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वीर सावरकर: वामपंथी प्रलाप की चिता पर 'हिंदू राष्ट्र' के सैनिकीकरण का शंखनाद

वीर सावरकर का ओजस्वी चित्र, जिसमें वे अखंड भारत के स्वर्णिम मानचित्र के समक्ष 'हिंदुत्व' रूपी अभेद्य ढाल धारण किए हुए हैं, जिससे टकराकर आक्रांता और विखंडनकारी शक्तियां भस्म हो रही हैं।
सावरकर प्रणीत 'हिंदुत्व' कोई संकीर्ण कर्मकांड नहीं, अपितु 'पैन-इस्लामिज्म' और विखंडनकारी शक्तियों के विरुद्ध आर्यावर्त का प्रथम और अंतिम सभ्यतागत सुरक्षा-कवच है।
"हिंदू राजनीति का हिंदूकरण करो और हिंदू राष्ट्र का सैनिकीकरण करो।"
– स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर

प्रतिवर्ष 26 फरवरी की तिथि आते ही लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों और वामपंथी विश्वविद्यालयों में बैठे स्वयंभू बुद्धिजीवियों का एक गिरोह वीर सावरकर के चरित्र हनन का अपना कुत्सित वार्षिक अनुष्ठान प्रारंभ कर देता है। यह कितना विक्षोभकारी और विडंबनापूर्ण परिदृश्य है कि जो छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादी आज एक सुरक्षित, आक्रामक और परमाणु-संपन्न भारत की छाती पर बैठकर चैन की सांस ले रहे हैं, वे उस सामरिक दृष्टा (Strategic Visionary) को कोसने में अपना संपूर्ण जीवन खपा देते हैं जिसने इस अभेद्य सुरक्षा-कवच का वैचारिक बीजारोपण किया था! एक कृत्रिम 'चरखे' की मरीचिका को पूजने वाले ये दरबारी इतिहासकार कभी यह स्वीकार नहीं कर पाए कि राष्ट्र की संप्रभुता कोरी भावुकता से नहीं, अपितु खड्ग की तीक्ष्ण धार से रक्षित होती है। सावरकर के 'हिंदुत्व' और 'सैनिकीकरण' के दर्शन को समझे बिना आधुनिक भारत की भू-राजनैतिक सफलताओं की मीमांसा करना नितांत असंभव है।


'क्षमा-याचिका' का वामपंथी कुतर्क और सावरकर की 'चाणक्य-नीति'

सावरकर के वैचारिक प्रताप से भस्म होने का भय पाले वामपंथी गिरोह का सबसे प्रिय अस्त्र है— अंडमान की सेलुलर जेल से लिखी गई याचिकाएं। इन याचिकाओं को 'कायरता' का प्रमाण बताकर छाती पीटने वाले बौद्धिक दरिद्रों को न तो आचार्य चाणक्य का 'अर्थशास्त्र' समझ आता है और न ही छत्रपति शिवाजी महाराज की सामरिक कूटनीति।

कालकोठरी में कोल्हू चलाते हुए तिल-तिल कर प्राण त्यागना एक भावुक शहादत तो हो सकती थी, परंतु राष्ट्र-निर्माण के वृहत्तर लक्ष्य के लिए वह एक 'सामरिक शून्यता' (Strategic Void) थी। सावरकर कोई भावुक आदर्शवादी मात्र नहीं थे; वे विशुद्ध यथार्थवाद (Realpolitik) के प्रणेता थे। उनकी याचिकाएं कोई आत्मसमर्पण नहीं, अपितु शिवाजी महाराज की 'पुरंदर की संधि' जैसी एक महान सामरिक वापसी (Tactical Retreat) थी। क्या भगवान श्रीकृष्ण का 'रणछोड़' रूप उनकी कायरता थी? कदापि नहीं! वह धर्म-संस्थापना के लिए उठाया गया एक कूटनीतिक पग था। सावरकर भली-भांति जानते थे कि जेल की दीवारों के बाहर आकर वृहत्तर हिंदू समाज को संगठित करना और उसे विखंडनकारी शक्तियों के विरुद्ध एक अभेद्य दुर्ग में परिवर्तित करना ही तत्कालीन युगधर्म था। शत्रु के थोपे गए नियमों से बंधकर नहीं, अपितु 'साम, दाम, दंड, भेद' के कूटनीतिक चातुर्य से युद्ध लड़ना ही सच्ची चाणक्य-नीति है।

