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गुरुवार, 29 जुलाई 2021

शायद राहुल गांधी की याददाश्त बहुत कमज़ोर है

इजरायल की एक कम्पनी एनएसओ पेगासस को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई है जिसमें भारत के कई महत्वपूर्ण लोगों की जासूसी की बात कही गई थी। जिसमें श्री राहुल गांधी का नाम भी शामिल है। मीडिया सूत्रों के अनुसार इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है कि- "यह हथियार हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया गया है। हम इस मामले में किसी भी तरह का समझौता नहीं करेंगे। इसका प्रयोग देशद्रोहियों और आतंकियों के ख़िलाफ़ होना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने इसका प्रयोग लोकतंत्र के ख़िलाफ़ क्यों किया।"

कांग्रेस नेता राहुल गांधी आज लोकतंत्र और देशभक्ति की बात कर रहे हैं। कल तक "आतंकियों का साथ-आतंक का विकास" का नारा देने वाली कांग्रेस किस मुँह से नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा रही है। क्या राहुल गांधी वह दिन भूल गए जब कश्मीर में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज ने कहा था कि "उनका बस चलता तो वह आतंकी बुरहान वानी को जिंदा रखते।". क्या वह बताएंगे कि श्रीमति सोनिया गांधी ने बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के लिए रातभर आंसू बहाए थे? खुद राहुल गांधी बताएं कि भारत के दुश्मन चाइना में उन्होंने किस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे? 11 जून, 2017 का वह दिन कोई सच्चा भारतीय नहीं भूल पाएगा जब कांग्रेस पार्टी के संदीप दीक्षित ने सेना प्रमुख को गुंडा कहा। दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सुपुत्र संदीप दीक्षित ने कहा, ”पाकिस्तान उलजुलूल हरकतें और बयानबाजी करता है। ख़राब तब लगता है कि जब हमारे थल सेनाध्यक्ष सड़क के गुंडे की तरह बयान देते हैं।”

राहुल गांधी जी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह ने इसके पहले 16 अप्रैल, 2017 को एक शर्मनाक बयान दिया जिसे सुनकर कोई भी समझ सकता है कि कांग्रेस पार्टी सेना के प्रति क्या भाव रखती है। उन्होंने कहा, ”कश्मीरी लोगों को एक तरफ आतंकवादी मारते हैं, दूसरी तरफ भारतीय सेना के जवान।” यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यह वही दिग्विजय सिंह हैं जिन्होंने अर्धसैनिक बल के एक जवान को बिना किसी गलती के थप्पड़ मारा था। 
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा था कि - कारगिल लड़ाई भाजपा की लड़ाई थी।

खुद राहुल गांधी पर अक्सर दुनियाभर में भारत की छवि को धूमिल करने के आरोप लगते रहे हैं। कश्मीरी आतंक और पंजाब में खालिस्तानी उन्माद की जन्मदाता मानी जाने वाली कांग्रेस को यह जरूर सोचना चाहिए कि उसके घर शीशे के हैं।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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बुधवार, 28 जुलाई 2021

इस हिसाब से तो महाराज रावण की मूर्तियां हर चौराहे पर लगवानी चाहिएं

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कानपुर के चौबेपुर स्थित ग्राम बरुआ में भगवान परशुराम मंदिर के भूमिपूजन एवं शिलान्यास कार्यक्रम में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. राजेंद्र नाथ त्रिपाठी पहुंचे थे। उन्होंने मंच से घोषणा की थी, कि "ब्राह्मण महासभा यूपी में प्रकाश शुक्ला और विकास दुबे की प्रतिमा स्थापित कराएगी। उन्होंने कहा कि जब फूलन देवी डकैत और ददुआ डकैत की प्रतिमा उनका समाज लगाता है, जो घोषित डकैत थे, तो जो ब्राह्मणों के महापुरुष और वीरता के प्रेरणा स्रोत हैं, उनकी प्रतिमा क्यों नहीं लग सकती है। पूरा ब्राह्मण समाज इसका समर्थन करता है।"

हम बड़ी विनम्रता से श्रीमान त्रिपाठी जी से पूछना चाहते हैं कि अगर आपके कथनानुसार विकास दुबे और श्री प्रकाश शुक्ला जैसे गुंडे-माफिया ब्राह्मण समाज के महापुरुष और वीरता के प्रेरणास्रोत हैं इसलिए उनकी मूर्ति लगनी चाहिए तो प्रश्न यह है कि फिर लँकाधिपति महाराज रावण, उनके भैया कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाथ का पुतला दहन क्यों किया जा रहा है? महाराज रावण भी तो ब्राह्मण थे और उन जैसा विद्वान और महायोद्धा तो न कल था, न आज है और न ही भविष्य में कभी होगा। तब ब्राह्मण समाज ने उनकी मूर्तियां मंदिरों में क्यों नहीं स्थापित कराईं?

प्रश्न यह भी है कि अगर कल को मुस्लिम समाज बुरहान वानी, अफ़ज़ल गुरु, याकूब मेमन, अजमल कसाब और उमर ख़ालिद जैसों की मूर्तियां चौराहों पर लगवाता है, तो आप क्या करेंगे? क्या ब्राह्मण समाज उसका भी समर्थन करेगा? क्या शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद की भी मूर्तियां चौराहों पर लगवा देनी चाहिए? क्या ब्राह्मण समाज की विचारधारा इतने निम्नस्तर की हो गई है कि वह दस्यु फूलन देवी और ददुआ जैसे डकैतों से अपनी तुलना करने लगा है?
क्या ब्राह्मण समाज में वीर योद्धाओं, विद्वान पुरुषों और महान संतों का अकाल पड़ गया है जो हमें विकास दुबे और श्री प्रकाश शुक्ल जैसे सड़क छाप गुंडों को वीरता और महानता का प्रेरणास्रोत बनाने की आवश्यकता है?

इस तरह के अनावश्यक और फ़िजूल के कुतर्कों से ब्राह्मण समाज का कोई लाभ नहीं होने वाला है। वैसे गलती इसमें श्रीमान त्रिपाठी जी की नहीं है। दरअसल आचार्य द्रोण और महृषि कृपाचार्य भी विद्वान ब्राह्मण थे, परन्तु दुर्योधन और शकुनि की संगति ने उनकी विद्वता और वीरता दोनों पर ग्रहण लगा दिया था। ठीक उसी प्रकार विद्वान त्रिपाठी जी भी शायद किसी दुर्योधन और शकुनि की कुटिल चालों के शिकार हो गए लगते हैं।

त्रिपाठी जी का यह भी कहना है कि उनकी बात को समस्त ब्राह्मण समाज का समर्थन है। यहां शायद त्रिपाठी जी ब्राह्मण समाज को अंडरएस्टीमेट कर गए हैं, क्योंकि वह स्वयं भी जानते हैं कि ब्राह्मण समाज एक बुद्धिजीवी समाज है जिसने सदैव हिन्दू समाज का नेतृत्व किया है। प्रत्येक ब्राह्मण स्वयं में एक कुशल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ  और नेता होता है। वह स्वयं में ही ब्रह्म है, वह निर्णय लेना जानता है। ब्राह्मण कोई भेड़-बकरी नहीं जिसे कोई भी हांक ले, वह भगवान परशुराम का वंशज है, जिन्होंने पूरी पृथ्वी पर अकेले ही नेतृत्व किया।

पंडित राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने आगे कहा कि "विकास दूबे और श्रीप्रकाश शुक्ला के साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने कहा कि अगर वे गुनाहगार थे, तो उन्हें न्यायालय सजा देता। सरकार कौन होती है, सजा देने वाली?

यहां प्रश्न यह बनता है कि यदि कोई आतंकी सुरक्षा-बलों की मुठभेड़ में मारा जाता है, अथवा मार दिया जाता है तो भी क्या इसके लिए सरकार को दोष दिया जाएगा। क्या सुरक्षा बलों को आतंकवादियों, देशद्रोहियों और समाज विरोधियों को मालाएं पहनाकर बैंड-बाजे के साथ माननीय न्यायालय को सौंप देना चाहिए?  क्या ब्राह्मण समाज बाटला हाउस कांड जैसी तमाम मुठभेड़ों का विरोध करेगा? या फिर आदरणीय त्रिपाठी जी भी माननीय सोनिया जी का अनुसरण करते हुए इशरत जहां की मौत पर रातभर आंसू बहाएंगे।

त्रिपाठी जी ने एक कहावत जरूर सुनी होगी कि "जैसा खाये अन्न वैसा हो जाये मन।" बाकी तो वह स्वयं बुद्धिमान हैं, इसलिए उनके लिए इतना ईशारा ही काफी है। 

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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

क्या इस देश में सवर्ण और पुरुष होना एक अपराध है

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मानो इस देश में सवर्ण और पुरुष होना दोनों ही एक अपराध हैं।

इस देश में दो तरह के आयोग गठित होना परम आवश्यक हैं, पहला "सवर्ण आयोग" और दूसरा "पुरुष आयोग"। सवर्ण आयोग अर्थात जहां सवर्ण समाज की समस्याओं और शिकायतों को गम्भीरता पूर्वक सुना और समझा जा सके। सवर्ण समाज केवल ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत ही नहीं है बल्कि शेख़, सैयद, मुगल और पठान भी सवर्णों की श्रेणी में ही आते हैं। इस आयोग को यह भी तय करने का अधिकार होगा कि सवर्ण समाज को कितना प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए अथवा नहीं मिलना चाहिए। एससी-एसटी एक्ट की निष्पक्ष जांच में सवर्ण आयोग की भी महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। 

इसके अतिरिक्त दूसरा "पुरुष आयोग" गठित होना चाहिये जो कि भारतीय पुरुष समाज की समस्याओं, शिकायतों और उनके बेहतर विकास के लिए हरसम्भव प्रयास कर सके। 

हमारा मानना है कि इस देश में सबसे अधिक यदि कोई मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित होता है तो वह पुरुष समाज ही है।  इसका सबसे ताज़ातरीन उदाहरण है सोशल मीडिया पर सबसे अधिक ट्रेंड करने वाला हैशटैग me too. जिसमें देश-विदेश की हजारों-लाखों महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्र के सूरमाओं पर सेक्सुअल हैरसमेंट के आरोप लगाए। एक महिला अपने कैरियर को बुलंदियों पर ले जाने या नौकरी में प्रमोशन पाने अथवा राजनीति/फ़िल्म इत्यादि में बड़ा ब्रेक पाने के लिए किसी पुरुष को अपना "शिकार" बनाती है, उसको जरिया बनाती है और अपना उल्लू सीधा होने अथवा न होने पर वह उसी पुरुष को आरोपी बना देती है। उसपर सेक्सुअल हैरसमेंट का घिनौना आरोप लगाकर उसको समाज में बदनाम करके खुद को "बेचारी" और "पीड़िता" बताने का ढोंग रचती है। इसमें महिला आयोग और उस जैसी अन्य अनेक संस्थाएं उस महिला की ख़ूब मदद करती हैं। और तो और आम जनता से लेकर संसद तक और माननीय न्यायपालिका में भी महिला का पक्ष पूरी सहानुभुति के साथ सुना जाता है। जबकि पुरुष बेचारा अपने परिवारजनों के साथ-साथ पूरे समाज की न केवल लानत-मनालत झेलता है बल्कि अपने "पुरुष समाज" से भी उसे कोई सहयोग नहीं मिलता। उसे बहुत घृणित दृष्टि से देखा जाता है और इसके लिए समय-समय पर उसे अपमानित भी होना पड़ता है। 
यह तमाम उन निर्दोष और निरपराध पुरुषों की कहानी है जिनपर बलात्कार के झूठे और मनघड़ंत आरोप लगाकर उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया जाता है। 

