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शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

पाकिस्तान के किन मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न हो रहा है

कांग्रेस और उसके चेले-चपाटे इस बात को लेकर हो-हल्ला मचा रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून में मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया गया।

प्रश्न यह है कि किन मुसलमानों को भारत में नागरिकता देने की पैरोकारी की जा रही है। शिया, अहमदिया या रोहिंग्या।

सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि मौहम्मद अली जिन्ना, जो कि पाकिस्तान का संस्थापक था, एक शिया था। जिन्ना का जन्म जिस परिवार में हुआ था वह एक शिया उप-सम्प्रदाय है, बाद में जिन्ना ने अशारिया सम्प्रदाय अपना लिया था जो सबसे बड़ा शिया उप-सम्प्रदाय है। दूसरा मुस्लिम नेता राजा मौहम्मद आमिर अहमद खान जिसने पाकिस्तान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, का भी ताल्लुक़ शिया सम्प्रदाय से था।

पाकिस्तान बनवाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद उस वक्त अहमदिया मुसलमानों का सबसे बड़ा इमाम था। और दूसरा अहमदिया नेता मुहम्मद जफरुल्ला खान था।
इस इमाम बशीरूद्दीन के इस्लामिक कट्टरपन्थ का जुनून इस हद तक था कि उसने कहा था कि "पाकिस्तान तो केवल एक शुरुआत है, असल मकसद तो इस्लामिस्तान बनाना है".

 अहमदिया समुदाय के लोग स्वयं को मुसलमान मानते व कहते हैं परंतु अहमदिया समुदाय के अतिरिक्त शेष सभी मुस्लिम वर्गों के लोग इन्हें मुसलमान मानने को हरगिज तैयार नहीं। इसका कारण यह है कि इस समुदाय के लोग अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं, परंपराओं व उन्हें विरासत में मिली शिक्षाओं व जानकारियों के अनुसार हज़रत मोहम्मद को अपना आख़िरी पैगम्बर स्वीकार नहीं करते। इसके बजाए इस समुदाय के लोग मानते हैं कि नबुअत (पैगम्बरी ) की परंपरा रूकी नहीं है बल्कि सतत जारी है। जबकि इस्लाम में पैगम्बर मोहम्मद ख़ुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर माने जाते हैं।

अहमदिया आंदोलन के अनुयायी गुलाम अहमद (1835-1908) को मुहम्मद के बाद एक और पैगम्बर (दूत) मानते हैं। अहमदिया सम्प्रदाय अपने वर्तमान सर्वोच्च धर्मगुरु को नबी के रूप में ही मानते हैं।

इन धार्मिक मान्यताओं में भेदभाव के चलते पाकिस्तान के सुन्नी कट्टरपंथी मुसलमानों ने 1974 में संविधान में संशोधन करके अहमदिया मुसलमानों को ग़ैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था।
यहां यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा भी खुद एक अहमदिया मुसलमान हैं।नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुल सलाम पाकिस्तान के पहले और अकेले वैज्ञानिक हैं जिन्हें फिज़िक्स के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है, वह एक अहमदिया थे।

शिया-सुन्नी का भेद तो जगज़ाहिर है। जहां तक रोहिंग्या मुसलमानों का प्रश्न है, तो वह मूलतः बांग्लादेश के निवासी हैं, और ख़ुद बांग्लादेश उन्हें अपने यहां शरण देने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान तो रोहिंग्या को फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते हैं।

अंतिम प्रश्न यह भी है कि अगर किसी इस्लामिक देश में मुसलमानों का उत्पीड़न किया भी जा रहा है, तो फिर वह भारत जैसे हिन्दू राष्ट्र (भारत के कांग्रेसियों के कथनानुसार) में ही क्यों आना चाहता है? इस दुनिया में 56 इस्लामिक देश हैं वहां क्यों नहीं चला जाता? क्या भारत धर्मशाला है, या खाला का घर।

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

जामिया गोलीकांड के लिए ज़िम्मेदार कौन

जामिया गोलीकांड को लेकर जिस प्रकार की बयानबाज़ी कांग्रेस नेता कर रहे हैं उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो इस देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए केवल भाजपा, संघ और बहुसंख्यक समाज के लोग ही उत्तरदायी हैं। ठीक ऐसी ही परिस्थितियां आज से 72 वर्ष पहले 30 जनवरी 1948 को बनी थीं जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की थी और कांग्रेस व वामपंथ ने इसका ठीकरा हिन्दू संगठनों और संघ पर फोड़ा था, जिसे वह आज भी दोहराते रहते हैं। उस समय भी कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदें पार करते हुए हिन्दू समाज को भयभीत और मजबूर किया हुआ था।

आज पूरे देश में CAA-NRC की आड़ में विपक्ष देश के विभाजन, मोदी-शाह और संघ के विरुद्ध नफ़रत, तथा हिन्दू-हिंदुत्व औऱ हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ लगातार जहर फैलाया जा रहा है। शाहीन बाग़ में पिछले लगभग 50 दिनों से अराजकतावादी तत्वों ने महिलाओं औऱ मासूम बच्चों के कंधों पर बंदूक रखकर गुंडागर्दी और बदमाशी के बल पर रास्ता जाम किया हुआ है जिसके कारण करीब 2 करोड़ नागरिकों को न केवल परेशानी हो रही है बल्कि उनके रोजमर्रा के कामों में भी काफी रुकावट हो रही है। 

उधर AMU में रोज़ाना ज़हरीले भाषण दिए जा रहे हैं, पूरे देश को तोड़ने की बात की जा रही है, JNU में पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प की जा चुकी है औऱ शरजील इमाम जैसे देशद्रोही तत्वों की खुलेआम पैरवी की जा रही है, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र रोज़ाना सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। मणिशंकर अय्यर, अमानुतुल्ला खान, अकबरुद्द्दीन ओवैसी सहित तमाम विपक्षी नेता जहर उगल रहे हैं। 

यद्यपि इस देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन आज जो हालात कांग्रेस-वामपंथ ने फैलाये हुए हैं, तो क्या उससे राष्ट्रभक्त, देशभक्त औऱ तमाम आम जनता के बीच आक्रोश लगातार पनप रहा है? क्या जामिया गोलीकांड उसी आक्रोश का नतीजा है? क्या इस देश को इस्लामिक राष्ट्र बनते हुए देखते रहें?
आखिर कब तक इस देश का आम नागरिक गांधी के तीन बन्दर बनकर बैठा बनकर रहेगा?

इन सवालों के जवाब कांग्रेस-वामपंथ सहित तमाम विपक्षी दल और ख़ुद  केंद्र सरकार को भी देना होगा।

पराजित राष्ट्र, और पराजित मन प्राय: विजेताओं के संस्कार और संस्कृति को स्वीकार करते हैं


धारावाहिक चाणक्य के एक भाग में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि–
“भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं है, भय उनकी सांस्कृतिक दासता का भी है. अनुभव कहता है कि पराजित राष्ट्र, और पराजित मन प्राय: विजेताओं के संस्कार और संस्कृति को स्वीकार करते हैं".
इन थोड़े से शब्दों में जो सत्य छिपा है, जो भाव छिपा है, जो राष्ट्रवाद छिपा है, उसे आज गहराई से समझने की परम आवश्यकता है।

आज CAA-NRC के विरोध की आड़ में इस देश में जो ज़हर की खेती की जा रही है, उसके लिए ज़मीन हमारा पारंपरिक दुश्मन देश पाकिस्तान तैयार कर रहा है।
जिस विचारधारा को पुष्पित-पल्लवित किया जा रहा है वह *इस्लामिक राष्ट्र* की विचारधारा है।
इनका नायक कोई और नहीं, बल्कि ज़ाकिर नाईक और हाफ़िज़ सईद हैं, इनके प्रेरणास्रोत अल-बगदादी और ओसामा हैं।

यह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के इशारों पर काम कर रहे हैं, इनका एकमात्र उद्देश्य भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना है। यह लोग अपने को केवल राष्ट्रवादी नहीं कहते बल्कि राष्ट्रवादी-मुसलमान कहते हैं, यह अखण्ड भारत की बात कभी नहीं करेंगे बल्कि हमेशा "मुस्लिम-भारत" की ही बात करेंगे।

समस्या इस्लाम या मुसलमान से नहीं है, बल्कि समस्या इस्लामिक राष्ट्र या मुस्लिम-भारत से है। क्योंकि यह हमें पराधीन बना देगा, यह हमारी संस्कृति, हमारे विश्वास, हमारी आस्था और हमारी सभ्यता को ग़ुलाम बना देगा। हम उनके संस्कृतिक दास बन जाएंगे। जो सही मायने में उनका मूल एजेंडा है।


बुधवार, 29 जनवरी 2020

इन देशद्रोही बयानों को बेहद गम्भीरता से लिया जाना चाहिए

अलीगढ़ मुस्लिम विवि (AMU) में CAA के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष फैजुल हसन का एक बयान सामने आया है। 
इस छात्र नेता ने कहा है कि 
"दुनिया में कहीं सब्र देखना है, तो हिंदुस्तान के मुसलमानों का देखिए। 1947 से 2020 तक मुसलमान सब्र कर रहा है कि हिंदुस्तान टूट ना पाए। हम उस कौम से हैं, अगर बर्बाद करने पर आ गए तो छोड़ेंगे नहीं, किसी भी देश को खत्म कर देंगे।"

IIT बॉम्बे से कम्प्यूटर साइंस में ग्रेजुएट और JNU से आधुनिक भारतीय इतिहास में पीएचडी कर रहा
शरजील इमाम मूल रूप से बिहार के जहानाबाद काको गांव का रहने वाला है. इसी शरजील इमाम ने CAA के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन में दिए एक बयान में कहा कि- 
"असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है. और इंडिया कटकर अलग हो जाएं, तभी ये हमारी बात सुनेंगे."

