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फ़रवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अविमुक्तेश्वरानन्द का मठाधीशी पाखंड और राजनैतिक हिंदुत्व का निष्ठुर यथार्थ

सनातन धर्म की रक्षा वातानुकूलित आश्रमों से जारी किए गए 'प्रमाणपत्रों' से नहीं, अपितु राम मंदिर और बुलडोजर रूपी उस 'राजदण्ड' से होती है, जिसका निर्माण एक 'राजनैतिक हिंदू' करता है। "धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्।" (धर्म का मूल संसाधन है, और संसाधनों का मूल राज्यसत्ता है।) – आचार्य चाणक्य जब सभ्यतागत शत्रु 'गजवा-ए-हिंद' और 'डेमोग्राफिक जिहाद' के माध्यम से हमारी अस्मिता को निगलने के लिए द्वार पर खड़े हों, तब यह देखना अत्यंत विक्षोभकारी है कि हमारे स्वयंभू मठाधीश 'असली हिंदू कौन है' इसका राजनैतिक 'सेंसर बोर्ड' चला रहे हैं। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के हालिया वक्तव्य और उस पर ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अहंकारी पलटवार ने एक आत्मघाती विमर्श को जन्म दिया है। पाठक का यह कथन कि "जो भाजपा का विरोध कर रहा है, वह हिंदू विरोधी है," भाषाई स्तर पर राजनैतिक दर्प प्रतीत हो सकता है, किंतु इसका भू-राजनैतिक (Geopolitical) यथ...

भारत-इजरायल मैत्री से विपक्ष और खाड़ी देशों में बौखलाहट क्यों?

विपक्ष का यह रुदन गाजा के लिए नहीं, अपितु अपनी समाप्त होती राजनैतिक प्रासंगिकता और उस 'इस्लामिक वीटो' के ध्वंस के लिए है, जिसने दशकों तक भारत की सामरिक संप्रभुता को बंधक बनाए रखा था। "अंतर्राष्ट्रीय राजनीति 'अहिंसा' और 'पंचशील' के कोरे कागजों पर नहीं, अपितु कठोर 'राष्ट्रीय स्वार्थ' और सामरिक शक्ति के लौह-पत्रों पर लिखी जाती है।" जबसे भारत ने अपनी विदेश नीति को 'लुटियंस' के वातानुकूलित कक्षों की कायरता से निकालकर यथार्थवाद के धरातल पर खड़ा किया है, तबसे खाड़ी देशों के महलों और भारत के वामपंथी इकोसिस्टम में एक अघोषित मातम छाया हुआ है। समस्या यह नहीं है कि भारत और इजरायल के सामरिक संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं; असली विक्षोभ यह है कि इन प्रगाढ़ होते संबंधों ने उस 'इस्लामिक वीटो' (Islamic Veto) को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है, जिसे दशकों तक हमारी संप्रभुता पर थोपा गया था। आज जब विपक्ष 'फिलिस्तीन-फिलिस्तीन' का रुदन करता है, तो वह वास्तव में किसी मानवाधिकार के लिए नहीं, बल्कि अपने खिसकते हुए ...

वीर सावरकर: वामपंथी प्रलाप की चिता पर 'हिंदू राष्ट्र' के सैनिकीकरण का शंखनाद

सावरकर प्रणीत 'हिंदुत्व' कोई संकीर्ण कर्मकांड नहीं, अपितु 'पैन-इस्लामिज्म' और विखंडनकारी शक्तियों के विरुद्ध आर्यावर्त का प्रथम और अंतिम सभ्यतागत सुरक्षा-कवच है। "हिंदू राजनीति का हिंदूकरण करो और हिंदू राष्ट्र का सैनिकीकरण करो।" – स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर प्रतिवर्ष 26 फरवरी की तिथि आते ही लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों और वामपंथी विश्वविद्यालयों में बैठे स्वयंभू बुद्धिजीवियों का एक गिरोह वीर सावरकर के चरित्र हनन का अपना कुत्सित वार्षिक अनुष्ठान प्रारंभ कर देता है। यह कितना विक्षोभकारी और विडंबनापूर्ण परिदृश्य है कि जो छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादी आज एक सुरक्षित, आक्रामक और परमाणु-संपन्न भारत की छाती पर बैठकर चैन की सांस ले रहे हैं, वे उस सामरिक दृष्टा (Strategic Visionary) को कोसने में अपना संपूर्ण जीवन खपा देते हैं जिसने इस अभेद्य सुरक्षा-कवच का वैचारिक बीजारोपण किया था! एक कृत्रिम 'चरखे' की मरीचिका को पूजने वाले ये दरबारी इतिहासकार कभी यह स्वीकार नहीं कर पाए कि राष्ट्र की संप्रभुता कोरी भा...

एक भारत, श्रेष्ठ भारत: विखंडनकारी विमर्शों की चिता पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सिंहनाद

    "भारत केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं है, यह एक राष्ट्र-पुरुष है, यह साक्षात् माँ भवानी का स्वरूप है।" – महर्षि अरविन्द जब लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों और वामपंथी विश्वविद्यालयों के परिसरों में बैठे स्वयंभू बुद्धिजीवी, संसद के पटल पर भारत को मात्र 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहकर इस राष्ट्र-पुरुष की सनातन अस्मिता को नकारते हैं, तो यह कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं होता। यह इस पुण्यभूमि के सांस्कृतिक अधिष्ठान के विरुद्ध एक सुनियोजित वैचारिक युद्ध का उद्घोष है। यह कैसा विडंबनापूर्ण और कुत्सित परिदृश्य है! 'विविधता' (Diversity) के नाम पर एक कृत्रिम उत्तर-दक्षिण (North-South) और भाषाई दरार पैदा कर, एक आयातित 'टुकड़े-टुकड़े' तंत्र भारत माता की देह को छिन्न-भिन्न करने का षड्यंत्र रच रहा है। इस विषैले विमर्श, इस बौद्धिक आतंकवाद का एक ही शमन है— आर्यावर्त की आत्मा में सुप्त 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का प्रचंड और निर्मम जागरण। इसे भी पढ़ें : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : उत्तर प्रदेश के पुनरुत्थान का वैचारिक अधिष्ठान   'यूनियन ऑफ स्टेट्स' का...