क्या उन महिलाओं को कभी कोई सज़ा मिल पाती है जो इस प्रकार के घिनौने षडयंत्र में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होती हैं? यह बेहद पेचीदा किंतु स्वभाविक प्रश्न है, और जिसका उत्तर शायद ही किसी के पास है। क्या कोई महिला किसी पुरुष का सेक्सुअल हेरेसमेन्ट नहीं कर सकती? क्या महिलाओं को ढाल बनाकर अपराध नहीं किये जाते?
अभी हाल ही में अपने प्यार की ख़ातिर परिवार के ही सात सदस्यों को मौत के घाट उतारने की गुनहगार अमरोहा की शबनम की फांसी की सज़ा के मामले में, शबनम की फांसी की सज़ा को मानवीय आधार पर उम्रकैद में बदले जाने की मांग को लेकर दाखिल इलाहाबाद हाईकोर्ट की महिला वकील सहर नक़वी की अर्जी में शबनम की फांसी को उम्रकैद में बदले जाने की मांग को लेकर जो दलीलें दी गईं हैं, उनमे सबसे प्रमुख यह है कि "आज़ाद भारत में आज तक किसी भी महिला को फांसी नहीं हुई है. सहर नकवी ने गवर्नर को भेजी गई अर्जी में लिखा है कि अगर शबनम को सूली पर लटकाया जाता है तो समूची दुनिया में भारत और यहाँ की महिलाओं की छवि खराब होगी, क्योंकि देश की महिलाओं को देवी की तरह पूजने व सम्मान देने की पुरानी परंपरा है।"

विद्वान वकील साहिबा की इस खोखली और बेबुनियाद दलीलों का एकमात्र मकसद एक ऐसी महिला को बचाना है जिसने 14 अप्रैल 2008 को अपने ही परिवार के 6 लोगों की सोते समय कुल्हाड़ी से गर्दन काटकर हत्या करवा दी थी, और अपने 11 महीने के मासूम  भतीजे का गला अपने हाथों से दबाकर मार डाला था। मरने वालों का कसूर मात्र इतना था कि वह शबनम और उसके आशिक सलीम के प्यार में रोड़ा बन गए थे। यहां ग़ौरतलब है कि शबनम इंग्लिश और भूगोल विषय से पोस्ट ग्रेजुएट थी।

ऐसी क्रूर और नृशंस हत्यारिन को क्या देवी मानकर पूजा जाना चाहिए, यदि हाँ, तो फिर ईशरत जहां का क्या कसूर था? श्रीराम ने सुपर्णखा के नाक-कान क्यों कटवा दिए थे? उसकी पूजा क्यों नहीं की थी? पूजा माता सीता की होती है, पूजा उस नारी की होती है जो त्याग, ममता और करुणा की प्रतिमूर्ति होती है। 
क्या किसी नृशंस हत्यारिन को फांसी पर चढ़ा देने से भारत की छवि खराब हो सकती है? इसे कुतर्क ही कहा जा सकता है।
बहरहाल, सरकार को इस सब पर बेहद गम्भीरता से विचार करना होगा, औऱ सवर्ण आयोग के साथ-साथ पुरूष आयोग का भी गठन निहायत आवश्यक है ताकि निर्दोष और निरपराध पुरुषों को न्याय मिल सके।

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सोमवार, 26 जुलाई 2021

भेड़िया अगर भेड़ की खाल पहन भी ले तो भी.....

एक पंडित जी के घर एक छोटी सी बच्ची आई जिसने पंडित जी को एक प्लेट में खीर दी, पंडित जी ने उस बच्ची से पूछा कि - बेटे, आज ये खीर किस खुशी में लाई हो? बच्ची बड़ी मासूमियत से बोली कि पंडित जी, इस खीर में कुत्ता मुहं मार गया था, इसलिए मम्मी ने कहा कि जाओ यह खीर पंडित जी को दे आओ, वह इसे अपने मंत्रों से पवित्र कर देंगे। पंडित जी को बहुत क्रोध आया उन्होंने उस खीर से भरी प्लेट को फर्श पर पटक दिया, प्लेट टूट गई। प्लेट के टूटते ही वह बच्ची दहाड़ मारकर रोने लगी। पंडित जी क्रोध में लालपीले होते हुए बोले- तू क्यों रो रही है। धर्म तो मेरा भ्रष्ट हुआ है। बच्ची बिलखते हुए बोली, पंडित जी इस प्लेट में मम्मी मेरी गन्दगी फेंकती थीं, अब मैं नई प्लेट कहाँ से लाऊंगी।

ठीक यही स्थिति उत्तरप्रदेश के ब्राह्मणों की है। आज लगभग प्रत्येक पार्टी अपनी गन्दगी ब्राह्मणों को परोसना चाहती है, ताकि ब्राह्मण उनके दुष्कर्मों, अपराधों और दुराचरण को क्षमा कर उन्हें पवित्र बना दें।
यह वही राजनीतिक दल और संगठन हैं जिनकी नींव ही ब्राह्मण विरोध पर रखी गई थी। औरंगज़ेब और बाबरभक्तों को शांतिदूत बताने वाले और उन मुस्लिम आक्रांताओं, लुटेरों और अय्याशों की शान में कसीदे गढ़ने वाले जिन्होंने ब्राह्मणों का नरसंहार किया, लाखों जनेऊधारी इनकी नफरत के शिकार हुए, उन आतंकियों को शरण देने वाले और उनकी पैरोकारी करने वाले जिन्होंने कश्मीर में लाखों पंडितों का कत्लेआम किया, उनकी बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटी, वह तमाम राजनीतिक दल/संगठन आज प्रदेश के ब्राह्मणों को अपनी गन्दगी परोस कर पवित्र होना चाहते हैं।

बाबरी मस्ज़िद की पैरवी करने वाले और मुगल संग्रहालय का निर्माण कर हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने वाले, आज ब्राह्मणों को सम्मान देने का वादा कर रहे हैं।

जिनकी सियासत ही ब्राह्मणों के विरोध से शुरू होती हो, जिन्होंने सदैव ब्राह्मणों का अपमान किया हो, जिन्होंने ब्राह्मणों को नीचा दिखाने का हरसम्भव प्रयास किया हो, वह आज ब्राह्मण हितैषी दिखाने की कोशिश में लगे हैं।

बाबर, औरंगजेब और तैमूर लंग जैसे क्रूर आक्रांताओं, हत्यारों और लुटेरों को अपना आका बताने वाले क्या कभी ब्राह्मणों के शुभचिंतक हो सकते हैं? जो लोग आज टोपियां उतारकर तिलक लगाए घूम रहे हैं, वह यह क्यों भूल रहे हैं कि ब्राह्मण बुद्धिजीवी होता है, वह जानता है कि भेड़िया अगर भेड़ की खाल पहन भी ले तो वह खून पीना नहीं भूल जाएगा।

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रविवार, 25 जुलाई 2021

मिस्टर ओवैसी, हिंदुत्व समझना आपके बस की बात नहीं है

आधुनिक मुस्लिम लीग के जन्मदाता और "आज के जिन्ना" माने जाने वाले जनाब असदुद्दीन ओवैसी साहब का कहना है कि - "मुस्लिम विरोधी नफरत का आदि है संघ, आधुनिक भारत में हिंदुत्व की कोई जगह नहीं है". 
असदुद्दीन ओवैसी साहब ये बताएं कि जब शरिया कानून की बात आती है तब आपको बाबा आदम के ज़माने की बातें याद आती हैं। जब तीन तलाक़ की बात है तो आपको सैंकड़ों साल पुराने कानून याद आने लगते हैं। जब जनसंख्या नियंत्रण कानून लाया जाता है तब आपको परिवार नियोजन के आधुनिक तरीके समझ नहीं आते, तो आपके लिए बच्चे अल्लाह की देन हो जाते हैं। वहां आप वही घिसेपिटे जुमलों को दोहराने लगते हो। जब श्रीरामजन्मभूमि की बात आती है तब आपको मध्यकाल के आक्रांता, लुटेरे, और अय्याश बाबर की याद आने लगती है। 
जरा आप बताएंगे कि आधुनिक भारत में सैंकड़ों-हजारों साल पुराने शरिया कानूनों का क्या काम? क्या इस्लाम आधुनिक भारत की देन है? क्या इस्लाम की विचारधारा आधुनिक भारत की विचारधारा से मेल खाती है? 
ओवैसी साहब, आप बताइए कि क्या 72 हूरों का जलवा और गजवा-ए-हिन्द की सोच आधुनिक भारत में कोई स्थान रखती है? 
आप कल भी मुसलमान थे, आप आज भी मुसलमान हैं और आप भविष्य में भी इस्लाम और इस्लामिक कानूनों को ही तरज़ीह देंगे। क्या यह सम्भव है कि कुछ सालों के बाद आप शरिया कानूनों या गजवा-ए-हिन्द के कांसेप्ट में कोई बदलाव इसलिए करेंगे कि अब आप आधुनिक भारत में रहने लगे हैं।
जब तक हिन्दू धर्म है तो हिंदुत्व है। हिंदुत्व सनातन है अर्थात कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। 
हिंदुत्व किसी व्यक्ति विशेष का लिखा हुआ कानून नहीं है, और न ही आसमान से उतरी कोई पवित्र पुस्तक। 
हिंदुत्व एक शैली है, जो मनुष्य को मनुष्यता सिखाती है, जीवन जीने की कला बताती है। हिंदुत्व एक ऐसी विचारधारा है जो "जियो और जीने दो" के सिद्धांत पर जीना सिखाती है। हिंदुत्व ही तो "वसुधैव कुटुंबकम" का मुख्य स्रोत है। 
मिस्टर ओवैसी "हिंदुत्व" को समझना आपके बस की बात नहीं, उसको समझने के लिए जिस सत्यनिष्ठा, पवित्रता और पावन विचारों की आवश्यकता होती है, वह न आपके पास न थे, न हैं औऱ न कभी होंगे।
जिन्होंने तलवार के डर और सिक्कों की खनखनाहट सुनकर अपना धर्म बदल लिया हो, उन्हें "हिंदुत्व" समझना भी नहीं चाहिए।

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शनिवार, 24 जुलाई 2021

अगर गांधी ने भेड़ियों को चराया होता तो शायद नाथूराम गोडसे जन्म न लेता

अहिंसा के पुजारी कहे जाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। जिन्होंने हमें सिखाया कि कोई अगर तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो। वही गांधी जो सत्याग्रह और अहिंसात्मक आंदोलनों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे। वही गांधी जो पूरी जिंदगी बकरी पालते रहे और बकरी का ही दूध पीते रहे। उस गांधी ने कभी उन निर्दोष, मासूम और बेजुबान बकरों की जान बचाने हेतु कोई आमरण अनशन क्यों नहीं किया? जिस गांधी ने अपने कथित अहिंसात्मक आंदोलनों से बिना खड्ग और ढाल के इस देश को अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद करा दिया वह गांधी मौहम्मद अली जिन्नाह को भारत के टुकड़े करने से क्यों नहीं रोक पाए? समस्त हिन्दू समाज को "अहिंसा परमो धर्म:" का पाठ पढ़ाने वाले गांधी, जिन्ना और उसके समर्थकों को अहिंसावादी क्यों नहीं बना पाए? आखिर क्या कारण था कि गांधी उन कुपरम्पराओं के विरोध में कभी आमरण अनशन पर नहीं बैठे जिसमें हर वर्ष लाखों-करोड़ों बेजुबानों की जान चली जाती है।

