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| प्रलोभन और छल-कपट से हो रहे धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए टुकड़ों में बंटे राज्य कानूनों के बजाय एक सशक्त राष्ट्रीय कानून समय की मांग है। |
राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य शर्त
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस जब भी होती है, तो उसमें सीमाओं पर तैनात सेना, परमाणु क्षमता, और साइबर युद्ध की चर्चा होती है। लेकिन एक मोर्चा ऐसा है जिसे जानबूझकर बहस से बाहर रखा जाता है — और वह है उस देश की जनसांख्यिकीय पहचान का व्यवस्थित रूपांतरण।
2011 की जनगणना के आँकड़े इस विषय पर सबसे स्पष्ट दस्तावेज़ हैं। मेघालय, नागालैंड और मिज़ोरम में ईसाई जनसंख्या का तीव्र प्रसार स्वाभाविक जन्म दर का परिणाम नहीं है — यह दशकों के संगठित मतान्तरण अभियान की उपज है।
राज्य की शक्ति उसके भूगोल में नहीं, उसकी जनसंख्या की निष्ठा में होती है।,
जब वह निष्ठा बाहरी शक्तियों द्वारा तोड़ी जाए, तो वह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं
वह एक प्रकार का अदृश्य अतिक्रमण है।
गृह मंत्रालय के FCRA आँकड़े बताते हैं कि भारत में धार्मिक संगठनों को प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ रुपये विदेश से प्राप्त होते हैं। यह धन जब tribal belt में पहुँचता है, तो साथ लाता है एक ऐसा narrative जो राज्य को शत्रु और भारतीय संस्कृति को दमनकारी बताता है।
1977 में सर्वोच्च न्यायालय ने Stanislaus vs. State of Madhya Pradesh में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था मानने और प्रचार करने का अधिकार देता है — किन्तु इसमें किसी अन्य व्यक्ति को मतान्तरित करने का अधिकार नहीं आता।
इसी आलोक में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 और अन्य राज्यों के कानूनों को देखा जाना चाहिए। कानूनी शून्यता एक ऐसा छिद्र है जिसमें से संगठित मतान्तरण नेटवर्क बेरोक-टोक काम करते हैं।
संसद में एक केंद्रीय धर्मान्तरण-विरोधी कानून की आवश्यकता है — जो प्रलोभन, छल और बाहरी फंडिंग से होने वाले मतान्तरण को परिभाषित करे। यह किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है — यह उन सबके विरुद्ध है जो राष्ट्र की जनसंख्या को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
बस उसकी जनसंख्या की निष्ठा तोड़ देना पर्याप्त है।
प्रश्न यह है कि भारत का नेतृत्व कब तक धृष्टराष्ट्र बना रहेगा?

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