इन दोनों बयानों को अगर हम एकसाथ देखें तो स्पष्टतया यह बयान मुस्लिम लीग के नेताओं के बयान की मूलभावना को ही प्रकट करता है जिसमें उन्होंने कहा था- 
"हम हिंदुस्तान को बंटवा देंगे या हिंदुस्तान को तबाह कर देंगे।"

 दरअसल अन्य धर्मों के मुकाबले भारत में मुस्लिम समुदाय का प्रवेश और सत्ता का अधिग्रहण तलवार के बल पर हुआ था। और मुस्लिम शासकों ने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और आस्था को गहरा आघात पहुंचाया है। तलवार के बल पर हिंदुओं का बलात इस्लाम कबूल कराया या उनको क़त्ल कर दिया।
 देश के स्वतंत्र होने के कुछ वर्षों पहले से ही जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम समाज ने भारत विभाजन की शर्त रखनी प्रारम्भ कर दी थी और कहा था कि हम खून की नदियां बहा देंगे, इस धमकी को उन्होंने अमली जामा पहनाते हुए "डायरेक्ट एक्शन डे" मनाया और कलकत्ता में 16 अगस्त 1946 को दोपहर तीन बजे एक विशाल मुस्लिम सभा आच्टरलोनी स्मारक के पास बुलाई गयी, मुस्लिम लीग की इस सभा में हिन्दुओं के खिलाफ जहरीले भाषण दिये गये। सभा समाप्त होते पूर्व षडयंत्र के मुताबिक दंगे शुरू कर दिए। उसके बाद नोआखली और बिहार में भयानक नरसंहार हुआ और उसके बाद मुंबई सहित देश के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी।

आज CAA-NRC के विरोध की आड़ में जिस प्रकार के ज़हरीले भाषण और हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे हैं, उनपर अगर गम्भीरता से विचार किया जाए तो यह 1946 की पुनरावृत्ति ही होती दिखाई दे रही है।

इसलिए भारत सरकार सहित इस देश की तमाम जनता को इन शरजील इमाम और फैजुल हसन के इन ज़हरीले बयानों को बेहद गम्भीरता लेना चाहिए। 

देश के गद्दारों को गोली मारो....को, नारे पर आपत्ति क्यों?

आपने सुना या देखा भी होगा कि जब किसी भी आदमखोर जानवर का शिकार किया जाता है तो उसे पहले खुले में लाया जाता है, ताकि उसको मारने के चक्कर में कोई निर्दोष जानवर न मारा जाए। इस आदमखोर को बाहर निकालने के लिए हांका लगाया जाता है जिसमें कुछ लोग ढोल-नगाड़े पीटते हुए ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करते हैं, उस शोर को सुनकर आदमखोर अपने गुप्त स्थान से निकलकर बाहर आ जाता है। और शिकारी उस आदमखोर को आसानी से मार डालता है।

आज जो एक नारा "देश के गद्दारों को, गोली मारो.....को" लगाया जा रहा है, उसे सुनकर जो लोग अपने-अपने दड़बों से बाहर आ रहे हैं, वही गद्दार हैं, जिन लोगों को इस नारे से दिक़्क़त है, समझ लीजिए वह देश का गद्दार है क्योंकि जो लोग राष्ट्रभक्त हैं, देश के वफ़ादार हैं उन्हें इस नारे से दिक़्क़त क्यों होने लगी?* इस नारे में किसी धर्म/मज़हब/जाति/सम्प्रदाय या पंथ का नाम नहीं लिया गया है, बल्कि गद्दारों के झुंड को ललकारा गया है।

इस्लाम में गद्दारी की सज़ा मौत है, सनातन धर्म में देशद्रोह की सजा मृत्युदंड है  या देश निकाला है। अन्य सभी धर्मों में भी ग़द्दारी की सज़ा मौत ही है। तब इस नारे पर आपत्ति क्यों है? इस नारे से दिक़्क़त सिर्फ उन्हीं लोगों को हो सकती है जो या तो ख़ुद ग़द्दार हैं या फिर गद्दारों के संरक्षक हैं। यह तो एक ऐसा नारा है कि प्रत्येक राष्ट्रभक्त/देशभक्त को ज़ोर-ज़ोर से बोलना चाहिए, ताकि गद्दारों का झुंड अपने दड़बों से बाहर निकल सके और हमारी बहादुर सेना उन्हें गोली मार सके।

तो ज़ोर से बोलो....

देश के गद्दारों को, गोली मारो ......को।

सोमवार, 27 जनवरी 2020

शरजील इमाम जैसे देशद्रोहियो को फाँसी देने का कानून बनाये मोदी सरकार-यति नरसिंहानंद सरस्वती

गुप्त नवरात्रि में सनातन धर्म और सनातन धर्म के मानने वालों की रक्षा व सनातन धर्म के शत्रुओं के समूल विनाश के लिये माँ बगलामुखी का महायज्ञ कर रहे शिवशक्ति धाम डासना के सन्यासियों ने असम को भारतवर्ष से काटने की योजना बनाने वाले शरजील इमाम और उसके जैसे गद्दारो के लिये फाँसी की सजा की मांग की।शिवशक्ति धाम के पीठाधीश्वर व अखिल भारतीय संत परिषद के राष्ट्रीय संयोजक यति नरसिंहानन्द सरस्वती जी ने भूमा निकेतन की यज्ञशाला से बयान जारी करके यह माँग की है।
उन्होंने कहा की इस्लाम के जिहादी भारत के गद्दारो से मिलकर इस देश के टुकड़े टुकड़े करना चाहते हैं।ये सब कुछ जे एन यू,ए एम यू, जामिया और शाहीन बाग में लग रहे नारो से देश की जनता के सामने स्पष्ट हो चुका है।शरलीन इमाम की स्वीकारोक्ति ने इस षड्यंत्र को साबित भी कर दिया।अब केंद्र सरकार को ऐसे देशद्रोहियो को फाँसी पर लटका देना चाहिये।यदि इसके लिये जरूरत पड़े तो केंद्र सरकार संविधान संशोधन के द्वारा नए और कड़े कानून बनाये।
इस माँग का श्री ब्राह्मण महासभा ने भी समर्थन किया है।श्री ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पण्डित अधीर कौशिक जी ने कहा की देश के टुकड़े टुकड़े करने के जो नारे हम वर्षो से सुन रहे हैं, उनका सच अब हमारे सामने आ गया है।ऐसे लोग देश के लिये बहुत बड़ा खतरा हैं।अगर इन्हें उचित दण्ड नही दिया जाता तो हर गद्दार इसी तरह से देश के टुकड़े करने में लग जायेगा और देशभक्त नागरिको का मनोबल टूट जाएगा।
हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष बाबा परमेन्द्र आर्य जी,यति सत्यदेवानंद सरस्वती जी,यति रामस्वरूपानंद सरस्वती जी,यति सेवानंद सरस्वती जी,पण्डित सनोज शास्त्री,पण्डित हरिकृष्ण शर्मा,बृजमोहन सिंह,डॉ राजा गौतम,विजयपाल त्यागी,मुकेश त्यागी,बॉबी त्यागी तथा अन्य उपस्थित भक्तगणों ने भी इस मांग का समर्थन किया।

चाहे पाकिस्तान में समस्त हिन्दू व सिख मार दिए जाएं, पर भारत के एक कमज़ोर मुसलमान बालक की भी रक्षा होगी- महात्मा गाँधी

लियोनार्ड मोसले के अनुसार भारत विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बावजूद भी महात्मा गांधी ने कहा था- "चाहे पाकिस्तान में समस्त हिन्दू व सिख मार दिए जाएं, पर भारत के एक कमज़ोर मुसलमान बालक की भी रक्षा होगी".

स्रोत-(पुस्तक- भारत का राष्ट्रीय आंदोलन: एक विहंगावलोकन, लेखक-मुकेश बरनवाल, डॉ. भावना चौहान)

कांग्रेस का इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण के तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आज देश में CAA-NRC की आड़ में जिन मंचों से मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को शह दी जा रही है, उन तमाम मंचों के पीछे जिस बेशर्मी के साथ कांग्रेस पार्टी और उसके तमाम नेता खड़े हैं, वह कोई नई बात नहीं है।  आज जिस तरह की भाषा मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर सहित तमाम कांग्रेसी नेता बोल रहे हैं, यह कांग्रेस के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा हैं। वह कांग्रेस ही थी जिसने धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलिरिज्म) शब्द को संविधान में जगह दी, औऱ हमेशा उसकी आड़ में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को प्रश्रय दिया। जिसका खामियाजा आज तक यह देश भुगत रहा है।

डॉ. अम्बेडकर अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" में लिखते हैं कि "कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनीतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति अपनाई है। क्योंकि वे समझते हैं कि मुसलमानों के समर्थन के बिना वे अपने मनोवांछित लक्ष्य को नहीं पा सकते। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने दो बातें समझीं नहीं हैं। पहली बात यह है कि तुष्टीकरण और समझौते में अंतर होता है, और यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। "तुष्टीकरण" का अर्थ है, एक आक्रामक व्यक्ति या समुदाय को मूल्य देकर अपनी ओर करना ; और यह मूल्य होता है उस आक्रमणकारी द्वारा किये गए, निर्दोष लोगों पर, जिनसे वह किसी कारण से अप्रसन्न हो, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और आगजनी जैसे अत्याचारों को अनदेखा करना। दूसरी ओर, "समझौता" होता है दो पक्षों के बीच कुछ मर्यादाएं निश्चित कर देना जिनका उल्लंघन कोई भी पक्ष नहीं कर सकता। तुष्टीकरण से आक्रांता की मांगों और आकांक्षाओं पर कोई अंकुश नहीं लगता, समझौते से लगता है।
दूसरी बात, जो कांग्रेस समझ नहीं पाई है, वह यह है कि छूट देने की नीति ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ावा दिया है; और, अधिक शोचनीय बात यह है कि मुसलमान इन रियायतों का अर्थ लगाते हैं हिंदुओं की पराजित मानसिकता और सामना करने की इच्छा-शक्ति का अभाव। तुष्टीकरण की यह नीति हिंदुओं को उसी भयावह स्थिति में फंसा देगी जिसमें मित्र देश (द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस आदि) हिटलर के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाकर स्वयं को पाते थे". 
स्रोत-(पुस्तक-डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में मुस्लिम कट्टरवाद, लेखक- एस के अग्रवाल)


