अभी बीते शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान एक एंकर ने AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी से श्रीराम मंदिर पर जब सवाल पूछा तो ओवैसी ने जवाब देते हुए कहा- "जब तक हम जिंदा रहेंगे, अपनी नस्लों को बताते रहेंगे कि आजाद भारत में सुप्रीम कोर्ट को धोखा देकर भाजपा ने मस्जिद को शहीद किया था। वो मेरी मस्जिद थी, है और रहेगी।"
ओवैसी साहब ने बिल्कुल सही कहा। एक "सेक्युलर भाईजान" से इसके अतिरिक्त आप कोई और उम्मीद कर भी क्या सकते हैं। गलती तो हमारी है ओवैसी साहब कि हम अपनी पीढ़ियों को यह समझाने में नाकामयाब रहे कि टीपू सुल्तान और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे लोगों की अंग्रेजों से लड़ाई भारत की आज़ादी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि दो आक्रांताओं द्वारा भारत में अपना वर्चस्व स्थापित करने का युद्ध था। इरफान हबीब और रोमिला थापर सरीखे वामपंथी, जिहादी और छद्म धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारो और कांग्रेसी सरकारों ने बड़ी चतुराई से हमारी पीढ़ियों के दिमाग़ में यह कूट-कूट कर भर दिया कि मुगल बादशाह कोई विदेशी आक्रांता या लुटेरे नहीं थे बल्कि वह तो सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद कराने के लिए उनसे लड़ाइयां लड़ीं और कुर्बानियां दीं।
हम अपनी नस्लों को यह कभी समझा ही नहीं पाए कि बाबर एक विदेशी लुटेरा, आक्रांता और क्रूर शासक था जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं और धार्मिक आस्थाओं को न केवल नष्ट-भ्रष्ट किया बल्कि वह उनकी जगह अपनी गुलामी के प्रतीक भी बना गया जो इस बात की हमेशा याद दिलाते रहेंगे कि भारत पर कभी मुस्लिम आक्रांताओं की हुकूमत हुआ करती थी।
विश्व में भारत ही शायद एकमात्र दुर्भाग्यशाली देश है जिसमें उन तमाम आक्रांताओं, लुटेरों और बलात्कारियों का महिमामंडन किया जाता है जिन्होंने भारत को सदियों तक न केवल ग़ुलाम बनाये रखा बल्कि उसकी हजारों-लाखों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की धरोहरों को भी नष्ट कर दिया था। जिन लुटेरों ने भारत को जी भरकर लूटा और मंदिरों के स्थान पर मकबरों की नींव रखी, हम आजतक उन्हें "महान" कहते हैं, और हमारे इतिहासकार उनकी शान में कसीदे गढ़ने से आज भी बाज नहीं आते।
ओवैसी साहब हमारी गलती यह है कि हम अपनी नस्लों को केवल अंग्रेजी हुक़ूमत के जुल्मों-सितम पर व्याख्यान सुनाते रहे, हमने कभी अपनी नस्लों को यह बताने की कोशिश ही नहीं की कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने किस प्रकार हमारे मासूम बच्चों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया था, नरमुंडों की मीनारें बनवा दी थीं, चोटियों और जनेऊओं की होलीयां जला दी थीं, तक्षशिला और नालंदा जैसी सांस्कृतिक धरोहरों को आग के हवाले कर दिया गया था, किस प्रकार खौलते तेल के कड़ाहों और गर्म रेत डालकर देशभक्तों की जान ली गई। हम अपनी नस्लों को यह समझा ही नहीं पाए कि अय्याश और लम्पट अकबर "महान" कभी नहीं था बल्कि महान तो महाराज राणा प्रताप थे। हमने अपनी नस्लों को अकबर-जोधा के मनघड़ंत और झूठे किस्से सुनाए लेकिन हम उन्हें माता जीजाबाई और वीर शिवाजी की शौर्यगाथा नहीं सुना पाए।
हम सैकड़ों साल बीतने के बाद भी आजतक यह समझने में लगभग पूरी तरह से असफल ही हैं कि हम केवल अंग्रेजों के ग़ुलाम नहीं थे, हम तो मुगलों, अफगानों, तुर्कों, और पठानों से भी अपनी आज़ादी के लिये संघर्ष करते रहे।
लेकिन अब वह समय आ गया है जब हमें भी अपनी नस्लों को बताना होगा कि किस प्रकार हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम सैंकड़ों सालों तक वनवास में रहे। उस वनवास को समाप्त करने के लिए न जाने कितने श्रीरामभक्तों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उन शूरवीर श्रीरामभक्तों की शौर्यगाथा का वर्णन प्रत्येक रामभक्त को अपनी पीढ़ी को बताना ही होगा।
🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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