'हिंदुत्व'— कोई कर्मकांड नहीं, अपितु एक अभेद्य 'सभ्यतागत सुरक्षा कवच'

विरोधी विमर्श ने दशकों तक एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत 'हिंदुत्व' को एक संकीर्ण, रूढ़िवादी और अल्पसंख्यक-विरोधी कर्मकांड के रूप में प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया। परंतु सावरकर का 'हिंदुत्व' कोई संकीर्ण पूजा-पद्धति नहीं है; यह भारतीय राष्ट्रवाद की पहली विशुद्ध वैज्ञानिक और सभ्यतागत (Civilizational) परिभाषा है। उन्होंने 'पितृभू' (Fatherland) और 'पुण्यभू' (Holyland) के सिद्धांत से उस राष्ट्रीय अस्मिता को पारिभाषित किया, जिसे मैकाले की शिक्षा-पद्धति और औपनिवेशिक दासता लील जाना चाहती थी।

सावरकर का यह दर्शन उस 'पैन-इस्लामिज्म' और ब्रिटिश विस्तारवाद के विरुद्ध गढ़ा गया एक लौह कवच था, जो भारत की जड़ों में विखंडन का विष घोल रहा था। आज जब हम आधुनिक परिप्रेक्ष्य में 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' और 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की उद्घोषणा करते हैं, तो उसका मूल प्राणतत्त्व सावरकर के इसी दर्शन से ऊर्जा प्राप्त करता है। यह विमर्श स्थापित करता है कि आर्यावर्त की एकात्मकता किसी आयातित 'मल्टीकल्चरलिज्म' पर नहीं, बल्कि इसकी सनातन बहुसंख्यक चेतना पर टिकी है।

ज़रूर पढ़ें :  हिंदुत्व का वैचारिक दृष्टिकोण : सावरकर, RSS और कांग्रेस

कोरी अहिंसा की मरीचिका और आज के 'सशक्त भारत' का सावरकरवादी यथार्थ

तथाकथित दरबारी इतिहासकारों ने 'अहिंसा परमो धर्मः' के अधूरे श्लोक को राष्ट्र के गले में बांधकर उसे सामरिक रूप से नपुंसक बनाने का भयंकर पाप किया। उन्होंने "धर्म हिंसा तथैव च" के वैदिक और महाभारतकालीन सत्य को जानबूझकर छिपा दिया। सावरकर उस कालखंड के अकेले वह सिंह थे जिन्होंने इस कोरी अहिंसा के आत्मघाती सम्मोहन को चीरकर 'राष्ट्र के सैनिकीकरण' का प्रखर शंखनाद किया था।

आज का नया भारत, जो सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक करता है, जो डोकलाम और गलवान में विस्तारवादी ताकतों की आंखों में आंखें डालकर प्रचंड प्रतिकार करता है, और जो वैश्विक पटल पर 'शस्त्र से शांति' (Peace through strength) का सिंहनाद करता है— वह नेहरूवादी 'पंचशील' के मृतप्राय आदर्शों पर नहीं चल रहा है। वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सावरकर की उसी यथार्थवादी रक्षा-नीति का ही अनुकरण कर रहा है।

क्या हम इस ऐतिहासिक सत्य से आंखें मूंद सकते हैं कि यदि 1947 में सत्ता हस्तांतरण के समय इस राष्ट्र के नियंताओं ने कोरे आदर्शवाद को त्यागकर सावरकर की सामरिक दृष्टि और 'हिंदुत्व' के दर्शन को आत्मसात कर लिया होता, तो क्या भारत माता को विभाजन की वह रक्तरंजित विभीषिका झेलनी पड़ती? क्या कश्मीर दशकों तक एक नासूर बनकर रिसता रहता, या 1962 के युद्ध में हमें वह सामरिक अपमान सहना पड़ता? समय का क्रूर चक्र अंततः उसी वैचारिक अधिष्ठान पर लौटकर आता है जो शाश्वत है; और आज का यह उदीयमान, आक्रामक और सुदृढ़ 'हिंदू राष्ट्र' स्वातंत्र्यवीर सावरकर की उसी वैचारिक विजय का जीवंत प्रमाण है।

वैचारिक रणभूमि: सावरकर पर वामपंथी कुतर्कों का विध्वंस (FAQs)

१. क्या सावरकर ने सेलुलर जेल से अंग्रेजों को 'माफीनामा' (Mercy Petition) लिखा था?

