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अविमुक्तेश्वरानन्द का मठाधीशी पाखंड और राजनैतिक हिंदुत्व का निष्ठुर यथार्थ

"एक सन्यासी के हाथ में धर्मदण्ड जिस पर 'सच्चा हिंदू प्रमाणपत्र' टंगा है। पृष्ठभूमि में राम मंदिर और बुलडोजर, जो दर्शाते हैं कि वास्तविक 'हिंदुत्व' का आधार राजनैतिक इच्छाशक्ति है, मठाधीशों के प्रमाणपत्र नहीं।
सनातन धर्म की रक्षा वातानुकूलित आश्रमों से जारी किए गए 'प्रमाणपत्रों' से नहीं, अपितु राम मंदिर और बुलडोजर रूपी उस 'राजदण्ड' से होती है, जिसका निर्माण एक 'राजनैतिक हिंदू' करता है।
"धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्।" (धर्म का मूल संसाधन है, और संसाधनों का मूल राज्यसत्ता है।)

जब सभ्यतागत शत्रु 'गजवा-ए-हिंद' और 'डेमोग्राफिक जिहाद' के माध्यम से हमारी अस्मिता को निगलने के लिए द्वार पर खड़े हों, तब यह देखना अत्यंत विक्षोभकारी है कि हमारे स्वयंभू मठाधीश 'असली हिंदू कौन है' इसका राजनैतिक 'सेंसर बोर्ड' चला रहे हैं। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के हालिया वक्तव्य और उस पर ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अहंकारी पलटवार ने एक आत्मघाती विमर्श को जन्म दिया है। पाठक का यह कथन कि "जो भाजपा का विरोध कर रहा है, वह हिंदू विरोधी है," भाषाई स्तर पर राजनैतिक दर्प प्रतीत हो सकता है, किंतु इसका भू-राजनैतिक (Geopolitical) यथार्थ अकाट्य है। इसके विपरीत, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया विशुद्ध मठाधीशी पाखंड और सैद्धांतिक हठ का वह वीभत्स उदाहरण है, जो वामपंथी और जिहादी 'इकोसिस्टम' को सनातन के विरुद्ध अस्त्र प्रदान कर रहा है। बिना सुदृढ़ 'राजदण्ड' के 'धर्मदण्ड' की रक्षा की कल्पना करना, कोरी मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं है।


मठाधीशी अहंकार और 'प्रमाणपत्र' बांटने का विरोधाभासी पाखंड

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि 'हिंदू' होने की परिभाषा शास्त्र तय करते हैं, कोई राजनैतिक दल नहीं। सैद्धांतिक रूप से यह सत्य है, परंतु यहाँ उनके पाखंड (Hypocrisy) का नग्न पर्दाफाश करना अनिवार्य है। जब स्वामी जी यह कहते हैं कि किसी नेता को हिंदू का प्रमाणपत्र बांटने का अधिकार नहीं है, तो वे स्वयं किस अधिकार से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या अन्य राजनेताओं के 'हिंदुत्व' का सार्वजनिक मूल्यांकन करते फिरते हैं? क्या पीठ का कार्य धर्म-संसद का मार्गदर्शन करना है, या राजनैतिक अखाड़े में उतरकर नेताओं की कार्यप्रणाली पर 'सुप्रीम कोर्ट' की भांति निर्णय सुनाना?

यह एक अत्यंत विरोधाभासी और कुतर्की स्थिति है। जब एक राजनेता (बृजेश पाठक) सभ्यतागत युद्ध (Civilizational War) की वास्तविकता को जनता के समक्ष रखता है, तो स्वामी जी को 'शास्त्रों की मर्यादा' स्मरण हो आती है। परंतु जब वे स्वयं अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर राजनेताओं को 'हिंदुत्व' के मापदंडों पर तौलते हैं, तब यह मर्यादा कहाँ विलुप्त हो जाती है? यह धर्म-रक्षा नहीं, अपितु वह 'मठाधीशी अहंकार' है जो स्वयं को राजसत्ता के समानांतर एक 'राजनैतिक ठेकेदार' के रूप में स्थापित करने की कुत्सित लालसा से ग्रसित है।

