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| 'हर शाख पे उल्लू बैठा है' के परिप्रेक्ष्य में पार्टी के वैचारिक पतन की एक तीखी राष्ट्रवादी पड़ताल। |
'हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?' मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर जब लिखा गया था, तब शायद उन्हें यह नहीं पता था कि डेढ़ सौ वर्ष बाद यह भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पर इतना सटीक बैठेगा। कांग्रेस का गुलिस्तां आज वह है, जहाँ हर शाख पर एक ऐसा नेता विराजमान है जो अपने ही दल की जड़ें काट रहा है — और भाजपा को घर बैठे संजीवनी दे रहा है। हाल ही में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को "आतंकवादी" कह दिया। बाद में सफाई भी दी, किन्तु जैसा कहते हैं- 'तीर कमान से निकल चुका था। गेंद सीधे भाजपा के पाले में चली गई।'
किन्तु यह कोई नई घटना नहीं है। खरगे न पहले हैं, न अंतिम। कांग्रेस की यह "हर शाख पे उल्लू बैठा है" कि परम्परा उतनी ही पुरानी है जितना मोदी युग। और इस परम्परा का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है — नरेन्द्र मोदी को एक प्रदेश के मुख्यमंत्री से देश का प्रधानमंत्री बनाने में सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों का अमूल्य योगदान है। और उन्हें लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाए रखने में राहुल गांधी और उनके चमचों का अविस्मरणीय योगदान भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा।
खरगे: मोदी को "आतंकवादी" — BJP को संजीवनी
सोनिया: "मौत का सौदागर" 2002 — मोदी को सहानुभूति
राहुल: "चौकीदार चोर है" — SC की फटकार
मनमोहन: "अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार" 2006
Sam Pitroda: हिन्दुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी
थरूर: "Hindu Pakistan" बयान
राहुल: विदेश में भारतीय लोकतंत्र पर प्रश्न
मल्लिकार्जुन खरगे — जो कांग्रेस के वह "Non-Gandhi" अध्यक्ष हैं जिन्हें परिवार की सहमति से चुना गया, ने प्रधानमंत्री मोदी को "आतंकवादी" कहकर वह कर दिखाया जो कांग्रेस के प्रत्येक वरिष्ठ नेता करते आए हैं अर्थात अपनी पार्टी के पाँव पर कुल्हाड़ी मारना। सफाई आई, माफी आई — किन्तु राजनीति में "सफाई" का मूल्य वही है जो उस बर्तन को धोने का जिसमें ज़हर पका हो। रंग बचा रहता है।
यह घटना Isolated नहीं है। यह एक अटूट Pattern का हिस्सा है जिसे कांग्रेस ने वर्षों में परिष्कृत किया है। जब भी भाजपा किसी संकट में होती है — किसी कांग्रेसी नेता का एक बयान उसे उबार लेता है। यह कांग्रेसी वैचारिक दिवालियेपन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।
2002 में जब सोनिया गांधी ने नरेन्द्र मोदी को "मौत का सौदागर" कहा — तो गुजरात के मतदाताओं ने इसे मोदी का अपमान माना और उन्हें भारी बहुमत से जिताया। यह कांग्रेस की पहली बड़ी "राजनीतिक मुर्खता" थी। 2019 में राहुल गांधी ने Rafale मामले में "चौकीदार चोर है" का नारा दिया — Supreme Court ने फटकार लगाई, राहुल को माफी माँगनी पड़ी, और BJP को एक ऐसा मुद्दा मिला जिसे उसने चुनाव भर भुनाया।
नरेन्द्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री से देश का प्रधानमंत्री बनाने में जितना योगदान भाजपा का है, उससे कहीं अधिक सोनिया गांधी और उनके "बयानवीर" सलाहकारों का है। और उन्हें तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बनाए रखने में कांग्रेसी भस्मासुर राहुल गांधी की "भारत जोड़ो यात्राओं" का, उनके विदेशी मंचों पर दिए बयानों का, और उनके "मंगलसूत्र लूट" वाले घोषणापत्र का अमूल्य योगदान है।
मोदी को CM से PM बनाने में सोनिया का योगदान,तीसरी बार PM बनाए रखने में राहुल का योगदान —यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है जो इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखेगा।
