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"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"
स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था,
"प्रत्येक राष्ट्र का एक मुख्य प्रवाह होता है, एक जीवन-संगीत होता है। भारत का जीवन-संगीत धर्म है, आध्यात्मिकता है। यदि आपने इसे त्याग दिया, तो यह राष्ट्र तीन पीढ़ियों में विलुप्त हो जाएगा।"
दशकों तक उत्तर प्रदेश, जो कभी आर्यावर्त का हृदय और वैदिक ज्ञान का उद्गम स्थल था, अपने इसी 'जीवन-संगीत' से विमुख रहा। परिणाम हम सभी ने देखा—यह पावन धरा 'बीमारू' राज्य की संज्ञा पाने के लिए विवश हो गई। अराजकता, तुष्टिकरण और जातिवाद के विषैले त्रिकोण ने प्रदेश की 'आत्मा' को मूर्छित कर दिया था।
किंतु, आज हम जिस उत्तर प्रदेश को देख रहे हैं, वह मात्र प्रशासनिक फेरबदल का परिणाम नहीं है। यह एक गहन वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतिफल है। आज के उत्तर प्रदेश का अभ्युदय इस बात का प्रमाण है कि 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' केवल एक भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि सुशासन और आर्थिक प्रगति का सबसे सुदृढ़ 'प्रस्थान-बिंदु' है।
सांस्कृतिक अस्मिता: विकास का मेरुदंड
लंबे समय तक भारतीय राजनीति में एक भ्रामक विमर्श स्थापित किया गया कि "विकास और संस्कृति दो परस्पर विरोधी ध्रुव हैं।" तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि यदि आप मंदिर की बात करेंगे, तो आप आधुनिकता से दूर हो जाएंगे। वर्तमान उत्तर प्रदेश ने इस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक पूजास्थल का निर्माण नहीं है; यह भारत के 'सांस्कृतिक स्वाभिमान' की पुनर्स्थापना है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का कायाकल्प हो या विंध्य कॉरिडोर का निर्माण—ये परियोजनाएं सिद्ध करती हैं कि जब शासन अपनी जड़ों पर गर्व करता है, तो उसकी शाखाएं आकाश छूने का सामर्थ्य रखती हैं। यह 'विरासत और विकास' का वह अद्भुत समन्वय है, जिसने उत्तर प्रदेश को वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया है।
'राम राज्य' की आधुनिक अवधारणा
महर्षि अरविंद ने कहा था कि "सनातन धर्म ही भारत का राष्ट्रवाद है।" इस राष्ट्रवाद का मूल मंत्र 'राम राज्य' है। राम राज्य का अर्थ किसी पंथ विशेष की सत्ता नहीं, बल्कि तुलसीदास जी के शब्दों में—
"दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहूँ नहिं व्यापा"
विगत कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने जिस तरह 'कानून के राज' को स्थापित किया है, वह इसी दर्शन का व्यावहारिक रूप है। आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट लिखा है कि
"दंड ही धर्म का रक्षण करता है।"राज्य की नरम शक्ति उसकी संस्कृति है, लेकिन उसे सुरक्षित रखने के लिए कठोर शक्ति अनिवार्य है। माफिया राज का अंत और महिलाओं की सुरक्षा—ये केवल पुलिसिया कार्यवाही नहीं, बल्कि उस शासकीय इच्छाशक्ति का परिणाम है, जो मानती है कि
"अधर्म का नाश करना ही राजधर्म है"
जातिवाद से ऊपर राष्ट्रवाद
उत्तर प्रदेश की राजनीति दशकों तक जातिगत समीकरणों की प्रयोगशाला बनी रही। 'वोट बैंक' की राजनीति ने समाज को टुकड़ों में बांट दिया था। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने इस विखंडन के विरुद्ध एक 'एकीकरण' की भूमिका निभाई है।
जब दीपोत्सव में लाखों दीये जलते हैं, या जब कांवड़ यात्रा पर पुष्प वर्षा होती है, तो वहां कोई ब्राह्मण, दलित या पिछड़ा नहीं होता—वहां केवल एक 'सनातनी' और एक 'राष्ट्रभक्त' होता है। सांस्कृतिक प्रतीकों ने समाज के वंचित वर्गों को भी मुख्यधारा से जोड़ा है। महाराजा सुहेलदेव हों या निषादराज, महापुरुषों के सम्मान ने यह संदेश दिया है कि राष्ट्र निर्माण में हर वर्ग का रक्त और स्वेद समान रूप से पवित्र है। यह सामाजिक समरसता ही प्रदेश की स्थिरता का कारण बनी है।
आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था
आलोचकों को यह समझना होगा कि संस्कृति केवल मन की शांति नहीं देती, वह पेट भरने का साधन भी बनती है। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' ने उत्तर प्रदेश में एक नई 'आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था' को जन्म दिया है।
आंकड़े झूठ नहीं बोलते। वर्ष 2022-23 में उत्तर प्रदेश में आने वाले घरेलू पर्यटकों की संख्या गोवा और केरल जैसे राज्यों से कई गुना अधिक रही। अकेले काशी में एक वर्ष में 10 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन हुआ। यह भीड़ केवल दर्शनार्थी नहीं है; यह एक उपभोक्ता वर्ग है जो परिवहन, होटल, हस्तशिल्प और स्थानीय बाजार को गति देता है। कुंभ मेला 2025 की तैयारियां इस बात का संकेत हैं कि उत्तर प्रदेश भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के स्वप्न को साकार करने में 'ग्रोथ इंजन' की भूमिका निभाएगा।
भविष्य का पथ
उत्तर प्रदेश का यह कायाकल्प हमें क्या सिखाता है? यही कि "मूल से कटकर कोई भी वृक्ष फल-फूल नहीं सकता।"
आज उत्तर प्रदेश अपनी हीनभावना को त्यागकर अपनी श्रेष्ठता को पहचान चुका है। यह वह प्रदेश है जिसने भारत को बुद्ध दिए, कबीर दिए, और क्रांतिवीर दिए। आज का नेतृत्व यह समझता है कि आधुनिक एक्सप्रेस-वे और डिफेंस कॉरिडोर आवश्यक हैं, लेकिन वे शरीर मात्र हैं; उस शरीर की 'आत्मा' उसकी संस्कृति है।
हमें यह स्मरण रखना होगा कि यह यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। हमारा लक्ष्य केवल एक 'उत्तम प्रदेश' बनाना नहीं, बल्कि भारत को पुनः 'विश्वगुरु' के पद पर आसीन करना है। और इसका मार्ग लखनऊ और अयोध्या से होकर ही जाता है।
आइए, हम इस सांस्कृतिक यज्ञ में अपनी आहुति दें और संकल्प लें कि हम आधुनिक बनेंगे, वैज्ञानिक बनेंगे, लेकिन अपनी जड़ों, अपने मूल्यों और अपने राष्ट्रवाद से कभी समझौता नहीं करेंगे।
"राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम।" (यह सब राष्ट्र के लिए है, मेरा इसमें कुछ भी नहीं।)
लेखक: एक राष्ट्रवादी चिंतक एवं राजनीतिक विश्लेषक (विशेषज्ञता: भारतीय दर्शन एवं उत्तर प्रदेश की राजनीति)

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