यह वामपंथी इतिहासकारों का सबसे बड़ा प्रलाप है। सावरकर एक 'पॉलिटिकल प्रिजनर' थे, और तत्कालीन ब्रिटिश कानूनों के अंतर्गत याचिकाएं दायर करना उनका विधिक अधिकार था। कालकोठरी में सड़कर मरना कोई राष्ट्रनीति नहीं है। उनकी याचिकाएं छत्रपति शिवाजी महाराज की मुगलों के साथ की गई संधियों की भांति एक 'सामरिक वापसी' (Tactical Retreat) थीं, ताकि बाहर आकर वे वृहत्तर राष्ट्र-कार्य कर सकें।

२. सावरकर का 'हिंदुत्व' क्या है? क्या यह अल्पसंख्यकों के विरुद्ध है?

सावरकर का हिंदुत्व कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं, अपितु एक विशुद्ध भू-राजनैतिक (Geopolitical) और सभ्यतागत अवधारणा है। जो भी इस भूमि (सिंधु से समुद्र तक) को अपनी 'पितृभू' (मातृभूमि) और 'पुण्यभू' (पवित्र भूमि) मानता है, वह हिंदू है। यह किसी के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह उस 'पैन-इस्लामिज्म' और औपनिवेशिक विस्तारवाद के विरुद्ध भारत का सुरक्षा-कवच है, जो राष्ट्र की निष्ठा को देश के बाहर के केंद्रों से जोड़ता है।

३. क्या सावरकर 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) के जनक थे?

यह एक और निर्लज्ज ऐतिहासिक झूठ है। द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का विष सर सैयद अहमद खान और बाद में मुस्लिम लीग ने बोया था। सावरकर ने 1937 में केवल उस कड़वे जमीनी यथार्थ (Ground Reality) को रेखांकित किया था कि मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण भारत में दो अलग-अलग सभ्यताएं समानांतर रूप से व्यवहार कर रही हैं। उन्होंने देश के विभाजन का घोर विरोध किया था, जबकि सत्ता-लोलुप नेताओं ने उस विभाजन को चुपचाप स्वीकार कर लिया।

४. 'हिंदू राष्ट्र के सैनिकीकरण' (Militarize Hindudom) से उनका क्या तात्पर्य था?

'कोरी अहिंसा' राष्ट्र को नपुंसक बनाती है। सावरकर का स्पष्ट मानना था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता केवल शक्तिशाली सैन्य बल से ही सुरक्षित रह सकती है। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिंदुओं से सेना में भर्ती होने का आह्वान किया, ताकि वे आधुनिक शस्त्रास्त्रों का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 'आजाद हिंद फौज' में उसी सैन्य प्रशिक्षण का सीधा लाभ राष्ट्र को मिला।

५. आधुनिक और नव-उदीयमान भारत में सावरकर के विचारों की क्या प्रासंगिकता है?

आज का नया भारत, जो 'सर्जिकल स्ट्राइक' करता है, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Make in India - Defence) की ओर बढ़ रहा है और आतंकवाद पर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाता है, वह पूर्णतः सावरकर की यथार्थवादी सामरिक दृष्टि का ही पालन कर रहा है। 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' और राम मंदिर जैसी सांस्कृतिक चेतना का जागरण सावरकर के 'हिंदुत्व' के दर्शन की ही अंतिम विजय है।

राष्ट्रधर्म का निर्वहन: इस वैचारिक ब्रह्मास्त्र को जन-जन तक पहुँचाएँ

वामपंथी 'इकोसिस्टम' के कुतर्कों को ध्वस्त करने के लिए केवल इस स्तंभ को पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इस ऐतिहासिक सत्य को हर उस युवा तक पहुँचाना आपका राष्ट्रधर्म है, जिसे दशकों से झूठा इतिहास रटाया गया है। अपनी वैचारिक तटस्थता त्यागें और सावरकर के इस 'हिंदू राष्ट्र' के शंखनाद को साझा कर एक सशक्त बौद्धिक योद्धा की भूमिका निभाएं।

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