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देश के गद्दारों को गोली मारो....को, नारे पर आपत्ति क्यों?

आपने सुना या देखा भी होगा कि जब किसी भी आदमखोर जानवर का शिकार किया जाता है तो उसे पहले खुले में लाया जाता है, ताकि उसको मारने के चक्कर में कोई निर्दोष जानवर न मारा जाए। इस आदमखोर को बाहर निकालने के लिए हांका लगाया जाता है जिसमें कुछ लोग ढोल-नगाड़े पीटते हुए ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करते हैं, उस शोर को सुनकर आदमखोर अपने गुप्त स्थान से निकलकर बाहर आ जाता है। और शिकारी उस आदमखोर को आसानी से मार डालता है।

आज जो एक नारा "देश के गद्दारों को, गोली मारो.....को" लगाया जा रहा है, उसे सुनकर जो लोग अपने-अपने दड़बों से बाहर आ रहे हैं, वही गद्दार हैं, जिन लोगों को इस नारे से दिक़्क़त है, समझ लीजिए वह देश का गद्दार है क्योंकि जो लोग राष्ट्रभक्त हैं, देश के वफ़ादार हैं उन्हें इस नारे से दिक़्क़त क्यों होने लगी?* इस नारे में किसी धर्म/मज़हब/जाति/सम्प्रदाय या पंथ का नाम नहीं लिया गया है, बल्कि गद्दारों के झुंड को ललकारा गया है।

इस्लाम में गद्दारी की सज़ा मौत है, सनातन धर्म में देशद्रोह की सजा मृत्युदंड है  या देश निकाला है। अन्य सभी धर्मों में भी ग़द्दारी की सज़ा मौत ही है। तब इस नारे पर आपत्ति क्यों है? इस नारे से दिक़्क़त सिर्फ उन्हीं लोगों को हो सकती है जो या तो ख़ुद ग़द्दार हैं या फिर गद्दारों के संरक्षक हैं। यह तो एक ऐसा नारा है कि प्रत्येक राष्ट्रभक्त/देशभक्त को ज़ोर-ज़ोर से बोलना चाहिए, ताकि गद्दारों का झुंड अपने दड़बों से बाहर निकल सके और हमारी बहादुर सेना उन्हें गोली मार सके।

तो ज़ोर से बोलो....

देश के गद्दारों को, गोली मारो ......को।

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