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समाजवादी शासनकाल में महिला उत्पीड़न और 'बाहुबली' तंत्र का उदय
लोहियावादी समाजवाद की आड़ में पनपे अपराधी-राजनेता गठजोड़ और महिला सम्मान के हनन का ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण।
उत्तर प्रदेश के समकालीन राजनीतिक इतिहास में समाजवादी पार्टी (सपा) का उदय एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने लोहियावादी समाजवाद और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया । 4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित यह दल अनिवार्य रूप से पिछड़ी जातियों, विशेषकर यादवों, और मुस्लिम समुदाय के गठबंधन पर आधारित रहा है ।
हालांकि, पार्टी के विभिन्न शासनकालों (1993-1995, 2003-2007, और 2012-2017) के दौरान उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था, विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान के प्रति दृष्टिकोण, निरंतर आलोचना और विवादों के केंद्र में रहा है । यह शोध रिपोर्ट समाजवादी पार्टी के सत्ता काल के दौरान महिलाओं, विशेष रूप से दलित और ब्राह्मण समुदायों की महिलाओं, के विरुद्ध हुए अपराधों, उनके सार्वजनिक अपमान की घटनाओं और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दिए गए महिला-विरोधी बयानों का गहन सांख्यिकीय और ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक विशिष्ट 'मर्दाना जाति संस्कृति' (masculinized caste culture) का उदय हुआ, जिसे अक्सर 'माफिया राज' या 'बाहुबली राजनीति' के रूप में परिभाषित किया जाता है । शोध इंगित करते हैं कि इस काल में सत्ता के संरक्षण में ऐसे संरक्षण नेटवर्क (patronage networks) विकसित हुए, जिन्होंने हिंसा और डराने-धमकाने के माध्यम से स्थानीय स्तर पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा । इस संस्कृति में शक्ति का प्रदर्शन ही राजनीतिक सफलता का पैमाना बन गया, जिसका सीधा और सबसे नकारात्मक प्रभाव महिलाओं की सुरक्षा पर पड़ा। जब राजनीतिक रसूख और शारीरिक बल को सामाजिक न्याय के नाम पर वैधता प्रदान की जाती है, तो कानून प्रवर्तन एजेंसियां अक्सर पंगु हो जाती हैं, जिससे अपराधियों को अभयदान मिलता है ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से मुखर रही, जहाँ अपराधी और राजनेता के बीच की रेखा धुंधली हो गई । कन्नौज जैसे जिलों का अध्ययन दर्शाता है कि यहाँ यादव समुदाय का राजनीतिक प्रभुत्व रहा है, लेकिन बाहुबली राजनीति ने विकास के एजेंडे को हाशिए पर धकेल कर आपराधिक तत्वों को मुख्यधारा में ला दिया । इस राजनीतिक ढांचे के भीतर, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं थी, बल्कि यह जातिगत वर्चस्व और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को साधने का एक औजार बन गई।
2014: सामूहिक बलात्कार के मामलों में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम स्थान पर था।
2015: बलात्कार की घटनाओं में 161% की अभूतपूर्व वृद्धि (9,075 मामले) दर्ज की गई।
2012-14: महिलाओं के विरुद्ध कुल अपराध 23,254 से बढ़कर 38,467 तक पहुंचे।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2 जून 1995 की घटना को महिला सम्मान के हनन और दलित उत्पीड़न के सबसे कलंकित अध्याय के रूप में दर्ज किया गया है । इस घटना ने न केवल सपा और बसपा के बीच दशकों पुराने वैमनस्य की नींव रखी, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि सत्ता के लिए समाजवादी पार्टी का नेतृत्व किस स्तर तक जा सकता है.