'राजनैतिक हिंदू' का उद्भव और 'राजदण्ड' की अनिवार्यता

बृजेश पाठक के बयान की भाषाई कांट-छांट को यदि किनारे रख दें, तो उसका केंद्रीय तत्त्व पूर्णतः सावरकर के 'राजनैतिक हिंदुत्व' (Political Hindutva) से मेल खाता है। आज का युग केवल अनुष्ठानिक हिंदू (Ritualistic Hindu) होने का नहीं है। जो व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर नहीं जाता, शिखा या सूत्र नहीं धारण करता, परंतु मतदान-केंद्र पर जाकर उन शक्तियों के पक्ष में 'राजदण्ड' सौंपता है जो राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण करती हैं, जो ज्ञानवापी के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं और जो जिहादी आक्रांताओं के दुस्साहस को बुलडोजर के नीचे कुचलती हैं— वह वर्तमान कालखंड में एक 'सक्रिय सनातनी' है।

तथ्य निष्ठुर होते हैं। वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने वाली शक्तियां कौन हैं? वे वही वामपंथी, छद्म-धर्मनिरपेक्ष और कट्टरपंथी तत्व हैं जो 'सनातन को डेंगू-मलेरिया' कहते हैं, जो रामचरितमानस की प्रतियां जलाते हैं और जो तुष्टिकरण की वेदी पर बहुसंख्यक समाज की बलि चढ़ाने को आतुर रहते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति इन सनातन-विरोधी शक्तियों का राजनैतिक समर्थन करता है, तो उसे 'हिंदू विरोधी' क्यों न कहा जाए? शास्त्रों का ज्ञान बघारने वाले मठाधीश यह क्यों भूल जाते हैं कि धर्म की रक्षा हवा में नहीं होती; उसके लिए एक अनुकूल और आक्रामक राजसत्ता की आवश्यकता होती है। जब राजसत्ता ही धर्म-विरोधियों के हाथ में चली जाएगी, तो क्या मठों की दीवारें और सस्वर श्लोक-पाठ जिहादी उन्माद को रोक पाएंगे?

सैद्धांतिक शुचिता (Abstract Purity) का आत्मघाती मोह

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब हमने 'सैद्धांतिक शुचिता' (Abstract Purity) के मोह और आपसी अहंकार में अपनी राजनैतिक और सैन्य शक्ति को खंडित किया है, तब-तब आक्रांताओं ने इस पुण्यभू को रौंदा है। बख्तियार खिलजी ने जब नालंदा को जलाया था, तब उसने वहाँ के आचार्यों की 'शास्त्र-सम्मत' शुद्धता का प्रमाणपत्र नहीं देखा था; उसने यह देखा था कि उनके पास उस ज्ञान की रक्षा करने वाला कोई 'राजदण्ड' (State Power) नहीं था।

पितामह भीष्म की 'प्रतिज्ञा' के हठ ने द्रौपदी के चीरहरण का मार्ग प्रशस्त किया था। आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जैसे संतों का यह 'सैद्धांतिक हठ' और राजनेताओं के बयानों की बाल-की-खाल निकालने की प्रवृत्ति उसी महाभारत कालीन भूल की पुनरावृत्ति है। जब वामपंथी-जिहादी गठजोड़ हमारे सभ्यतागत अस्तित्व को मिटाने के लिए एकजुट है, तब हमारे संत राजनेताओं से 'असली और नकली' हिंदू की बहस में उलझे हुए हैं। धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी श्री कृष्ण की भांति यथार्थवादी, कठोर और कूटनीतिक मार्ग अपनाना ही युगधर्म होता है। 'शास्त्र और शस्त्र' दोनों का समन्वय ही राष्ट्र की संप्रभुता का आधार है; शस्त्रधारी (राजसत्ता) को कमजोर करके शास्त्रधारी (संत) कभी सुरक्षित नहीं रह सकता

क्या मठाधीशों का यह बेलगाम अहंकार और 'प्रमाणपत्र' बांटने की यह पाखंडी लालसा सनातन धर्म को उस काले दिन के लिए तैयार कर रही है, जब उनके ये स्व-प्रमाणित 'सर्टिफिकेट' किसी जिहादी आक्रांता की नंगी तलवार के आगे रद्दी का टुकड़ा सिद्ध होंगे? क्या आने वाली पीढ़ियां इस कालखंड को सभ्यतागत एकता के पुनर्जागरण के लिए याद रखेंगी, या उन संतों के दर्प के लिए जो एक सभ्यतागत युद्ध के मध्य में खड़े होकर केवल अपने 'अहंकार' की आरती उतार रहे थे?

