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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

एक भारत, श्रेष्ठ भारत: विखंडनकारी विमर्शों की चिता पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सिंहनाद

 

"भारत माता का वह ओजस्वी स्वरूप जो हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैली हमारी सभ्यतागत एकता और 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की संकल्पना को प्रदर्शित करता है।"

 "भारत केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं है, यह एक राष्ट्र-पुरुष है, यह साक्षात् माँ भवानी का स्वरूप है।"– महर्षि अरविन्द

जब लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों और वामपंथी विश्वविद्यालयों के परिसरों में बैठे स्वयंभू बुद्धिजीवी, संसद के पटल पर भारत को मात्र 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहकर इस राष्ट्र-पुरुष की सनातन अस्मिता को नकारते हैं, तो यह कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं होता। यह इस पुण्यभूमि के सांस्कृतिक अधिष्ठान के विरुद्ध एक सुनियोजित वैचारिक युद्ध का उद्घोष है। यह कैसा विडंबनापूर्ण और कुत्सित परिदृश्य है! 'विविधता' (Diversity) के नाम पर एक कृत्रिम उत्तर-दक्षिण (North-South) और भाषाई दरार पैदा कर, एक आयातित 'टुकड़े-टुकड़े' तंत्र भारत माता की देह को छिन्न-भिन्न करने का षड्यंत्र रच रहा है। इस विषैले विमर्श, इस बौद्धिक आतंकवाद का एक ही शमन है— आर्यावर्त की आत्मा में सुप्त 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का प्रचंड और निर्मम जागरण।

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'यूनियन ऑफ स्टेट्स' का भ्रमजाल और आर्यावर्त

वामपंथी इतिहासकार और मैकाले की वैचारिक दासता में जकड़े हुए तत्व यह सिद्ध करने के लिए व्याकुल रहते हैं कि भारत 1947 में अंग्रेजों द्वारा गढ़ा गया कोई प्रशासनिक ढांचा मात्र है। उनके संकुचित दृष्टिकोण में यह राष्ट्र केवल एक 'पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट' है, जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। पश्चिम के 'नेशन-स्टेट' (Nation-State) के चश्मे से भारत को देखने वाले इन बौद्धिक दरिद्रों को यह स्मरण कराना आवश्यक है कि जब यूरोप के पूर्वज कबीलों में बंटे जंगलों में भटक रहे थे, तब इस भूमि का 'विष्णु पुराण' हमारी भौगोलिक और आध्यात्मिक एकात्मकता का शंखनाद कर रहा था:

"उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥"

यह राष्ट्र किसी संविधान सभा की बहस की उपज नहीं है। जब आदि शंकराचार्य ने बिना किसी सैन्यबल के, केवल अपने प्रखर ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के प्रताप से चारों दिशाओं में (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, और शृंगेरी) मठ स्थापित किए, तब उन्होंने किसी 'प्रशासनिक इकाई' का नहीं, अपितु एक अखंड सांस्कृतिक साम्राज्य का एकीकरण किया था। काशी के घाटों से लेकर कांचीपुरम के मंदिरों तक बहने वाली चेतना एक है। हमारा राष्ट्रवाद पश्चिम की तरह किसी कृत्रिम शत्रु के भय से नहीं जन्मा, बल्कि यह हमारी साझी आध्यात्मिक विरासत का स्वाभाविक प्रकटीकरण है

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क्षुद्र राजनीतिक मंडियों में बिकता क्षेत्रीय 'उप-राष्ट्रवाद'

आज देश के कुछ हिस्सों में क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए 'उप-राष्ट्रवाद' (Sub-nationalism) की भट्टी सुलगा रहे हैं। द्रविड़-आर्यन का वह विषैला मिथक, जिसे औपनिवेशिक आकाओं ने हमारी जड़ों में विष घोलने के लिए गढ़ा था, आज भी विघटनकारी शक्तियों का सबसे मारक अस्त्र बना हुआ है। भाषा, जाति और क्षेत्र की अस्मिता की आड़ में क्षुद्र वोट-बैंक के लिए राष्ट्र की संप्रभुता को निर्लज्जता से दांव पर लगाया जा रहा है।

आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में राजधर्म की व्याख्या करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी थी कि आंतरिक कलह और विखंडनकारी तत्व राष्ट्र को उस दीमक की भांति खोखला करते हैं, जो बाहर से अदृश्य होती है। उत्तर प्रदेश के हृदय स्थल— गंगा-यमुना के पावन दोआब से लेकर सुदूर दक्षिण तक की जमीनी सच्चाई यही है कि आम जनमानस इस विभाजनकारी राजनीति को भीतर से नकार चुका है।

इतिहास इसका साक्षी है कि जब-जब क्षुद्र क्षेत्रीय स्वार्थों ने राष्ट्रीय अस्मिता के ऊपर सिर उठाया है, तब-तब आक्रांताओं ने इस भूमि को रौंदा है। यदि हम इतिहास के पन्नों से सत्य को निचोड़ें, तो छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित 'हिंदवी स्वराज्य' इसी 'एक भारत' की अक्षुण्ण भावना का सबसे प्रखर स्वरूप था। उन्होंने केवल एक साम्राज्य नहीं खड़ा किया, बल्कि उस मजहबी कट्टरता और विस्तारवाद— जिसका क्रूर और वीभत्स प्रतीक टीपू सुल्तान जैसे आक्रांता रहे हैं— के घोर अंधकार को चीरकर सनातन अस्मिता को पुनर्स्थापित किया था। शिवाजी का विमर्श जोड़ने का था, जबकि टीपू सुल्तान का विमर्श धर्मांधता और सांस्कृतिक विध्वंस का था। आज का यह वामपंथी और छद्म-धर्मनिरपेक्ष तंत्र उसी विध्वंसकारी मानसिकता का आधुनिक संस्करण है।

