़ोर न किया, तो वे न केवल हिंदुस्तान में रामराज्य स्थापित कर देंगे, बल्कि धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल जाएंगे। यह हिंदुस्तान के 9 करोड़ (उस समय भारत में मुसलमानों की जनसंख्या) पर निर्भर है कि वे हिंदुओं को शक्तिशाली बनाएं...

बहनजी के सताए-रावण की शरण में आये

राजनीतिक गलियारों में ख़बर है कि "रावण" एक राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिशों में लगे हैं, और उनकी उन कोशिशों को वह सारे लोग सहारा देने में लगे हैं, जो "हाथी" से उतर गए या उतार दिए गए दूसरे शब्दों में कहिए तो जो नेता "बहनजी" के द्वारा सताए गए हैं, वह सब एक नए लेकिन मजबूत और टिकाऊ प्लेटफार्म पर आने की जुगत में लगे हुए हैं। इनमें कई दिग्गजों के नाम शामिल हैं। इन सबकी समस्या यह है कि इन्होंने एक लंबे समय तक दलित-मुस्लिम भाईचारे का चारा डालकर सत्ताएं हासिल की हैं। अब इन्हें वही पार्टी भायेगी जो दलित-मुस्लिम एकता का ढिंढोरा पीटे और सीधेतौर पर बहनजी को चुनौती दे सके। एक और दिक़्क़त यह भी है कि इस पार्टी का मुखिया भी कोई दलित चेहरा ही होना चाहिए, क्योंकि "जय भीम-जय मीम" का नारा तो हैदराबाद वाले "बैरिस्टर भाईजान" भी ख़ूब लगा रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी दाल गलने वाली नहीं है, वह तो बस 15 करोड़ तक ही सीमित रह गए। बाकी के 100 करोड़ उन्हें घास नहीं डाल रहे, इसलिए उनके साथ इन दिग्गज़ों की पटरी नहीं बैठेगी। अब ये "बहनजी हटाओ बिग्...

हिंदुओं का यह विचार कि हिन्दू और मुसलमान एक राष्ट्र हैं, टिक नहीं पाता-बाबा साहेब अंबेडकर

 "यह निर्विवाद है कि भारतवर्ष के अधिकांश मुसलमान उसी जाति के हैं जिसके हिन्दू हैं। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सभी मुसलमान एक ही भाषा नहीं बोलते, और बहुत से तो वही बोलते हैं जो हिन्दू बोलते हैं। दोनों समुदायों में कई सामाजिक रिवाज़ भी एक समान हैं। यह भी सत्य है कि कुछ धार्मिक कृत्य व प्रथाएं दोनों समुदायों में एक से हैं। परंतु, प्रश्न यह है कि क्या इन सभी तत्वों से ही हिन्दू व मुसलमान एक राष्ट्र बन जाते हैं, या कि क्या इनसे उनमें एक दूसरे से जुड़ने की इच्छा पैदा हुई है?" - डॉ आंबेडकर कृत "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" पृष्ठ 15 "पहली बात तो यह है कि दोनों समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) में जो समान विशेषताएं इंगित की जाती हैं वे दोनों समुदायों में सामाजिक ऐक्य स्थापित करने हेतु एक-दूसरे के तौर-तरीकों को अपनाने या उन्हें आत्मसात करने के लिए किए गए किन्हीं सचेतन प्रयासों का परिणाम नहीं है। सच्चाई यह है कि ये समानताएं कुछ अनसोचे कारणों का परिणाम है। कुछ तो ये धर्मांतरण की प्रक्रिया के अधूरी रह जाने से है। भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश मु...

