अहिंसा के पुजारी कहे जाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। जिन्होंने हमें सिखाया कि कोई अगर तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो। वही गांधी जो सत्याग्रह और अहिंसात्मक आंदोलनों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे। वही गांधी जो पूरी जिंदगी बकरी पालते रहे और बकरी का ही दूध पीते रहे। उस गांधी ने कभी उन निर्दोष, मासूम और बेजुबान बकरों की जान बचाने हेतु कोई आमरण अनशन क्यों नहीं किया? जिस गांधी ने अपने कथित अहिंसात्मक आंदोलनों से बिना खड्ग और ढाल के इस देश को अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद करा दिया वह गांधी मौहम्मद अली जिन्नाह को भारत के टुकड़े करने से क्यों नहीं रोक पाए? समस्त हिन्दू समाज को "अहिंसा परमो धर्म:" का पाठ पढ़ाने वाले गांधी, जिन्ना और उसके समर्थकों को अहिंसावादी क्यों नहीं बना पाए? आखिर क्या कारण था कि गांधी उन कुपरम्पराओं के विरोध में कभी आमरण अनशन पर नहीं बैठे जिसमें हर वर्ष लाखों-करोड़ों बेजुबानों की जान चली जाती है।
कभी आपने इस विषय पर गम्भीर चिंतन किया? जरा सोचिए कि महात्मा गांधी ने पाकिस्तान में जाकर हिंदुओं के भीषण रक्तपात का विरोध क्यों नहीं किया था? उन्होंने जिन्ना के "डायरेक्ट एक्शन" को रोकने के लिए कभी सत्याग्रह क्यों नहीं किया?
इन सब सवालों का शायद एक ही जवाब आपको मिलेगा कि गांधी केवल एक "शो-मैन" थे। गांधी जानते थे कि यदि उन्होंने बेजुबानों की बलि लेने वाली कुप्रथाओं का विरोध किया तो उनकी खुद की बलि चढ़ जाएगी। गांधी जानते थे कि जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन रोकना उनके लिए असम्भव था, वह भूख से प्राण भी त्याग देंगे तब भी जिन्ना और उसके समर्थकों पर कोई प्रभाव नहीं होगा। इसलिए भीमराव अंबेडकर के घर के सामने आमरण अनशन करने वाले गांधी कभी जिन्ना के बंगले पर भूख हड़ताल लेकर नहीं बैठ सके।
गांधी का अहिँसा प्रेम और उसकी शिक्षाएं केवल उसी समाज तक सीमित रहीं जो हमेशा से "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के सिद्धांत पर अमल करता रहा है।
आज भी इस देश में हजारों गांधी हैं जो सिर्फ़ हमें ही सहिष्णुता, शांति अहिंसा और सद्भावना का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन वह कभी कश्मीर में जाकर शांति और सद्भाव का ढोल नहीं पीटते, वह कभी पश्चिम बंगाल में हिंसा का तांडव रोकने के लिए भूख हड़ताल पर नहीं बैठते, वह कभी किसी बुरहान वानी को प्रेम और शांति का पाठ नहीं पढ़ाते, क्योंकि वह जानते हैं कि वहां उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
उन्हें मालूम है कि भेड़ों का हांकना बहुत आसान है, लेकिन भेड़ियों को हांकने में जान भी जा सकती है। गांधी भी अपनी पूरी जिंदगी भेड़ों और बकरियों को ही हांकते रहे, उन्होंने कभी किसी भेड़िए को चराने की कोशिश नहीं की थी। अगर कभी की होती तो शायद किसी नाथूराम गोडसे का जन्म ही न हुआ होता।
🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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