सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्या अखिलेश यादव "चोर" और योगी "नामर्द" हैं

आजकल सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ दुर्योधन और दुःशासनों द्वारा शब्दों की मर्यादा और भाषा की शालीनता का चीरहरण बेख़ौफ़ किया जा रहा है।

एक बानगी देखिये कि पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया श्री अखिलेश यादव को धड़ल्ले से "टोंटी चोर" लिखा जा रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री बाबा योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर भी बेहद अश्लील और भद्दी टिप्पणियां की जाती हैं। क्या लिखने वालों के पास कोई पुख़्ता सबूत है अथवा कोई न्याययिक दस्तावेज जिससे वह अपनी बात को साबित कर सकें? या उन्हें बस "कुछ भी बोलना" है।

सच पूछिए तो सोशल मीडिया प्लेटफार्म का दुरुपयोग करते हुए देश के कई दिग्गज राजनीतिज्ञों और सम्मानित और गणमान्य नागरिकों के विरुद्ध अश्लीलता भरे कमेंट्स और Fake Messeges द्वारा  दुष्प्रचार करने की मानो एक कु-परम्परा सी चल पड़ी है। और विडम्बना यह है कि इस घिनौने और घृणित कार्य में कुछ कथित बुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी शामिल रहते हैं।

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दी हुई अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि भाषा पर संयम बरतना चाहिए। *सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद के एस.आर.के. कॉलेज में इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शहरयार अली*  को गिरफ्तारी से संरक्षण देने से इनकार करते हुए की है। प्रोफेसर शहरयार अली पर केंद्रीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी के खिलाफ फेसबुक पर कथिततौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है।टिप्पणी करते हुए माननीय न्यायधीशों संजय किशन कौल और हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि *"लोगों को सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आलोचना या मजाक करते वक्त अपनी भाषा का ध्यान रखना चाहिए।"* उन्होंने आगे कहा कि *‘आप इस तरह महिलाओं को बदनाम नहीं कर सकते। आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ बदनाम करने के लिए नहीं कर सकते। आखिर किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है? आलोचना या मजाक करने की भी एक भाषा होती है।’* सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि *आप कुछ भी नहीं कह सकते।* 

इससे पहले मई में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रोफेसर शहरयार अली को यह कहते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था कि आरोपी राहत का हकदार नहीं है क्योंकि वह एक कॉलेज में वरिष्ठ शिक्षक है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि उसके सोशल मीडिया पोस्ट से विभिन्न समुदायों के बीच दुर्भावना को बढ़ावा देने की आशंका थी। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद अली ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

इस मामले में यह गौर करने लायक है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में आप किसी भी हद तक नहीं जा सकते, आप शब्दों की मर्यादा और भाषा की शालीनता की सीमाओं को नहीं लांघ सकते। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी उन तमाम लोगों के लिए भी एक सबक़ है जिन्हें लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में वह किसी का भी अपमान कर सकते हैं, किसी के भी विरुद्ध दुष्प्रचार कर सकते हैं, कोई भी अमर्यादित, अश्लील अथवा अभद्र टिप्पणी कर सकते हैं। कुल मिलाकर अगर हम सीधे-सरल शब्दों में कहें तो "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का अर्थ "कुछ भी बोलना" नहीं है।

हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस निष्पक्ष और निष्कलंक टिप्पणी का हृदय से स्वागत करते हैं।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

व्हाट्सऐप-

 9058118317

ईमेल-
 manojchaturvedi1972@gmail.com

ब्लॉगर-

https://www.shastrisandesh.co.in/

फेसबुक-

https://www.facebook.com/shastrisandesh

ट्विटर-

https://www.twitter.com/shastriji1972

*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

गंगा स्नान का वैज्ञानिक महत्व : एक प्रमाणिक और गहन विश्लेषण

  गंगा स्नान को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है — लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी है, जिसे आधुनिक शोधों ने प्रमाणित किया है। 1. प्राकृतिक एंटीबायोटिक जल गंगाजल में Bacteriophage नामक वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसलिए यह पानी सड़ता नहीं, बल्कि शुद्ध बना रहता है — यह आधुनिक माइक्रोबियल साइंस द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।  इसे भी पढ़ें : कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व  2. स्किन एवं इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी गंगाजल में विद्यमान खास खनिज (Mineral Salts) व प्राकृतिक माइक्रोब्स त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाते हैं और त्वचा रोगों में उपचारकारी पाए गए हैं। इससे शरीर की immune response क्षमता बढ़ती है — विशेषकर जल-ज्वर, फंगल और फोड़े-फुंसियों जैसे संक्रमणों से लड़ने में। 3. नेगेटिव आयन एनर्जी थैरेपी (Negative Ion Therapy) जब व्यक्ति सूर्योदय या प्रातःकालीन मौसम में गंगा में स्नान करता है, तब उसे नेगेटिव आयन (−IONs) प्राप्त होते हैं — यह वही आयन हैं जो हिमालय, झरनों और बारिश के बाद की हवा में होते हैं। विज्ञान...