केंद्र सरकार NRC पर अपना रुख़ साफ़ क्यों नहीं करती

केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून को लागू करके निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम उठाया है। लेकिन राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NRC) पर अभी भी सरकार का रुख़ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। जबकि गृहमंत्री श्री अमित शाह ने लोकतंत्र के मंदिर  संसद भवन में NRC को पूरे देश में लागू करने की बात कही थी, हालांकि विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर सरकार ने "till Now" शब्द लगाकर NRC के भविष्य पर एक प्रश्नचिन्ह अवश्य लगा दिया है। मूल प्रश्न यह है कि यदि भाजपा की केंद्र सरकार NRC को अभी लागू करने की स्थिति में नहीं है तब उसपर भाजपा नेताओं विशेषतः अमित शाह ने बेवज़ह बयानबाजी क्यों की थी, और यदि देर-सबेर उसको लागू करना ही है तब आख़िर क्या कारण है कि अभी तक उसका कोई ड्राफ्ट तैयार नहीं किया गया? और न ही इस सम्बंध में कोई प्रस्ताव कैबिनेट में आ पाया है। भारत का मुसलमान कथित तौर पर NRC से अपने आपको डरा हुआ महसूस कर रहा है, जिसके कारण पूरे देश में मुस्लिम संगठनों और उनके हिमायतियों द्वारा नफ़रत की आग लगाई जा रही है, जिसमें विपक्ष लगातार घी डालने का काम कर रहा है। लेकिन इसके लिए क...

कुकुरमुत्ते की तरह उगते शाहीन बाग़ क्या भाजपा की कायरतावादी और दोगली नीति का परिणाम हैं

आज जनता यह जानना चाहती है कि जब शाहीन बाग़ में विरोध-प्रदर्शन की आड़ में दुर्योधन और दुशासन बने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और एसडीपीआई द्वारा आम जनता के अधिकारों का चीरहरण किया जा रहा है, तब श्री नरेन्द्र मोदी धृष्टराष्ट्र की तरह आंख बंद क्यों बैठे हैं?  डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" नामक पुस्तक में एक जगह लिखा है कि- "कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनैतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति अपनाई है। क्योंकि वे समझते हैं कि मुसलमानों के समर्थन बिना वे अपने मनोवांछित लक्ष्य स्वतंत्रता को पा नहीं खा सकते। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने दो बातें समझी नहीं है। पहली तो यह कि तुष्टिकरण और समझौते में अंतर होता है, और यह एक महत्त्वपूर्ण अंतर होता है। तुष्टिकरण का अर्थ है, एक आक्रामक व्यक्ति या समुदाय को मूल्य देकर अपनी ओर करना, और यह मूल्य होता है उस आक्रमणकारी द्वारा किये गए, निर्दोष लोगों पर, जिनसे वह किसी कारण से अप्रसन्न हो, हत्या, बलात्कार,लूटपाट और आगजनी जैसे अत्याचारों को अनदेखा करना। दूसरी ओर, समझौता ...

राजनीति में जज़्बातों के लिए कोई जगह नहीं होती

राजनीति में जज़्बातों के लिए कोई जगह नहीं होती, जज़्बात यानी भावनाएं। समझदार राजनीतिज्ञ वह होता है जो ख़ुद कभी भावनाओं में न बहे लेकिन हमेशा दूसरों की भावनाओं को भड़काता रहे। दूसरे शब्दों में राजनीति हमेशा दिमाग़ से होती है, दिल से नहीं।  इस समय पूरे देश में जो कुछ हो रहा है वह राजनीति के इसी सिद्धान्त का एक हिस्सा है। एक और बात जो सबसे जरूरी है वह यह है कि राजनीति में कोई किसी का नहीं होता, सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए लड़ते हैं। लेकिन यह दोनों ही बातें न तो राहुल गांधी आजतक समझ सके और न ही अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने कभी इस बात को समझने की कोशिश की। दरअसल अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी दोनों ही लोग मुहं में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, और इन तीनों को ही राजनीति विरासत में मिली है। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, मायावती, शरद पवार, नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं ने ज़मीन से राजनीति की है। इसमें मुलायम सिंह यादव, लालू यादव औऱ शिवपाल यादव जैसे नाम भी शामिल हैं। आज जो कुछ हो रहा है और जिस प्रकार के बचकाना बयान इन हवाई नेताओं ...

