सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्या भारत में इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है : २०२० से १९४७ की ओर (भाग -२)

अलाउद्दीन खिलजी ने जब एक क़ाज़ी से सवाल किया- इस्लामी क़ानून के अंतर्गत हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी?

क़ाज़ी ने उत्तर दिया-
"उन्हें (हिन्दुओं को ) लगान भरने वाला कहा जाता है, और जब कोई लगान अधिकारी उनसे चांदी मांगे, उन्हें बिना कोई प्रश्न उठाये पूरी विनम्रता और सम्मान के साथ सोना भेंट करना चाहिए। यदि अधिकारी उनके मुहं में गंदगी फेंकें तो उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी उसे लेने के लिए मुहं चौड़ा खोल देना चाहिए। धिम्मी (गैर-मुस्लिम) की असली नीच स्थिति इस प्रकार विनम्रता से धन भेंट करने और अपने मुहं में गंदगी स्वीकारने से ही प्रकट होती है. इस्लाम का महिमा गान ही कर्तव्य है और मज़हब के प्रति उपेक्षा भाव ओछापन है. खुदा उन्हें हिक़ारत से देखता है, जैसा कि उसने कहा है, उन्हें दबाकर रखो". हिन्दुओं को अपमानित बनाकर रखना तो ख़ासकर ही मज़हब का कर्तव्य है, क्योंकि वे पैगंबर के सबसे पुराने जिद्दी दुश्मन हैं, और क्योंकि पैगंबर ने हमें उनको क़त्ल करने का हुक्म यह कहकर दिया है कि 'उन्हें इस्लाम कबूल कराओ या मार दो' और गुलाम बनाओ तथा उनकी धन-सम्पत्ति लूट लो'. कोई और नहीं बल्कि स्वयं महान सिद्धांतकार हनीफाह ने, जिनके मत के हम सब अनुयायी हैं, हिन्दुओं पर जज़िया लगाने की सहमति दी है. अन्य विचारशाखाओं के उलेमा तो किसी अन्य मार्ग की अनुमति नहीं देते, सिवाय "मौत या इस्लाम" के।"  

       (डॉ. टाइटस की पुस्तक "इंडियन इस्लाम" में उद्घृत)

हमारा दुर्भाग्य है कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक़ नहीं सीखा। हजारों वर्षों की ग़ुलामी के बावजूद भी हम अपने इतिहास से कुछ सीखने की कोशिश कभी नहीं करते। हम हमेशा वर्तमान में ही जीते हैं, हमने कभी अपनी ऐतिहासिक भूलों से सबक़ लेकर अपने भविष्य को सुधारने की चेष्टा नहीं की. हम हमेशा से ही अहिंसा, नैतिकता और कर्तव्यों का पाठ पढ़ते और पढ़ाते रहे, लेकिन 'शठे शाठ्यम समाचरेत'  के सिद्धांत को हमने भुला दिया। हमने गांधीवाद को पढ़ा लेकिन चाणक्यनीति को कभी समझने की कोशिश नहीं की.

इतिहास सही मायने में शायद इसीलिए लिखा जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां उससे कुछ सीख सकें, लेकिन हमारा एक और दुर्भाग्य देखिये कि वामपंथियों और कांग्रेस ने हमारे सामने जो इतिहास रखा उसने हमें हमारे ही दुश्मनों का गुणगान करने पर मजबूर कर दिया। हम अकबर को महान और राणा प्रताप को बागी समझने लगे.
आज की पीढ़ी को यह जानने का पूरा हक़ है कि वामपंथी और कांग्रेस ने जो इतिहास हमें पढ़ाया है वह गुलाम मानसिकता पर झूठ का मुलम्मा है, जबकि सच्चाई अभी भी हमसे कोसों दूर है.

हमें जिस छद्म धर्म-निरपेक्षता की चाशनी पिलाई जाती है उसे हम कभी समझ ही नहीं सके. कांग्रेसियों और वामपंथियों ने सेक्युलरिज्म की आड़ में इस्लामिक कटटरपंथी विचारधारा को सुरक्षा-चक्र ही प्रदान किया है. और हमने सेक्युलरिज्म की इस विचारधारा को खाद-पानी देकर इसी आशा में पालने-पोसने का कार्य किया है, और उसे बढ़ते हुए देखकर भी इसी आशा में जी रहे हैं कि शायद कभी इस पेड़ पर मानवता, शांति और सौहार्द के फल-फूल भी लगेंगे और हम अपने देश को फलता-फूलता हुआ देख सकेंगे। क्रमशः 

भाग तीन कल पढ़िए 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

Your comment has been received and is subject to moderation. Abusive, defamatory, or legally objectionable comments will not be published.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

हर शाख पे उल्लू बैठा है —अंजाम-ए-कांग्रेस क्या होगा?

'हर शाख पे उल्लू बैठा है' के परिप्रेक्ष्य में पार्टी के वैचारिक पतन की एक तीखी राष्ट्रवादी पड़ताल। राष्ट्रचिन्तन — अंजाम-ए-कांग्रेस राजनीतिक विश्लेषण · कांग्रेस का पतन · विशेष आलेख · अप्रैल 2026 ▶ अप्रैल 2026 · राष्ट्रीय राजनीति विशेषांक जो दल अपने बयानों से अपने शत्रु को संजीवनी देता रहे "हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा" — मिर्ज़ा ग़ालिब उसका भविष्य इतिहास पहले ही लिख चुका है म.च. शास्त्री मनोज चतुर्वेदी शास्त्री Rashtra-Chintan · राष्ट्रचिन्तन · अप्रैल 2026 'हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?' मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर जब लिखा गया था, तब शायद उन्हें यह नहीं पता था कि डेढ़ सौ वर्ष बाद यह भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पर इतना सटीक बैठेगा। कांग्रेस का गुलिस्तां आज वह है, जहाँ हर शाख पर एक ऐसा नेता विराजमान है जो अपने ही दल की जड़ें काट रहा है — और भाजपा को घर बैठे संजीवनी दे रहा है। हा...

पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी की विदाई तय क्यों है?

 संदेशखाली का आक्रोश, घोटालों की गूंज और चरम तुष्टिकरण? राष्ट्रचिन्तन — ममता बनर्जी की विदाई चुनाव विश्लेषण · बंगाल 2026 · तथ्यात्मक शोध · विशेष आलेख ▶ अप्रैल 2026 · बंगाल चुनाव विशेषांक "मां, माटी, मानुष" का नारा अब "घोटाला, गुंडाराज, विदाई" में बदल चुका है एक तथ्यात्मक विश्लेषण शास्त्री मनोज चतुर्वेदी शास्त्री राष्ट्रचिन्तन · अप्रैल 2026 2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों के वामपंथी शासन को "परिवर्तन" के नारे पर उखाड़ फेंका था। वह क्षण ऐतिहासिक था — एक जनाक्रोश जो दशकों के दमन, भ्रष्टाचार और गुंडाराज के विरुद्ध फूटा था। किन्तु इतिहास की एक क्रूर विडम्बना यह है कि जो शक्तियाँ "परिवर्तन" लाती हैं, वे प्रायः स्वयं उसी पतन का शिकार हो जाती हैं जिसके विरुद्ध उन्होंने लड़ा था। 2026 में पश्चिम बंगाल की जनता वही "परिवर्तन" ममता बनर्जी के विरुद्ध माँग रही है — और इस बार वह माँग केवल भावनात्मक...