कभी आपने इस विषय पर गम्भीर चिंतन किया? जरा सोचिए कि महात्मा गांधी ने पाकिस्तान में जाकर हिंदुओं के भीषण रक्तपात का विरोध क्यों नहीं किया था? उन्होंने जिन्ना के "डायरेक्ट एक्शन" को रोकने के लिए कभी सत्याग्रह क्यों नहीं किया? 
इन सब सवालों का शायद एक ही जवाब आपको मिलेगा कि गांधी केवल एक "शो-मैन" थे। गांधी जानते थे कि यदि उन्होंने बेजुबानों की बलि लेने वाली कुप्रथाओं का विरोध किया तो उनकी खुद की बलि चढ़ जाएगी। गांधी जानते थे कि जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन रोकना उनके लिए असम्भव था, वह भूख से प्राण भी त्याग देंगे तब भी जिन्ना और उसके समर्थकों पर कोई प्रभाव नहीं होगा। इसलिए भीमराव अंबेडकर के घर के सामने आमरण अनशन करने वाले गांधी कभी जिन्ना के बंगले पर भूख हड़ताल लेकर नहीं बैठ सके। 
गांधी का अहिँसा प्रेम और उसकी शिक्षाएं केवल उसी समाज तक सीमित रहीं जो हमेशा से "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के सिद्धांत पर अमल करता रहा है।
आज भी इस देश में हजारों गांधी हैं जो सिर्फ़ हमें ही सहिष्णुता, शांति अहिंसा और सद्भावना का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन वह कभी कश्मीर में जाकर शांति और सद्भाव का ढोल नहीं पीटते, वह कभी पश्चिम बंगाल में हिंसा का तांडव रोकने के लिए भूख हड़ताल पर नहीं बैठते, वह कभी किसी बुरहान वानी को प्रेम और शांति का पाठ नहीं पढ़ाते, क्योंकि वह जानते हैं कि वहां उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

उन्हें मालूम है कि भेड़ों का हांकना बहुत आसान है, लेकिन भेड़ियों को हांकने में जान भी जा सकती है। गांधी भी अपनी पूरी जिंदगी भेड़ों और बकरियों को ही हांकते रहे, उन्होंने कभी किसी भेड़िए को चराने की कोशिश नहीं की थी। अगर कभी की होती तो शायद किसी नाथूराम गोडसे का जन्म ही न हुआ होता।

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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

भारत ही एक ऐसा देश है जहां यह दोगला प्राणी बहुतायत में पाया जाता है

भारत की धरती पर "सेक्युलर" नामक एक दुर्लभ प्रजाति पाई जाती है। पूरी दुनिया में एकमात्र भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर यह "दोगला" प्राणी बहुतायत में पाया जाता है, इसे राजनीतिक भाषा में "सेक्युलर" कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये जिस थाली में खाता है, उसी में छेद कर देता है। घड़ियाली आंसू बहाने में तो यह बहुत माहिर है। छाती कूटना, विधवा विलाप करना, अर्धरात्रि को माननीय न्यायधीशों की निद्रा में विघ्न डालना, आंदोलन के नाम पर धींगामुश्ती करना, मुफ़्तखोरी को बढ़ावा देना, घुसपैठी हरामखोरों को शैल्टर देना, आदि-आदि इसके कुछ विशिष्ट गुण हैं। दोगलापन तो समझिये कि इसकी रग-रग में है, गिरगिट को भी इसे देखकर अपनी किस्मत पर तरस आता है कि आख़िर इस "सेक्युलर" नामक जीव को प्रकृति ने उसके मुकाबले अधिक रंग बदलने का यह विशेष गुण क्यों दिया। 
अब ज़रा देखिए जब इस देश में कोई आतंकी मरता है तो यह "प्राणी" सारी रात मातम मनाता है, लेकिन सेना के वीर जवानों की मौत पर जश्न मनाया जाता है। 
कश्मीरी "भटके हुए नौजवानों" की मौत का जिम्मेदार सेना को ठहराया जाता है, लेकिन दानिश सिद्दीकी की मौत के लिए एक बेचारी "निर्जीव" भोलीभाली "बुलेट" को दोषी ठहरा दिया जाता है।
भारत माता को डायन कहने वाले एक भूमाफिया के स्वास्थ्य लाभ के लिए यह "दुर्लभ प्राणी" हवन-पूजन और मजारों पर दुआएं मांगता है, जबकि इस देश को "बाबर" जैसे आक्रांता और लुटेरे द्वारा दी गई ग़ुलामी से छुटकारा दिलाने वालों की मौत की दुआएं मांगी जाती है।
 
आतंकियों के पैरोकार और अयोध्या को "जलियांवाला बाग" बनाने वाले मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन एक आध्यात्मिक योगी के मुख्यमंत्री बनने पर इस "दुर्लभ प्राणी" की छाती पर सांप लोटने लगते हैं।
सबसे मज़े की बात तो यह है कि "दिमागी दिवालियापन" में पीएचडी किये हुए "पप्पू" में इन्हें देश का नेतृत्व नज़र आ रहा है और जो शख़्स पूरी दुनिया में भारत का नेतृत्व कर रहा है, उसको यह "फेकू" कहते हैं।

इस दुर्लभ प्रजाति की एक और विशेषता यह है कि इसे "हिंदुत्व" शब्द से बहुत एलर्जी है, "हिंदुत्व" शब्द न केवल इनके हाजमे को ख़राब करता है बल्कि इस शब्द को सुनते ही इनकी ज़बान में खुजली होने लगती है। और उस खुजली को मिटाने के लिये इन्हें "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" नामक घुट्टी पीनी पड़ती है।

इस प्राणी की एक और विशेषता यह है कि इसे "ट्वीट-ट्वीट" करना बहुत अच्छा लगता है। खाने में इसे "पशुओं का चारा" और पीने में "ऑक्सीजन" अच्छी लगती है।ऑक्सीजन के तो सिलेंडर के सिलेंडर पी जाता है।

भारत की राजनीतिक पुस्तक में इस दुर्लभ प्राणी का वैज्ञानिक नाम "रवीश गंवार" रखा गया है।

आजकल चुनावों के दौर में इस "दुर्लभ प्राणी" की बहुत मांग रहती है। अगर आपके आसपास कोई ऐसा "दुर्लभ प्राणी" दिखाई देता है तो तुरन्त हमें सूचित करें।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

मायावती का हाथी ऐसे बनेगा प्रदेश के ब्राह्मणों का साथी?

मीडिया सूत्रों से ख़बर मिली है कि 23 जुलाई को अयोध्या में होने वाले ब्राह्मण सम्मेलन से पहले पार्टी नेता और पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने एलान किया कि बिकरू कांड में आरोपी बनाई गई खुशी दुबे की रिहाई की लड़ाई बसपा लड़ेगी। खुशी कुख्यात विकास दुबे के भतीजे अमर की पत्नी है। बिकरू कांड के बाद पुलिस मुठभेड़ में दोनों ढेर कर दिए गए थे। ब्राह्मण वोटों को साधने के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस एड़ीचोटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन ब्राह्मणों का सच्चा हमदर्द कौन है? 
बसपा सुप्रिमो सुश्री मायावती और उनकी पार्टी के "ब्राह्मण नेता" अगर वास्तव में ब्राह्मणों के हितैषी हैं तो सर्वप्रथम आरक्षण को समाप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। यदि यह भी संभव नहीं है तो कम से कम Sc/St एक्ट को "ब्राह्मण मुक्त" बनाने हेतु आंदोलन चलाएं और महामहिम से सिफारिश करें। साथ ही साथ ब्राह्मण समाज पर लगे तमाम झूठे मुकदमे वापस कराए जाएं। 

सतीश चंद्र मिश्रा और नकुल दुबे जैसे बसपा नेता यह भी बताएं कि बाबा अम्बेडकर की तरह ही भगवान परशुराम के नाम पर भी गांव और पार्क कब बनवाये जाएंगे। ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन करवाने से और गुंडे-बदमाशों की पैरवी करने से ब्राह्मण समाज का भला नहीं होने वाला है। सुश्री मायावती को ब्राह्मण हितों के लिए बेहद ठोस कदम उठाने होंगे। जिसमें ब्राह्मण समाज को यथोचित सम्मान, एट्रोसिटी एक्ट को पूरी तरह से समाप्त करना आवश्यक कदम हैं। 

*यदि बसपा सुप्रीमों यह भी कर पाने में असमर्थ हैं तो कम से कम इतना भर कर दें कि दलित समाज के प्रत्येक व्यक्ति को बाबा भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" अथवा "पाकिस्तान : द पार्टीशन ऑफ इंडिया" उपलब्ध करवाएं ताकि वह उसे पढ़ और समझ सकें। साथ ही पाकिस्तान के प्रथम कानून और श्रम मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल की जीवनगाथा का सच देश के प्रत्येक दलित तक अवश्य पहुंचवा दें।*
प्रदेश की जनता को यह भी अवश्य बताएं कि ऐसा क्या हुआ था कि मायावती बहन को उन गुंडों से हाथ मिलाना पड़ा जिन्होंने "एक दलित की बेटी" की इज़्ज़त को तार-तार करने की हरसम्भव कोशिश की थी। और क्यों उस भाजपा का विरोध करना पड़ रहा है जिसने उन गुंडों-बदमाशों से "दलित की बेटी" की जान बचाई थी।

जनता यह भी जरूर जानना चाहेगी कि क्या सतीश चंद्र मिश्रा ब्राह्मणों को सम्मान दिला पाएंगे?

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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

अरे ब्राह्मणों, जो राम का न हुआ वह परशुराम का क्या होगा

मीडिया स्रोतों से ख़बर मिली है कि बसपा सुप्रीमों कुमारी मायावती "ब्राह्मण सम्मेलन" करा रही हैं। यह सुनकर अच्छा लगा कि जो कल तक "तिलक, तराजू और तलवार। इनके मारो जूते चार" का नारा लगाते थे, मनुस्मृति की प्रतियां जलाते थे और ब्राह्मणों को अत्याचारी और व्यभिचारी बताया करते थे। जिन्होंने पंडितों को हर की पैड़ी पर कुरान पढ़वाने की बात कही थी। आज वही लोग "ब्राह्मण सम्मेलन" करवा रहे हैं। 

उधर "सिर्फ मुस्लिम बेटियां ही हमारी बेटियां हैं" और "ब्राह्मणों की कोई मदद न करे" कहने वाले भगवान श्री परशुराम जी की मूर्तियां लगवा रहे हैं।भगवान श्री परशुराम के चित्र लगवाने से क्या लाभ जब आप उनके चरित्र और आदर्शों को ही सिरे से नकार चुके हैं। 

शायद वह भूल गए कि इनके गृह जनपद इटावा में ब्राह्मण समाज के परिवार की महिलाओं और बच्चों तक को जूते की माला पहनाकर और मुंह काला करके घुमाया गया। ऐसा करके एक वर्ग के लोगों ने अमानवीयता की सभी हदें पार कर दीं थीं, पर सुना जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इतने गंभीर मामले को भी छोटी-मोटी घटना करार देते हुए ठोस कार्रवाई की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था। सुलतानपुर जिले के इसौली विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीते इनकी पार्टी के तत्कालीन विधायक अबरार अहमद से जब ब्राह्मणों का एक प्रतिनिधिमंडल मिलने गया। तो उसने ताल ठोक कर कहा कि वो मुसलमान हैं और मुसलमानों के वोट से जीतकर आया है, कुछ हिंदु जाति के बैकवर्ड लोगों ने वोट दिया है। इसलिए वो ब्राह्मणों की कोई मदद नहीं करेगा। जब भी मदद करेगा तो वह मुसलमानों की मदद करेगा, क्योंकि वो मुसलमानों की वोट से जीतकर आया हैं। समाचार-पत्रों में छपी खबरों के अनुसार उसने यह भी कहा कि "अखिलेश यादव (तत्कालीन सीएम) ने कहा है कि यह सब (ब्राह्मण) बसपा और कांग्रेस के खास हैं, इनकी कोई मदद न की जाए। उस समय यह ख़बर कई समाचार-पत्रों की सुर्खियां बना था। 

कल तक एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की राजनीति में आकंठ तक डूबे जो लोग प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार रहे थे, श्रीरामभक्तों पर गोलियां चलवाकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे। साधु-संतों का अपमान करने वालों के साथ खड़े थे। आज वही लोग श्री परशुराम के नाम की माला जप रहे हैं। अरे ब्राह्मणों, जरा सोचो *जो राम का नहीं हो सका वह परशुराम का क्या होगा?* 

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मुन्नवर राना साहब सौ कौरव पैदा करके धृष्टराष्ट्र बनने से क्या लाभ होगा