लिनलिथगो, वेबेल तथा माउंटबेटन जैसे वायसरायों के संवैधानिक सलाहकार वापुल पांगुनी मेनन (वीपी मेनन) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "ट्रांसफर ऑफ पॉवर" में लिखा है- "यदि कांग्रेस ने प्रान्तों में लाभदायक स्थिति को नहीं छोड़ा होता, तो भारतीय इतिहास का घटनाक्रम सम्भवतः बहुत अलग होता"। वीपी मेनन आगे लिखते हैं कि-" इस्तीफे देकर कांग्रेस ने घटिया राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है। यह स्पष्ट है कि कांग्रेस मंत्रिमंडल के इस्तीफों के बिना जिन्ना और मुस्लिम लीग कभी उस मुक़ाम को नहीं पा सकते थे, जो उन्हें प्राप्त हुआ। इन इस्तीफों का दीर्घकालिक परिणाम यह हुआ कि सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त अफगानिस्तान और भारत की सीमा पर स्थित ख़ैबर दर्रे पर राष्ट्रवादियों ने अपना नियंत्रण खो दिया। यदि 1940-46 ईसवी के समय कांग्रेस का इन मुस्लिम बहुल प्रान्तों में शासन बना रहता, तो भारत के विभाजन की योजना आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थी।कांग्रेस मंत्रिमंडल के इस्तीफों से अति प्रसन्न जिन्ना ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था- "घोर गलती, मतलब कांग्रेस की घोर गलती".
स्रोत-(पुस्तक- भारत का राष्ट्रीय आंदोलन: एक विहंगावलोकन, लेखक-मुकेश बरनवाल, डॉ. भावना चौहान)

टू नेशन थ्योरी का सिद्धांत सर्वप्रथम अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने दिया था

सर सैयद अहमद खान 
मई 1875 में सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ में मदरसतुल-उलूमनामक एक मुस्लिम स्कूल स्थापित किया और महारानी विक्टोरिया की वर्षगाँठ के अवसर पर २४ मई 1875 को उन्होंने "मोहम्डन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज" की स्थापना की थी जो बाद में विकसित होकर 1920 में "अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय" बना. मोहम्डन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल थियोडर बैक थे. सर सैयद के प्रयासों से अलीगढ़ क्रांति की शुरुआत हुई, जिसमें शामिल मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओं ने भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने का काम किया. सर सैयद ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय ब्रिटिश साम्राज्य का वफ़ादार बनकर बहुत से यूरोपियों की जानें बचाईं. सर सैयद ने 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना में मुख्य भूमिका अदा  की. क्योंकि सर सैयद का मानना था कि कांग्रेस हिन्दू आधिपत्य पार्टी है.
अलीगढ़ युनिवर्सिटी 
अंग्रेजों के बाद जिसने सर्वप्रथम साम्प्रदायिकता के बुनियाद को मजबूत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की वे सर सैयद अहमद खान ही थेअंग्रेजों और सर सैयद के गठजोड़ ने भारत में राजनीतिक वातावरण को साम्प्रदायिकता के भाव में कलुषित कर दिया. सर सैयद और उनके समर्थकों ने यह कहना शुरू कर दिया कि- "अगर अंग्रेज भारत से चले जायेंगे तो हिन्दू बहुसंख्यक होने की वजह से मुस्लिम हितों का गला घोंट देंगे." अंग्रेजों के प्रति निष्ठा को प्रकट करने के लिए सर सैयद ने  “राजभक्त मुसलमान” नामक एक पत्रिका की शुरुआत की थी. और उसमें इस बात को प्रदर्शित करने का प्रयास किया कि भारतीय मुस्लिमों का हित ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहकर सुरक्षित रह सकता है. इसलिए मुस्लिमों को सरकार के प्रति वफ़ादार रहना चाहिए. सर सैयद ने मुसलमानों की ऐतिहासिक भूमिका और राजनीतिक महत्व को मान्यता देने की मांग करते हुए कहा था कि "सरकारी नौकरियों, विधायिकाओं इत्यादि में मुस्लिमों के लिए आरक्षण होना चाहिए". इस प्रकार सर सैयद ने भारतीय राजनीति में सर्वप्रथम अंग्रेजों के साथ मिलकर भारत में साम्प्रदायिकता की नींव डाली.   
मुहम्मद अली जिन्नाह 
पाकिस्तान बंटवारे में भले ही जिन्ना की मुख्य भूमिका रही हो लेकिन टू नेशन थ्योरी के सिद्धांत को जिन्ना ने नहीं, बल्कि सर सैयद अहमद खान ने दिया था. जो लोग वीर सावरकर को द्विराष्ट्र सिद्धांत (टू नेशन थ्योरी) का जनक बता रहे हैं वो लोग ये जान लें कि वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को हुआ था जबकि सर सैयद ने द्विराष्ट्र का सिद्धांत वीर सावरकर के जन्म से 16 साल पहले 1867 में ही पेश कर दिया था.1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दस साल बाद अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के मुख्य संस्थापक सर सैयद ने हिंदी-उर्दू विवाद के कारण 1867 में टू नेशन थ्योरी सिद्धांत को पेश किया था. इस सिद्धांत के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दुओं और मुसलमानों को दो विभिन्न राष्ट्र करार दिया गया था.

मुख्य स्रोत- https://www.harinayak.in
 विशेष यह लेख भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन” (ज्ञान सदन प्रकाशन) जिसके (लेखक मुकेश बरनवाल) की पुस्तक में से सम्पादित किये गए कुछ अंश पर आधारित है.

रविवार, 26 जनवरी 2020

आप इनसे राष्ट्रप्रेम की उम्मीद क्यों करते हैं

आज दिनांक 26/01/2020 को बाजार ढाली पर स्थित श्रीराम कॉम्प्लेक्स (ज्ञान काँटेवालो के यहां) पर ध्वजारोहण हुआ। वहां ज्ञान वर्मा जी ने एक बहुत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा कि- "इस देश के लोगों में राष्ट्रप्रेम की कमी क्यों है?
ज्ञान वर्मा जी मेरे बड़े भाई हैं, मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ और उसी सम्मान को बरकरार रखते हुए एक बात कहूंगा और वह यह कि-
*जो लोग "भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह" का नारा लगाते हैं, जो लोग इस देश में 100 करोड़ हिंदुओं को 15 मिनट में काटे जाने की बात पर तालियां बजाकर उसका समर्थन करते हैं, जो लोग पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाने वाले और गोलियां चलाने वालों को शहीदों का दर्जा देने की मांग रखते हैं, जो लोग हमारी जाबांज सेना पर गोलियां चलाने वालों को क्रांतिकारी बताते हैं, जो लोग याकूब मेमन को मासूम बताते हैं, जो लोग वीर सैनिकों की शहादत पर दिवाली मनाते हैं और आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाते हैं, जो लोग इस देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को क़ातिल बताते हैं, जो लोग खुलेआम आसाम और कश्मीर को भारत से अलग करने बात कहते हैं, और जो लोग इस देशद्रोही कथन को  बड़ी बेशर्मी के साथ अभिव्यक्ति की आजादी बताते हैं, जो लोग संविधान की रक्षा के नाम पर सड़कों पर जाम लगा देते हैं, जो इस देश में खुलेआम पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, जो इस देश में खुलेआम शरिया कानून लागू करने की वक़ालत करते हैं, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानी मीडिया को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटते हैं, उनको धमकाते हैं। जिन्हें भारत माता की जय बोलने में शर्म आती है, जो वन्देमातरम को राष्ट्रगीत नहीं मानते। जो लोग यही नहीं मानते कि वह इस देश के नागरिक हैं बल्कि उनका मानना है कि उन्होंने इस देश में 800 साल राज किया है, यानी वह इस देश और उसकी जनता को अपना ग़ुलाम मानते हैं*।
उनमें राष्ट्रप्रेम की हमेशा कमी ही रहेगी, वह इसे अपना राष्ट्र मान ही नहीं सकता।
जबकि वह प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म, मज़हब, पंथ, सम्प्रदाय, जाति का हो, यह मानता है कि - *उसकी संस्कृति, उसकी सभ्यता और उसकी आस्था इस देश की मिट्टी से जुड़ी है, जो इस मातृभूमि को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उसकी पवित्र मिट्टी को अपने माथे से लगाता है, जिसे वन्देमातरम बोलने में शर्म नहीं आती, जो भारत माता की जय बोलने से कतराता नहीं है, जो भारत की भूमि को अपनी माँ की गोद मानता है, जो अपने को इस देश का नागरिक मानता है, न कि हुक्मरानों में गिनता है।*
वही इस राष्ट्र से प्रेम करता है, इस राष्ट्र का सम्मान करता है। वही सच्चा देशभक्त है औऱ उसे अपनी देशभक्ति किसी के सामने साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

मुसलमान किस सीमा तक एक ऐसी सरकार की सत्ता को स्वीकारेंगे जिसको बनाने और चलाने वाले हिन्दू होंगे

आज इस देश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध  की आड़ में जिस प्रकार की नफ़रत, हिंसा और देशद्रोही बयानबाजी की जा रही है वह निश्चित रूप से एक बड़ी गहरी साजिश है जिसके पीछे विदेशी ताकतों के साथ-साथ कटटरपंथी विचारधाराओं का भी पूरा समर्थन है.
दरअसल नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने का एकमात्र कारण यह बताया जा रहा है कि इसमें "मुस्लिम" शब्द को क्यों नहीं जोड़ा गया? यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून, २०१९ के अनुसार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिखों जो कि ३१ दिसंबर २०१४ तक भारत में आ गए हैं, को भारत की नागरिकता दे दी जाएगी। इसमें आईने की तरह स्पष्ट है कि नागरिकता केवल उन लोगों को दी जाएगी जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश देश जो इस्लामिक देश हैं, में धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक हैं और इन देशों में उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है. ऐसे में यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इन इस्लामिक देशों में कोई भी मुस्लिम धार्मिक आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है. और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून का कोई संबंध भारत के मुसलमान से नहीं है. उसके बावजूद पुरे देश में जगह-जगह धरने-प्रदर्शन, हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ की गई और लगातार हिन्दु, हिंदुत्व और देश विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं.

इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं इसे जानने के लिए हमें उस मानसिकता को समझना होगा जिसके चलते यह सब हो रहा है. यहाँ यह चर्चा करना प्रासंगिक होगा कि इस्लाम भू-क्षेत्रीय (देश के) नातों को नहीं मानता।इसके रिश्ते-नाते सामाजिक और मज़हबी होते हैं, अतः दैशिक सीमाओं को नहीं मानते। अंतराष्ट्रीय इस्लामवाद का यही आधार है। इसी से प्रेरित हिंदुस्तान का हर मुसलमान कहता है कि वह मुसलमान पहले है और हिंदुस्तानी बाद में। यही है वह भावना जो स्पष्ट कर देती है कि क्यों भारतीय मुसलमानों ने भारत की प्रगति के कामों में इतना कम भाग लिया है, जबकि वे मुस्लिम देशों के पक्ष का समर्थन करने में इतनी सारी शक्ति लगा देते हैं, और क्यों उनके ख़यालों में मुस्लिम देशों का स्थान पहला और भारत का दूसरा है।

डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है-
"यदि अंतराष्ट्रीय इस्लामवाद का यह मज़हबपरस्त रूप एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामी राजनीतिक स्वरूप अपनाने की ओर बढ़ता है तो उसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता" (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया, पृष्ठ 287-91)
इस प्रकार की अपनी वैचारिक प्रेरणाओं के प्रभाव में रहते हुए मुसलमान किस सीमा तक एक ऐसी सरकार की सत्ता को स्वीकारेंगे जिसको बनाने और चलाने वाले हिन्दू होंगे? यह प्रश्न भी डॉ. अम्बेडकर ने उठाया । इस संदर्भ में उन्होंने इस बात का वर्णन किया कि मुसलमान हिंदुओं को किस दृष्टि से देखते हैं।

"मुसलमान की दृष्टि में हिन्दू काफ़िर है और क़ाफ़िर सम्मान के योग्य नहीं होता। वह निकृष्टजन्मा और प्रतिष्ठाहीन होता है। इसीलिए क़ाफ़िर द्वारा शासित देश मुसलमान के लिए दारुल-हर्ब होता है।" (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया,पृष्ठ 294)

स्रोत- (पुस्तक-डॉ. अम्बेकर की दृष्टि में मुस्लिम कटटरवाद, लेखक-एसके अग्रवाल, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ-२६-२७)

ओवैसी साहब, बाप बनने की कोशिश मत करो, बेटा बनकर रहो

आपने एक कहावत जरूर सुनी होगी, जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं। आपने अक्सर देखा होगा कि कुत्ता जब किसी गाड़ी के पीछे भागता है, तो सिर्फ़ भौंकता है, वो क्यों भागता है और क्यों भौंकता है इसपर शायद ही आपने कभी विचार किया हो। दरअसल कुत्ते को गाड़ी से कुछ लेना-देना नहीं होता, लेकिन उसके वजूद और उसकी रफ़्तार से डरता है और इसीलिए वह उसके पीछे भौंकते हुए दौड़ता है।

अकबरुद्दीन ओवैसी साहब ने कहा कि "हमने 800 साल इस देश में हुक़ूमत की है". बेशक की होगी, लेकिन ओवैसी साहब आपने यह हुकूमत उनपर की है जिनके साथ आप जय भीम-जय मीम का नारा लगाते हैं, हमपर नहीं। हम उनकी औलादें हैं जिन्होंने महाभारत की है, जिसके कारण आज भी उस मैदान की मिट्टी लाल ही निकलती है। 
आप कहते हैं कि 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दीजिये तो 100 करोड़ हिंदुओं को काट देंगे। ओवैसी साहब जब 800 साल तक आपकी हुक़ूमत थी, जब पुलिस भी आपकी ही थी और जज भी आपका, तब आपने इन हिंदुओं को जिंदा क्यों छोड़ दिया था।

आप जिन्ना बनना चाहते हैं, शौक से बनिये, हम तो चाहते हैं कि भारत का मुसलमान आपको जिन्ना मान ले लेकिन दिक़्क़त यह है कि इस मुसलमान ने तो उस जिन्ना की नहीं सुनी तो यह आपकी क्या सुनेगा। 

ओवैसी साहब, आप कभी हैदराबाद से बाहर निकले हैं, शायद नहीं। अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर होता है। कभी हैदराबाद से बाहर निकल कर देखिये जनाब, आपको अपनी औक़ात समझ आ जायेगी। 

ओवैसी साहब हमने महाभारत से लेकर अंग्रेजों तक हमेशा हुक़ूमत के ख़िलाफ़ ही लड़ाइयां लड़ी हैं, हमने कारगिल भी लड़ा है और 93,000 आप जैसे लड़ाकुओं को घुटने के बल रेंगने को मजबूर भी किया है।

ओवैसी साहब, हम वीर शिवाजी और महाराणा प्रताप की औलादें हैं, किसी मीरजाफ़र की नाजायज़ संताने नहीं।

आप कहते हैं कि आपके बाप ने ताजमहल बनाया, कुतुबमीनार बनाई, लालकिला बनाया। बेशक बनाया होगा, लेकिन जिस ज़मीन पर आपके बाप ने इमारतें खड़ी की हैं वो ज़मीन आपके बाप की नहीं थी बल्कि वो ज़मीन हमारे बाप-दादाओं की थी। जिन्हें आप अपना बाप बता रहे हैं, उन्हें हम अवैध घुसपैठिया, आक्रांता और लुटेरे के नाम से जानते हैं। और हमें नहीं लगता कि आप जैसे शरीफ़, इज्जतदार और रसूखदार का बाप कोई लुटेरा या घुसपैठिया होगा।

ओवैसी साहब, बाप बनने की कोशिश मत कीजिये, क्योंकि बाप बनकर आज तक कोई नहीं खा सका, अलबत्ता बेटा बनकर सबने खाया है।

आप यह मत समझिए कि हम ख़ामोश हैं तो चीखना नहीं जानते, हम चीखना भी जानते हैं और चीख निकलवाना भी जानते हैं। ये मत समझना कि हमने चूड़ियां पहन रखी हैं।

ओवैसी साहब, जिन्होंने हिंदुस्तान पर हुक़ूमत की थीं वो तो अपनी औलादों को लेकर चले गए, लेकिन आप जैसे "केयरटेकर" यहां छोड़ गए। केयरटेकर का मतलब समझते हैं न आप।

एक शेर अर्ज है, ज़रा ग़ौर फ़रमाइये-

"हमको डरा सको ये तुम में दम नहीं।
तुम हमसे हो, तुमसे हम नहीं।।"

अल्लाह हाफ़िज़

*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

मुस्लिम कानून के अनुसार दुनिया दो पक्षों में बंटी है दारुल इस्लाम और दारुल हर्ब : डॉ. बी आर आंबेडकर (भाग-1)

बाबा भीमराव अम्बेडकर साहेब जैसा विद्वान व्यक्तित्व शायद ही कोई दूसरा हो, परन्तु उनके तमाम विचार अंग्रेजी भाषा में होने के कारण और कांग्रेस और भीम-मीम का नारा लगाने वालों की कुटिल राजनीति के चलते हम सब उन विचारों से पूर्णतया अनभिज्ञ ही रहे हैं।  कांग्रेस-वामपंथ सहित ओवैसी जैसों के इशारों पर तथाकथित बुद्धिजीवियों डॉ. आंबेडकर के विचारों को हिन्दुविरोधी और इस्लाम हितैषी बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इन "बौद्धिक आतंकवादियों" ने एक गहरी साजिश के तहत दलित-पिछड़े और सवर्ण जातियों में विभाजित कर दिया। यहाँ तक कि इन्होने यह  दुष्प्रचार किया कि दलित और हिन्दू दो अलग-अलग समुदाय हैं. और इसके लिए उन्होंने बाबा भीमराव आंबेडकर के उन विचारों का सहारा लिया जिनका कोई संबंध बाबा साहेब से कभी रहा ही नहीं।
अगर आप लोग भी दलित-मुस्लिम एकता के पक्षधर हैं तो बाबा अम्बेडकर के उन विचारों को जानिए जो शायद आप तक इसलिए नहीं पहुंच पाए क्योंकि बाबा साहेब ने उन्हें अंग्रेजी में लिखा था और जो लोग अंग्रेजी जानते थे उन्होंने सच्चाई को हमेशा अपने तक सीमित रखा. लेकिन एस.के. अग्रवाल जैसे देशभक्त बुद्धिजीवियों ने बाबा साहेब के विचारों को हूबहू प्रस्तुत किया है.

