औरंगज़ेब का सत्ता तक पहुँचना स्वयं उसके चरित्र का पहला और सबसे बड़ा प्रमाण है। उसने न केवल अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में वर्षों तक कैद रखा, बल्कि अपने सगे भाइयों—दारा शिकोह, मुराद और शुजा—की नृशंस हत्या करवाई। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था; दारा शिकोह की हत्या के पीछे वैचारिक असहिष्णुता भी थी, क्योंकि दारा सूफी परंपरा और धार्मिक समन्वय का पक्षधर था। सत्ता की यह भूख किसी भी नैतिक सीमा को स्वीकार नहीं करती—और यही तानाशाही की पहली पहचान होती है।
औरंगज़ेब ने शासन को इस्लामी शरीयत के अधीन लाने का संगठित प्रयास किया। जज़िया कर की पुनर्बहाली, गैर-मुस्लिमों पर धार्मिक प्रतिबंध, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों पर अंकुश, तथा इस्लामी फ़तवों का संकलन ‘फ़तवा-ए-आलमगीरी’—ये सभी कदम दर्शाते हैं कि वह धर्म को निजी आस्था नहीं, बल्कि राज्य की वैचारिक नीति बनाना चाहता था। भारत जैसी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक भूमि में यह दृष्टिकोण स्वभावतः दमनकारी सिद्ध हुआ।
इतिहासिक अभिलेख यह स्पष्ट करते हैं कि औरंगज़ेब के शासनकाल में हिंदू समाज को द्वितीय श्रेणी के नागरिक की स्थिति में धकेला गया। अनेक मंदिरों का विध्वंस, धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध और आर्थिक भेदभाव—ये किसी एक घटना या अपवाद नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित नीति का हिस्सा थे। यह तर्क दिया जाता है कि उसने कुछ मंदिरों को दान भी दिया, किंतु ऐसे अपवाद किसी मूल नीति को न्यायपूर्ण सिद्ध नहीं कर सकते। किसी भी शासन का मूल्यांकन उसकी प्रवृत्ति से होता है, न कि चुनिंदा उदाहरणों से।
औरंगज़ेब का लगभग आधा शासनकाल युद्धों में बीता—विशेषकर दक्कन के अभियानों में। इन युद्धों ने मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक नींव को खोखला कर दिया। करोड़ों की जनहानि, कृषि और व्यापार का पतन तथा प्रशासनिक थकान—ये सब उसी नीति का परिणाम थे, जिसमें विस्तार और धार्मिक वर्चस्व को स्थिर शासन से अधिक महत्व दिया गया। उसके बाद मुग़ल साम्राज्य का तीव्र पतन कोई संयोग नहीं, बल्कि उसी तानाशाही दृष्टि का स्वाभाविक परिणाम था।
यद्यपि औरंगज़ेब भारत में जन्मा और भारत में ही मरा, किंतु उसकी वैचारिक निष्ठा भारतीय सभ्यता से नहीं, बल्कि मध्यकालीन इस्लामी साम्राज्य की अवधारणा से जुड़ी रही। भारत की सहिष्णुता, बहुलता और सांस्कृतिक सहअस्तित्व की परंपरा उसके शासन में कमजोर पड़ी। इस अर्थ में वह भौगोलिक रूप से भले ही भारतीय रहा हो, पर मानसिकता से वह भारत की आत्मा से जुड़ नहीं सका।
इतिहास के प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष अपरिहार्य है कि औरंगज़ेब न तो महान शासक था और न ही न्यायप्रिय सुधारक। वह एक कट्टरपंथी, क्रूर और सत्ता-लोलुप तानाशाह था, जिसकी नीतियों ने न केवल मानवता और धार्मिक सहिष्णुता को क्षति पहुँचाई, बल्कि स्वयं उसके साम्राज्य के पतन की नींव भी रखी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास को न तो महिमामंडन का साधन बनाया जाए और न ही राजनीतिक तुष्टिकरण का। इतिहास का उद्देश्य पूजा नहीं, चेतावनी देना होता है—ताकि समाज यह समझ सके कि असहिष्णुता, कट्टरता और तानाशाही अंततः किसी भी राष्ट्र को कमजोर ही करती है।

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