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उत्तर प्रदेश के पुनरुत्थान का वैचारिक अधिष्ठान

विरासत से विकास: प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक कलाओं के आधार पर बढ़ता उत्तर प्रदेश का आधुनिक कदम।   "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥" स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था,   "प्रत्येक राष्ट्र का एक मुख्य प्रवाह होता है, एक जीवन-संगीत होता है। भारत का जीवन-संगीत धर्म है, आध्यात्मिकता है। यदि आपने इसे त्याग दिया, तो यह राष्ट्र तीन पीढ़ियों में विलुप्त हो जाएगा।" दशकों तक उत्तर प्रदेश, जो कभी आर्यावर्त का हृदय और वैदिक ज्ञान का उद्गम स्थल था, अपने इसी 'जीवन-संगीत' से विमुख रहा। परिणाम हम सभी ने देखा—यह पावन धरा 'बीमारू' राज्य की संज्ञा पाने के लिए विवश हो गई। अराजकता, तुष्टिकरण और जातिवाद के विषैले त्रिकोण ने प्रदेश की 'आत्मा' को मूर्छित कर दिया था। किंतु, आज हम जिस उत्तर प्रदेश को देख रहे हैं, वह मात्र प्रशासनिक फेरबदल का परिणाम नहीं है। यह एक गहन वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतिफल है। आज के उत्तर प्रदेश का अभ्युदय इस बात का प्रमाण है कि 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' केवल एक भावनात्मक नारा न...

क्या अखिलेश यादव अब आजम खान को हाशिये पर धकेलना चाहते हैं?

Akhilesh Yadav's undisputed dominance on the Samajwadi Party's new political chessboard, in contrast to the progressive marginalisation of veteran leader Azam Khan. This silent power shift is set to define the trajectory of the 2027 UP Assembly elections. राजनीति में कोई भी कदम बिना किसी ठोस वजह के नहीं उठाया जाता, और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर तो हर नये मोहरे की चाल का एक गहरा मतलब होता है। हाल ही में (15 फरवरी 2026 को) नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल होना कोई सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। क्या यह महज़ एक नेता का दल-बदल है? या फिर समाजवादी पार्टी के भीतर एक नए और खामोश तख्तापलट की शुरुआत? उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले जानते हैं कि अखिलेश यादव का यह कदम एक बहुत बड़ी और सोचे-समझी आगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा है, जिसका सीधा असर पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरे—आजम खान—पर पड़ने वाला है। इतिहास का दोहराव: मुलायम और शिवपाल के बाद अब आजम की बारी? कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है और इंसान अपनी फितरत कभी नहीं ...

क्या लोकसभा स्पीकर के मुद्दे ने विपक्षी एकता की पोल खोल दी है ?

The House in turmoil: Symbol of deepening confrontation between opposition and the Chair लोकसभा अध्यक्ष को हटाना बिल्कुल अंतिम विकल्प TMC : एक गहन विश्लेषण संसदीय लोकतंत्र की नींव निष्पक्षता और संयम पर टिकी होती है। 10 फरवरी 2026 को, जब विपक्षी INDIA गठबंधन ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी ने स्पष्ट कहा कि "अध्यक्ष का हटाना अंतिम विकल्प होना चाहिए"। यह बयान बजट सत्र के दौरान सदन में बढ़ते हंगामे, विपक्षी सांसदों के निलंबन, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का अवसर न देने और सत्ता पक्ष की आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कार्रवाई न होने जैसे मुद्दों के बीच आया। TMC ने इन शिकायतों से सहमति जताई, लेकिन तत्काल प्रस्ताव के बजाय पहले एक औपचारिक पत्र भेजकर सुधार का अवसर देने पर जोर दिया, जिसमें 2-3 दिनों का समय सुझाया गया। यह घटना संसदीय इतिहास में दुर्लभ है, जहां अध्यक्ष के पद को चुनौती दी गई। संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत हटाने के लिए सदन क...

भारत रत्न विवाद: क्या सावरकर ने दी थी टू-नेशन थ्योरी? तथ्यों के आईने में

The Bharat Ratna debate revisited: Examining historical records and ideological positions to assess claims linking Savarkar with the Two-Nation Theory भारतीय राजनीति में वीर सावरकर का नाम हमेशा से विवादास्पद रहा है। हाल ही में जब भारत रत्न के लिए सावरकर के नाम का प्रस्ताव सामने आया, तो कांग्रेस नेता और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि "सावरकर ने ही टू-नेशन थ्योरी दी थी, इसलिए उन्हें भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए।" यह बयान न केवल राजनीतिक बहस का विषय बना, बल्कि इसने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न को भी सामने रखा: क्या वास्तव में सावरकर ने टू-नेशन थ्योरी का प्रतिपादन किया था? या यह एक राजनीतिक आरोप मात्र है? 🎯 इस लेख का उद्देश्य: तथ्यों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और विद्वानों की राय के आधार पर इस दावे की गहन पड़ताल करना। हमारा उद्देश्य न तो किसी विचारधारा का समर्थन है और न ही विरोध, बल्कि एक संतुलित, शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करना है। भाग 1: विवाद की पृष्ठभूमि सावरकर को भारत रत्न: एक पुरानी मांग ...