गिरिराज सिंह द्वारा देवबंद पर दिए गए बयान को बेहद गम्भीरता से लिया जाना चाहिए

अभी हाल ही में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने दारुल उलूम देवबंद पर एक बयान देते हुए कहा कि "देवबंद आतंक की गंगोत्री है" इस बयान के बचाव में दिए अपने एक दूसरे स्टेटमेंट में बीते बुधवार को उन्होंने कहा, 'देखिए कितने लोग देवबंद से आतंकी गतिविधियों में शामिल हुए हैं। दुर्भाग्य है इस देश का जो राष्ट्र के लिए काम करना चाहिए, वे राष्ट्र विरोधी..मैंने सही कहा कि देवबंद गंगोत्री है'. व्यक्तिगत रूप से हम केंद्रीय मंत्री श्री गिरिराज सिंह का बहुत सम्मान करते हैं और यह मानते हैं कि देवबंद पर दिए गए उनके इस बयान को बेहद गम्भीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह बयान कोई कोरा राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि इस बयान का सीधा सम्बन्ध देश की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता से जुड़ा हुआ है। अगर इस बयान में लेशमात्र भी सच्चाई है तो उसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिये अन्यथा इस तरह की कोरी और भड़काऊ बयानबाजी से देश का माहौल बिगड़ने और दो सम्प्रदायों के बीच कड़वाहट बढ़ने की पूरी संभावना होती है। * कट्टरपन्थ और आतंक दो अलग-अलग विषय हैं। हमारा मानना है कि प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को...

दिल्ली में भाजपा की हार बनाम मोदी का गांधीवाद

आज दिल्ली में भाजपा की हार हो गई और आम आदमी पार्टी की जीत हुई। इसके लिए मैं अरविंद केजरीवाल और उनकी पूरी टीम के साथ-साथ तमाम दिल्लीवासियों को हार्दिक बधाईयां देता हूँ। इस जीत और हार को लेकर प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण है। मेरा मानना है कि यह भाजपा के उस गांधीवाद की हार है जो "सबका विश्वास" साथ लेकर चलने की बात करता है, और जिसने "सबका विश्वास" जीतने के चक्कर में अपनों का ही विश्वास खो दिया है।  मैंने दिल्ली चुनाव को बहुत करीब से देखा है, और पिछले तकरीबन एक माह से मैं भाजपा के कई दिग्गजों के साथ बातचीत करता रहा हूँ। और मैंने महसूस किया कि कहीं न कहीं भाजपा को यह खुशफ़हमी हो चली है कि हिन्दू वोट उसका जरखऱीद ग़ुलाम बन गया है  औऱ हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के नाम पर उसे वोट देना उसकी मजबूरी बन गई है।  CAA-NRC की आड़ में जिस प्रकार से पिछले दो माह में कुछ देश विरोधी ताक़तों के द्वारा पूरे देश में हिंसा और अराजकता का माहौल बनाया गया और हमारी केंद्र सरकार गांधीवादी दर्शन की दुहाई देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से उन अराजकतावादी ताक़तों की हौंसला अफ़जाई करती रही वह हम...

कभी किंग कहलाने वाली कांग्रेस आज किंगमेकर बनने को तरस रही है

दिल्ली चुनाव परिणाम आ गए हैं और केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं।  भाजपा के लिए यह चुनाव एक प्रयोग की तरह था, जिसमें वह काफी हद तक सफल हो गई है।  भाजपा का एक ही लक्ष्य है "कांग्रेस मुक्त भारत", या यूं कहिए कि वह 70 सालों के उस मिथक को पूरी तरह से ख़त्म कर देना चाहती है जो यह समझता है कि इस देश को केवल कांग्रेस ही चला सकती है। कांग्रेस लगातार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। 15 सालों तक दिल्ली में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस आज शून्य पर आ गई है। कल तक "किंग" कहलाने वाली कांग्रेस आज "किंगमेकर" बनने के लिए भी तरस रही है। मैं पूरे होशोहवास में दावे के साथ कह सकता हूँ कि दिल्ली चुनावों के परिणामों के बाद "एं tuटी भाजपा कम्युनिटी" (भाजपा और संघ से नफ़रत करने वाले) अब अरविंद केजरीवाल को अपने प्रधानमंत्री के रूप में देखना शुरू कर देगी, औऱ यही भाजपा चाहती है।  भाजपा के लिए आप, सपा, बसपा, टीएमसी, एनसीपी, शिवसेना या कोई भी क्षेत्रीय पार्टी चुनौती पेश नहीं कर सकती। लेकिन कांग्रेस और वामपंथ उसके लिये बड़ी चुनौती हैं। जिनमे...