वैचारिक रणभूमि: मठाधीशी कुतर्कों और वामपंथी विमर्श का विध्वंस (FAQs)

१. क्या बृजेश पाठक का यह कहना उचित है कि 'भाजपा का विरोध करने वाले हिंदू विरोधी हैं'?

भाषाई आवरण को हटाकर यदि इसके भू-राजनैतिक (Geopolitical) यथार्थ को देखें, तो यह शत-प्रतिशत सत्य है। आज भाजपा का विरोध करने वाली मुख्य शक्तियां कौन हैं? वे वही 'इकोसिस्टम' हैं जो सनातन को 'डेंगू-मलेरिया' बताते हैं, रामचरितमानस जलाते हैं और तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं। ऐसे सनातन-द्रोहियों का राजनैतिक समर्थन करने वाला व्यक्ति 'हिंदू' कैसे हो सकता है? यह एक कड़वा यथार्थ है, जिसे स्वीकार करने का साहस मठाधीशों में नहीं है।

२. क्या शंकराचार्य जी को 'हिंदू' की परिभाषा तय करने का शास्त्र-सम्मत अधिकार नहीं है?

सैद्धांतिक रूप से अवश्य है, परंतु उनका यह 'अधिकार' केवल आध्यात्मिक और धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित है। विडंबना यह है कि जब वे स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या अन्य राजनेताओं को अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर 'हिंदुत्व' का प्रमाणपत्र बांटते हैं, तो वे धर्म-संसद की मर्यादा लांघकर विशुद्ध राजनैतिक ठेकेदारी कर रहे होते हैं। एक नेता के बयान पर भड़कना और दूसरे को प्रमाणपत्र देना ही उनका सबसे बड़ा 'मठाधीशी पाखंड' है।

३. 'राजनैतिक हिंदू' (Political Hindu) और 'अनुष्ठानिक हिंदू' (Ritualistic Hindu) में क्या अंतर है?

अनुष्ठानिक हिंदू वह है जो मंदिर जाता है और शास्त्रों का पाठ करता है, परंतु जब सभ्यता पर संकट आता है तो 'अहिंसा' की आड़ में मूक दर्शक बन जाता है। इसके विपरीत, वीर सावरकर के दर्शन पर आधारित 'राजनैतिक हिंदू' वह योद्धा है जो अपनी लोकतांत्रिक शक्ति (मतदान) का उपयोग करके एक ऐसा सुदृढ़ 'राजदण्ड' स्थापित करता है, जो आक्रांताओं का मान-मर्दन कर सनातन धर्म की रक्षा करता है। आज के इस सभ्यतागत युद्ध में राष्ट्र को केवल 'राजनैतिक हिंदू' की ही आवश्यकता है।

४. मठाधीशों का यह 'सैद्धांतिक हठ' भविष्य के लिए कितना घातक सिद्ध हो सकता है?

यह उसी प्रकार आत्मघाती है जैसे बख्तियार खिलजी के आक्रमण के समय नालंदा के आचार्यों का कोरा शास्त्र-ज्ञान। आचार्य चाणक्य का स्पष्ट सिद्धांत है कि बिना 'राजदण्ड' (State Power) के 'धर्मदण्ड' की रक्षा असंभव है। यदि ये संत राजनेताओं से बाल-की-खाल निकालने वाले विवादों में उलझकर बहुसंख्यक समाज की राजनैतिक शक्ति को विखंडित करेंगे, तो अंततः 'गजवा-ए-हिंद' की चाह रखने वाली शक्तियों के लिए ही मार्ग प्रशस्त होगा।

सभ्यतागत दायित्व: इस वैचारिक शंखनाद को घर-घर पहुँचाएँ

मठाधीशी अहंकार और वामपंथी विमर्श के इस आत्मघाती गठजोड़ को केवल पढ़कर मौन रह जाना भी एक प्रकार की कायरता है। यदि आप वास्तव में एक 'राजनैतिक हिंदू' हैं, तो अपनी वैचारिक तटस्थता त्यागें। इस निष्ठुर यथार्थ को हर उस सनातनी तक पहुँचाना आपका धर्म है, जो छद्म-आदर्शवाद के भंवर में फँसकर अपने ही 'राजदण्ड' को कमजोर कर रहा है। उठें और इस लेख रूपी 'ब्रह्मास्त्र' का संधान करें!

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