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| विपक्ष का यह रुदन गाजा के लिए नहीं, अपितु अपनी समाप्त होती राजनैतिक प्रासंगिकता और उस 'इस्लामिक वीटो' के ध्वंस के लिए है, जिसने दशकों तक भारत की सामरिक संप्रभुता को बंधक बनाए रखा था। |
"अंतर्राष्ट्रीय राजनीति 'अहिंसा' और 'पंचशील' के कोरे कागजों पर नहीं, अपितु कठोर 'राष्ट्रीय स्वार्थ' और सामरिक शक्ति के लौह-पत्रों पर लिखी जाती है।"
जबसे भारत ने अपनी विदेश नीति को 'लुटियंस' के वातानुकूलित कक्षों की कायरता से निकालकर यथार्थवाद के धरातल पर खड़ा किया है, तबसे खाड़ी देशों के महलों और भारत के वामपंथी इकोसिस्टम में एक अघोषित मातम छाया हुआ है। समस्या यह नहीं है कि भारत और इजरायल के सामरिक संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं; असली विक्षोभ यह है कि इन प्रगाढ़ होते संबंधों ने उस 'इस्लामिक वीटो' (Islamic Veto) को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है, जिसे दशकों तक हमारी संप्रभुता पर थोपा गया था। आज जब विपक्ष 'फिलिस्तीन-फिलिस्तीन' का रुदन करता है, तो वह वास्तव में किसी मानवाधिकार के लिए नहीं, बल्कि अपने खिसकते हुए 'वोट-बैंक' और "तुष्टिकरण की कूटनीतिक" मृत्यु पर छाती पीट रहा है। यह चीख-पुकार भारत के एक 'सॉफ्ट स्टेट' (Soft State) से 'सामरिक महाशक्ति' में परिवर्तित होने का शोक-गीत है।
'सभ्यतागत अद्वैत' और 'इस्लामिक वीटो' का ध्वंस
भारत और इजरायल मात्र दो भौगोलिक 'राष्ट्र-राज्य' (Nation-States) नहीं हैं; ये उन दो प्राचीनतम सभ्यताओं के जीवित प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने सदियों तक 'अब्राहमिक विस्तारवाद' और "जिहादी रक्तपात" का सामना अपने प्राणों की आहुति देकर किया है। दशकों तक, भारत की कांग्रेसी विदेश नीति पर अरब जगत का एक अघोषित भय हावी रहा—कि यदि भारत इजरायल के निकट गया, तो खाड़ी देश रुष्ट हो जाएंगे और हमें तेल मिलना बंद हो जाएगा।
वर्तमान नेतृत्व ने आचार्य चाणक्य की 'मण्डल-नीति' (Mandala Theory) का प्रयोग करते हुए इस 'पेट्रो-डॉलर' के अहंकार को निर्दयता से कुचल दिया है। कूटनीति को 'डी-हाइफेन' (De-hyphenate) करके भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि तेल अवीव (Tel Aviv) के साथ हमारे संबंध, रामल्लाह (Ramallah) की मोहताज नहीं हैं। यह एक ऐसा सभ्यतागत गठबंधन है, जिसे देखकर पैन-इस्लामिक (Pan-Islamic) शक्तियों का विक्षुब्ध होना अत्यंत स्वाभाविक है। जब आप इस कूटनीतिक यथार्थ को वीर सावरकर के 'राजनैतिक हिंदुत्व' (Political Hindutva) के चश्मे से देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि राष्ट्र-रक्षा के लिए यह निर्मम यथार्थवाद कितना अनिवार्य है।
विपक्ष का 'फिलिस्तीनी विलाप': वोट-बैंक का अंतिम हथियार
हमारे देश के विपक्ष (वामपंथी और कांग्रेसी इकोसिस्टम) का राजनीतिक पोस्टमार्टम करें, तो उनका नग्न पाखंड उजागर होता है। बलूचिस्तान में जब पाकिस्तानी सेना नरसंहार करती है, तिब्बत में जब बौद्धों की अस्मिता कुचली जाती है, या शिनजियांग में उइगरों को यातना शिविरों में रखा जाता है, तब इन 'मानवाधिकार के स्वयंभू ठेकेदारों' की जुबानें सिल जाती हैं। परंतु गाजा का नाम आते ही इनकी धमनियों में 'क्रांति' का रक्त उबलने लगता है। क्यों?