उत्तरप्रदेश जनसंख्या नियंत्रण कानून पर "दरबारी शायर" और कथित बुद्धिजीवी मुन्नवर राना साहब ने एक बयान देते हुए कहा कि- *“दो से ज्यादा बच्चे इसलिए पैदा किए जाते हैं क्योंकि दो बच्चे एनकाउंटर में मार दिए जाते हैं. एकाध को कोरोना हो जाता है. एकाध एक्सीडेंट में भी मर जाता है. ये वैसे ही है जैसे लोग मुर्गी के 8-10 बच्चे खरीदते हैं. एक-दो बच जाएं तो बच जाएं. हिंदू हो या मुसलमान, एक से ज्यादा बच्चे इसलिए पैदा करता है ताकि कम से कम कोई एक बच्चा कहीं से पंचर जोड़कर, रोटी कमाकर लाए और खिला सके, बाकियों को तो आप मार देंगे.”* 
राना साहब का यह बयान सिद्ध करता है कि शायद उन्होंने महापुराण "महाभारत" का अध्ययन नहीं किया और न ही उन्होंने चोपड़ा साहब का "महाभारत" सीरियल ही देखा है। काश अगर देखा होता तो उन्हें मालूम होता कि हस्तिनापुर सम्राट धृष्टराष्ट्र के 100 पुत्र थे जिन्हें कौरव कहा जाता है। और महाराज पांडु के मात्र 5 पुत्र थे, जिन्हें पांडव कहा जाता है। कौरवों के अहंकार और ज़िद के कारण "महाभारत युद्ध" हुआ और उसमें सभी कौरव मारे गए और पांचों पांडव जीवित रहे। कौरव अहंकारी, दुराचारी और अत्याचारी थे जो अपनी हठधर्मिता के लिए लड़े जबकि पांडव अंत तक सत्य, न्याय और धर्म के साथ खड़े रहे। और अंततः पांडवों की जीत हुई और कौरवों की हार। कौरवों के पिता महाराज धृष्टराष्ट्र और माता गांधारी के सौ पुत्र होने के पश्चात भी वृद्धावस्था में उनका पालन-पोषण पांडवों ने ही किया और उनकी मृत्यु के पश्चात उनका श्राद्ध कर्म इत्यादि भी पांडवों द्वारा ही किया गया। 

मुन्नवर राना साहब 100 "कसाब" पैदा करने से कहीं बेहतर है कि एक "कलाम" पैदा कर लिया जाए। 
एक कहावत है- पूत "कपूत" तो धन क्या करना और पूत "सपूत" तो धन क्या करना। जिसका जीता-जागता उदाहरण हैं हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, जिन्होंने अपने "ग़रीब परिवार" का नाम रौशन कर दिया, और दूसरी तरफ़ आपके चहेते "युवराज" जिन्होंने "शाही परिवार" का नाम ख़राब कर दिया। 

मुन्नवर राना साहब एक बात और समझ लीजिए, यह भारत है, यहां की पवित्र भूमि पर श्रीकृष्ण जैसे महायोगी, महाराणा प्रताप और वीर शिवाजी जैसे महायोद्धा, चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ, महात्मा बुद्ध और कबीरदास जैसे संत और महापुरुष अवतरित होते हैं, मुर्गी के बच्चे नहीं।

मुन्नवर साहब अगर आपको "मुर्गी के बच्चे" पैदा करने का शौक़ है तो "पड़ोसी मुल्क़" में चले जाइये, मुर्गी का तो पता नहीं लेकिन आपको गधे के बच्चे वहां बहुत मिल जाएंगे। आप चाहें तो उन्हें चीन को बेचकर बुढ़ापा अच्छी तरह से काट सकते हैं।

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सोमवार, 19 जुलाई 2021

मादरे वतन पर जो लगाते हैं तोहमत,वो कहते हैं कि उनके हिस्से में माँ आई

मुन्नवर राणा साहब चंद "दरबारी शायरों" की नज़र हमारा एक शेर पेश है. ज़रा मुलाहिज़ा फरमाइए-

*मादरे वतन पर जो लगाते हैं तोहमत।*
*वो कहते हैं कि उनके हिस्से में माँ आई।।*

*चंद सिक्कों में जो बेच गए ज़मीर अपना।*
*वही चीखते हैं मुल्क़ में बढ़ गई महंगाई।।*

उर्दू के "दरबारी शायर" मुनव्वर राणा ने कहा है कि- *"अगर योगी आदित्यनाथ 2022 में फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो वह उत्तर प्रदेश छोड़ देंगे। उन्होंने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं, तो यह सिर्फ ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी की वजह से होगा। ओवैसी और भारतीय जनता पार्टी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बीजेपी और ओवैसी लोगों को गुमराह कर रहे हैं। दोनों की चुनावी लाभ के लिए मतदाताओं के ध्रुवीकरण की नीति अपना रहे हैं।"* राणा ने यह भी कहा कि *अगर यूपी के मुसलमान ओवैसी के जाल में पड़ गए और एआईएमआईएम को वोट दिया, तो कोई भी योगी आदित्यनाथ को दोबारा मुख्यमंत्री बनने से रोक नहीं सकेगा। अगर योगी फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं, तो मैं मान लूंगा कि राज्य अब मुसलमानों के रहने लायक नहीं रह गया है और मुझे दूसरी जगह पलायन करना पड़ेगा।*. 

"दरबारी शायर" और कथित बुद्धिजीवी मुन्नवर राणा की उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ से मुख़ालफ़त तो समझ आती है, लेकिन "मुस्लिम हृदय सम्राट" जनाब असदुद्दीन ओवैसी और भारत में मुसलमानों की एकमात्र हितैषी AIMIM पार्टी से उनकी मुख़ालफ़त हमारी समझ से परे है।

उल्लेखनीय है कि यह वही मुन्नवर राणा हैं जिनकी साहबजादी सुमैया राणा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चल रहे सीएए, एनआरसी के विरोध प्रदर्शन के अवसर पर धरने पर कहा था, *“हमें ध्यान रखना है कि हमें इतना भी न्यूट्रल (तटस्थ) नहीं होना है कि हमारी पहचान ही खत्म हो जाए। पहले हम मुस्लिम हैं और उसके बाद कुछ और हैं। हमारे अंदर का जो दीन है, जो इमान है, वह जिंदा रहना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम अल्लाह को भी मुँह दिखाने लायक न रह जाएँ।”* 

इस हिसाब से तो मुन्नवर राणा को एकमात्र मुस्लिम नेता ओवैसी साहब का ही समर्थन करना चाहिए, न केवल समर्थन बल्कि ओवैसी साहब और उनकी पार्टी को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन इसके उलट वह तो खुलकर "मुस्लिम हृदय सम्राट" ओवैसी साहब का विरोध कर रहे हैं। विचारणीय है कि मुन्नवर राणा जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम को ओवैसी साहब से भला क्या दिक़्क़त है। वह क्यों छाती फाड़कर ओवैसी की मुख़ालफ़त पर उतर आये हैं। क्या मुन्नवर राणा नहीं चाहते कि उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री एक मुस्लिम बने? क्या मुन्नवर राणा को अल्लाह का खौफ़ नहीं है? क्या मुन्नवर राणा के अंदर का दीन और ईमान मर गया है या फिर चंद सिक्कों की ख़ातिर राणा साहब ने अपना ज़मीर बेच दिया है?
श्रीरामजन्मभूमि पर आए फैसले के बाद मुनव्वर राणा ने कथितरूप से कहा था,- *'रंजन गोगई जितने कम दाम में बिके, उतने में हिंदुस्तान की एक ‘वेश्या’ भी नहीं बिकती है.'* 

अब मुन्नवर राणा बताएं कि वह ख़ुद वेश्या से ज़्यादा कीमत में बिके हैं या उससे कम कीमत में? और उनकी बोली किसने लगाई है? अगर नहीं बिके हैं तो दें अपनी कौम का साथ, और बोलें "ओवैसी जिंदाबाद".

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रविवार, 18 जुलाई 2021

राहुल गांधी पहले अपने डर को दूर भगाने का प्रयास करें, फिर दूसरों पर......

11 जुलाई 2018 को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश के कुछ प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ बैठक में मुसलमानों से जुड़े मुद्दों और देश की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थिति पर चर्चा की थी. राहुल गांधी के साथ इस संवाद बैठक में इतिहासकार इरफान हबीब, सामाजिक कार्यकर्ता इलियास मलिक, कारोबारी जुनैद रहमान, ए एफ फारूकी, अमीर मोहम्मद खान, वकील जेड के फैजान, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट फराह नकवी, सामाजिक कार्यकर्ता रक्षंदा जलील सहित करीब 15 लोग शामिल हुए. इनके साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद और पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष नदीम जावेद भी मौजूद थे.

इसके अगले दिन इस कार्यक्रम को लेकर उर्दू अखबार इंकलाब में *‘हां, कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है।’* शीर्षक से रिपोर्ट लिखी गई.

17 दिसंबर, 2010… विकीलीक्स ने राहुल गांधी की अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से 20 जुलाई, 2009 को हुई बातचीत का एक ब्योरा दिया। राहुल ने अमेरिकी राजदूत से कहा था, *‘भारत विरोधी मुस्लिम आतंकवादियों और वामपंथी आतंकवादियों से बड़ा खतरा देश के हिन्दू हैं।’*

अभी हाल ही में राहुल गांधी सोशल मीडिया वॉलंटियर्स की वर्चुअल मीटिंग को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, *'डरने वाले बीजेपी में जाएंगे, बीजेपी डर दिखा कर अपने साथ करती है. जिन्हें डर लग रहा है वे जा सकते हैं. वैसे लोग जो पार्टी छोड़कर गए हैं वे RSS के लोग थे.'*

अमेरिकी राजदूत के सामने खुद के हिन्दूओं से डरने की बात स्वीकार करने वाले राहुल गांधी यह बताएं कि वह स्वयं कांग्रेस क्यों नहीं छोड़ देते। कायदे में तो ख़ुद राहुल गांधी को सबसे पहले कांग्रेस छोड़नी चाहिए क्योंकि उन्हें सबसे अधिक डर हिंदुओं से लगता है और आरएसएस को तो वह स्वयं एक हिंदुवादी संगठन मानते हैं और भाजपा को हिंदुओं का राजनीतिक दल। श्री राहुल गांधी को तो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से भी डर लगता है। शायद इसीलिए वह मोदी जी को हराने के लिए पाकिस्तान से मदद की गुहार लगाने गए थे। प्रश्न यह भी है कि आखिर श्री राहुल गांधी ने कांग्रेस को "मुस्लिम पार्टी" किसके डर से बताया था?