मुस्लिम समुदाय की मूलभूत राजनीतिक प्रेरणाओं के बारे में डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं-
"मुस्लिम कानून के अनुसार दुनिया दो पक्षों में बंटी है- दारुल-इस्लाम और दारुल-हर्ब। वह देश दारुल इस्लाम कहलाता है जहां मुसलमानों का राज हो। दारुल-हर्ब वह देश हैं जहां मुसलमान रहते तो हैं, पर वे वहां के शासक नहीं हैं। इस्लामी कानून के अनुसार भारत देश हिंदुओं और मुसलमानों की साझी विरासत नहीं हो सकता। यह मुसलमानों की भूमि तो हो सकती है, पर 'बराबरी से रहते हिंदुओं और मुसलमानों की भूमि' नहीं हो सकती। यह मुसलमानों की ज़मीन भी तभी हो सकती है, जब इसपर मुसलमानों का राज हो। जिस क्षण इस भूमि पर किसी ग़ैर-मुस्लिम का अधिकार हो जाता है, यह मुसलमानों की ज़मीन नहीं रहती। दारुल इस्लाम के स्थान पर यह दारुल हर्ब हो जाती है।"
यह न समझा जाये कि ऐसा विचार कोरी किताबी अभिरुचि की बात है, क्योंकि इसमें मुसलमानों के व्यवहार को प्रभावित करने वाली कारगर शक्ति बनने की क्षमता है। इस विचार ने मुसलमानों के व्यवहार पर उस समय भी काफ़ी प्रभाव डाला था जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्ज़ा किया। ब्रिटिश कब्ज़े से हिंदुओं के मनों में तो कोई पापशंका पैदा नहीं हुई, किंतु मुसलमानों के सामने तुरन्त यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या अब हिंदुस्तान मुसलमानों के निवास करने योग्य देश रह गया है। मुस्लिम समुदाय के भीतर यह चर्चा प्रारम्भ की गई, जो डॉ. टाइट्स कहते हैं, लगभग 50 वर्षों तक चली कि भारत दारुल-हर्ब है या दारुल-इस्लाम? कुछ अधिक उत्साही तत्वों ने सैयद अहमद शाहिद के नेतृत्व में सचमुच ही जिहाद की घोषणा कर दी; उन्होंने मुसलमानों को सिखाया कि हिज़रत करके मुस्लिम राज वाले देशों को चले जाओ, और हिंदुस्तान भर में अपना आंदोलन चलाया।
अलीगढ़ आंदोलन के संस्थापक सर सैयद अहमद ने अपनी सारी प्रतिभा लगाकर मुसलमानों को यह समझाया कि "वे हिंदुस्तान को दारुल-हर्ब केवल इस कारण न माना जाए कि अब यहां मुस्लिम राज नहीं रहा। उन्होंने मुसलमानों से आग्रह किया कि हिंदुस्तान को दारुल-इस्लाम ही मानें, क्योंकि उन्हें अपने धर्म के अनुसार सभी रस्मों-रिवाज़ पूरे करने की आज़ादी है।"

हिज़रत करने का आंदोलन कुछ समय के लिए गया। परन्तु हिंदुस्तान दारुल-हर्ब है यह सिद्धान्त छोड़ नहीं दिया गया। इसका दोबारा प्रचार मुस्लिम-राष्ट्र के झण्डा बरदारों ने ख़िलाफ़त आन्दोलन के समय 1920-21 में किया। इस प्रचार का मुस्लिम समुदाय में अनुकूल प्रभाव भी हुआ। बहुत से मुसलमान न केवल मुस्लिम कानून के अनुसार हिज़रत करने को तैयार हो गए, बल्कि वास्तव में भी भारत में अपने घर छोड़कर अफगानिस्तान की ओर चले गए। यह भी उल्लेखनीय है कि दारुल-हर्ब से अपने आपको मुक्त करने के लिए मुसलमानों के पास केवल हिज़रत ही एकमात्र मार्ग नहीं है। मुस्लिम कानून का एक और आदेश है-जिहाद छेड़ने का, जिसके द्वारा "मुस्लिम शासक कर्तव्य-बद्ध है कि वह (युद्ध के द्वारा) इस्लाम के राज को तब तक फैलाये जब तक कि पूरी दुनिया उसकी हुक़ूमत में नहीं आ जाती. सारे संसार को जब दो पक्षों में बांट दिया है।-एक दारुल इस्लाम और दूसरा दारुल हर्ब। तो सभी देश दो में से किसी एक श्रेणी में आएंगे ही।

सिद्धान्ततः, दारुल हर्ब को दारुल इस्लाम में बदलना हर उस मुस्लिम शासक का कर्तव्य है जिसमें ऐसा करने का सामर्थ्य है।" और, जिस प्रकार मुसलमानों के हिज़रत करने के दृष्टांत मिलते हैं, उसी प्रकार ऐसे भी उदाहरण हैं जब उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में झिझक नहीं की। 
सच्चाई जानने के इच्छुक व्यक्ति यदि 1857 के विद्रोह के इतिहास पर पारखी दृष्टि डालेंगे तो पाएंगे कि वह विद्रोह एक अंश में मुसलमानों द्वारा ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध जिहाद की घोषणा भी था। मुसलमानों के लिए यह विद्रोह उसी बगावत की पुनरावृत्ति थी, जो सैयद अहमद शाहिद ने फैलाई थी। उसने कई दशकों तक मुसलमानों को यह समझाया था कि ब्रिटिश हुकूमत हो जाने के कारण हिंदुस्तान दारुल हर्ब हो गया है। 1857 में मुसलमानों ने तो विद्रोह करके भारत को फिर से दारुल इस्लाम में परिणत करने का प्रयास किया था (हिंदुओं के लिए भले ही वह देश की स्वाधीनता का संग्राम रहा हो).

जो भी हो यह बात निश्चित है कि हिंदुस्तान पर यदि शत-प्रतिशत मुस्लिम शासन नहीं है तो यह दारुल हर्ब ही कहलायेगा। और मुस्लिम सिद्धान्तों के अनुसार यहां मुसलमानों का जिहाद छेड़ना उचित होगा। वे जिहाद छेड़ ही नहीं सकते, बल्कि जिहाद की सफलता के लिये किसी विदेशी मुस्लिम शक्ति को सहायता के लिए भी बुलवा भी सकते हैं, और इसी प्रकार यदि भारत के विरुद्ध कोई विदेशी मुस्लिम शक्ति ही जिहाद छेड़ती है तो भारत का मुसलमान उसके प्रयास की सफलता के लिए सहायता भी कर सकते हैं।

स्रोत : (पुस्तक- डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में मुस्लिम कटटरवाद, लेखक एस.के अग्रवाल, प्रकाशन सुरुचि, पृष्ठ संख्या २६-२७) 

*संकलन*-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"

बुधवार, 22 जनवरी 2020

क्या भारत में इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है : २०२० से १९४७ की ओर (भाग -२)

अलाउद्दीन खिलजी ने जब एक क़ाज़ी से सवाल किया- इस्लामी क़ानून के अंतर्गत हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी?

क़ाज़ी ने उत्तर दिया-
"उन्हें (हिन्दुओं को ) लगान भरने वाला कहा जाता है, और जब कोई लगान अधिकारी उनसे चांदी मांगे, उन्हें बिना कोई प्रश्न उठाये पूरी विनम्रता और सम्मान के साथ सोना भेंट करना चाहिए। यदि अधिकारी उनके मुहं में गंदगी फेंकें तो उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी उसे लेने के लिए मुहं चौड़ा खोल देना चाहिए। धिम्मी (गैर-मुस्लिम) की असली नीच स्थिति इस प्रकार विनम्रता से धन भेंट करने और अपने मुहं में गंदगी स्वीकारने से ही प्रकट होती है. इस्लाम का महिमा गान ही कर्तव्य है और मज़हब के प्रति उपेक्षा भाव ओछापन है. खुदा उन्हें हिक़ारत से देखता है, जैसा कि उसने कहा है, उन्हें दबाकर रखो". हिन्दुओं को अपमानित बनाकर रखना तो ख़ासकर ही मज़हब का कर्तव्य है, क्योंकि वे पैगंबर के सबसे पुराने जिद्दी दुश्मन हैं, और क्योंकि पैगंबर ने हमें उनको क़त्ल करने का हुक्म यह कहकर दिया है कि 'उन्हें इस्लाम कबूल कराओ या मार दो' और गुलाम बनाओ तथा उनकी धन-सम्पत्ति लूट लो'. कोई और नहीं बल्कि स्वयं महान सिद्धांतकार हनीफाह ने, जिनके मत के हम सब अनुयायी हैं, हिन्दुओं पर जज़िया लगाने की सहमति दी है. अन्य विचारशाखाओं के उलेमा तो किसी अन्य मार्ग की अनुमति नहीं देते, सिवाय "मौत या इस्लाम" के।"  

       (डॉ. टाइटस की पुस्तक "इंडियन इस्लाम" में उद्घृत)

हमारा दुर्भाग्य है कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक़ नहीं सीखा। हजारों वर्षों की ग़ुलामी के बावजूद भी हम अपने इतिहास से कुछ सीखने की कोशिश कभी नहीं करते। हम हमेशा वर्तमान में ही जीते हैं, हमने कभी अपनी ऐतिहासिक भूलों से सबक़ लेकर अपने भविष्य को सुधारने की चेष्टा नहीं की. हम हमेशा से ही अहिंसा, नैतिकता और कर्तव्यों का पाठ पढ़ते और पढ़ाते रहे, लेकिन 'शठे शाठ्यम समाचरेत'  के सिद्धांत को हमने भुला दिया। हमने गांधीवाद को पढ़ा लेकिन चाणक्यनीति को कभी समझने की कोशिश नहीं की.

इतिहास सही मायने में शायद इसीलिए लिखा जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां उससे कुछ सीख सकें, लेकिन हमारा एक और दुर्भाग्य देखिये कि वामपंथियों और कांग्रेस ने हमारे सामने जो इतिहास रखा उसने हमें हमारे ही दुश्मनों का गुणगान करने पर मजबूर कर दिया। हम अकबर को महान और राणा प्रताप को बागी समझने लगे.
आज की पीढ़ी को यह जानने का पूरा हक़ है कि वामपंथी और कांग्रेस ने जो इतिहास हमें पढ़ाया है वह गुलाम मानसिकता पर झूठ का मुलम्मा है, जबकि सच्चाई अभी भी हमसे कोसों दूर है.

