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सरस्वती विद्या मंदिर में हिन्दू छात्रों को कलमा पढ़ाने के लिए जिम्मेदार कौन?

 पानीपत से उत्तराखण्ड : शिक्षा मंदिरों में ‘कलमा’ और भाजपा सरकार 

Panipat and Uttarakhand school prayer controversy—accountability and governance question

बच्चों की सुबह की प्रार्थना सभा—सिद्धांततः—अनुशासन, नैतिकता और सामूहिकता का अभ्यास है। लेकिन जब प्रार्थना सभा या कक्षा के भीतर किसी एक धार्मिक परंपरा के विशिष्ट पाठ को “सभी” विद्यार्थियों पर लागू किया जाता है, तो यह शिक्षा की तटस्थता (secular spirit) और अभिभावकों के भरोसे—दोनों के लिए जोखिम बन जाता है। हाल के महीनों में दो अलग-अलग BJP-शासित राज्यों—हरियाणा और उत्तराखण्ड—में सामने आए मामलों ने यही प्रश्न उठाया है कि “जिम्मेदारी किसकी है?” और “निगरानी कहाँ विफल हुई?”

मामला 1: पानीपत का “सरस्वती विद्या मंदिर”—कक्षा में ‘कलमा’ पढ़ाने का आरोप

18 मई 2025 को हरियाणा के पानीपत में सरस्वती विद्या मंदिर से जुड़ा प्रकरण सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार कक्षा 8 के छात्रों को एक महिला शिक्षक द्वारा ‘कलमा’ पढ़ाने/पढ़वाने का आरोप लगा; बच्चों ने घर जाकर वही पंक्तियाँ गुनगुनाईं, तब अभिभावकों को जानकारी हुई और उन्होंने स्कूल में आपत्ति दर्ज कराई। 


इन्हीं रिपोर्टों में शिक्षक का नाम महजीब अंसारी (उर्फ “माही”) बताया गया है और स्कूल के प्रिंसिपल का नाम इंदु रिपोर्ट हुआ है; स्कूल प्रबंधन ने शिक्षिका को सेवामुक्त/बर्खास्त करने की बात कही। 

यहाँ दो बिंदु रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं:

1. विवाद कक्षा के भीतर पढ़ाए गए धार्मिक पाठ को लेकर है—यानी यह “वैकल्पिक धर्म-अध्ययन” की तरह कोई स्पष्ट, लिखित, अभिभावक-सहमति वाला कार्यक्रम बताकर रिपोर्ट नहीं हुआ। 

2. स्कूल की प्रतिक्रिया तत्काल कार्रवाई तक सीमित दिखती है, पर जनहित का प्रश्न यह है कि ऐसी गतिविधि कक्षा तक पहुँची कैसे—क्या यह शिक्षक की निजी पहल थी, या स्कूल-स्तरीय निगरानी/नीति कमजोर थी?

मामला 2: उत्तराखण्ड (ऊधम सिंह नगर)—प्रार्थना सभा में ‘कलमा’ का नियमित पाठ

दिसंबर 2025 में उत्तराखण्ड के ऊधम सिंह नगर (बाज़पुर क्षेत्र; सुल्तानपुर पट्टी/कौशल्या पुरी) के एक निजी स्कूल का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें बच्चे प्रार्थना सभा में ‘कलमा’ पढ़ते दिखे। रिपोर्ट के अनुसार स्कूल का नाम Adarsh Janata Montessori Junior High School है और प्रिंसिपल Girish Chandra Saini ने बताया कि करीब एक वर्ष से सुबह की प्रार्थना में ‘कलमा’ शामिल था, जिसे वायरल वीडियो के बाद रोक दिया गया। 

इसी मामले में शिक्षा विभाग द्वारा नोटिस/जांच का उल्लेख भी रिपोर्ट हुआ है और यह भी कहा गया कि नीति/मानदंड के अनुसार किसी एक धर्म की प्रार्थना सभी विद्यार्थियों पर लागू करना उचित नहीं है। 

यह केस पानीपत से अलग इसलिए है क्योंकि यहाँ गतिविधि असेंबली का हिस्सा बताई गई—यानी संस्थागत स्तर पर नियमित। 

अब मूल प्रश्न: जिम्मेदार कौन?

इन दोनों मामलों को जोड़कर देखें, तो जवाबदेही चार स्तरों पर तय होती है—(1) शिक्षक, (2) स्कूल प्रबंधन, (3) शिक्षा विभाग, (4) राजनीतिक-शासन (policy + oversight)।

1) प्राथमिक जिम्मेदारी: शिक्षक/शिक्षिका

पानीपत केस में यदि रिपोर्टिंग के अनुसार शिक्षक ने कक्षा में ‘कलमा’ सिखाया, तो यह शिक्षक की पेशेवर सीमाओं और स्कूल-एथिक्स का उल्लंघन माना जाएगा—क्योंकि ऐसी धार्मिक सामग्री को नियमित पाठ्यक्रम/अभिभावक-सहमति के फ्रेम में रिपोर्ट नहीं किया गया। 

लेकिन उत्तराखण्ड केस दिखाता है कि “सिर्फ शिक्षक” पर जिम्मेदारी डालना कई बार वास्तविकता से बचना है—क्योंकि वहाँ इसे स्कूल प्रार्थना का नियमित हिस्सा बताया गया है। 

2) निर्णायक जिम्मेदारी: प्रिंसिपल और स्कूल मैनेजमेंट

स्कूल का संचालन प्रिंसिपल/प्रबंधन के नियंत्रण में होता है। प्रार्थना सभा का कंटेंट, स्कूल डायरी/कैलेंडर, और गतिविधियों की स्वीकृति संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड मामले में प्रिंसिपल का यह कहना कि यह एक साल से चल रहा था, प्रबंधन/प्रशासनिक जिम्मेदारी को सीधे स्थापित करता है। 