जब मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया, तो समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं की एक हिंसक भीड़ ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पर धावा बोल दिया । साक्ष्यों के अनुसार, यह भीड़ न केवल हिंसक थी, बल्कि वह स्पष्ट रूप से मायावती को निशाना बनाने के उद्देश्य से आई थी। गेस्ट हाउस के कमरों में तोड़फोड़ की गई, बिजली काट दी गई और मायावती के साथ मौजूद विधायकों को पीटा गया।
रिपोर्टों और पुलिस FIR के वि
वरण के अनुसार, सपा कार्यकर्ताओं ने मायावती के विरुद्ध अत्यधिक अभद्र, जातिसूचक और यौन उत्पीड़नकारी टिप्पणियां कीं । भीड़ ने उनके कमरे का दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया, और यह आरोप लगाया गया कि यदि वे स्वयं को कमरे के भीतर बंद न कर लेतीं, तो उनकी हत्या या गंभीर शारीरिक अपमान निश्चित था । इस अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में भाजपा विधायक ब्रह्म दत्त द्विवेदी ने हस्तक्षेप किया और उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में मदद की ।
यह घटना केवल एक राजनीतिक झड़प नहीं थी, बल्कि यह दलित महिलाओं की स्वायत्तता और उनके राजनीतिक उदय को बलपूर्वक दबाने का प्रयास था। इस मामले में दर्ज मुकदमों को दशकों तक लड़ा गया, और 2019 में राजनीतिक गठबंधन की खातिर मायावती द्वारा केस वापस लेने के बावजूद, यह घटना सपा के शासनकाल में महिला सुरक्षा और सम्मान की विफलता का सबसे ज्वलंत उदाहरण बनी हुई है ।
अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल (2012-2017) को उत्तर प्रदेश में 'युवा नेतृत्व' और 'विकास' के वादे के साथ शुरू किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां करते हैं । इस अवधि के दौरान महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में केवल वृद्धि ही नहीं हुई, बल्कि उत्तर प्रदेश देश के सबसे असुरक्षित राज्यों की सूची में शीर्ष पर पहुंच गया ।
2014-2015 के दौरान उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी। राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डेटा के अनुसार, 2014 की तुलना में 2015 में बलात्कार की घटनाओं में 161% की आश्चर्यजनक वृद्धि देखी गई । जहाँ 2014 में 3,467 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2015 में यह संख्या बढ़कर 9,075 हो गई । NCRB की 'Crime in India' 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सामूहिक बलात्कार (gang rape) की घटनाओं की स्थिति देश में सबसे खराब थी। उस वर्ष दर्ज हुए कुल 573 सामूहिक बलात्कार के मामले अकेले उत्तर प्रदेश से थे, जो पूरे देश के ऐसे मामलों का लगभग 25% था ।
वर्ष महिलाओं के विरुद्ध कुल अपराध (UP) बलात्कार के मामले (UP) राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति 2012 23,254 1,963 असुरक्षित राज्यों में शामिल 2013 32,546 3,050 अपराधों में तीव्र वृद्धि 2014 38,467 3,467 सामूहिक बलात्कार में देश में प्रथम 2015 डेटा लंबित 9,075 161% की ऐतिहासिक वृद्धि
"लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है। क्या बलात्कार के लिए फांसी दी जानी चाहिए?"