हमें जिस छद्म धर्म-निरपेक्षता की चाशनी पिलाई जाती है उसे हम कभी समझ ही नहीं सके. कांग्रेसियों और वामपंथियों ने सेक्युलरिज्म की आड़ में इस्लामिक कटटरपंथी विचारधारा को सुरक्षा-चक्र ही प्रदान किया है. और हमने सेक्युलरिज्म की इस विचारधारा को खाद-पानी देकर इसी आशा में पालने-पोसने का कार्य किया है, और उसे बढ़ते हुए देखकर भी इसी आशा में जी रहे हैं कि शायद कभी इस पेड़ पर मानवता, शांति और सौहार्द के फल-फूल भी लगेंगे और हम अपने देश को फलता-फूलता हुआ देख सकेंगे। क्रमशः 

भाग तीन कल पढ़िए 

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

क्या भारत में इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है :२०२० से १९४७ की ओर (भाग-1)

आज यह देश पूरी तरह से दो विचारधाराओं में बंटा हुआ है. एक विचारधारा उन लोगों की है जिनके लिए देश और देश का  संविधान पहले है, और दूसरी विचारधारा उन लोगों की है जिनके लिए उनका मज़हब और उनकी क़ौम सर्वोपरि है. उनको देश और संविधान से कोई सरोकार नहीं है.

हमने इस शीर्षक को ऐसे ही नहीं लिख दिया बल्कि इसके पीछे कई ऐतिहासिक कारण और घटनाक्रम हैं. हमें उनको गहराई से समझना होगा, उसके बाद ही शायद हम किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँच पाएंगे। यहाँ हमने कटटरपंथी विचारधारा के साथ-साथ राजनैतिक विचारधाराओं का समागम  करने का प्रयास किया है.
आम मुसलमान की विचारधारा और उसकी सोच का कोई महत्व न आज है और न कल था. क्योंकि आम मुस्लिम या हिन्दू केवल अपने खाने-कमाने और घर-गृहस्थी के दायरे से बाहर कभी नहीं जा पाता है. इसलिए जब भी हम हिन्दू या मुस्लिम की बात करते हैं तो वहां हमारा आशय मात्र और मात्र उन हिन्दू-मुसलमानों से होता है जो सियासत से ताल्लुक़ रखते हैं या सियासती मामलों में अपना दख़ल रखते हैं.

२६ मार्च १९४० को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में मौहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था-
"भारत के मुसलमान भारत की आजादी का असंदिग्ध रूप से समर्थन करते हैं. पर यह आजादी पूरे भारत की होनी चाहिए, न कि केवल एक वर्ग की. यदि हिन्दू आजाद हो जाएँ और उसके बाद मुसलमान उनके गुलाम होकर रह जाएँ, तो यह ऐसी आजादी नहीं जिसके लिए मुसलमानों को संघर्ष करने के लिए कहा जाये. किसी भी अर्थ में मुसलमान स्वयं में एक राष्ट्र हैं. यदि भारत की (आपसी संबंधों की) समस्या को मात्र दो समुदायों के बीच की ही समस्या माना गया तो यह हल नहीं होगी। यह दो राष्ट्रों के बीच की समस्या है और इससे इसी प्रकार निपटा जाना चाहिए। हिन्दू और मुसलमान कभी एक साझी राष्ट्रीयता विकसित कर पाएंगे, यह एक कोरा सपना है. हिन्दुओं और मुसलमानों के धार्मिक तत्वज्ञान, सामाजिक रीति-रिवाज़ और साहित्य अलग-अलग हैं. उनमें न आपस में शादी-ब्याह होते हैं, न आपसी खानपान। वास्तव में, उनका संबंध दो अलग-अलग सभ्यताओं से है जो एक-दुसरे से बिलकुल विपरीत विचारों और धारणाओं पर आधारित हैं. यह स्पष्ट है कि हिन्दू और मुस्लिम अपनी प्रेरणाएं इतिहास के अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त करते हैं. इनके महाकाव्य अलग हैं, वीर पुरुष अलग हैं, गाथाएं अलग हैं. ज्यादातर एक का वीर पुरुष दूसरे का शत्रु है, और यही बात उनकी जय-पराजयों में भी है. ऐसी दो अलग-अलग कौमों को एक राज्य के नीचे जबरदस्ती बैठा देने से, जहाँ कि एक तबक़ा बहुसंख्यक है और दूसरा अल्पसंख्यक, केवल कड़वाहट ही बढ़ेगी और ऐसे राज्य का शासन चलाने के लिए जो भी ताना-बाना तैयार किया जायेगा, वह आख़िरकार नष्ट ही हो जायेगा। "राष्ट्र" की किसी भी परिभाषा से मुसलमान एक अलग ही राष्ट्र कहलायेंगे, और उनकी अपनी सरज़मीं, अपना इलाक़ा और अपना राज्य होना ही चाहिए। अतः मुस्लिम-भारत कोई ऐसा संविधान स्वीकार नहीं करेगा जिसका एकमात्र परिणाम बहुसंख्यकों का स्थाई शासन होने वाला हो."
स्रोत : (स्ट्रगल फॉर पाकिस्तान, आई एच कुरैशी, कराची, १९८७, पृष्ठ १२८-२९) 
कल पढ़िए दूसरा भाग 

संकलन- मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री" 

सोमवार, 20 जनवरी 2020

भारत का मुसलमान CAA विरोध क्यों कर रहा है

"सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान" हमारा कहने वाले अल्लामा इक़बाल ने कहा था *"हिंदुस्तानी मुसलमानों को, जो संख्या में एशिया के दूसरे सभी देशों के मुसलमानों को एक साथ जोड़ने पर भी अधिक है, खुद को इस्लाम की सबसे बड़ी जायदाद मानना चाहिए. यानी ऐसे हिंदुस्तानी मुसलमानों को एकरूप होकर दुनिया भर के मुसलमानों के बीच बंधुत्व के सन्देश का वाहक मानना चाहिए।"*

इस देश में इस्लामिक कट्टरपंथी या कहिए छद्मधर्मनिरपेक्ष ताकतें लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रश्रय इसलिए नहीं देतीं क्योंकि उनका यह सोचना है कि यदि इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर कोई सरकार की स्थापना होगी तो उसमें हिन्दू बहुमत में होंगे और वे निश्चित रूप से अल्पसंख्यकों के विरुद्ध मनमाने तरीके से प्रस्ताव पारित करा देंगे.
भारत के मुसलमानों की एक दूसरी और सबसे बड़ी समस्या उनके धर्म का केंद्र भारत से बाहर विदेश में होना है। उनके धार्मिक निर्णय प्रत्यक्ष रूप से तुर्की या अन्य केंद्रों से प्रभावित होते हैं। हिन्दू धर्म पूरी तरह से भारत का अपना धर्म है और उसका केंद्र भारत में ही है। न तो वह किसी एक व्यक्ति को अपना सर्वेसर्वा या उपदेशक मानता है और न ही उसका कोई केंद्रीय चिन्ह है। इसके ठीक विपरीत इस्लाम में पवित्र भूमि, स्थान, पैग़म्बर, राज्य, व्यक्ति आदि विदेशों में थे। 
हिंदुओं के तीर्थस्थल, उनके ऋषि-मुनि, महापुरुष, उनके पूर्वज और उनकी धार्मिक मान्यताएं इसी भारतवर्ष में हैं, दूसरे शब्दों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता ही सनातन हिन्दू संस्कृति है। इसलिए भारत भूमि को प्रत्येक हिन्दू नमन करता है और वन्देमातरम कहता है।
हिंदूवाद वास्तव में राष्ट्रवाद है, और वन्देमातरम राष्ट्रगान माना जा सकता है। प्रत्येक हिन्दू भारत को अपनी माँ और भारत भूमि को अपनी माँ की गोद समझता है। इसीलिए उसकी वंदना करता है।

इसके ठीक उलट मुस्लिम समाज जिन मुगलों को अपना पूर्वज मानता है वह भारत के लिए लुटेरे और आक्रांता हैं, जिस संस्कृति को वह अपनाये हुए है वह भारतीय संस्कृति के बिलकुल विपरीत है। मुसलमानों की आस्था का केंद्र विदेशों में है, उसकी तीर्थयात्रा और उसके पीर-पैगम्बर इस भारत में नहीं जन्मे बल्कि या तो विदेशों में जन्मे या फिर विदेशी भूमि से भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने आये थे।
भारत का मुसलमान नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध केवल इसलिए कर रहा है क्योंकि उसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा उनके पास इसका विरोध करने का कोई अन्य कारण नहीं है। जबकि नागरिकता संशोधन कानून में केवल उन्हीं लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है जो लोग पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किये जा रहे हैं और वहां पर अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे हैं और 31 दिसम्बर 2014 तक भारत में प्रवेश कर चुके हैं।
ऐसे में यह समझना कोई कठिन नहीं है कि आज इस देश में कट्टरपंथी ताकतों द्वारा जो हालात पैदा किये जा रहे हैं, वह निश्चित रूप से उसी विचारधारा से उपजे हैं जो कि अल्लामा इक़बाल ने दी थी।

क्या संविधान के स्वयंभू रक्षकों को न्यापालिका पर भरोसा नहीं है

जब भी विपक्ष के किसी नेता या नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध कर रहे किसी प्रदर्शनकारी से आप यह पूछेंगे कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश की जनता को यह आश्वासन दिया है कि CAA से भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है, तब यह विरोध-प्रदर्शन क्यों? तब वह तपाक से एक ही जवाब देता है कि हमें मोदी जी की बातों पर भरोसा नहीं है, क्योंकि मोदी झूठ बोलता है। दूसरा सवाल अगर उनसे यह पूछा जाए कि आप यह धरना-प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? तो हाथों में पत्थर लिए या "फ्री कश्मीर" का बैनर गले में लटकाए घूमता या "भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह" जैसे देशद्रोही नारे लगाता टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य भी आपको यही जवाब देगा कि हम संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह इसे क्रांति का नाम भी दे सकता है।

