एक राष्ट्रीय स्तर का गंभीर, तथ्यात्मक और प्रमाणिक संपादकीय प्रस्तुत है।
भारत का संविधान किसी एक समुदाय, आस्था या पंथ का दस्तावेज़ नहीं है। यह एक नागरिक-राज्य अनुबंध (Social Contract) है, जो विविधताओं से भरे समाज को एक राष्ट्र में बांधता है।
संविधान की प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि भारत एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है।
यहां धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि राज्य की तटस्थता है।
संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन वही अनुच्छेद यह भी स्पष्ट करता है कि यह स्वतंत्रता “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन होगी। अर्थात,
"धर्म पूर्ण स्वतंत्र है, पर निरंकुश नहीं"
जब किसी भी मजहबी कट्टरपंथी विचारधारा में यह धारणा जन्म लेती है कि मज़हबी क़ानून संविधान से ऊपर हैं, तब वह विचारधारा स्वतः संवैधानिक ढांचे से बाहर चली जाती है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब मज़हब को राज्य संचालन का आधार बनाया गया, तब-तब—
- नागरिक समानता समाप्त हुई
- आम जनमानस शोषण का शिकार हुए
- और अंततः राज्य अस्थिर हुआ
पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान जैसे उदाहरण किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि धर्म-प्रधान राज्य संरचना की असफलता के जीवंत प्रमाण हैं।
भारत की विशेषता यह रही है कि यहां आस्था और नागरिकता को अलग रखा गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि—
“राज्य का धर्म से कोई सरोकार नहीं होगा, अन्यथा लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा।”
इसके बावजूद, समय-समय पर कट्टरपंथी मज़हबी कुतर्क सामने आता रहा है कि—
- मज़हबी कानून संविधान से ऊपर हों
- मज़हबी पहचान राष्ट्रीय पहचान से पहले हो
- और मज़हबी मामलों पर तर्क-वितर्क को ‘धर्म-विरोध’ घोषित कर दिया जाए
यहाँ तक कि स्वस्थ आलोचनाओं को भी भीड़तंत्र द्वारा "सर तन से जुदा" जैसे हिंसक नारों से दबाने कि हरसम्भव कोशिशे की गईं. नूपुर शर्मा का मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है. भीड़तंत्र की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितनी किसी तानाशाही की शुरुआत।
आज भारत में समस्या केवल मज़हबी कट्टरता की नहीं, बल्कि चयनात्मक सेक्युलरिज़्म की भी है। जहां एक ओर कुछ वर्ग संविधान की आड़ में मज़हबी राजनीति करते हैं, वहीं दूसरी ओर—
- मज़हबी तुष्टिकरण को सेक्युलरिज़्म कहा जाता है
- मज़हबी कट्टरता पर चुप्पी को सहिष्णुता बताया जाता है
- जबकि संवैधानिक आलोचना को साम्प्रदायिक करार दिया जाता है
यह दोहरा मापदंड संविधान को कमजोर करता है, और राष्ट्र को भीतर ही भीतर खोखला करता है।
राष्ट्र कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि संवैधानिक इकाई है। धर्म व्यक्ति की आस्था है, संविधान नागरिक का अधिकार-पत्र है, लेकिन राष्ट्र—
- सुरक्षा देता है
- कानून लागू करता है
- और अस्तित्व की गारंटी देता है
यदि राष्ट्र कमजोर होगा, तो न कोई धर्म सुरक्षित रहेगा और न ही संविधान।
भारत को आज स्पष्ट रूप से यह तय करना होगा कि—
- आस्था निजी है
- संविधान सर्वोच्च है
- और राष्ट्र सामूहिक उत्तरदायित्व
जो भी मज़हबी विचारधारा, संगठन या नेता इस क्रम को उलटता है, वह चाहे किसी भी धर्म से जुड़ा हो, वह संवैधानिक भारत के विरुद्ध खड़ा है।
यह बहस किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्र की वैचारिक सुरक्षा के पक्ष में है। और यही आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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