मई 2014 में बदायूँ जिले के कटरा शहादतगंज गाँव में हुई घटना ने वैश्विक स्तर पर उत्तर प्रदेश की छवि को धूमिल कर दिया । दो चचेरी बहनों, जिनकी आयु क्रमशः 14 और 15 वर्ष थी, के शव एक आम के पेड़ से लटके पाए गए थे । इस मामले ने सपा शासन के दौरान पुलिस की संवेदनहीनता और जातिगत पक्षपात को पूरी तरह नग्न कर दिया।
पीड़ित परिवार, जो पिछड़ी जाति (शाक्य) से संबंधित था, ने आरोप लगाया कि जब वे अपनी बेटियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गए, तो वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने न केवल उनकी मदद करने से मना किया, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की और उन्हें अपमानित किया । यह आरोप लगाया गया कि पुलिसकर्मी आरोपी पक्ष (जो यादव समुदाय से थे और सत्ता पक्ष के करीबी माने जाते थे) को बचाने का प्रयास कर रहे थे।
इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार का रवैया भी रक्षात्मक रहा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुरू में इसे मीडिया का दुष्प्रचार बताया, जबकि उनके मंत्री आजम खान ने इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दिया । प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामूहिक बलात्कार और गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई थी, लेकिन बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने अपनी जांच में यह दावा किया कि युवतियों ने आत्महत्या की थी । हालांकि, स्थानीय POCSO अदालत ने CBI की इस थ्योरी को खारिज कर दिया और जांच पर सवाल उठाए, जिससे यह मामला सत्ता समर्थित अपराधियों को बचाने के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा गया ।
जुलाई 2016 में नेशनल हाईवे-91 पर एक नोएडा स्थित परिवार के साथ हुई डकैती और सामूहिक बलात्कार की घटना ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी । अपराधियों ने चलती कार को रोककर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी को खींचकर बाहर निकाला और उनके साथ वीभत्स कृत्य किया ।
इस जघन्य अपराध पर सहानुभूति व्यक्त करने के बजाय, समाजवादी पार्टी के तत्कालीन कद्दावर मंत्री आजम खान ने बयान दिया कि-
यह घटना आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सरकार को बदनाम करने की एक राजनीतिक साजिश हो सकती हैएक कैबिनेट मंत्री द्वारा इस प्रकार का बयान देना न केवल पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा था, बल्कि इसने पुलिस जांच को भी प्रभावित करने की कोशिश की।
पीड़ित परिवार ने इस बयान के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सर्वोच्च न्यायालय ने आजम खान के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को ऐसे संवेदनशील मामलों में गैर-जिम्मेदाराना बयान देने से बचना चाहिए । न्यायालय ने आजम खान को बिना शर्त माफी माँगने का आदेश दिया, जिसे अंततः उन्हें स्वीकार करना पड़ा । इस घटना ने सपा नेतृत्व की उस मानसिकता को उजागर किया जहाँ वे अपराध को अपराध के बजाय 'राजनीति' के चश्मे से देखते थे।
समाजवादी पार्टी के शासनकाल में ब्राह्मण और उच्च जाति की महिलाओं को भी राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। यह मामले दर्शाते हैं कि सपा का 'माफिया तंत्र' किसी भी सामाजिक वर्ग को नहीं बख्शता था।
28 फरवरी 2006 को लखनऊ के हजरतगंज इलाके में मेहर भार्गवा की हत्या समाजवादी पार्टी के शासनकाल में गिरती कानून-व्यवस्था का चरम बिंदु थी । मेहर भार्गवा, जो एक प्रसिद्ध वकील और कांग्रेस नेता लव भार्गवा की पत्नी थीं, ने अपनी बहू पर फब्तियां कसने वाले चार युवकों का विरोध किया था । विरोध करने के कारण उन्हें दिन-दहाड़े गोली मार दी गई।
इस मामले में सपा सरकार का रवैया अत्यंत निंदनीय रहा। मुख्य आरोपी के सत्ता पक्ष के साथ संबंध होने के कारण पुलिस जांच शुरू में अत्यंत धीमी रही । मेहर भार्गवा की मृत्यु के बाद पूरे लखनऊ में आक्रोश फैल गया, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सीबीआई जांच की मांग को यह कहकर ठुकरा दिया कि पुलिस सक्षम है । बाद में भारी जनाक्रोश और कैंडल मार्च के दबाव में ही पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां कीं । यह घटना आज भी लखनऊ के लोगों के लिए सपा शासन के दौरान महिला असुरक्षा की सबसे भयावह याद है।
कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या का मामला उत्तर प्रदेश के इतिहास में सत्ता के दुरुपयोग का सबसे चर्चित प्रकरण है । 9 मई 2003 को 24 वर्षीय गर्भवती मधुमिता की उनके घर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गई । इस हत्या की साजिश के पीछे समाजवादी पार्टी के तत्कालीन प्रभावशाली नेता और 'बाहुबली' विधायक अमरमणि त्रिपाठी का हाथ था, जिनके साथ मधुमिता के संबंध थे ।
यद्यपि यह हत्या 2003 में हुई थी, लेकिन समाजवादी पार्टी ने अमरमणि त्रिपाठी के जेल जाने के बाद भी उनके परिवार के साथ अपने संबंध बनाए रखे। 2012 के चुनाव में सपा ने अमरमणि के पुत्र अमनमणि त्रिपाठी को टिकट दिया, जबकि वह स्वयं आपराधिक छवि का व्यक्ति था और बाद में अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में जेल गया । यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पार्टी के लिए ब्राह्मण महिलाओं के प्रति हुए अपराधों से अधिक महत्वपूर्ण 'बाहुबली' नेताओं का वोट बैंक और उनका रसूख था।
समाजवादी पार्टी के पतन और जनता के मोहभंग का एक बड़ा कारण इसके शीर्ष नेताओं द्वारा समय-समय पर दिए गए अत्यंत आपत्तिजनक और महिला-विरोधी बयान रहे हैं । ये बयान केवल व्यक्तिगत राय नहीं थे, बल्कि इन्होंने राज्य के प्रशासनिक तंत्र को यह संदेश दिया कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है।
10 अप्रैल 2014 को मुरादाबाद की एक जनसभा में मुलायम सिंह यादव ने सामूहिक बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा देने का विरोध करते हुए कहा: "लड़के, लड़के हैं। उनसे गलती हो जाती है। क्या बलात्कार के लिए फांसी दी जानी चाहिए?" । उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कई मामलों में बलात्कार के आरोप झूठे होते हैं और आपसी सहमति से बने संबंधों के बिगड़ने के बाद लगाए जाते हैं । एक पूर्व रक्षा मंत्री और तीन बार के मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण बना और इसे "बलात्कार संस्कृति" (rape culture) को बढ़ावा देने वाला माना गया।
इसके पश्चात अगस्त 2015 में उन्होंने पुनः एक विवादास्पद टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने कहा कि-
एक महिला द्वारा चार पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगाना व्यावहारिक रूप से असंभव है
-मुलायम सिंह यादव
आजम खान की बयानबाजी ने निरंतर संसदीय मर्यादाओं और महिलाओं के सम्मान को चोट पहुंचाई है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार जया प्रदा के विरुद्ध उनकी "खाकी अंडरवियर" वाली टिप्पणी अत्यंत घृणित थी । उन्होंने रामपुर की एक रैली में कहा: "उनकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे, लेकिन मैं 17 दिनों में जान गया था कि उनके नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है" । राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया और उन्हें चुनाव प्रचार से प्रतिबंधित करने की मांग की ।
इसके अतिरिक्त, आजम खान ने संसद के भीतर पीठासीन महिला सांसद रमा देवी पर भी यौनार्थक टिप्पणी की थी, जिसके कारण पूरे सदन में भारी हंगामा हुआ था । इन घटनाओं के बावजूद, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अक्सर आजम खान का बचाव करते दिखे, जो यह सिद्ध करता है कि पार्टी में महिला सम्मान से ऊपर राजनीतिक वफादारी थी
सपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के बयान तालिबानी मानसिकता के करीब रहे हैं। निर्भया कांड के बाद उन्होंने कहा कि "महिलाओं के छोटे कपड़े पहनने और पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण करने के कारण बलात्कार होते हैं" । उन्होंने यह भी विवादित सुझाव दिया कि जो महिलाएं अपनी इच्छा से भी किसी पुरुष के साथ संबंध बनाती हैं, उन्हें भी फांसी दी जानी चाहिए क्योंकि यह इस्लाम के विरुद्ध है ।
