भारतीय संविधान का मूल दर्शन बहुलता, सहिष्णुता और समानता पर आधारित है. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि वह सिद्धांत है जो यह सुनिश्चित करता है कि राज्य और उसकी संस्थाएँ किसी एक धर्म का पक्ष न लें। प्रश्न यह है कि जब शिक्षा—जो भविष्य की चेतना गढ़ती है—राज्य और समाज दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है, तब क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था व्यवहार में भी उतनी ही धर्मनिरपेक्ष है, जितनी वह काग़ज़ों पर दिखती है?
संविधान और शिक्षा: सैद्धांतिक ढांचा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 स्पष्ट करता है कि राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य नहीं हो सकती। वहीं, अनुच्छेद 25–28 सामूहिक रूप से यह संदेश देते हैं कि आस्था व्यक्तिगत है और राज्य-प्रायोजित ढांचे में तटस्थता अनिवार्य है।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) भी constitutional values, scientific temper और critical thinking पर ज़ोर देती है। कहीं भी यह नहीं कहा गया कि स्कूल किसी विशिष्ट धर्म की पूजा-पद्धति या धार्मिक पाठ को सभी विद्यार्थियों पर लागू करें।
सैद्धांतिक रूप से देखें तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था स्पष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष है।
व्यवहारिक वास्तविकता: कक्षा और प्रार्थना सभा की सच्चाई
यथार्थ इससे अधिक जटिल है। देश के अनेक सरकारी और निजी स्कूलों में:
प्रार्थना सभा में किसी एक धर्म विशेष के मंत्र/पाठ
धार्मिक प्रतीकों का संस्थागत उपयोग
त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों को “अनिवार्य सांस्कृतिक गतिविधि” के रूप में प्रस्तुत करना जैसी स्थितियाँ देखने को मिलती हैं.
समस्या धर्म के अध्ययन से नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब ‘धर्म का ज्ञान’ और ‘धर्म का अभ्यास’ एक-दूसरे में घुलने लगते हैं, और बच्चों के पास असहमति या विकल्प का वास्तविक अधिकार नहीं रहता।
हालिया विवाद: चेतावनी के संकेत
पानीपत (हरियाणा) और ऊधम सिंह नगर (उत्तराखण्ड) जैसे मामलों ने यह प्रश्न फिर सामने रखा कि:
क्या स्कूलों में धार्मिक तटस्थता के लिए स्पष्ट SOP मौजूद हैं?
क्या निजी स्कूलों पर प्रभावी निगरानी तंत्र लागू है?
क्या अभिभावकों की सहमति और संवैधानिक सीमाओं का सम्मान किया जा रहा है?
इन मामलों ने यह दिखाया कि समस्या केवल किसी एक शिक्षक या स्कूल की नहीं, बल्कि प्रशासनिक अस्पष्टता और निगरानी-शून्यता की है।
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सरकारी बनाम निजी स्कूल: दोहरी चुनौती
सरकारी स्कूलों में समस्या अक्सर संसाधन और प्रशिक्षण की होती है, जबकि निजी स्कूलों में स्वायत्तता का अति-उपयोग देखने को मिलता है।
कई निजी स्कूल स्वयं को “value-based education” के नाम पर धार्मिक गतिविधियों का अधिकार दे देते हैं, जबकि वे यह भूल जाते हैं कि मूल्य (values) और आस्था (faith) समान नहीं हैं।
यहाँ शिक्षा विभागों की भूमिका निर्णायक होनी चाहिए, परंतु अधिकतर मामलों में कार्रवाई विवाद के बाद होती है, पहले नहीं।
क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध है? नहीं। यह एक सामान्य भ्रांति है।
धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का अर्थ है:
सभी धर्मों के प्रति सम्मान
किसी एक धर्म का संस्थागत प्रभुत्व नहीं
ज्ञान, इतिहास और दर्शन के रूप में धर्म का अध्ययन
लेकिन धार्मिक आचरण को व्यक्तिगत विकल्प बनाए रखना. स्कूल का काम नागरिक बनाना है, अनुयायी नहीं।
समाधान क्या है? — भावनात्मक नहीं, संरचनात्मक
यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को वास्तव में धर्मनिरपेक्ष बनाना है, तो कुछ ठोस कदम अनिवार्य हैं:
1. School Assembly Compliance Code — सभी मान्यता-प्राप्त स्कूलों के लिए
2. धार्मिक तटस्थता पर शिक्षक प्रशिक्षण
3. अभिभावक-सहमति आधारित गतिविधियाँ (opt-in model)
4. नियमित प्रशासनिक ऑडिट
5. स्पष्ट अंतर — संस्कृति शिक्षा बनाम धार्मिक अभ्यास
धर्मनिरपेक्षता को न तो डर का विषय बनाया जाए, न ही राजनीतिक हथियार।
तो, क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था वास्तव में धर्मनिरपेक्ष है? उत्तर है: सैद्धांतिक रूप से हाँ, व्यवहार में आंशिक रूप से।
संविधान और नीति स्पष्ट हैं, लेकिन क्रियान्वयन में गंभीर अंतर दिखाई देता है। जब तक स्कूल-स्तर पर स्पष्ट नियम, प्रभावी निगरानी और संवैधानिक मूल्यों की वास्तविक समझ नहीं बनेगी, तब तक यह प्रश्न बार-बार उठता रहेगा।
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को सोचने योग्य नागरिक बनाना है—किसी धार्मिक या वैचारिक प्रयोगशाला का विषय नहीं।

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