राहुल गांधी ने 2023 में लंदन, वाशिंगटन और कैम्ब्रिज में भारतीय लोकतंत्र को "खतरे में" बताया — विदेशी धरती पर, विदेशी दर्शकों के सामने। "भारत में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं" — यह दावा विदेशी मंचों पर किया गया। शशि थरूर ने BJP शासित भारत को "Hindu Pakistan" कहा। Sam Pitroda ने उत्तर और दक्षिण भारतीयों की तुलना करते हुए हिन्दुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की — उन्हें पद छोड़ना पड़ा, किन्तु पार्टी ने पहले उनका बचाव किया। 2024 के कांग्रेस घोषणापत्र में सम्पत्ति के "पुनर्वितरण" का संकेत था — जिसे मोदी ने "हिन्दू महिलाओं का मंगलसूत्र और सोना छीनने की योजना" के रूप में उजागर किया। और जनता ने मोदी की बात मानी।
RSS को "फासीवादी" कहना, राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का बायकॉट, Article 370 हटाने का विरोध, CAA का विरोध — इन सबका एक सुसंगत pattern है।
जो दल राम मंदिर में न जाए लेकिन रमदान में जाए — उसका वैचारिक पक्ष किसी घोषणापत्र की मोहताज नहीं। वह उसके कार्यों से स्पष्ट है।
1986 में राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो मामले में Supreme Court के उस ऐतिहासिक फैसले को — जो एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता देता था — संसद में पलट दिया। यह निर्णय मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में हुआ। उसी राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खुलवाकर हिन्दू वोट साधने की भी कोशिश की — यह दोनों तरफ से तुष्टीकरण था। इस नीति का परिणाम यह हुआ — न मुसलमान संतुष्ट रहा, न हिन्दू। और BJP को एक स्थायी राजनीतिक मुद्दा मिल गया।
2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी का "मुसलमानों को पहला हक" वाला वादा मनमोहन सिंह के 2006 के उस बयान की सटीक प्रतिध्वनि था जिसमें उन्होंने कहा था कि "अल्पसंख्यकों का देश के संसाधनों पर पहला अधिकार है।" क्या कांग्रेस को यह नहीं पता था कि यह बयान हिन्दू मतदाताओं में किस प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगा? पता था — किन्तु वोटबैंक की गणित उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण से सदा बड़ी रही।
राहुल गांधी की विदेश यात्राएँ एक अजीब Pattern का अनुसरण करती हैं। वे जहाँ भी जाते हैं — लंदन, वाशिंगटन, सैन फ्रांसिस्को, कैम्ब्रिज — वहाँ भारत के लोकतंत्र, भारत की न्यायपालिका, भारत की प्रेस और भारत के अल्पसंख्यकों की "दुर्दशा" का वर्णन करते हैं। यह वही भारत है जिसे वे प्रधानमंत्री बनकर शासित करना चाहते हैं।
चाणक्य का सूत्र स्पष्ट है — "जो अपने देश की निंदा विदेश में करे, वह राजनेता नहीं।" राहुल गांधी का विदेशी मंचों से भारत की आलोचना करना — और साथ ही George Soros जैसे विदेशी fund से जुड़े संगठनों की निकटता — यह उस नेतृत्व का चरित्र है जो "भारत जोड़ो" का नारा देता है और विदेश में भारत को "तोड़ता" है।
2020 में कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं — जिनमें गुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी शामिल थे — ने पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी को पत्र लिखकर आंतरिक लोकतंत्र और नेतृत्व परिवर्तन की माँग की। परिणाम? सबने धीरे-धीरे पार्टी छोड़ी। गुलाम नबी आज़ाद ने अपनी अलग पार्टी बनाई। कपिल सिब्बल राज्यसभा में सपा से गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया BJP में गए — मध्यप्रदेश की सरकार गिरी। जितिन प्रसाद BJP में गए। आर.पी.एन. सिंह BJP में गए।
यह पलायन "विश्वासघात" नहीं — यह उस संस्था का स्वाभाविक क्षरण है जहाँ विचारधारा की जगह परिवार-निष्ठा सर्वोपरि है। जो पार्टी अपने अनुभवी, समर्पित और योग्य नेताओं को रोक न सके — वह जनता का विश्वास कैसे जीतेगी? कांग्रेस आज एक विचारधारा नहीं — एक परिवार की Political Holding Company है।
खरगे से सोनिया तक, राहुल से Sam Pitroda तक —
कांग्रेस का प्रत्येक "बयानवीर" नेता
भाजपा का सबसे विश्वसनीय प्रचारक सिद्ध हुआ है।
1984 में 414 सीटें थीं — 2024 में 99।
यह पतन की रेखा नहीं —
यह आत्म-विनाश का कालक्रम है।
ग़ालिब ने पूछा था — "अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा?"
कांग्रेस का गुलिस्तां स्वयं उत्तर दे रहा है —
प्रश्न केवल यह है कि
क्या कांग्रेस यह उत्तर पढ़ पाएगी?

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