कुछ कांग्रेसी नेता अभी तक यह कहते नहीं थक रहे थे कि देश को "कांग्रेस मुक्त" कराने का दावा करने वाली भाजपा ख़ुद "कांग्रेस युक्त" होती जा रही है। परन्तु कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने स्वयं ही यह सिद्ध कर दिया कि जो लोग कांग्रेस से भाजपा में गए हैं वह आरएसएस के लोग थे और अभी भी कांग्रेस में आरएसएस के लोग मौजूद हैं। अर्थात श्री गांधी यह मान रहे हैं कि कांग्रेस "RSS युक्त" है।

दरअसल, मुगलों को अपना आदर्श मानने वाली और हमेशा से विदेशी संस्कृति को पुष्पित-पल्लवित करने वाली कांग्रेस को हर उस व्यक्ति/नेता/संगठन से दिक़्क़त होना स्वभाविक ही है, जो भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्परा और जीवन मूल्यों को अपना आदर्श मानते हैं और उनकी सुरक्षा और संरक्षा हेतु वचनबद्ध हैं। 

डरना और डराना कांग्रेस की पुरानी फ़ितरत है। एक अंग्रेज ए ओ ह्यूम द्वारा संस्थापित कांग्रेस ने हमेशा "फुट डालो और राज करो" की अंग्रेजी नीति का अनुसरण किया। औऱ एक वर्ग विशेष को बहुसंख्यक समुदाय का डर दिखाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया। कांग्रेस हमेशा सच्चाई से डरती रही और इसी डर ने उसे 1975 में आपातकाल लगाने को मजबूर किया था।

दरअसल गांधी परिवार को हमेशा से यह डर लगता रहा है कि कहीं सत्ता की बागडोर उनके हाथों से न फिसल जाए और उसके लिए उन्होंने मुसलमानों को हिंदुओं का और हिंदुओं को सिखों का डर दिखाये रखा। 
राहुल गांधी बताएं कि कश्मीर में अलगाववाद का डर किसने पैदा किया? पंजाब में खालिस्तान की मांग और भिंडरावाले का जन्मदाता कौन था? नक्सलियों को कौन पाल रहा है? पश्चिम बंगाल, केरल, आसाम और दिल्ली में हुए दंगों का जिम्मेदार कौन है? 1966 में किसके डर से निहत्थे और निर्दोष साधु-संतों पर गोलियां चलवाईं गईं, 1984 में सिखों के नरसंहार और उसके बाद कश्मीरी पंडितों की दर्दनाक चीखों का जिम्मेदार कौन है? 
श्री राहुल गांधी पहले अपने डर को दूर भगाएं तभी वह दूसरों पर उंगलियां उठाने के हकदार हो सकते हैं।
 
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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

पाकिस्तान जिंदाबाद-अखिलेश जी आपका यह कैसा समाजवाद

भाजपा सरकार के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने बीते गुरुवार को प्रदेश भर में धरना-प्रदर्शन का आह्वान किया था। आगरा में भी सपाइयों ने प्रदर्शन किया। इस जुलूस में सपा महानगर अध्यक्ष चौधरी वाजिद निसार भी साथ चल रहे थे। ख़बर है कि जब चौधरी वाजिद निसार सदर तहसील में धरना-प्रदर्शन खत्म कर सपा कार्यकर्ताओं के साथ जुलूस के रूप में लौट रहे थे। उस समय किसी ने जुलूस में "पाकिस्तान जिंदाबाद" के नारे लगा दिए। जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है।हालांकि हम वायरल वीडियो की पुष्टि नहीं करते परन्तु वायरल वीडियो में "समाजवादी पार्टी जिंदाबाद" के नारों के साथ उनका जुलूस पुलिस लाइन मैदान के सामने से गुजरता दिख रहा है, तभी "पाकिस्तान जिंदाबाद" की आवाज गूंजती है। इसके बाद फिर से समाजवादी पार्टी जिंदाबाद के नारे लगने लगते हैं। वीडियो में पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा जब गूंजता है, तब मेहरून शर्ट वाला एक युवक हाथ उठाता नजर आता है। महानगर अध्यक्ष वाजिद निसार का कहना है कि इंटरनेट मीडिया पर वायरल वीडियो में जिस युवक पर देश विरोधी नारे लगाने का आरोप है, उसकी पहचान करा ली गई है। वह सुल्तानगंज की पुलिया निवासी पंकज सिंह है। वह सपा का कार्यकर्ता नहीं है। 

सच क्या है यह तो जांच के बाद ही मालूम होगा परन्तु अभी हाल ही में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा था कि "उन्हें उत्तरप्रदेश पुलिस पर विश्वास नहीं है"। अब लगता है कि उनके कार्यकर्ताओं को "हिंदुस्तान" पर विश्वास नहीं है, इसीलिए वह पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं।

अखिलेश यादव अपने को यदुवंशी बताते हैं, अर्थात भगवान श्रीकृष्ण का वंशज, परन्तु लगता है कि अखिलेश जी ने श्रीमद् भगवद्गीता का भक्तिभाव से अध्ययन नहीं किया।

श्रीमद भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि- "श्रेष्ठजन जिस प्रकार का आचरण करते हैं, उनके अनुयायी वैसा आचरण दोहराते हैं।" ज़ाहिर है कि गलती समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की नहीं है बल्कि पार्टी के मुखिया श्री अखिलेश यादव की है। वह जिस प्रकार का आचरण दिखा रहे हैं उससे उनके अनुयायियों में "पाकिस्तान प्रेम" उमड़ने की संभावनाओं को बल मिलना स्वभाविक ही है। यूं भी समाजवाद से आतंकवाद की ओर बढ़ते कदमों का आख़िरी पड़ाव "पाकिस्तान" ही तो है। अखिलेश जी के पिताश्री माननीय मुलायम सिंह तो केवल "हिंदुस्तानी मुल्लाजी" बनकर ही रह गए थे लेकिन लगता है कि कल के "विकास पुरुष" श्री अखिलेश यादव आजकल अपने पिताजी से भी 100 कदम आगे निकल रहे हैं और वह "पाकिस्तान" प्रेम में आकंठ तक डूब चुके हैं। इसीलिए उनके "भक्तगण" पाकिस्तान की जय-जयकार कर रहे हैं।

ज़रा गौर करने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे उत्तरप्रदेश में विधानसभा 2022 के चुनावों की तिथि करीब आ रही है अखिलेश एंड पार्टी का नया नारा कुछ इस तरह हो रहा है-  "आतंकियों का साथ-पुलिस पर NO विश्वास-यही हमारा समाजवाद"

अभी भी समय है श्री अखिलेश यादव को चाहिए कि जिन्नावादी विचारधारा को पूर्णतः त्यागकर सच्चाई और निष्पक्षता के साथ समाजवादी विचारधारा की ओर बढ़ें। साथ में श्रीमद भगवद्गीता का अध्ययन भी किया करें। इसी में उनकी पार्टी और देश सबका भला है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

गांधी परिवार को अध्यक्ष की नहीं बलि के बकरे की तलाश है

भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की मृत्यु के पश्चात से आजतक कांग्रेस की दिशा और दशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। श्रीमती सोनिया गांधी ने काफी हद तक कांग्रेस की दशा और दिशा सुधारने में सफलता हासिल कर ली थी परन्तु उनकी बढ़ती आयु और गिरते स्वास्थ्य ने कांग्रेसी नेतृत्व को कमज़ोर कर दिया है। गांधी परिवार के एकमात्र चश्मो चिराग श्री राहुल गांधी से जो उम्मीदें गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी को थीं, उसपर राहुल आजतक खरे नहीं उतर पाए। और अब तो उनसे शायद ही किसी को कोई उम्मीद रह गई है, कहावत भी है कि आख़िरी वक्त में क्या खाक मुसलमाँ होंगे।

उधर प्रियंका गांधी कुछ भी कहें लेकिन सच यह है कि वह प्रियंका वाड्रा बन चुकी हैं, और अब न तो देश की जनता और न ही ख़ुद कांग्रेस पार्टी उनके नेतृत्व को गले उतार पा रही है। इस सबके बावजूद गांधी परिवार पार्टी पर अपनी पकड़ को ढीली नहीं करना चाहता है। सोनिया गांधी के विषय में यह कहा जा रहा है कि वह पुत्रमोह में अंधी हो रही हैं जबकि कड़वा सत्य यह है कि सोनिया गांधी पीवी नरसिंघा राव और सीताराम केसरी के कार्यकाल में हुई उठापटक और गांधी परिवार की ढीली पकड़ का अनुभव कर चुकी हैं। सीताराम केसरी को तो सही मायने में धक्के देकर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, जबकि पीवी नरसिंहा राव के ज़माने में हुए बाबरी विध्वंस का दंश अभी तक पार्टी नहीं भूल पाई है, जिसका खमियाजा आज तक उसे उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में भुगतना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी जानते हैं कि यदि पार्टी की अध्यक्षता किसी भी ग़ैर-गांधी परिवार के व्यक्ति के हाथों में जाती है तो पार्टी के अंदर ही विरोध की चिंगारी पनप सकती है।
लेकिन दुविधा यह है कि राहुल गांधी किसी के गले नहीं उतर पा रहे हैं और वाड्रा परिवार की सीमा से अधिक दखलंदाजी भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के गले नहीं उतर पा रही है। यही कारण है कि कांग्रेस की कोर कमेटी भी चाहती है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला कर दिया जाये, परन्तु दिक़्क़त यह है कि बिल्ली के गले में घण्टी बांधेगा कौन?
दरअसल, सोनिया गांधी किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहती हैं कि पार्टी की डोर उनके और उनके लाडले सुपुत्र के हाथों से छूट जाए, यानी सोनिया गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में "मन मौन सिंह" जैसे किसी वफ़ादार को ढूंढ रही हैं। लेकिन समस्या यह है कि गुलाम नबी आज़ाद से लेकर दिग्विजय सिंह तक कोई भी नेता वफ़ादारी की इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ़ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी मालूम है कि वह आने वाले "मन मौन सिंह" ही बनने वाले हैं, असल डोर तो सोनिया और राहुल के ही हाथों में रहने वाली है। इसलिये कोई भी नहीं चाहता कि वह केवल कठपुतली बने। मज़े की बात यह है कि हर वरिष्ठ कांग्रेसी जानता है कि पार्टी की हालत बहुत खस्ता है, पार्टी लगातार चुनाव हार रही है, और कई जगहों पर तो शून्य पर भी आउट हो चुकी है। ऐसे में यदि कोई भी गैर-गांधी परिवार का व्यक्ति अध्यक्ष पद को संभालने का दुस्साहस करता भी है तो उसका अंत बहुत बुरा होगा क्योंकि उत्तरप्रदेश चुनाव का ठीकरा भी उसी के सर पर फूटेगा जबकि यदि इत्तेफ़ाक़ से पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन कर दिया तो उसकी वाहवाही गांधी परिवार को मिलेगी। मतलब सीधे-सरल शब्दों में कहा जाए तो गांधी परिवार और उसके शुभचिंतकों को बलि के बकरे की तलाश है।
 
ऐसे में फिलहाल कमलनाथ को बलि का बकरा बनाने की क़वायद चल रही है, देखना यह है कि क्या कमलनाथ जैसा सुलझा हुआ व्यक्तित्व और कुशल राजनीतिज्ञ बलि का बकरा बनने को तैयार हो पायेगा।

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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