परन्तु क्या किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर है कि जब संसद जिसे लोकतन्त्र का मंदिर माना जाता है, और विधायिका जिसे लोकतंत्र का एक मजबूत स्तम्भ माना जाता है, ने इस कानून को बहुमत से पास कर दिया और देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने भी उसपर अपनी सहमति की मोहर लगा दी।
तब उस कानून पर विश्वास क्यों नहीं किया जा रहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी धर्म, जाति, मत, मज़हब, या सम्प्रदाय विशेष के प्रधानमंत्री नहीं है बल्कि वह संवैधानिक व्यवस्था से चुनी हुई सरकार के मुखिया हैं जिसे इस देश की जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है।
इसके बावजूद कुछ लोगों, और कुछ हठी और दम्भी मुख्यमंत्रियों ने सर्वोच्च न्यायालय में CAA के ख़िलाफ़ याचिका डाली हुई है जिसपर माननीय सर्वोच्च न्यायालय को आने वाली 22 जनवरी को फ़ैसला लेना है।
तब ऐसे में यह प्रश्न स्वावभाविक ही है कि आखिर संविधान के स्वयम्भू रक्षक बने पाखंडियो को क्या इस देश की न्यायपालिका पर भी भरोसा नहीं है?


मोदी झूठ नहीं बोलता है, मोदी ने जो वादे इस देश की जनता से किये थे, उन्हीं वादों को पूरा करने के लिए वह प्रतिबद्ध है। मोदी से आप सत्य की ही अपेक्षा करें चूंकि वह एकमात्र ऐसा व्यक्तित्व है जो बिना किसी भेदभाव के, बिना के किसी पूर्वाग्रह के इस देश की एक अरब पैंतीस करोड़ जनता के हितों का ध्यान करते हुए इस देश में शांति, सुरक्षा और सौहार्द का वातावरण बनाये रखने का हरसम्भव प्रयास कर रहा है।

पाकिस्तान में आमतौर पर मुसलमान दलितों द्वारा तैयार भोजन नहीं खाते हैं

पाकिस्तान के सिंध में जमींदारों, या वाडेरों का एक छोटा वर्ग, अधिकांश भूमि का मालिक है, और कुछ सम्पदा हजारों एकड़ में चलती हैं। सिंधी किसान या हरिस की स्थिति, जिसमें मुस्लिमों के साथ-साथ दलित भी शामिल हैं, दयनीय हैं। कई लोग तो मिट्टी के झोपड़ों के भी मालिक नहीं हैं जिनमें वे रहते हैं। पाकिस्तान की लगभग 3 मिलियन आधिकारिक रूप से वर्गीकृत 'हिंदू' आबादी में से कुछ 80 प्रतिशत दलित हैं। देश में 42 अलग-अलग दलित जातियां हैं, जिनमें सबसे अधिक भील, मेघवाल, ओड और कोहली हैं। ज्यादातर पाकिस्तानी दलित दक्षिणी पंजाब और बलूचिस्तान में कम संख्या में रहते हैं। वे मुख्य रूप से गरीब हैं और बड़े पैमाने पर निरक्षर हैं और मुख्य रूप से कृषि श्रमिकों, मेनियल्स और क्षुद्र कारीगरों के रूप में एक दयनीय अस्तित्व को बाहर निकालते हैं भूमि का अधिकांश हिस्सा अनुपस्थित जमींदारों के पास है जो हैदराबाद और कराची, सिंध के सबसे बड़े शहरों में रहते हैं।

सिंध के अधिकांश निचले इलाकों में दलितों की संख्या 70 प्रतिशत तक है। शायद ही कोई दलित किसी भी भूमि का मालिक हो और वे पूरी तरह से अपने अस्तित्व के लिए जमींदारों पर निर्भर हैं। महिलाएं रोजाना 60 रुपये और पुरुषों से बीस रुपये अधिक कमाती हैं। सिंध के कुछ हिस्सों में दलित बंधुआ मजदूरों के रूप में काम करते हैं, उन्हें शक्तिशाली जमींदारों की निजी सेनाओं द्वारा भागने से रोका जाता है। दलितों के लिए कोई विशेष सरकारी विकास योजनाएं नहीं हैं। ग्राम भोजनालयों में दलितों के लिए अलग बर्तन हैं, और छोटे शहरों में अलग दलित रेस्तरां हैं। आमतौर पर, मुसलमान दलितों द्वारा तैयार भोजन नहीं खाते हैं। जमींदारों द्वारा दलित महिलाओं के अपहरण के मामले आम हैं। अक्सर यह महिलाओं में उनकी इच्छा के खिलाफ इस्लाम में परिवर्तित होने के परिणामस्वरूप होता है। दलित छात्र नियमित रूप से अपने सहपाठियों द्वारा स्कूल में ताना मारे जाने की शिकायत करते हैं, जो उनकी गरीबी के अलावा, उनमें से अधिकांश को जल्द ही बाहर निकालने के लिए मजबूर करता है। 

बाबरी मस्जिद के विनाश और भारत में मुसलमानों के परिणामस्वरूप नरसंहार के मद्देनजर, पाकिस्तान के दलितों की स्थिति और भी अनिश्चित हो गई है। कुछ दलितों के साथ ही पिछड़ी जाति के हिंदुओं को सिंध में भीड़ द्वारा मार दिया गया था और कई मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था। यहाँ कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों का प्रभाव है जो हिंदू विरोधी और भारत विरोधी हैं। इन सबने दलितों को बोलने से और भी अधिक डरा दिया है। पाकिस्तान के एक दलित मजदूर कहते हैं, 'यहाँ हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भारत में मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। हर बार जब वहां मुसलमानों पर हमला होता है, तो हमें पाकिस्तानी दलित हिंदुओं को खामियाजा भुगतना पड़ता है। हमारा भविष्य गंभीर रूप से भारत और पाकिस्तान और दक्षिण एशिया में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंधों पर निर्भर करता है। कई पाकिस्तानी दलित मूल रूप से राजस्थान के हैं, जो अब 1947 से पहले पाकिस्तान चले गए हैं। इसलिए, स्वाभाविक रूप से वे भारत में अपने रिश्तेदारों से जुड़ना चाहते हैं, और अल्पसंख्यकों के बीच बढ़ते डर ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है।'

राजस्थान और गुजरात की सीमा से लगे पाकिस्तान के एकमात्र हिंदू थार पारकर जिले में, दलितों की स्थिति समान रूप से दयनीय है। सिंध के अन्य हिस्सों की तरह, उन्हें भी अक्सर बंधुआ मजदूरों के रूप में उपयोग किया जाता है। निरंतर भेदभाव के खिलाफ विरोध के रूप में, कई दलित ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं, विदेशी-वित्त पोषित मिशनरी समूह इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। दिलचस्प बात यह है कि दलितों के बीच काम करने वाले इस्लामिक मिशनरी संगठन नहीं हैं।
1998 की पाकिस्तान की राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार, अनुसूचित जाति और दलित संख्या 330,000 है और मुख्य रूप से दक्षिणी पंजाब की सीमावर्ती भारत के पांच जिलों में रहते हैं। पाकिस्तान की दलित महिलाएं यौन-शोषण, अपहरण और जबरन धर्म-परिवर्तन का शिकार होती हैं। दलित महिलाएँ अपहरण के बारे में बताती हैं जिससे मुस्लिम परिवारों में जबरन धर्म-परिवर्तन और विवाह होता है। महिलाओं के परिवारों की कहानियों से पता चलता है कि धार्मिक रूपांतरण महिलाओं के उनके परिवारों में लौटने और पुलिसकर्मियों द्वारा कार्रवाई में बाधा है। सिंध प्रांत में लगभग 1.8 मिलियन लोग बंधुआ मजदूरी में रहते हैं, जिनमें से अधिकांश दलित मूल रूप से भारत के हैं। कम शिक्षा के स्तर का संयुक्त प्रभाव, पारिवारिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बहिष्करण और संपत्ति के अधिकारों की कमी दलित महिलाओं को इस श्रम शोषण और बंधन के लिए असुरक्षित बनाती है। महिला बंधुआ मजदूरों का बलात्कार व्यापक और हिंसक है, और थोड़ा कानूनी सहारा है।


note- विभिन्न वेबसाइट से संकलित 

शनिवार, 18 जनवरी 2020

हिन्दू बहुसंख्या में हैं इस नाते उनके दृष्टिकोण का महत्व होना ही चाहिए-डॉ. बी.आर. आंबेडकर

मेरे तर्कों का बहुत बड़ा भाग हिंदुओं को सम्बोधित है। इसका एक स्पष्ट कारण है, जो किसी की भी समझ में नहीं आएगा। हिन्दू बहुसंख्या में हैं इस नाते उनके दृष्टिकोण का महत्व होना ही चाहिए। उनकी आपत्तियों को, चाहे वह तर्कसम्मत हों या भावुकतापूर्ण, दूर किये बिना (हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की) समस्या का शांतिपूर्ण हल सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त, अपने तर्कों को अधिकांशतः हिंदुओं को सम्बोधित करने के कुछ विशेष कारण भी हैं जो दूसरे लोगों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं होंगे।
मैं अनुभव करता हूँ कि जो हिन्दुजन अपने बांधवों के भाग्यों का पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं। वे कुछ खोखले भ्रमजालों की चमक ओढ़े घूम रहे हैं जिनके परिणाम, मुझे भय है, हिंदुओं के लिए घातक सिद्ध होंगे।