क्योंकि दशकों तक 'फिलिस्तीन-समर्थन' को भारतीय मुसलमानों के तुष्टिकरण का एक भू-राजनैतिक अस्त्र (Geopolitical Tool) बनाकर रखा गया था। विपक्ष विशेषकर कांग्रेस ने एक कृत्रिम विमर्श गढ़ा था कि इजरायल का विरोध ही भारत में 'धर्मनिरपेक्षता' का अंतिम प्रमाण है। भारत-इजरायल मैत्री ने विपक्ष के हाथ से तुष्टिकरण का वह 'वीटो' छीन लिया है। विपक्ष का यह रुदन गाजा के बच्चों के लिए नहीं, अपितु अपनी समाप्त होती राजनैतिक प्रासंगिकता और उस सभ्यतागत अस्तित्व (Civilizational Existence) के जागरण के विरुद्ध है, जिसे वे कभी पनपने नहीं देना चाहते थे।
कारगिल से लेकर कृषि तक: 'सामरिक संप्रभुता' का अजेय दुर्ग
भावनात्मक विमर्शों से परे, कूटनीति निष्ठुर स्वार्थों पर टिकी होती है। जब 1999 के कारगिल युद्ध में पश्चिमी देश भारत को 'संयम' का उपदेश पिला रहे थे, तब वह इजरायल ही था जिसने बिना किसी 'मानवाधिकार' की शर्त के लेज़र-गाइडेड बम और अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) देकर भारतीय सेना की विजय सुनिश्चित की थी।
आज कृषि में 'ड्रिप इरिगेशन' (Drip Irrigation) से लेकर, सीमाओं पर 'फाल्कन अवाक्स' (Phalcon AWACS) रडार और एयरोस्पेस तकनीक तक, इजरायल के साथ इस अद्वैत ने भारत को उस पश्चिमी और मध्य-पूर्वी ब्लैकमेल से सर्वथा मुक्त कर दिया है। हमारी यह आत्मनिर्भर और अभेद्य 'सामरिक संप्रभुता' ही जिहादी और विघटनकारी शक्तियों के हृदय में शूल बनकर चुभ रही है। वे जानते हैं कि भारत आज इजरायल के साथ मजबूती के साथ खड़ा है, अब उसे 'इस्लामिक कट्टरपंथ' या 'अंतर्राष्ट्रीय दबाव' से झुकाया नहीं जा सकता।
वैचारिक रणभूमि: वामपंथी कुतर्कों का बौद्धिक विध्वंस (FAQs)
१. क्या भारत को फिलिस्तीन में 'मानवाधिकारों' के नाम पर इजरायल का विरोध नहीं करना चाहिए?
यह वामपंथियों का सबसे बड़ा वैचारिक पाखंड है। भारत एक उत्तरदायी राष्ट्र के रूप में गाजा को मानवीय और चिकित्सा सहायता निरंतर भेजता है, किंतु 'मानवाधिकार' की आड़ में हमास जैसे जिहादी आतंकवाद का समर्थन नहीं कर सकता। जो इजरायल कारगिल युद्ध और बालाकोट के समय हमारा संकटमोचक बना, हम उस सामरिक भ्राता को इन वामपंथी रुदालियों के विलाप के लिए नहीं छोड़ सकते। राष्ट्र-हित सर्वोपरि है।
२. क्या इजरायल से प्रगाढ़ मैत्री के कारण खाड़ी देशों से हमारे संबंध बिगड़ेंगे और 'तेल-संकट' आएगा?
यह 'इस्लामिक वीटो' का वह पुराना और कायरतापूर्ण भय है, जिसे कांग्रेस दशकों तक देश को बेचती रही। यथार्थ यह है कि आज स्वयं खाड़ी देश (अब्राहम एकॉर्ड्स के माध्यम से) इजरायल के साथ व्यापार और सामरिक संधियां कर रहे हैं। भारत अब एक ऐसी वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति है, जो किसी 'पेट्रो-डॉलर' ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकता। हमारी 'डी-हाइफेन' नीति ने सिद्ध कर दिया है कि हम अरबों से भी मित्रता रख सकते हैं, बिना इजरायल की पीठ में छुरा घोंपे।
३. देश के विपक्ष (इंडी गठबंधन) को भारत-इजरायल मैत्री से इतनी पीड़ा क्यों है?
उनकी पीड़ा कूटनीतिक नहीं, विशुद्ध राजनैतिक और 'तुष्टिकरण' से प्रेरित है। दशकों तक उन्होंने भारत की विदेश नीति को घरेलू मुस्लिम वोट-बैंक का बंधक बनाकर रखा। 'फिलिस्तीन का समर्थन' उनकी छद्म-धर्मनिरपेक्षता का अंतिम अस्त्र था। भारत-इजरायल मैत्री ने उनके हाथ से यह 'वीटो' छीन लिया है। उनका यह विलाप गाजा के लिए नहीं, बल्कि अपने समाप्त होते राजनैतिक अस्तित्व और तुष्टिकरण की मृत्यु के लिए है।
आपका सभ्यतागत दायित्व: इस वैचारिक ब्रह्मास्त्र का संधान करें!
वामपंथी और जिहादी इकोसिस्टम के इस छद्म-विमर्श को केवल पढ़कर मौन रह जाना भी एक प्रकार की कायरता है। यदि आप वास्तव में एक 'राजनैतिक हिंदू' और राष्ट्रवादी हैं, तो अपनी निष्क्रियता त्यागें। इस निष्ठुर यथार्थ को हर उस भारतीय तक पहुँचाना आपका धर्म है, जो 'मानवाधिकार' के झूठे आवरण में फँसकर अपनी ही सामरिक सुरक्षा को कमजोर कर रहा है। उठें और वामपंथी रुदालियों के इस पाखंड को ध्वस्त करें!

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