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ब्राह्मण राजनीति पर मची हायतौबा: अवसरवाद, स्मृतिभ्रंश और जयचंदी परंपरा का नया अध्याय

 

Brahmin politics debate in Uttar Pradesh highlighting BJP, Samajwadi Party hypocrisy, and Yogi Adityanath governance model

भाजपा के ब्राह्मण विधायकों की हालिया बैठक ने यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति आज भी संकेतों से अधिक आशंकाओं पर चलती है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक जिस तरह की हाय–तौबा मची, वह इस बैठक के राजनीतिक महत्व से अधिक विपक्ष की वैचारिक दिवालियापन को उजागर करती है।

समाजवादी पार्टी के लिए तो यह बैठक मानो सूखे में बारिश साबित हुई। वही समाजवादी पार्टी, जिसकी वैचारिक बुनियाद ही कभी ब्राह्मण राजनीति के प्रतिरोध पर रखी गई थी। यह इतिहास का निर्विवाद तथ्य है कि एक दौर में उसके शीर्ष नेताओं द्वारा ब्राह्मण समाज को अपमानजनक उपमाओं से नवाज़ा गया, उन्हें सत्ता और समाज के लिए “खतरे” के रूप में प्रस्तुत किया गया। आज वही पार्टी अचानक ब्राह्मण हितैषी होने का अभिनय कर रही है। राजनीति में इससे बड़ा वैचारिक पतन और क्या हो सकता है?

वास्तविकता यह है कि समाजवादी पार्टी के पास इस समय न कोई ठोस मुद्दा है, न कोई भरोसेमंद नैरेटिव। ‘नमाजवाद’ और ‘जातिवाद’ के खाद-पानी पर पनपती ‘परिवारवाद’ की बेल अब अपनी अंतिम ऋतु में है। स्वघोषित समाजवादियों के मन में भले ही आत्मसंतोष के लड्डू फूट रहे हों, लेकिन आम ब्राह्मण समाज—और व्यापक हिंदू समाज—इतना भोला नहीं है कि स्मृतिहीनता का शिकार हो जाए।

इसके बरअक्स, उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शासन किसी प्रचार का मोहताज नहीं है। कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सख़्ती और निर्णायक नेतृत्व—इन तीनों मोर्चों पर उनके कार्यकाल की चर्चा न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों तक हुई है। कट्टरपंथ, वामपंथ, तथाकथित उदारतावाद की आड़ में पलती अराजक सोच, पत्थरबाज़ गिरोह और जिहादी मानसिकता—इन सबके बेलगाम घोड़ों की लगाम कसने का साहस अगर किसी ने दिखाया है, तो वह योगी आदित्यनाथ हैं।

शांतिप्रिय, राष्ट्रवादी और मानवतावादी समाज को भावुक भाषणों नहीं, बल्कि ऐसे ही कठोर और सक्षम प्रशासक की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि आज गुंडों, माफियाओं और आतंक के सरपरस्तों के हौसले पस्त हैं, उनकी राजनीतिक भाषा में आत्मविश्वास नहीं, केवल हताशा झलकती है।

विडंबना यह है कि जो लोग कभी खुलेआम कहते रहे—“तिलक, तराजू और तलवार…”—आज वही सत्ता की चौखट पर सिर झुकाने को तैयार हैं। वोटों का तिलक लगाने की होड़ है, शासन की तलवार थामने की लालसा है, और नोटों के तराजू में खुद को तौलने की व्यग्रता भी। सिद्धांत पीछे छूट चुके हैं, अवसरवाद आगे खड़ा है।

जहाँ तक कांग्रेस के पंजे का प्रश्न है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता आज प्रतीकों से अधिक व्यंग्य का विषय बन चुकी है। उसका अस्तित्व न नेतृत्व दे पा रहा है, न दिशा—बस किसी न किसी तरह प्रासंगिक बने रहने की कोशिश भर।

अब निर्णायक क्षण ब्राह्मण समाज के नेतृत्व के सामने है। प्रश्न केवल सत्ता का नहीं, स्मृति और स्वाभिमान का है। यह तय करना उसी समाज को है कि वह स्थिर शासन और स्पष्ट राष्ट्रवादी दिशा के साथ खड़ा होगा, या फिर उन ताक़तों के साथ, जिनका अतीत अपमान से भरा और वर्तमान अवसरवाद से सना हुआ है।

इतिहास एक बात बार-बार दोहराता है—जो लोग निजी स्वार्थों की वेदी पर समूचे हिंदू समाज को बलि चढ़ाते हैं, उन्हें अंततः किसी विचारधारा का नहीं, केवल “जयचंद” का तमगा ही मिलता है। राजनीति बदल सकती है, चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन इतिहास की अदालत में फैसले कभी नहीं बदलते।

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