पानीपत में शिक्षक को हटाना एक “तत्काल प्रबंधन कदम” है, लेकिन जनहित के प्रश्न बने रहते हैं:

क्या स्कूल के पास असेंबली/कक्षा कंटेंट के लिए लिखित SOP थी? यदि थी, तो उल्लंघन पकड़ने की आंतरिक निगरानी क्यों नहीं चली? यदि नहीं थी, तो यह प्रबंधन की संस्थागत कमी है। 

3) नियामक जिम्मेदारी: शिक्षा विभाग

उत्तराखण्ड केस में विभागीय संज्ञान, नोटिस और यह टिप्पणी कि नीति के अनुसार किसी एक धर्म की प्रार्थना सभी छात्रों को नहीं कराई जा सकती—यह संकेत देता है कि सरकारी दिशा-निर्देश/मानक मौजूद हैं और उल्लंघन पर कार्रवाई संभव है। 

अब व्यावहारिक प्रश्न यह है:

निजी स्कूलों में ऐसी गतिविधियाँ क्या केवल वायरल/विवाद के बाद ही पकड़ी जाती हैं? या विभाग के पास प्रोएक्टिव निरीक्षण और “कॉम्प्लायंस ऑडिट” की वास्तविक व्यवस्था है? 

यदि जवाब “घटना के बाद” वाला है, तो यह प्रशासनिक oversight gap है—और यही gap कल को किसी भी राज्य में पुनरावृत्ति कर सकता है।

4) राजनीतिक-शासन की जिम्मेदारी: दावा बनाम डिलीवरी

हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में राज्य सरकार है, और उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार है—दोनों BJP से संबद्ध हैं। 

इसलिए यह प्रश्न “दल-राजनीति” से अधिक “गवर्नेंस परफॉर्मेंस” का बनता है:

जब शासन मॉडल “निगरानी/कानून-व्यवस्था/अनुशासन” को प्रमुख प्राथमिकता बताता है, तो स्कूल-स्तर पर संवेदनशील शैक्षणिक-धार्मिक अनुशासन की नियामक व्यवस्था कितनी सुदृढ़ है?

क्या राज्य शिक्षा विभाग को सभी निजी स्कूलों के लिए धर्म-तटस्थ असेंबली प्रारूप (मौन-प्रार्थना/सार्वभौमिक नैतिक पाठ/संवैधानिक मूल्य-पाठ) का सार्वजनिक और बाध्यकारी SOP जारी करना चाहिए?

जनहित में 7 ठोस प्रश्न

1. क्या स्कूल असेंबली/कक्षा में किसी एक धर्म का विशिष्ट पाठ सभी विद्यार्थियों पर लागू करना नीति/मानदंडों के अनुरूप है? 

2. पानीपत मामले में यह सामग्री कक्षा तक पहुँची कैसे—शिक्षक की निजी पहल थी या स्कूल-संस्कृति/निगरानी का हिस्सा? 

3. उत्तराखण्ड में यदि यह एक साल से चल रहा था, तो निरीक्षण तंत्र ने पहले क्यों नहीं रोका? 

4. दोनों मामलों में अभिभावकों को लिखित रूप से जानकारी/सहमति का मानक क्या था?

5. निजी स्कूलों की असेंबली/एक्स्ट्रा गतिविधियों पर राज्य के पास अनुपालन का मापनीय ढांचा क्या है?

6. कार्रवाई केवल “बर्खास्तगी/नोटिस” तक सीमित न रहकर सुधारात्मक आदेश और पुनरावृत्ति रोकने का तंत्र बनेगा क्या? 

7. क्या राज्यों को सार्वजनिक “School Assembly Compliance Code” जारी करना चाहिए?

“सरस्वती विद्या मंदिर में हिन्दू छात्रों को कलमा पढ़ाने के लिए जिम्मेदार कौन?”—इसका उत्तर किसी एक व्यक्ति पर टिकाकर समाप्त नहीं हो सकता। पानीपत प्रकरण में प्रथम दृष्टि में शिक्षक की भूमिका प्रमुख है, पर स्कूल की नीति/निगरानी भी कठघरे में है। 
उत्तराखण्ड प्रकरण में जिम्मेदारी अधिक स्पष्ट है, क्योंकि प्रार्थना सभा में इसे नियमित बताकर प्रिंसिपल ने प्रशासनिक चूक स्वीकार की, और विभागीय नोटिस/नीति-उल्लंघन की बात रिपोर्ट हुई।

और चूँकि दोनों राज्यों में BJP की सरकारें हैं, इसलिए जनता का यह अपेक्षित मानक बनता है कि ऐसी संवेदनशील स्थितियों में प्रतिक्रिया “घटना के बाद” नहीं, बल्कि “घटना से पहले”—सिस्टम के जरिए—दिखे। 

Legal & Constitutional Disclaimer (Bilingual)

यह लेख जनहित, सूचना और नीति-सुधार के उद्देश्य से उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित विश्लेषण है। किसी व्यक्ति/समुदाय के प्रति घृणा, अपमान या हिंसा का कोई आशय नहीं है। लेख का उद्देश्य शिक्षा-प्रशासन की जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के अनुपालन पर विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
This piece is a public-interest, policy-focused analysis based on publicly available reports. It does not intend to promote hatred, contempt, or violence against any individual or community. It is published in the spirit of free speech under Article 19(1)(a) and subject to reasonable restrictions under Article 19(2) of the Constitution of India.

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