वामपंथी और लिबरल गैंग की हिन्दू विरोधी मानसिकता

अभी हाल ही में अमेरिका की बहुप्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी नेशनल एरोनॉटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) ने उन प्रतिभागियों की फोटो शेयर की है, जिन्हें उनके साथ इंटर्नशिप करने का मौका मिला। उन प्रतिभागियों में भारतीय-अमेरिकी इंटर्न प्रतिमा रॉय की तस्वीर भी थी। प्रतिमा रॉय की टेबल पर हिन्दू देवियों की मूर्तियाँ और दीवार पर हिन्दू देवी-देवताओं की फोटो दिखाई दे रही हैं।यह फोटो भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए गौरवांवित करने वाली होनी चाहिए थी, परन्तु सनातन संस्कृति और सभ्यता विरोधी एक "कथित बुद्धिजीवी लॉबी" को प्रतिमा रॉय की इस धर्मपरायणता ने नाराज कर दिया, क्योंकि ये "बुद्धिजीवी" प्रतिमा राय द्वारा अपनी भक्ति दिखाए जाने पर खुश नहीं हैं। इन्होंने प्रतिमा के ‘वैज्ञानिक स्वभाव’ पर भी प्रश्न उठाया। हालाँकि, प्रतिमा ने अपने उसी वैज्ञानिक स्वभाव के कारण NASA के साथ इंटर्नशिप करने का मौका अर्जित किया है। कुछ लोगों ने NASA पर विज्ञान को बर्बाद करने का आरोप लगाया है।
ऐसे तमाम "बौद्धिक दिवालियों" को यह मालूम होना चाहिये कि
यूट्यूब के निर्माता नीलसन को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से जब व्यक्तिगत महत्व की कोई चीज दिखाने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपनी जेब से कई छोटी चीजें निकालीं। उन्होंने कहा कि ये चीजें उन्हें 'अपने सफर में अब तक मिले अलग-अलग लोगों की' याद दिलाती हैं. CNN की खबर के अनुसार इन चीजों में पोप फ्रांसिस से मिली मनकों की माला, एक भिक्षु से मिली बुद्ध की छोटी सी प्रतिमा, *भगवान हनुमान की एक मूर्ति* सहित कई चीजें शामिल हैं. ओबामा ने कहा, "मैं हमेशा इन्हें अपने पास रखता हूं. अगर मुझे थकावट महसूस होती है, या मैं कई बार जब खुद को हतोत्साहित महसूस करता हूं तो मैं अपनी जेब में हाथ डालकर कह सकता हूं कि मैं इस चीज से पार पा लूंगा क्योंकि किसी ने मुझे उन मुद्दों पर काम करने का विशेषाधिकार दिया है, जो उन्हें प्रभावित करने वाले हैं।" 
जरा कल्पना कीजिये कि यदि कुछ ऐसा ही बयान भारत के किसी राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री ने दे दिया होता तो शायद भारत के तमाम "बौद्धिक लिबरल" और "दोगली सेक्युलर जमात" अपनी छातियाँ कूट-कूट कर जान दे देते। अपने आपको आधुनिक और सभ्य दिखाने की होड़ में "बौद्धिक दिवालियापन" के शिकार हो चुके तमाम लिबरल और वामपंथी जमात यह भूल जाती है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति पूर्णतः वैज्ञानिक है। विडम्बना देखिये कि जिस पश्चिमी सभ्यता को अपनाकर यह लोग अपने को सभ्य और आधुनिक कहला रहे हैं, वही पश्चिमी सभ्यता के लोग अब हमारे ऋषि-मुनियों और धर्मग्रन्थों पर तमाम तरह के शोध कर रहे हैं। 
वामपंथी विज्ञान के दुष्परिणाम पूरे विश्व में "कोविड-19" की शक़्ल में मौत बांट चुके हैं और उससे बचाव के लिए अंततः सम्पूर्ण विश्व को हाथ जोड़कर प्रणाम करने की भारतीय परम्परा को ही अपनाना पड़ा। परन्तु इस सबके बावजूद भारत का लिबरल और वामपंथी गैंग अपनी सनातन हिन्दू विरोधी विचारधारा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। मज़े की बात यह है कि यदि किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति ने यही फोटो अपने धर्म के प्रतीक चिन्हों के साथ खिंचवाया होता तो यही लिब्रांडू गैंग इसको उसकी आस्था, विश्वास और धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न बताकर खुद की पीठ थपथपा रहा होता।

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को हमेशा ही पिछड़ा हुआ और रूढ़िवादी मानते रहे हैं जबकि विदेशों में जब-तब हमारी ही सभ्यता और संस्कृति का गुणगान होता रहता है। 

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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क्या अखिलेश यादव "चोर" और योगी "नामर्द" हैं

आजकल सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ दुर्योधन और दुःशासनों द्वारा शब्दों की मर्यादा और भाषा की शालीनता का चीरहरण बेख़ौफ़ किया जा रहा है।

एक बानगी देखिये कि पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया श्री अखिलेश यादव को धड़ल्ले से "टोंटी चोर" लिखा जा रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री बाबा योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर भी बेहद अश्लील और भद्दी टिप्पणियां की जाती हैं। क्या लिखने वालों के पास कोई पुख़्ता सबूत है अथवा कोई न्याययिक दस्तावेज जिससे वह अपनी बात को साबित कर सकें? या उन्हें बस "कुछ भी बोलना" है।

सच पूछिए तो सोशल मीडिया प्लेटफार्म का दुरुपयोग करते हुए देश के कई दिग्गज राजनीतिज्ञों और सम्मानित और गणमान्य नागरिकों के विरुद्ध अश्लीलता भरे कमेंट्स और Fake Messeges द्वारा  दुष्प्रचार करने की मानो एक कु-परम्परा सी चल पड़ी है। और विडम्बना यह है कि इस घिनौने और घृणित कार्य में कुछ कथित बुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी शामिल रहते हैं।

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दी हुई अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि भाषा पर संयम बरतना चाहिए। *सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद के एस.आर.के. कॉलेज में इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शहरयार अली*  को गिरफ्तारी से संरक्षण देने से इनकार करते हुए की है। प्रोफेसर शहरयार अली पर केंद्रीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी के खिलाफ फेसबुक पर कथिततौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है।टिप्पणी करते हुए माननीय न्यायधीशों संजय किशन कौल और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि *"लोगों को सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आलोचना या मजाक करते वक्त अपनी भाषा का ध्यान रखना चाहिए।"* उन्होंने आगे कहा कि *‘आप इस तरह महिलाओं को बदनाम नहीं कर सकते। आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ बदनाम करने के लिए नहीं कर सकते। आखिर किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है? आलोचना या मजाक करने की भी एक भाषा होती है।’* सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि *आप कुछ भी नहीं कह सकते।* 

इससे पहले मई में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रोफेसर शहरयार अली को यह कहते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था कि आरोपी राहत का हकदार नहीं है क्योंकि वह एक कॉलेज में वरिष्ठ शिक्षक है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि उसके सोशल मीडिया पोस्ट से विभिन्न समुदायों के बीच दुर्भावना को बढ़ावा देने की आशंका थी। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद अली ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

इस मामले में यह गौर करने लायक है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में आप किसी भी हद तक नहीं जा सकते, आप शब्दों की मर्यादा और भाषा की शालीनता की सीमाओं को नहीं लांघ सकते। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी उन तमाम लोगों के लिए भी एक सबक़ है जिन्हें लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में वह किसी का भी अपमान कर सकते हैं, किसी के भी विरुद्ध दुष्प्रचार कर सकते हैं, कोई भी अमर्यादित, अश्लील अथवा अभद्र टिप्पणी कर सकते हैं। कुल मिलाकर अगर हम सीधे-सरल शब्दों में कहें तो "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का अर्थ "कुछ भी बोलना" नहीं है।

हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस निष्पक्ष और निष्कलंक टिप्पणी का हृदय से स्वागत करते हैं।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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बुधवार, 14 जुलाई 2021

कांग्रेस कभी अपने गिरेबान में क्यों नहीं झांकना चाहती

आजकल बढ़ती हुई महंगाई और ग़रीबी पर बोलने के लिए कांग्रेसी नेताओं औऱ उनके समर्थकों में एक होड़ सी लगी है। आइये आपको बताते हैं कि ग़रीबी क्या है जिसकी चर्चा कांग्रेसी हर चौराहे पर कर रहे हैं। 

*"गरीबी एक मानसिक अवस्था है। खाना, पैसे या भौतिक चीजों की कमी से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यदि आप में आत्मविश्वास है तो आप गरीबी से उबर सकते हैं।"* ग़रीबी की यह नई परिभाषा कांग्रेस के राजदुलारे श्री राहुल गांधी ने अगस्त 2013 में गढ़ी थी। उस समय राहुल जी जाने-माने समाज विज्ञानी बद्री नारायण की ओर से जी.बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में आयोजित एक सेमिनार में गरीबी पर व्याख्यान दे रहे थे।
इसी तरह आज जिस "मंहगाई" को लेकर कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष सड़कों और चौराहों पर अपनी छाती कूट रहा है उसी कांग्रेस के महान नेता श्री पी. चिदम्बरम ने कहा था- *"महंगाई अच्छी है, ये तो ऐसे ही बढ़ेगी"* मतलब कॉंग्रेसी सरकार में जो महंगाई अच्छी थी, वही भाजपा सरकार में काटने को दौड़ रही है। 

आज कांग्रेस भाजपा सरकार पर लगातार मंहगाई को नियंत्रित करने के लिये दबाव बना रही है लेकिन फरवरी 2011 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार में वित्तमंत्री रहे प्रणव मुखर्जी ने एक संवाददाता सम्मेलन में एक प्रश्न के जवाब में कहा था कि *"सरकार ने महंगाई पर नियंत्रण के कई उपाय किए हैं पर उसके पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है जिससे महंगाई को तत्काल वश में किया जा सके"।* तो क्या कांग्रेसियों को लगता है कि आज मोदी सरकार के हाथ कोई अलादीन का चिराग़ लग गया है जिससे वह पलक झपकते ही महंगाई को काबू कर लेगी।
इसी प्रकार कांग्रेस के एक और नेताजी ने कहा था कि *"पाँच रुपये में गरीबों को भरपेट भोजन मिल जाता है महँगाई कहाँ है"* आज उसी कांग्रेस को देश में चारों ओर महंगाई ही महंगाई दिखाई दे रही है। 

सितंबर 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने डीजल की कीमतों में वृद्धि तथा सब्सिडीयुक्त रसोई गैस की सीमा सीमित किए जाने के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि *"पैसे पेड़ पर नहीं उगते।"* सुधि पाठकों को मालूम होना चाहिए कि श्री मनमोहन सिंह कांग्रेस सरकार में लगातार दो बार  देश के प्रधानमंत्री रहे हैं और विपक्ष मनमोहन सिंह जी के अर्थशास्त्र ज्ञान का महिमामंडन करते-करते नहीं थकता। कांग्रेस और उनके समर्थक रात-दिन इन्हीं मनमोहन सिंह को अर्थशास्त्र का कौटिल्य बताते हैं, और उनके अर्थशास्त्र के ज्ञान पर फुले नहीं समाते। उन्हें लगता है कि श्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में भारत को सोने की चिड़िया बना दिया था, लेकिन मोदी सरकार ने अंग्रेजों से ज़्यादा लूटपाट करके भारत को कंगाल बना दिया है।
दरअसल, कांग्रेस और कांग्रेसियों की सबसे बुरी आदत यह है कि वह कभी अपने गिरेबान में झांककर देखने की कोशिश नहीं करते हैं। उन्हें दूसरों के घरों में ताक-झांक करने की बहुत बुरी आदत है। शायद कांग्रेसियों ने कबीरदास का वह दोहा नहीं पढ़ा-

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।।

कांग्रेस हाईकमान को चाहिए कि वह संत कबीरदास की शिक्षाओं को आत्मसात करें और अपने बाकी चेले-चपाटों को भी ज्ञान बांटे। अब सिर्फ़ पप्पू बनने से काम नहीं चलेगा।

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जहां गए अरविंद केजरीवाल, वहीं बांटा मुफ़्त का माल

ऐसा प्रतीत होता है कि आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल का चुनावी मंत्र है- 
"भाड़ में जाए जनता, कौन करे विकास।
मुफ़्त का माल बांटकर चुनाव जीतो झकास।।"
भारत की राजनीति में जब भी "मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाले नेताओं" की सूची बनाई जाएगी तब माननीय अरविंद केजरीवाल का नाम उस सूची में सबसे ऊपर लिखा जाएगा। अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाने के लिए भारत की जनता में "मुफ्तखोरी" की गन्दी आदत डालने का हरसम्भव प्रयास कर रहे हैं। आश्चर्य तो तब होता है कि जब ऑस्ट्रेलिया से शिक्षा ग्रहण किये हुए और  खुद को "विकास पुरुष" मानने वाले श्री अखिलेश यादव भी अरविंद केजरीवाल के इस "मुफ्तखोर भारत बनाओ" मॉडल की न केवल सराहना करते हैं बल्कि उनके इस चुनावी मॉडल की हूबहू नकल करने पर भी अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। आपको याद होगा कि अखिलेश सरकार ने "मुफ्त लैपटॉप" वितरित किये थे। 

भारत को "गरीबों का देश" तो पहले से ही कहा जाता रहा है लेकिन 10-20 वर्षों पश्चात अब इसे "मुफ्तखोरों का देश" भी कहा जाने लगेगा। 

एक समय था जब भारतीय नेता अपने विचारों और आदर्शों के बल पर चुनाव जीतते थे और देश के विकास को प्राथमिकता दी जाती थी, लेकिन अरविंद केजरीवाल जैसे महानुभावों ने विचारों और आदर्शों को "मुफ्तखोरी" की भेंट चढ़ा दिया है और "विकास" को "विनाश"में बदल दिया है। 

इसका उदाहरण पंजाब और गोवा में होने वाले चुनावों में भी देखा जा सकता है जहां एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी की सरकार बनने पर "मुफ्त बिजली" की घोषणा की है। 

प्रश्न यह है कि मुफ़्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ़्त लेपटॉप आदि बांटने के लिए सरकार के पास बजट कहाँ से आता है। ज़ाहिर है जनता की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को ही "मुफ्तखोर राजनीति" की भेंट चढ़ाया जाता है। भारत के एक कर्मठ और जुझारू नागरिक की जेब से पैसा निकालकर "मुफ्तखोरों" को बांटना किस प्रकार से उचित ठहराया जा सकता है। क्या किसी भिखारी को भीख देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित है?दुनिया के कई देशों में भीख मांगना एक अपराध है लेकिन शायद भारत एक ऐसा देश है जहाँ भीख मांगना भी एक कला और रोजगार बन गया है और भीख देना "पुण्य" और धर्म का काम है। क्या मुफ्तखोरी के इस चुनावी मॉडल से भारत का विकास किया जा सकता है?