राष्ट्रवाद : हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम मुस्लिम राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद की भावना कई तत्वों से मिलकर बनती है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक राष्ट्र में यह सभी तत्व विद्यमान हों। राष्ट्र  को सुदृढ करने वाले मुख्य तत्व हैं-भौगोलिक एकता, जातीय एकता, विचारों या आदर्शों की एकता या समान संस्कृति, भाषा की एकता, धर्म की एकता तथा विदेशी शासन से मुक्ति। एक मनुष्य समूह का राष्ट्रवाद दूसरे मनुष्य समूह के राष्ट्रवाद से भिन्न होता है।  स्वतंत्रता से पूर्व भारत में हिन्दू समुदाय और मुस्लिम समुदाय राष्ट्रवाद का अभिप्राय विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करना था। किंतु स्वंतत्रता प्राप्ति के पश्चात इन दोनों समुदायों के लिए राष्ट्रवाद का अभिप्राय बदल गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में दो प्रकार की राष्ट्रवादी विचारधाराओं ने जन्म लिया, एक-मुस्लिम राष्ट्रवाद औऱ दूसरा हिन्दू राष्ट्रवाद। हिंदू राष्ट्रवाद का अभिप्राय  हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, भाषा एवं हिंदुत्व की विचारधारा में निष्ठा रखना तथा महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, जैसे महान हिन्दू योद्धाओं के विचारों और आदर्शों का पालन करते हुए एक सुगठित, सुसंस्कृत और सभ्य राष्ट्र...

शाहीन बाग़ : भाजपा के गले हड्डी

आज 8 फरवरी है, यानी दिल्ली चुनाव में मतदान की तारीख, आज दिल्ली के मतदाता सभी पार्टियों का भाग्य ईवीएम में बंद कर देंगे। लेकिन हमें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह देखना ज़्यादा दिलचस्प होगा कि शाहीन बाग़ की जनता के भाग्य में अभी और कितने दिन रास्ते बदलकर सफ़र करना लिखा है?, कब तक बच्चे अपने घरों पर बैठे रहेंगे?, कब तक एम्बुलेंस रोकी जाती रहेंगी?, कब तक लोग अपने व्यापार, अपनी रोजी-रोटी के साधनों को बर्बाद होते देखते रहेंगे? यह भी देखना है कि शाहीन बाग़ का धरना किस या किन पार्टियों द्वारा प्रयोजित किया गया है, साथ ही यह भी देखना होगा कि केंद्र सरकार और नई दिल्ली सरकार इस धरने से कैसे निपटती हैं? क्योंकि दिल्ली सरकार बनते ही पुलिस-प्रशासन केंद्र सरकार के हाथों में आ जायेगा, हालांकि अभी तक यह चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहा है। अब देखना यह है कि मोदी सरकार गांधीवाद को अपनाएगी यानी बातचीत के ज़रिए मसले को हल करने का प्रयास करेगी, अथवा इंदिरा गांधी के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, "डंडा तंत्र" द्वारा इसको खाली करवाने का प्रयास करेगी। वैसे * ...

