परन्तु क्या किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर है कि जब संसद जिसे लोकतन्त्र का मंदिर माना जाता है, और विधायिका जिसे लोकतंत्र का एक मजबूत स्तम्भ माना जाता है, ने इस कानून को बहुमत से पास कर दिया और देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने भी उसपर अपनी सहमति की मोहर लगा दी।
तब उस कानून पर विश्वास क्यों नहीं किया जा रहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी धर्म, जाति, मत, मज़हब, या सम्प्रदाय विशेष के प्रधानमंत्री नहीं है बल्कि वह संवैधानिक व्यवस्था से चुनी हुई सरकार के मुखिया हैं जिसे इस देश की जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है।
इसके बावजूद कुछ लोगों, और कुछ हठी और दम्भी मुख्यमंत्रियों ने सर्वोच्च न्यायालय में CAA के ख़िलाफ़ याचिका डाली हुई है जिसपर माननीय सर्वोच्च न्यायालय को आने वाली 22 जनवरी को फ़ैसला लेना है।
तब ऐसे में यह प्रश्न स्वावभाविक ही है कि आखिर संविधान के स्वयम्भू रक्षक बने पाखंडियो को क्या इस देश की न्यायपालिका पर भी भरोसा नहीं है?
मोदी झूठ नहीं बोलता है, मोदी ने जो वादे इस देश की जनता से किये थे, उन्हीं वादों को पूरा करने के लिए वह प्रतिबद्ध है। मोदी से आप सत्य की ही अपेक्षा करें चूंकि वह एकमात्र ऐसा व्यक्तित्व है जो बिना किसी भेदभाव के, बिना के किसी पूर्वाग्रह के इस देश की एक अरब पैंतीस करोड़ जनता के हितों का ध्यान करते हुए इस देश में शांति, सुरक्षा और सौहार्द का वातावरण बनाये रखने का हरसम्भव प्रयास कर रहा है।
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