यदि अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे "विकास पुरुष" वास्तव में भारत की जनता का विकास करने के प्रति गम्भीर हैं तो रोजगार के नए अवसर पैदा करें, स्वरोजगार को बढ़ावा दें, युवाओं में स्वावलंबन की भावनाएँ जागृत करें, लघु और सूक्ष्म उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाए, रोजगारपरक शिक्षा संसाधनों पर ध्यान केंद्रित किया जाए, कृषकों को कृषि के अत्याधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाए। ग्रामीण युवाओं को खेती और उनके पुश्तेनी व्यवसाय को आगे बढ़ाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, आदि -आदि।

लेकिन मुफ्तखोरी की यह राजनीति देश का भविष्य दीमक की तरह  चाटकर खोखला कर देगी। 
यह सब जानने-बुझने के बावजूद जिस प्रकार अरविंद केजरीवाल जैसे नेता लगातार "मुफ्तखोर" बनाने की नई-नई स्कीमें ला रहे हैं, उससे यह देश और इस देश की जनता निरन्तर "विनाश" की ओर अग्रसर हो रही है। अरविंद केजरीवाल का यह "मुफ्तखोर मॉडल" भारतीय राजनीति के इतिहास में काले अक्षरों में "विनाशकारी सभ्यता" के नाम से दर्ज किया जाएगा।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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मंगलवार, 13 जुलाई 2021

क्या अखिलेश यादव के लिए सत्ता का मोह राष्ट्रधर्म से अधिक मूल्यवान है

उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि - "मुझे उत्तरप्रदेश की पुलिस पर भरोसा नहीं है।" उन्होंने यह बयान तब दिया है जबकि UP ATS ने आतंकी संगठन अलकायदा के दो आतंकी मिनहाज अहमद और मशीरुद्दीन मुशीर को गिरफ्तार किया है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह दोनों आतंकी अयोध्या, मथुरा और वाराणसी में आतंकी हमला करने की योजना बना रहे थे।
इससे पहले कोविड वैक्सीन पर बयान देते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि-"मुझे भाजपा की वैक्सीन पर भरोसा नहीं है।" हालांकि बाद में उन्होंने उसी वैक्सीन को लगवा लिया।

जनसंख्या नियंत्रण बिल और कोरोना जैसी महामारी पर भी समाजवादी पार्टी के नेताओं, चाहे वह शफीकुर्रहमान बर्क़ हों, इक़बाल महमूद हों या फिर एसटी हसन, के बयान न केवल बेहद ग़ैर-जिम्मेदाराना रहे हैं बल्कि कुछ बयान तो बेहद हास्यास्पद भी हैं।

उत्तरप्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में समाजवादी पार्टी का भाजपा से मतभेद होना स्वाभाविक है और राजनीतिक बयानबाजी भी होनी चाहिए। यह भी सही है कि विपक्ष को सरकार की गलत नीतियों का विरोध करना चाहिए परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं होना चाहिये कि विपक्ष अपनी मर्यादा और नैतिक जिम्मेदारियों को ही भूल जाये। 

सरकार के साथ-साथ विपक्ष के भी कुछ कर्तव्य बनते हैं, जिन्हें निभाना उसकी जिम्मेदारी है। 
लेकिन उत्तरप्रदेश में पिछले साढ़े चार सालों में विपक्षी दलों विशेषकर समाजवादी पार्टी ने जो भूमिका निभाई है, वह न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि एक वर्ग विशेष को ख़ुश करने की रणनीति की ओर भी ईशारा करती है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि विपक्ष अपनी जिम्मेदारियों को भलीभांति नहीं निभा पा रहा है, बल्कि सही मायने में विपक्ष केवल अपने वोटबैंक को साधने के लिए हर जायज़-नाजायज़ हथकंडा अपनाने में लगा हुआ है। 

माननीय अखिलेश यादव उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। वह युवा हैं और काफी लोकप्रिय नेता भी हैं ऐसे में उनका कोई भी बयान जिसका प्रभाव जन सामान्य पर पड़ता हो, गैर-जिम्मेदाराना नहीं होना चाहिए। विशेषकर तब, जबकि उसका सम्बंध देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता से जुड़ा हो। अखिलेश जैसे युवा और कर्मठ नेताओं को चाहिए कि वह अपने देश के सुरक्षा बलों के हौंसले बुलंद करें, उन्हें प्रोत्साहित करें। 

हालांकि अपने ही देश के सुरक्षा बलों पर उंगलियां उठाने वाले अखिलेश यादव पहले और आखिरी नेता नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोगों की एक लंबी लिस्ट है, जिन्हें अपने ही देश की सेना और पुलिस पर भरोसा नहीं है। सेना और पुलिस की बात तो छोड़िए, इन लोगों को देश की न्यायपालिका पर भी भरोसा नहीं है। 
एक वर्ग विशेष को ख़ुश करने के लिए देश के सुरक्षा बलों पर उंगलियां उठाने वाले अखिलेश जैसे नेताओं से जनता यह जरूर जानना चाहती है कि सत्ता की इस राजनीतिक बिसात पर आखिर कब तक देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को दांव पर लगाया जाता रहेगा? आखिर कब तक राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की वेदी पर निर्दोष और निरपराध जनता की बलि चढ़ाई जाती रहेगी? क्या आज सत्ता का मोह राष्ट्रधर्म से अधिक मूल्यवान हो गया है?? आखिर विपक्ष अपनी जिम्मेदारियों को कब समझेगा? 

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सोमवार, 12 जुलाई 2021

क्या मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार UP ATS ने अलकायदा के दो आतंकियों मिनहाज अहमद और मसिरुद्दीन मुशीर को पकड़ा है। इस पर समाजवादी पार्टी के नेता अबू आज़मी ने मीडिया के हवाले से बयान दिया कि "उत्तरप्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके लिए मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। प्रदेश बल्कि देशभर के मुसलमानों को अब चौकस रहने की ज़रूरत है।" इससे पहले जब "जबरन धर्मांतरण" मामले में मौलाना उमर गौतम और मुफ़्ती जहांगीर आलम को भी UP ATS ने पकड़ा था तब भी विपक्षियों ने कुछ इसी तरह के प्रवचन दिए थे।

यहां यह उल्लेखनीय है कि देश की एक बड़ी "सेक्युलर जमात" यह भी शोर मचाते नहीं थकती कि "आतंकी" का कोई "मज़हब" नहीं होता। जब आतंकी का कोई मज़हब नहीं होता तो अबू आज़मी किस बिना पर कह रहे हैं कि मुसलमानों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
इस देश में एक पूरी जमात (लॉबी) है जो हमेशा आतंकियों और उपद्रवियों की पैरोकारी में खड़ी हो जाती है। यह एक ऐसी जमात है जिसे "दानवों" में मानवता नज़र आती है और यह "दानवों" के लिये "मानवाधिकार" की बात करती है। इन्हें याकूब मेमन "निर्दोष" और अज़मल कसाब "मासूम" नज़र आता है। यह "अफ़ज़ल गुरु" की फांसी पर "शर्मिंदा" होते हैं और बाटला हाउस एनकाउंटर पर "विधवा विलाप" करते हैं। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी औऱ सरकारी सम्पत्तियों में आगजनी करने वाले इन्हें "भटके हुए नौजवान" दिखाई देते हैं। यह भारत की "चिकन नेक" को अलग करने की वकालत करने वाले शरजील इमाम और "भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह" कहने वाले उमर खालिद की जल्द से जल्द रिहाई की मांग करते हैं।
लेकिन प्रज्ञा ठाकुर, कपिल मिश्रा औऱ  यति नरसिंहा नन्द सरस्वती इनको आतंकी और देश तोड़ने वाले दिखाई देते हैं।

इस पूरी जमात को ममता बनर्जी में मां की "ममतामयी मूरत" दिखाई देती है लेकिन योगी आदित्यनाथ में इन्हें "कठोर और निरंकुश शासक" की छवि दिखाई देती है।
प्रश्न यह है कि जब आतंकी का कोई मज़हब ही नहीं होता तब अबू आज़मी जैसे नेता अपनी ही क़ौम में भय और नफ़रत की भावना क्यों पैदा करना चाहते हैं? आतंकी और अपराधी का किसी धर्म विशेष से क्या सम्बन्ध है? क्या यह माना जाए कि उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं तो किसी भी अपराधी, आतंकी अथवा संदिग्ध को गिरफ़्तार न किया जाए, क्या अपराधियों और आतंकियों को अराजकता फैलाने की खुली छूट दे दी जाए? ज़रा कल्पना कीजिये कि कोई भी आतंकी संगठन किसी भी मंदिर अथवा तीर्थस्थल पर किसी आतंकी गतिविधि को अंजाम देने में कामयाब हो जाता है तो पूरे देश में जो भयावह स्थिति होगी, क्या आप उसकी कल्पना कर सकते हैं??

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रविवार, 11 जुलाई 2021

सलमान खुर्शीद साहब पत्थर मत उठाइये,आपके घर शीशे के हैं

उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर योगी सरकार ने फॉर्मूला तैयार कर लिया है, जिसके तहत जिनके पास दो से अधिक बच्चे होंगे, वे न तो सरकारी नौकरी के लिए योग्य होंगे और न ही कभी चुनाव लड़ पाएंगे। उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण कानून के तैयार मसौदे में इस तरह के कई प्रस्ताव रखे हैं। आयोग ने इस मसौदे पर लोगों ने आपत्तियां व सुझाव भी मांगे हैं। राज्य विधि आयोग अध्यक्ष न्यायमूर्ति एएन मित्तल के मार्ग-दर्शन में यह मसौदा तैयार किया गया है। आपत्तियों एवं सुझावों का अध्ययन करने के बाद संशोधित मसौदा तैयार करके राज्य सरकार को सौंपा जाएगा। 
योगी सरकार के इस विधेयक पर कई नेताओं ने हमले किए हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने भी इस संबंध में बड़ा बयान दिया है. सलमान खुर्शीद ने कहा कि "नई जनसंख्या नीति लागू करने से पहले सरकार के मंत्री और नेता अपनी जायज़ और नाजायज़ औलादों के बारे में जानकारी दें."