B.R अंबेडकर का यह बयान चन्द्रशेखर उर्फ रावण जैसों की आंख खोलने के लिए काफी है

"मैं अनुसूचित जाति के उन  लोगों को, जो इस समय पाकिस्तान में फंसे हुये हैं, यह कहना चाहता हूं कि वह  भारत आ जाएं। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि अनुसूचित जाति के लोग, चाहे वह पाकिस्तान में हों या हैदराबाद में, मुसलमानों या मुस्लिम-लीग पर विश्वास न करें, यह उनके लिए घातक होगा। अनुसूचित जाति के लोगों में मुसलमानों को अपना हितैषी मानने की आदत सी बन गई है, केवल इसलिए कि उनके मनों में हिंदुओं के प्रति रोष है। यह दृष्टिकोण उचित नहीं है". ( धनजंय कीर कृत 'अम्बेडकर : जीवन और लक्ष्य', पृष्ठ 498) (ब्लिट्ज़ 24 अप्रैल, 1993 में उद्धत) पाकिस्तान बनने के कुछ समय पश्चात ही हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाने के समाचार जब बाबा साहेब को मिले तब बाबा साहेब अधीर हो उठे थे। उस वक्त उन्होंने (अम्बेडकर ने) पाकिस्तान सरकार की भर्त्सना करते हुए यह वक्तव्य निर्गत किया था.  यह बयान उन तमाम लोगों को जरूर पढ़ना औऱ समझना चाहिये जो लोग हाथों में बाबा अम्बेडकर साहेब की तस्वीर लेकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे हैं, विशेषतः बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले चंद्...

हिन्दू भारत बनाम मुस्लिम भारत: भाग-2

गतांक से आगे...... शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान के क़ायदे-आज़म मौहम्मद अली जिन्ना एक बेहद सेक्युलर इंसान थे। और इस बात का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि डॉ. सरोजिनी नायडू ने जिन्ना को "हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत" कहा था। इसी जिन्ना ने उस समय के मुसलमानों के सबसे आंदोलन "ख़िलाफ़त आंदोलन" में भाग लेने पर यह कहकर गांधी जी का विरोध किया था कि यह मज़हबी मसला है और इसमें राजनीति का दख़ल उचित नहीं। बाद में यही जिन्ना पाकिस्तान का जनक बन गया और इसी शख़्स के कहने पर मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में "डायरेक्ट एक्शन दिवस" मनाया था जिसमें लाखों हिंदुओं की नृशंसता पूर्वक हत्या हो गई थी। यह भी शायद कम लोगों को मालूम है कि गांधी और जिन्ना दोनों के विचार एकदूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते थे, यहाँ तक कि जिन्ना ने गांधी के असहयोग आंदोलन से भी असहमति दर्शाई थी। टू नेशन थ्योरी का सिद्धांत जिन्ना ने नहीं बल्कि सर सय्यद अहमद खान ने 1867 में दिया था, पाकिस्तान शब्द भी जिन्ना ने नहीं दिया बल्कि रहमत अली ने दिया था। अल्लाहमा इक़बाल जिन्ना से सहमत नहीं थे ले...

मुसलमान इस देश की आज़ादी के लिए लड़ रहा था या उसपर वापस अपना कब्ज़ा जमाने के लिये

1947 से लेकर आज तक भारत का मुसलमान और उसके पैरोकार यही शोर मचाते रहते हैं कि भारत की स्वतंत्रता में मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है। हाल ही में अकबरुद्द्दीन ओवैसी ने कहा था कि भारत पर हमने 800 साल हुक़ूमत की है, यह बात अकेले ओवैसी ही नहीं कह रहे हैं बल्कि इस देश का लगभग हर मुसलमान यही वाक्य दोहराता है। यानी हम यह मान लें कि अंग्रेजों से पहले इस देश में मुगलों की हुक़ूमत थी, और मुग़लवंशियों को भारत का मुसलमान अपना वंशज मानता है। ज़ाहिर है कि अंग्रेजों से पहले इस देश में मुसलमानों की ही हुक़ूमत थी। उसके बाद अंग्रेज आ गए, यानी इस देश का हिन्दू-बौद्ध-जैन-सिक्ख तो मुसलमानों और अंग्रेजों के ग़ुलाम ही माने जाने चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि अंग्रेजों से जो मुसलमान लड़ रहे थे वह इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि उसे फिर से वापस अपने कब्जे में लेने के लिए लड़ रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो एक आक्रमणकारी, दूसरे आक्रमणकारी से अपनी सत्ता को वापस पाने के लिए लड़ रहा था।  * कई इतिहासकारों के अनुसार 1857 का जो गदर हुआ था, वह मुसलमानों द्वारा सत्ता वापसी के लिए क...