हिंदुओं को यह बोध नहीं होता, यद्दपि यह अनुभव सिद्ध है कि हिन्दू व मुसलमान न तो स्वभाव में एक हैं, न आध्यात्मिक अनुभव में और न ही राजनीतिक एकता की इच्छा में, और जिन कुछ क्षणों में वे सौहार्द के से सम्बन्धों की ओर बढ़े, तब भी यह सम्बन्ध तनावपूर्ण थे। फिर भी हिन्दू इसी भ्रम को प्रसन्नतापूर्वक अपनाए रखेंगे कि पिछले अनुभवों के बावजूद, हिंदुओं व मुसलमानों में घनिष्ठता बनाने के लिए दोनों के बीच लक्ष्यों, भावनाओं व नीतियों की व्यापक एवं वास्तविक एकता की पर्याप्त मात्रा बची हुई है।

इन्हीं कारणों से मैंने अपने तर्कों का इतना बड़ा भाग हिंदुओं को सम्बोधित किया है। कपोल-कल्पित भावुकताओं और धारणाओं की मोटी, अभेद्य दीवार ने हिंदुओं तक नए प्रकाश की किरणों को पहुंचने से रोक रखा है। इसी कारण मैंने अपनी बैटरियां चालू करने की गम्भीर आवश्यकता महसूस की। मैं नहीं जानता कि इस दीवार में दरारें पैदा करके अंधेरे कमरे में प्रकाश पहुंचाने में कितना सफल हुआ हूँ। मुझे सन्तोष है कि मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। हिन्दू यदि अपना कर्तव्य नहीं निभाते तो वे वही परिणाम भुगतेंगे जिनके लिए वे आज यूरोप पर हंस रहे हैं, और यूरोप की ही भांति नष्ट भी हो जाएंगे।

स्रोत : (डॉ. अम्बेडकर कृत "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" के उपसंहार से, पृष्ठ 349-42)

‘दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकता’ का वह भयानक सच जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया

भारत में दलित-मुस्लिम एकता के प्रथम पैरोकार और पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल जिन्होंने जिन्ना के पाकिस्तान में दलित समाज के उत्थान के सपने देखे थे. मंडल ने शेडयूल कास्ट फेडरेशन और मुस्लिम लीग में समझौता किया था. जोगेंद्र नाथ मंडल नमोशूद्राय जाति से ताल्लुक रखते थे. जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री नियुक्त किया था. लेकिन पाकिस्तान में जिस प्रकार से दलित समाज के साथ धोखा किया गया और उनके साथ जो अत्याचार किये गए जो कि आज तक बदस्तूर चल रहे हैं, उनसे दुखी होकर जोगेंद्र नाथ मंडल ने २० फरवरी १९५० को तत्कालीन राष्ट्रपति को अपना जो इस्तीफा सौंपा था, उसके कुछ अंशों को यहाँ प्रस्तुत किया गया है. 
"बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी। दोनों ही पिछड़ेमछुआरे और अशिक्षित थे। मुझे आश्वस्त किया गया था मुस्लिम लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा। हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहार्द बढ़ेगा। इन्हीं कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया। 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने 'डायरेक्ट एक्शन डेमनाया। जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए। कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओं की हत्याएं हुईंसैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया। हिंदू महिलाओं का बलात्कारअपहरण किया गया। इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मैंने हिन्दुओं के भयानक दुःख देखे जिनसे अभिभूत हूँ लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा।14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रीमंडल में शामिल किया गया। मैंने ख्वाजा नजीमुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगों को शामिल करने का अनुरोध किया। उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया। लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मैं बहुत हताश हुआ। गोपालगंज के पास दीघरकुल (Digharkul ) में एक मुस्लिम की झूठी शिकायत पर स्थानीय नमोशूद्राय लोगों के साथ क्रूर अत्याचार किया गया। पुलिस के साथ मुसलमानों ने मिलकर नमोशूद्राय समाज के लोगों को पीटाघरों में छापे मारे। एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका मौके पर ही गर्भपात हो गया निर्दोष हिंदुओं, विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगों पर सेना और पुलिस ने भी हिंसा को बढ़ावा दिया। सयलहेट जिले के हबीबगढ़ में निर्दोष पुरुषों और महिलाओं को पीटा गया। सेना ने न केवल लोगों को पीटा बल्कि हिंदू पुरुषों को उनकी महिलाओं को सैन्य शिविरों में भेजने के लिए मजबूर किया गया ताकि वो सेना की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया थामुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिये आश्वस्त किया गया लेकिन रिपोर्ट नहीं आई। खुलना (Khulna) जिले कलशैरा (Kalshira) में सशस्त्र पुलिससेना और स्थानीय लोगों ने निर्दयता से पूरे गाँव पर हमला किया। कई महिलाओं का पुलिससेना और स्थानीय लोगों द्वारा बलात्कार किया गया।मैंने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया। जब मैं कलशैरा में आया तो देखा यहाँ जगह उजाड़ और खंडहर में बदल गयी।यहाँ करीबन 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया। मैंने तथ्यों के साथ आपको सूचना दी। ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। ढाका नारायणगंज और ढाका चंटगाँव के बीच ट्रेनों और पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओं की हत्याओं ने मुझे गहरा झटका दिया। मैंने ईस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर दंगा प्रसार को रोकने के लिये जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया।20 फरवरी 1950 को मैं बरिसाल (Barisal) पहुंचा। यहाँ की घटनाओं के बारे में जानकर में चकित था। यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओं को जला दिया गया था। उनकी बड़ी संख्या को खत्म कर दिया गया। मैंने जिले में लगभग सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मधापाशा(Madhabpasha) में जमींदार के घर में 200 लोगों की मौत हुई और 40 घायल थे। एक जगह है मुलादी (Muladi ), प्रत्यक्षदर्शी ने यहाँ भयानक नरक देखा। यहाँ 300 लोगों का कत्लेआम हुआ। वहां गाँव में शवों के कंकाल भी देखे, नदी किनारे गिद्द और कुत्ते लाशों को खा रहे थे। यहाँ सभी पुरुषों की हत्याओं के बाद लड़कियों को आपस में बाँट लिया गया। राजापुर में 60 लोग मारे गये। बाबूगंज(Babuganj) में हिन्दुओं की सभी दुकानों को लूटकर आग लगा दी गयी. ईस्ट बंगाल के दंगे में अनुमान के मुताबिक 10,000 लोगों की हत्याएं हुईं। अपने आसपास महिलाओं और बच्चों को विलाप करते हुए मेरा दिल पिघल गया। मैंने अपने आप से पूछा, 'क्या मैं इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था।पश्चिम बंगाल में आज क्या हालात हैं विभाजन के बाद लाख हिन्दुओं ने देश छोड़ दिया है। मुसलमानों द्वारा हिंदू-वकीलोंहिंदू-डॉक्टरोंहिंदू-व्यापारियोंहिंदू-दुकानदारों के बहिष्कार के बाद उन्हें आजीविका हेतु पलायन करने के लिये मजबूर होना पड़ा। मुझे मुसलमानों द्वारा पिछड़ी जाति की लडकियों के साथ बलात्कार की जानकारी मिली है। हिन्दुओं द्वारा बेचे गये सामान की मुसलमान खरीददार पूरी कीमत नहीं दे रहे हैं। तथ्य की बात यह है कि पाकिस्तान में न कोई न्याय हैन कानून का राज इसीलिए हिंदू चिंतित हैं। पूर्वी पाकिस्तान के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान में भी ऐसे ही हालात हैं। विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब में लाख पिछड़ी जाति के लोग थे उनमे से बड़ी संख्या को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित किया गया है। मुझे एक लिस्ट मिली है जिसमें 363 मंदिरों और गुरूद्वारे मुस्लिमों के कब्जे में हैं। इनमें से कुछ को मोची की दुकानकसाईखाना और होटलों में तब्दील कर दिया गया है. मुझे जानकारी मिली है सिंध में रहने वाली पिछड़ी जाति की बड़ी संख्या को जबरन मुसलमान बनाया गया है। इन सबका कारण एक है- हिंदू धर्म को मानने के अलावा इनकी कोई गलती नहीं है। 'पाकिस्तान की पूर्ण तस्वीर तथा उस निर्दयी एवं कठोर अन्याय को एक तरफ रखते हुएमेरा अपना तजुर्बा भी कुछ कम दुखदायीपीड़ादायक नहीं है। आपने अपने प्रधानमंत्री और संसदीय पार्टी के पद का उपयोग करते हुए मुझसे एक वक्तव्य जारी करवाया थाजो मैंने सितम्बर को दिया था। आप जानते हैं कि मेरी ऐसी मंशा नहीं थी कि मैं ऐसे असत्य, और असत्य से भी बुरे अर्धसत्य भरा वक्तव्य जारी करूं। जब तक मैं मंत्री के रूप में आपके साथ और आपके नेतृत्व में काम कर रहा था मेरे लिये आपके आग्रह को ठुकरा देना मुमकिन नहीं था पर अब मैं इससे ज्यादा झूठे दिखावे तथा असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता। मैंने यह निश्चय किया कि मैं आपके मंत्री के तौर पर अपना इस्तीफे का प्रस्ताव आपको दूँजो कि मैं आपके हाथों में थमा रहा हूँ। मुझे उम्मीद है आप बिना किसी देरी के इसे स्वीकार करेंगे। आप बेशक इस्लामिक स्टेट के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस पद को किसी को देने के लिये स्वतंत्र हैं।"
       -जोगेंद्र नाथ मंडल (प्रथम कानून मंत्री, पाकिस्तान)
जिन्ना की मौत के बाद मंडल अक्टूबर, 1950 को लियाकत अली खां के मंत्रीमंडल से त्याग-पत्र देकर भारत आ गये ।
पाकिस्तान में मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल भारत आ गये । कुछ वर्ष गुमनामी की जिन्दगी जीने के बाद अक्टूबर, 1968 को पश्चिम बंगाल में उन्होंने अंतिम सांस ली।