सलमान खुर्शीद का यह बयान कांग्रेस की मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त है। दरअसल, कांग्रेस में जायज़ और नाजायज़ औलादों का चलन बहुत पुराना है। कांग्रेसियों की अय्याशियों और उनकी रंगीन मिज़ाजी के चर्चे विदेशों तक मशहूर हुए हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेडी माउंटबेटन से इश्कबाज़ी ने भारत के बंटवारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जवाहरलाल नेहरू की रँगीनमिजाजी की चर्चाएं भारत से लेकर ब्रिटेन तक चर्चित रही हैं। उसके बाद उनकी बेटी और भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के विषय में तो खुद जवाहरलाल नेहरू के सचिव एम.ओ. मथाई की किताब “Reminiscences of the Nehru Age” में बहुत कुछ लिखा गया। इंदिरा गांधी के अवैध सम्बंध अपने पिता के सचिव एम ओ मथाई सहित, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, दिनेश सिंह और एक मुस्लिम मौहम्मद यूनुस से भी बताए जाते हैं।
इंदिरा गांधी को शांति निकेतन विश्वविद्यालय से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें उसके दुराचरण के लिए बाहर कर दिया था। 

के.एन.राव की पुस्तक “नेहरू राजवंश”
(10:8186092005 ISBN) में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है संजय गांधी फ़िरोज़ गांधी का पुत्र नहीं था,जिसकी पुष्टि के लिए उस पुस्तक में अनेक तथ्यों को सामने रखा गया है। मोहम्मद यूनुस ही वह व्यक्ति था जो संजय गाँधी की विमान दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा रोया था।
यूनुस की पुस्तक ”व्यक्ति जुनून और राजनीति” (persons passions and politics) (ISBN-10 : 0706910176) में संजय गांधी को लेकर बहुत स्पष्ट लिखा हुआ है। कौन नहीं जानता कि सच क्या है, लेकिन दिल बहलाने को ग़ालिब यह ख़्याल अच्छा है। 

सलमान खुर्शीद साहब शायद कांग्रेस के दिग्गज नेता और अपनी रँगीनमिजाजी के लिए मशहूर स्व. पंडित नारायण दत्त तिवारी के विषय में भी बताना भूल गए, जिनके DNA की जांच के बाद उनके "सुपुत्र" का पता चला था। अभी तो यह भी स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस के इस "रंगीन हमाम" में कौन-कौन नंगा हुआ है। शशि थरूर साहब की अय्याशी के किस्से किसने नहीं सुने। कांग्रेस के ही एक नेता थे संजय सिंह, जिनका नाम तब बहुत उछला था जब 27 अगस्त  1988 को एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बैडमिंटन खिलाड़ी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यहां यह समझना जरूरी है कि संजय सिंह की दूसरी पत्नी अमिता सिंह इस बैडमिंटन खिलाड़ी की पत्नी थीं।
अब इन और इन जैसे तमाम कांग्रेसी नेताओं की अगर कुंडली खंगाली जाए तो न जाने कितनी वैध और अवैध संतानों का बायोडाटा सामने आएगा। किस-किस का नाम सूची में दर्ज होगा। कहना मुश्किल है।
सलमान खुर्शीद साहब एक बेहद सुलझे हुए और सम्मानित नेता हैं, उनके मुखारविंद से इस तरह के "सी ग्रेड" बयान शोभा नहीं देते और वह भी तब जबकि खुद उनकी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के घरौंदे शीशे के बने हों। 
वैसे गर सलमान खुर्शीद साहब वैध और अवैध संतानों का ब्यौरा चाहते ही हैं तो फिर शुरुआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से ही कर लेनी चाहिए। आख़िर जनता को भी तो पता चले कि भारत में किस मंत्री की कितनी जायज और कितनी नाजायज़ औलादे हैं।

अलबत्ता जो भारत में रहकर भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, उनका नाम तो नाजायज औलाद की सूची में ही आना चाहिए।

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अखिलेश जी इस राजनीतिक।हमाम में सब नंगे हैं

लखनऊ में हुई एक प्रेस कान्फ्रेंस में बोलते हुए  पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया श्री अखिलेश यादव ने कहा कि- "उत्तरप्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख पदों के लिए होने वाले चुनावों में हिंसा औऱ अराजकता का बोलबाला रहा है। उन्होंने प्रदेश की योगी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पंचायत चुनाव के बाद ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में एक कदम आगे निकल गए, गुंडों को पूरी छूट दी है। पुलिस प्रशासन को खुली छूट दी, पर्चा भरने गए लोगों के साथ मारपीट की गई। उन्होंने किसी का नाम लिए बग़ैर कहा कि जो लोग प्रदेश की योगी सरकार को बधाई दे रहे हैं वह भी दोषी हैं।"

माननीय अखिलेश जी जब आज आपकी अपनी परछाई पर पैर पड़ा तो चीख उठे। वह दिन भूल गए जब आप पश्चिम बंगाल में ममता दीदी से आशीर्वाद लेने गए थे और उनसे जीत का मंत्र पूछ रहे थे। आप ही ने ममता दीदी को बधाईयां दी थीं और उनके साथ मुहं मीठा किया था। तब आपको पश्चिम बंगाल में हुई चुनावी हिंसा और खुली अराजकता नहीं दिखाई दे रही थी। पूरे भारत की जनता ने देखा था कि किस प्रकार ममता सरकार ने गुंडों और आतंकियों को सड़कों पर उतार रखा था। किस प्रकार से टीएमसी के कार्यकर्ता बम और हथगोले बरसा रहे थे, निर्दोषों और मासूम लोगों की हत्याएं की जा रही थीं। भाजपा सहित तमाम विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को चुन-चुन कर मारा जा रहा था। ममता सरकार ने विपक्षी पार्टी के नेताओं की रैलियों को रोकने के लिए हर जायज़-नाजायज़ हथकंडे अपनाए। हद तो तब हो गई जब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल को भी नहीं बख्शा गया और अंततः उन्हें भी अपनी जान जोखिम में नज़र आने लगी। हाईकोर्ट और केंद्र सरकार तक को दख़ल देना पड़ा। उसके बावजूद पश्चिम बंगाल में हिंसा का नँगा नाच होता रहा। और ममता सरकार दंगाइयों और उपद्रवियों के हौंसले बुलंद करती रही, उन्हें और अधिक उकसाती रही। क्या आप भूल गए कि पश्चिम बंगाल में किस प्रकार से बेबस और मासूम महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किये गए, मासूम बच्चों का बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। बस्तियों को जला दिया गया और हजारों-लाखों लोगों को घर से बेघर कर दिया गया। 
लेकिन आपको तब यह सब नहीं दिखाई दिया था, आपको तो केवल ममता दीदी की जीत और भाजपा की हार दिखाई दे रही थी। वहां आपको लोकतंत्र की लाचारी और विपक्ष की बेबसी नहीं दिखाई दी। बल्कि आप तो खुद उत्तरप्रदेश को पश्चिम बंगाल बनाने की बात कर रहे थे। यह अलग बात है कि उससे आपका आशय क्या था.

और थोड़ा नज़दीक आइये तो अभी बलिया में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सपा उम्मीदवार की जीत के बाद कथितरूप से समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विजयी जुलूस निकाला जिसमें सभ्यता की सारी मर्यादाओं को ताक पर रखकर प्रदेश सरकार में मंत्री पद पर बैठे उपेंद्र तिवारी की मां-बहनों के लिए बेहद अश्लील भाषा का प्रयोग किया गया। जिसकी पूरी वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुई।

आपके पूज्य पिताजी के कार्यकाल में "बुआजी" के साथ हुआ गेस्ट हाउस कांड भी आप भूल गए जिसमें एक दलित की बेटी की न केवल इज़्ज़त उतारने की कोशिश हुई थी बल्कि उसको जान से मारने का भी षड्यंत्र रचा गया था और यह सब किसने किया और किसके ईशारों पर हुआ था, यह पूरे प्रदेश की जनता को मालूम है।
ख़ुद आपकी ही सरकार में 2013 में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में किस प्रकार की घटनाएं घटित हुईं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिला बिजनौर के कई दिग्गज समाजवादी नेताओं पर 18 जिला पंचायत सदस्यों के अपहरण का आरोप लगा था, जिनकी बाद में गिरफ्तारियां भी की गई।थीं।
यह सही है कि स्थानीय चुनावों में हिंसा और अराजकता का बोलबाला रहता है और यह भी कि इस बार भी उत्तरप्रदेश इससे अछूता नहीं रहा। निश्चित रूप से इसके लिये वर्तमान प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया जाना चाहिए। लेकिन किसी दूसरे पर उंगलियां उठाने से पहले हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाकी की तीन उंगलियां हमारी ओर भी ईशारा कर रही हैं। सत्ता लोलुपता के इस राजनीतिक हमाम में सब नंगे हैं। यह और बात है कि हमें अपना नँगापन भले ही न दिखाई दे, लेकिन दूसरों का नँगापन आसानी से दिखाई दे जाता है।

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शनिवार, 10 जुलाई 2021

मात्र 15 दिनों में आप लिबरल गैंग की सदस्यता लीजिए, ऑफर सीमित समय तक

आप जानते हैं कि आप जो कुछ देख अथवा सुन रहे हैं उसका आप और आपके बच्चों के मन-मस्तिष्क पर कितना गहरा प्रभाव पड़ रहा है। तो आइए जानते हैं। 
आप कुछ दिन केवल रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे पत्रकारों और एनडीटीवी जैसे चैनलों को सुनते रहिए और केवल उन्हीं की खबरों पर ध्यान रखिये। आप राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और ओवैसी सहित तमाम वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा के लोगों का लेख पढिये और उनके भाषण सुनिए। जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं के विचारों और "लिबरल गैंग" के विचारों का गहनता से अध्ययन करिए । जम्मू-कश्मीर समस्या को सैफुद्दीन सोज जैसे नेताओं के चश्मे से देखिये। जावेद अख़्तर, अनुराग कश्यप, फरहान अख़्तर, स्वरा भास्कर, मुनव्वर राना और मरहूम राहत इंदौरी की लिखी शायरी और उनकी फिल्मों को देखते रहिए। आप लगातार टिकैत जैसे  किसान नेताओं और चंद्रशेखर रावण जैसे दलित नेताओं के आंदोलनों पर निगाह जमाये रखिए और शाहीन बाग़ में बैठे लोगों के वीडियो को ध्यान से देखिये और उनके नारों पर ध्यान देते रहिए। सुधा भारद्वाज और स्वर्गीय फादर स्टेन स्वामी जैसे अर्बन नक्सलियों की जीवन गाथा और उनके साहित्य को पढ़ते रहिए। दिग्विजय सिंह और आचार्य प्रमोद कृष्णम जैसे महान पोंगापंथियो के प्रवचन सुनिए।
 
यकीन जानिए कि मात्र 15 दिनों में आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन आपको आतंकी संगठन नज़र आने लगेंगे। भगवा रंग से आपको नफ़रत हो जाएगी। "हिंदुत्व" आतंक का पर्याय और "राष्ट्रभक्त" आतंकी नज़र आने लगेगा। आपको लगने लगेगा कि इस देश में असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है और "गंगा-जमुनी तहज़ीब" आपको ख़तरे में दिखाई देने लगेगी। हर पत्थरबाज आपको भटका हुआ नौजवान और प्रत्येक AK-47 वाला आपको क्रांतिकारी नज़र आने लगेगा। रोहिंग्या घुसपैठिये आपको पीड़ित और लाचार नज़र आने लगेंगे जबकि पाकिस्तानी अल्पसंख्यक आपको दुश्मन देशों के जासूस नज़र आएंगे। 

नरेंद्र मोदी आपको कादर खान और योगी आदित्यनाथ आपको शक्ति कपूर नज़र आने लगेंगे। राहुल गांधी में आपको अमोल पालेकर और अखिलेश यादव में आपको दबंग फ़िल्म के सलमान खान दिखाई देंगे। सोनिया जी में आपको निरूपाराय नज़र आएंगी और ममता बनर्जी तो आपको साक्षात लेडी सिंघम दिखाई देने लगेंगी।

"लवजिहाद" में आपको लैला-मजनूं की मौहब्बत और "धर्मांतरण जिहाद" में आपको शांति और प्रेम का सन्देश सुनाई देने लगेगा। धीरे-धीरे आप महाराणा प्रताप को बागी और अकबर को महान समझना शुरू कर देंगे। मुगलों को आप "मसीहा" और राजपूतों को "लुटेरा" मानने लगेंगे। आपको मोहनदास करमचंद गांधी में "महात्मा" नज़र आने लगेगा और वीर दामोदर सावरकर आपको अंग्रेजों के पिट्ठू नज़र आएंगे।
आपको लगेगा कि भारत की आज़ादी में चरखे और चश्मे का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और उसी की बदौलत आज हम स्वतंत्र हो पाए हैं। इसके बाद आपको "लिबरल गैंग" की सदस्यता मिलना तय है। तो देर न करें जल्दी करिए, और लिबरल गैंग के सदस्य बनने की तैयारियों में जोरशोर से लग जाइये।

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