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| रामचरितमानस विवाद और सपा नेताओं के बयानों के परिप्रेक्ष्य में एक गंभीर राष्ट्रवादी पड़ताल। |
नारे केवल शब्द नहीं होते — वे किसी राजनीतिक दल की आत्मा का दर्पण होते हैं। उनमें वह विचारधारा झलकती है जो पार्टी के कार्यालयों में नहीं, उसके वैचारिक अवचेतन में बसती है। 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में जो नारा दिया — "मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम" — वह केवल एक चुनावी नारा नहीं था। वह सनातन की सबसे पवित्र आराधना — राम-नाम — को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की घोषणा थी। और तीन दशक बाद 2026 में जब "मिले आंबेडकर-अखिलेश, खुलेंगे साधुओं के भेष" का नारा गूँजा — तो यह स्पष्ट हो गया कि यह सब अकस्मात नहीं है बल्कि एक सोची-समझी साजिश है, जिसके पीछे वह घृणित मानसिकता है जो सदैव सनातन और सनातनियों का अपमान करती रही है।
प्रश्न यह नहीं कि यह साजिश है या राजनीति। प्रश्न यह है कि 1993 से 2026 तक — 33 वर्षों की इस यात्रा में — समाजवादी पार्टी ने एक भी नारा ऐसा क्यों नहीं दिया जिसमें राम का सम्मान हो, सनातन की गरिमा हो, और संन्यासियों का आदर हो? जब यह प्रवृत्ति समय के साथ लंबी होती चली जाए, निरंतरता में अडिग रहे, और इसके व्यवहार में किसी प्रकार का कोई पश्चाताप या आत्मस्वीकृति न झलके — तो उसे "रणनीति" नहीं, "DNA" कहते हैं।
1990: अयोध्या में कारसेवकों पर गोली — मुलायम सरकार
1993: "हवा में उड़ गए जय श्रीराम" — गठबंधन नारा
2003: मधुमिता शुक्ला हत्या — SP विधायक दोषी
2020: स्वामी प्रसाद मौर्य — रामचरितमानस पर अभद्र टिप्पणी
2023: उदयनिधि के "सनातन = डेंगू" बयान पर अखिलेश का समर्थन
2024: राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का बायकॉट
2024: "खुलेंगे साधुओं के भेष" — नया नारा
2 नवम्बर 1990 — वह तिथि जो उत्तर प्रदेश के इतिहास में रक्त से लिखी गई है। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए कारसेवा करने आए निहत्थे श्रद्धालुओं पर गोलियाँ चलाईं। दर्जनों कारसेवकों के प्राण गए। यह कोई भीड़-नियंत्रण की विवश कार्रवाई नहीं थी — यह एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश था। संदेश यह कि सनातन की आराधना, राम की भक्ति, और जन्मभूमि का स्वप्न — इस सरकार के लिए गोली के योग्य अपराध हैं।
उस गोलीकांड के बाद मुलायम सिंह यादव को "मुल्ला मुलायम" की उपाधि मिली- और वे इसे गर्व से स्वीकार करते थे।- यह उपाधि उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन गई।
स्वामी प्रसाद मौर्य — समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री — ने गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस पर बार-बार अभद्र और अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों को "जातिवादी और महिला-विरोधी" बताते हुए उस पवित्र ग्रंथ पर प्रतिबंध की माँग तक की। रामचरितमानस — जो भारत के करोड़ों घरों में प्रतिदिन पढ़ी जाती है, जो उत्तर भारत की सांस्कृतिक चेतना का आधार है — उस पर यह प्रहार कोई बौद्धिक असहमति नहीं थी। यह एक सुनियोजित सांस्कृतिक आक्रमण था।
किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की — न निष्कासन, न भर्त्सना, न सार्वजनिक माफी। उन्हें पार्टी में बनाए रखा गया। यह मौन स्वीकृति है — और राजनीति में मौन सबसे स्पष्ट बयान होता है। जो दल अपने नेता के धर्म-विरोधी बयानों पर मौन रहे — वह उस बयान का सह-लेखक है।
जो दल 1993 में राम-नाम को "हवा में उड़ाए" और 2024 में साधुओं के "भेष खोले" —उससे सनातन-सम्मान की अपेक्षा उतनी ही व्यर्थ है जितना अँधेरे से प्रकाश की माँग।
सितम्बर 2023 में तमिलनाडु के DMK मंत्री और मुख्यमंत्री स्टालिन के पुत्र उदयनिधि स्टालिन ने एक सार्वजनिक मंच से कहा —
सनातन धर्म डेंगू और मलेरिया की तरह है। जैसे इन बीमारियों को खत्म करना ज़रूरी है, वैसे ही सनातन को भी खत्म करना होगा।
यह बयान भारत के 80 करोड़ से अधिक सनातनियों की आस्था को "बीमारी" की संज्ञा दे रहा था — और उसके "उन्मूलन" का आह्वान कर रहा था।
अखिलेश यादव ने इस बयान की न निंदा की, न उदयनिधि स्टालिन से दूरी बनाई। INDIA bloc की एकजुटता के नाम पर SP ने इस बयान को स्वीकृत किया। यह केवल राजनीतिक सुविधावाद नहीं — यह वैचारिक साझेदारी है। जो दल "सनातन-उन्मूलन" का आह्वान करने वाले के साथ गठबंधन करे और उसके बयान पर मौन रहे — वह उस विचार का साझेदार है।
22 जनवरी 2024 — वह दिन जब 500 वर्षों के संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। करोड़ों भारतीयों के लिए यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं — यह एक सभ्यतागत पुनर्जागरण का क्षण था। किन्तु अखिलेश यादव वहाँ नहीं थे। INDIA bloc के नेताओं ने सामूहिक बायकॉट किया। उनका तर्क था कि यह "चुनावी आयोजन" है।
किन्तु यही नेतृत्व ईद की नमाज़ में, मुहर्रम के जुलूस में, और अन्य अवसरों पर सक्रिय भागीदारी करता है — फोटो खिंचवाता है, प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है।
राम मंदिर "चुनावी आयोजन" है — किन्तु ईफ्तार पार्टी "सांस्कृतिक कार्यक्रम"।
यह चयनात्मक उपस्थिति और चयनात्मक अनुपस्थिति — यही समाजवादी पार्टी की असली "मानसिकता" है। 1993 में जय श्रीराम "हवा में उड़ा" था — 2024 में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का बायकॉट — यह एक ही वैचारिक यात्रा के दो पड़ाव हैं।
समाजवादी पार्टी की राजनीति का केंद्रीय समीकरण "M-Y" — मुस्लिम और यादव — वोटबैंक पर आधारित है। यह कोई रहस्य नहीं — स्वयं समाजवादी नेता इसे स्वीकार करते रहे हैं। इस समीकरण को बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य शर्त है — बहुसंख्यक हिन्दू समाज, विशेषतः सनातन-निष्ठवर्ग, को कभी एकजुट न होने दिया जाए।
सनातन पर प्रहार इसीलिए होता है — ताकि हिन्दू समाज जाति-पाँति में बँटा रहे, और M-Y गठबंधन मज़बूत बना रहे।
2024 के लोकसभा चुनाव में जब एक मुस्लिम धर्मगुरु ने "वोट जिहाद" का नारा दिया — अखिलेश नेतृत्व मौन रहा। किन्तु जब हिन्दू संगठनों ने "बटेंगे तो कटेंगे" और "एक हैं तो सेफ हैं" का नारा दिया — अखिलेश यादव ने इसे "सांप्रदायिक" और "संविधान-विरोधी" बताया। एक ही प्रकार की एकजुटता की अपील — एक पर आपत्ति, दूसरे पर मौन। यह दोहरा मापदंड संयोग नहीं — यह वोट बैंक की वह राजनीति है जिसमें सनातन समाज की भावनाएँ सदैव गौण रही हैं।