'श्रेष्ठ भारत' का चाणक्य-सूत्र और एकात्मता का अंतिम समाधान

'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' सत्ता के गलियारों में गूंजने वाला कोई खोखला राजनीतिक नारा नहीं है; यह आधुनिक राजधर्म की आत्मा है, हमारा अंतिम लक्ष्य है। 'श्रेष्ठ' बनने की यह यात्रा केवल जीडीपी (GDP) के चमकदार आंकड़ों, गगनचुंबी इमारतों या भौतिक चकाचौंध से पूर्ण नहीं होती।

पश्चिम-प्रेरित 'मल्टीकल्चरलिज्म' (Multiculturalism), जो केवल अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नींव पर टिका है, हमारे लिए एक धीमे विषपान के समान है। यह सिद्धांत समाज को अलग-अलग खांचों में बांटता है। हमारी एकात्मता और श्रेष्ठता का एकमात्र अकाट्य समाधान 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' है। भारत की सहिष्णुता, इसका लोकतंत्र और इसका समावेशी चरित्र किसी आयातित 'सेक्युलरिज्म' का ऋणी नहीं है; यह इसके सनातन, हिंदू बहुसंख्यक चरित्र का सहज और स्वाभाविक गुण है। जिस दिन इस जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक धुरी को कमजोर किया गया, उस दिन 'श्रेष्ठ भारत' तो दूर, 'एक भारत' भी शेष नहीं रहेगा।

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विविधता हमारा अलंकार अवश्य है, यह हमारी शक्ति है, परंतु इसे राष्ट्र-विभाजन का अस्त्र बनने की छूट किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जा सकती। राष्ट्रीय अस्मिता के यज्ञ में हर क्षेत्रीय और भाषाई अहंकार की आहुति देनी ही होगी।

क्या हम उन विघटनकारी, आयातित विचारधाराओं को अपनी कायरतापूर्ण चुप्पी के बल पर इस अजर-अमर 'राष्ट्र-पुरुष' को क्षत-विक्षत करने देंगे, या फिर अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रचंड ब्रह्मास्त्र से इस 'टुकड़े-टुकड़े' विमर्श का समूल नाश कर एक अखंड, अजेय और 'श्रेष्ठ भारत' का निर्माण करेंगे? निर्णय हमारा है— क्योंकि इतिहास न तो कायरों को क्षमा करता है, और न ही तटस्थ रहने वाले मूक दर्शकों को।

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प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. क्या भारत केवल एक 'प्रशासनिक संघ' (Union of States) है?

जी नहीं। भारत को मात्र 'राज्यों का संघ' कहना इसकी सांस्कृतिक आत्मा को नकारना है। संवैधानिक रूप से भले ही यह शब्दों का समूह हो, परंतु वैचारिक और ऐतिहासिक रूप से भारत एक 'सभ्यतागत राष्ट्र' (Civilizational State) है, जिसकी अखंडता का आधार वेदों, पुराणों और सांस्कृतिक केंद्रों (शक्तिपीठों/मठों) द्वारा हजारों वर्ष पूर्व ही तय कर दिया गया था।

२. 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' अभियान का मूल उद्देश्य क्या है?

इसका मूल उद्देश्य राज्यों के बीच केवल पर्यटन बढ़ाना नहीं, अपितु उस 'सांस्कृतिक सूत्र' को पुनर्जीवित करना है जो भाषा, वेशभूषा और खान-पान की विविधता के बावजूद हम सबको एक सूत्र में पिरोता है। यह औपनिवेशिक मानसिकता द्वारा पैदा की गई क्षेत्रीय दूरियों को पाटकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को सुदृढ़ करने का प्रकल्प है।

३. क्या क्षेत्रीय भाषाएँ राष्ट्रवाद के मार्ग में बाधा हैं?

कदापि नहीं। भारत की प्रत्येक प्रांतीय भाषा उस महान सनातन संस्कृति की ही अभिव्यक्ति है। समस्या भाषा से नहीं, बल्कि उस 'भाषाई राजनीति' (Linguistic Politics) से है जिसे विखंडनकारी शक्तियां अलगाववाद के औजार के रूप में प्रयोग करती हैं। 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' भाषाई गौरव को राष्ट्रीय गौरव के अधीन लाने का प्रयास है।

४. 'विविधता' और 'विखंडन' के बीच की रेखा क्या है?

विविधता राष्ट्र का अलंकार है, किंतु जब यही विविधता 'विशिष्ट अधिकारों' या 'स्वतंत्र अस्मिताओं' की मांग करने लगे जिससे राष्ट्र की संप्रभुता संकट में पड़े, तो वह विखंडन की श्रेणी में आती है। श्रेष्ठ भारत वही है जहाँ क्षेत्रीय पहचान, राष्ट्रीय पहचान में विलीन हो जाए, न कि उसके विरुद्ध खड़ी हो।

५. आधुनिक युवा इस राष्ट्रवादी विमर्श से कैसे जुड़ सकते हैं?

युवाओं को पश्चिम द्वारा थोपे गए भ्रामक इतिहास के स्थान पर भारत के वास्तविक नायक— जैसे आचार्य चाणक्य, आदि शंकराचार्य और छत्रपति शिवाजी महाराज के सिद्धांतों को आत्मसात करना चाहिए। बौद्धिक सतर्कता और अपनी जड़ों के प्रति गौरव ही 'श्रेष्ठ भारत' के निर्माण की पहली सीढ़ी है।

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