2017 में बेंगलुरु में हुई सामूहिक छेड़छाड़ की घटना पर उन्होंने टिप्पणी की कि "जहाँ चीनी होगी, वहां चींटियाँ तो आएंगी ही" । इस प्रकार की उपमाओं का प्रयोग करके उन्होंने न केवल अपराधियों का बचाव किया बल्कि महिलाओं की स्थिति को वस्तु (object) के समान बना दिया।
समाजवादी पार्टी के शासनकाल में पुलिस विभाग अक्सर राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करता पाया गया। जब भी किसी रसूखदार व्यक्ति या समुदाय का नाम अपराध में आता, पुलिस तंत्र जांच को भटकाने के लिए हास्यास्पद थ्योरी गढ़ने लगता था।
लखनऊ के चिनहट इलाके में एक 5 वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या कर दी गई थी । स्थानीय पुलिस ने शुरू में इसे "कुत्ता काटने" की घटना बताकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया । स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) देवेंद्र दुबे ने दावा किया कि बच्ची के शरीर पर मिले घाव कुत्तों के काटने के हैं । हालांकि, बाद में हुए पोस्टमार्टम ने इस झूठ का पर्दाफाश किया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था और उसके शरीर पर 50 से अधिक गंभीर चोटें थीं । यह घटना दिखाती है कि सपा शासन में पुलिस किस हद तक गिरकर अपराधियों को वैचारिक और कानूनी कवच प्रदान करती थी।
मुख्यमंत्री के गृह जनपद इटावा में एक 20 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसे जिंदा जला देने की घटना ने सिद्ध किया कि मुख्यमंत्री के घर में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं थीं । इन मामलों में FIR दर्ज कराने के लिए पीड़ितों के परिवारों को अदालतों और मीडिया का सहारा लेना पड़ता था, क्योंकि स्थानीय थाने अक्सर सपा के क्षेत्रीय नेताओं (जिन्हें 'छोटा नेता' या 'खलीफा' कहा जाता था) के नियंत्रण में होते थे ।
समाजवादी पार्टी के शासनकालों का विस्तृत अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उनका अपमान केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं थी, बल्कि यह पार्टी की राजनीतिक कार्यशैली का एक अभिन्न अंग बन गया था।
1. जातिगत पक्षपात: दलित महिलाओं (विशेषकर मायावती और बदायूँ की युवतियों) के प्रति पार्टी का रवैया न केवल अपमानजनक था, बल्कि यह उनके प्रति एक गहरे सामाजिक विद्वेष को दर्शाता था ।
2. बाहुबली संरक्षण: ब्राह्मण और उच्च जाति की महिलाओं (मेहर भार्गवा, मधुमिता शुक्ला) के हत्यारों को राजनीतिक संरक्षण देकर सपा ने यह संदेश दिया कि सत्ता के करीब रहने वाले लोग कानून से ऊपर हैं।
3. नेतृत्व की संवेदनहीनता: मुलायम सिंह यादव, आजम खान और अबू आजमी जैसे नेताओं के बयानों ने राज्य में एक ऐसी संस्कृति पैदा की जहाँ महिला सुरक्षा को एक 'मजाक' या 'राजनीतिक साजिश' के रूप में देखा जाने लगा।
4. प्रशासनिक मिलीभगत: पुलिस का उपयोग अपराधियों को पकड़ने के बजाय पीड़ितों को चुप कराने और साक्ष्यों को मिटाने के लिए किया गया, जैसा कि चिनहट की घटना से स्पष्ट है।
अंततः, समाजवादी पार्टी का "समाजवाद" महिलाओं के लिए केवल असुरक्षा, सार्वजनिक अपमान और न्याय की विफलता की एक लंबी श्रृंखला सिद्ध हुआ। सांख्यिकीय आंकड़े और ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि 2012-2017 और उससे पूर्व के सपा शासनकालों में उत्तर प्रदेश की आधी आबादी को निरंतर भय और अपमान के साये में जीना पड़ा।
"जहाँ चीनी होगी, वहां चींटियाँ तो आएंगी ही।"
समाजवादी पार्टी के शासनकालों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं थी, बल्कि यह पार्टी की राजनीतिक कार्यशैली का हिस्सा बन गया था। बाहुबली संरक्षण, नेतृत्व की संवेदनहीनता और पुलिस की मिलीभगत ने राज्य की आधी आबादी को निरंतर भय के साये में जीने पर मजबूर किया।
सत्य की खोज और राष्ट्रवादी विमर्श के लिए समर्पित यह शोध रिपोर्ट 'राष्ट्रवादी चिंतन' के संकलन का हिस्सा है।

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