समाजवादी पार्टी के नेता सनातन की परम्पराओं, ग्रंथों और प्रतीकों पर "प्रगतिशील आलोचना" के नाम पर खुलकर प्रहार करते हैं। किन्तु इस्लाम में व्याप्त कुरीतियों — तीन तलाक, हलाला, बाल-विवाह — पर उनकी रहस्यमयी चुप्पी है। तीन तलाक पर जब मोदी सरकार ने कानून बनाया — समाजवादी पार्टी ने विरोध किया। मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बात जब सनातन-समर्थक सरकार करे — तो वह "सांप्रदायिक" हो जाती है। और जब समाजवादी नेता रामचरितमानस को "बाँटने वाली" बताए — तो वह "समाज सुधारक" हो जाता है।
यह धर्मनिरपेक्षता नहीं — यह वह एकतरफा सांस्कृतिक आक्रमण है जो एक समुदाय की आस्था को "रूढ़ीवादिता" और दूसरे की कट्टरता को "आस्था का अधिकार" कहता है। जो "सेकुलरिज्म" केवल एक दिशा में चले — वह विचारधारा नहीं, वोटबैंक की गणित है।
2024 का "PDA" (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फ्रेम और "मिले आंबेडकर-अखिलेश, खुलेंगे साधुओं के भेष" का नारा — ये दोनों एक ही रणनीति के दो पहलू हैं। सनातन धर्म पर प्रहार करके, संन्यासियों को "भेष में छुपे अपराधी" बताकर, और हिन्दू समाज को जाति-खानों में बाँटकर — समाजवादी एक गैर-हिन्दू वोटबैंक को एकजुट और हिन्दू वोटबैंक को विखंडित रखना चाहती है।
यह रणनीति उतनी ही पुरानी है जितनी सपा स्वयं। 1993 में "जय श्रीराम" को "हवा में उड़ाकर" राम-भक्त हिन्दुओं को हाशिए पर धकेला गया था। 2026 में "साधुओं के भेष खोलकर" सनातन के आध्यात्मिक नेतृत्व को संदिग्ध बनाया जा रहा है। जो राजनीति हिन्दू को हिन्दू से लड़ाकर जीती हो — वह राष्ट्रीय एकता की नहीं, राष्ट्रीय विखंडन की राजनीति है।
कुछ विश्लेषक कहते हैं कि यह समाजवादी पार्टी की "तात्कालिक राजनीतिक रणनीति" है — वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं। किन्तु यह तर्क एक सरल परीक्षण में विफल हो जाता है। यदि यह केवल रणनीति होती — तो कभी न कभी समाजवादी पार्टी ने सनातन-समर्थक कोई बड़ा निर्णय भी लिया होता। स्वामी प्रसाद मौर्य को निष्कासित किया होता। उदयनिधि के बयान की निंदा की होती। राम मंदिर में उपस्थिति दर्ज कराई होती। "साधुओं के भेष" वाले नारे को अस्वीकार किया होता।
किन्तु 33 वर्षों में — 1993 से 2026 तक — एक भी ऐसा क्षण नहीं आया। हर बार जब सनातन और समाजवादी के बीच चुनाव हुआ — मुलयम परिवार ने हमेशा सनातन को छोड़ा। यह pattern इतना लम्बा है, इतना consistent है, और इतना unrepentant है कि इसे "रणनीति" कहना उस दल के प्रति अनावश्यक उदारता होगी। जब कोई दल अपने हिन्दू-विरोधी नेताओं पर कोई कड़ी कार्रवाई न करे — तो राष्ट्रवादी निष्कर्ष यही निकलता है कि सनातन का अपमान समाजवादी पार्टी की स्वीकृत राजनीतिक पहचान बन चुकी है। और स्वीकृत पहचान को "रणनीति" नहीं — "DNA" कहते हैं।
"मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम" — 1993
"मिले आंबेडकर-अखिलेश, खुलेंगे साधुओं के भेष" — 2026
इन दोनों नारों के बीच 33 वर्षों में
समाजवादी पार्टी ने एक भी नारा नहीं लगाया
जिसमें राम का सम्मान हो,
सनातन की गरिमा हो,
संन्यासियों का आदर हो।
DNA वह होता है जो बदलता नहीं —
केवल उजागर होता रहता है।
क्या इसे DNA नहीं कहेंगे?

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