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| संदेशखाली का आक्रोश, घोटालों की गूंज और चरम तुष्टिकरण? |
"मां, माटी, मानुष" का नारा अब "घोटाला, गुंडाराज, विदाई" में बदल चुका है
2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों के वामपंथी शासन को "परिवर्तन" के नारे पर उखाड़ फेंका था। वह क्षण ऐतिहासिक था — एक जनाक्रोश जो दशकों के दमन, भ्रष्टाचार और गुंडाराज के विरुद्ध फूटा था।
किन्तु इतिहास की एक क्रूर विडम्बना यह है कि जो शक्तियाँ "परिवर्तन" लाती हैं, वे प्रायः स्वयं उसी पतन का शिकार हो जाती हैं जिसके विरुद्ध उन्होंने लड़ा था। 2026 में पश्चिम बंगाल की जनता वही "परिवर्तन" ममता बनर्जी के विरुद्ध माँग रही है — और इस बार वह माँग केवल भावनात्मक नहीं, तथ्यों की अटूट नींव पर खड़ी है।
विदाई "तय" इसलिए नहीं कि विपक्ष असाधारण रूप से मज़बूत है। विदाई तय इसलिए है कि TMC ने शासन के हर मोर्चे पर — महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा — बंगाल को विफल किया है। जब सत्ता अपने नागरिकों की पीड़ा को "राजनीतिक साजिश" कहने लगे — तो उस सत्ता की विदाई की उलटी गिनती शुरू हो जाती है।
Sandeshkhali: TMC नेताओं द्वारा महिलाओं का यौन उत्पीड़न, भूमि हड़पना
RG Kar: महिला चिकित्सक बलात्कार-हत्या — कोलकाता में अभूतपूर्व आंदोलन
SSC Scam: 25,000+ अवैध नियुक्तियाँ — SC ने रद्द किया
राशन घोटाला: लाखों परिवारों का हक लूटा
कोयला तस्करी: TMC नेताओं की CBI जाँच
2021 हिंसा: Calcutta HC का CBI आदेश
पंचायत 2023: खुलेआम बूथ कैप्चरिंग
ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान का सबसे बड़ा आधार "महिला मुख्यमंत्री" की छवि रही है। "मां, माटी, मानुष" का नारा उसी छवि का विस्तार था। किन्तु 2024 में संदेशखाली ने इस पूरी छवि को ध्वस्त कर दिया। संदेशखाली में TMC के स्थानीय नेताओं ने महिलाओं का संस्थागत यौन उत्पीड़न किया, उनकी ज़मीनें हड़पीं, और विरोध करने पर धमकियाँ दीं। राज्य पुलिस ने पीड़ितों की मदद के बजाय अपराधियों को संरक्षण दिया। Calcutta High Court को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा।
इसके बाद RG Kar Medical College की वह रात जिसने पूरे बंगाल को झकझोर दिया। एक महिला चिकित्सक के साथ बलात्कार और हत्या — और ममता सरकार का ढुलमुल रवैया। कोलकाता की सड़कों पर रात के दो बजे लाखों लोगों ने मार्च किया — यह किसी दल का आंदोलन नहीं था, यह एक समाज का स्वतःस्फूर्त विद्रोह था। जो मुख्यमंत्री महिला-सुरक्षा की दुहाई दे और उसी के शासन में "मां, माटी, मानुष" की आधी आबादी सबसे असुरक्षित हो — वह जनादेश की अदालत में बच नहीं सकती।
SSC भर्ती घोटाला TMC सरकार के भ्रष्टाचार का सबसे क्रूर अध्याय है — इसलिए नहीं कि यह सबसे बड़ा है, बल्कि इसलिए कि इसने बंगाल के उन लाखों युवाओं के सपने तोड़े जो वर्षों की मेहनत के बाद सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा देते रहे। उनकी सीटें पैसों से बिकती रहीं — और ममता सरकार मौन रही। Calcutta High Court और Supreme Court दोनों ने 25,000 से अधिक अवैध नियुक्तियाँ रद्द कीं।
शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के घर ED की छापेमारी में ₹50 करोड़ से अधिक नकद मिले — यह दृश्य TMC के "सेवा" के दावे का सबसे स्पष्ट उत्तर था।
राशन घोटाले ने बंगाल के सबसे गरीब परिवारों का हक लूटा। कोयला तस्करी नेटवर्क ने राज्य की सम्पदा को Private Hands में पहुँचाया। ये घोटाले Isolated नहीं हैं — ये एक संस्थागत लूटतंत्र के प्रमाण हैं जहाँ सरकार नागरिकों की सेवा के लिए नहीं, "वसूली" के लिए चलाई जाती है। बेरोज़गार युवाओं का यह क्रोध 2026 में मतपेटी में उतरेगा — और वह क्रोध TMC को क्षमा नहीं करेगा।
2011 में ममता ने कहा था — "परिवर्तन.2026 में बंगाल कह रहा है — "परिवर्तन. इतिहास का यह व्यंग्य आकस्मिक नहीं, यह 14 वर्षों के शासन की स्वाभाविक परिणति है।
2021 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में जो हुआ — वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कलंकित अध्याय है। 30 से अधिक BJP कार्यकर्ताओं की हत्या documented है। Calcutta High Court ने स्वयं CBI जाँच का आदेश दिया — यह आदेश इस बात का प्रमाण था कि राज्य पुलिस निष्पक्ष जाँच के योग्य नहीं थी। विपक्षी कार्यकर्ताओं को घर छोड़ने पर मजबूर किया गया, उनके परिजनों को धमकाया गया। यह "चुनाव-पश्चात हिंसा" नहीं — यह राज्य-प्रायोजित आतंकवाद था।
2023 के पंचायत चुनाव इस गुंडाराज का दूसरा अध्याय थे। खुलेआम बूथ कैप्चरिंग, विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन न भरने देना, और सैकड़ों सीटों पर "निर्विरोध जीत" का जबरन तंत्र — यह सब documented है। जब "लोकतंत्र" इस तरह आयोजित हो — तो वह चुनाव नहीं, सत्ता का नाटक है। बंगाल की जनता अब इस खूनी खेल का अंत चाहती है — और 2026 उसका जनमत-संग्रह है।
ममता सरकार की तुष्टीकरण नीति केवल राजनीतिक पाखंड नहीं — यह राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट है। बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को अवैध रूप से बसाकर वोट बैंक बनाना — यह TMC की Documented रणनीति है। सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव की गति इतनी तेज़ है कि यह केवल बंगाल की नहीं — भारत की संप्रभुता का प्रश्न बन चुका है।
रामनवमी के जुलूसों पर पथराव, हिन्दू त्योहारों पर अघोषित प्रतिबंध — यह "सामाजिक समरसता" नहीं, यह एकतरफा सांस्कृतिक आत्मसमर्पण है।
इस तुष्टीकरण का प्रत्यक्ष परिणाम है — बंगाल के हिन्दू समाज में एक गहरा, संगठित और अब मुखर आक्रोश। वह आक्रोश 2019 में 40.25% वोट के रूप में दिखा। वह 2021 में 77 सीटों के रूप में दिखा। और 2026 में वह एक निर्णायक जनादेश के रूप में सामने आएगा।
बंगाल का हिन्दू समाज — जिसमें मतुआ, राजबंशी, नमःशूद्र, कायस्थ, ब्राह्मण — सभी तेज़ी से जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट हो रहा है। यह "सांप्रदायिक ध्रुवीकरण" नहीं — यह अस्तित्व और अस्मिता की राजनीति है। CAA के माध्यम से मतुआ समुदाय — जो बंगाल में 30 लाख से अधिक मतदाता हैं — को नागरिकता का वादा पूरा हुआ। यह BJP का सबसे बड़ा चुनावी हस्तक्षेप है।
शुभेंदु अधिकारी जैसे TMC के पूर्व वरिष्ठ नेताओं का BJP में पलायन — यह भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। जो लोग TMC की भीतरी कार्यशैली जानते हैं, वे उसे छोड़ रहे हैं। जनता यह देख रही है — और उसका निष्कर्ष स्वयंस्पष्ट है।
पश्चिम बंगाल जो कभी भारत का औद्योगिक हृदय था — टाटा, बिड़ला, और जूट उद्योग की भूमि — आज एक "बीमारू" राज्य की श्रेणी में आ चुका है। ममता सरकार की "मुफ्तखोर राजनीति" — मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, नकद हस्तांतरण — ने राज्य के खज़ाने को रिक्त कर दिया है। इन योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक कितना पहुँचा — यह राशन घोटाले का उत्तर है।
बंगाल में कोई नया बड़ा उद्योग नहीं आया — टाटा नैनो का प्रकरण याद है, जिसे आंदोलन के बाद गुजरात जाना पड़ा था? वह घटना बंगाल में औद्योगिक निवेश की अनिच्छा का प्रतीक बन गई। बंगाल के युवा, रोज़गार के लिए केरल, महाराष्ट्र और गुजरात जाते हैं। "सोनार बांग्ला" का नारा उन युवाओं के लिए एक क्रूर उपहास बन चुका है जो अपनी भूमि पर अवसर नहीं पाते। यह आर्थिक विफलता 2026 के मतदान में बोलेगी।
जो क्षेत्र 2016 तक TMC के अजेय गढ़ माने जाते थे — दक्षिण बंगाल के मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया, बाँकुड़ा — वहाँ BJP की जमीनी पैठ 2019-21 में स्पष्ट हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों की जमीनी पकड़ अब बंगाल के उन क्षेत्रों में भी है जहाँ पाँच वर्ष पहले नाम भी नहीं था। यह संगठनात्मक विस्तार चुनावी जीत की नींव है।
2026 में जनता के पास एक ठोस राष्ट्रवादी विकल्प है। यह विकल्प केवल "TMC-विरोध" नहीं — यह विकास, सुशासन और सांस्कृतिक अस्मिता का एक सकारात्मक एजेंडा है। जब विकल्प स्पष्ट हो और शासन की विफलता Documented हो — तो जनादेश की दिशा अनुमानित हो जाती है।
ममता बनर्जी का वास्तविक भय चुनाव से नहीं — निष्पक्ष चुनाव से है। 2021 में 8 चरणों में केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद बूथ कैप्चरिंग और हिंसा रुकी नहीं। 2026 में चुनाव आयोग के सामने यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी है कि राज्य पुलिस और TMC की प्रशासनिक मशीनरी निष्प्रभावी हो।
यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान हुआ — तो जनादेश का परिणाम TMC के लिए अप्रत्याशित नहीं होगा।
यही कारण है कि TMC केंद्रीय बलों की तैनाती का निरंतर विरोध करती है। जो सरकार निष्पक्ष चुनाव से डरे — वह जनादेश से नहीं, तंत्र से जीतती है। और तंत्र को लोकतंत्र से अधिक समय तक नहीं जिलाया जा सकता।
2011 में ममता बनर्जी ने जनता से कहा था —
"परिवर्तन लाओ।"
जनता ने 34 वर्षों के वामपंथ को उखाड़ा।
2026 में बंगाल की जनता ममता बनर्जी से कह रही है —
"परिवर्तन लाओ।"
Sandeshkhali की पीड़िताएँ, RG Kar की माँगें,
SSC के बेरोज़गार युवा, 2021 की हत्याओं के परिजन —
ये सब एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं —
प्रश्न यह नहीं कि ममता जाएंगी या नहीं —
प्रश्न यह है कि कितनी सीटें लेकर जाएंगी।

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