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| एक शक्तिशाली राष्ट्रवादी नैरेटिव: 'पॉलिटिकल इस्लाम' वैश्विक शांति के लिए खतरा है, जबकि पश्चिमी लोकतंत्र संघर्ष कर रहे हैं, 'उत्तर प्रदेश मॉडल' समाधान और आशा के स्तंभ के रूप में उभरता है। |
राष्ट्रवादी चिंतन
क्या 'पॉलिटिकल इस्लाम' वैश्विक शांति और लोकतांत्रिक संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा संकट है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी और शायद सबसे आत्मघाती त्रासदी यह है कि यह अपनी असीमित उदारता में उन ताकतों को भी पनपने का अधिकार और सुरक्षा प्रदान कर देता है, जिनका अंतिम और एकमात्र लक्ष्य स्वयं लोकतंत्र की ही हत्या करना होता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, 'पॉलिटिकल इस्लाम' (राजनीतिक इस्लाम) इसी विरोधाभास का सबसे ज्वलंत और खतरनाक प्रमाण बनकर उभरा है। यह एक ऐसी अधिनायकवादी (Totalitarian) विचारधारा है, जिसने अत्यंत चतुराई से धर्म और आस्था का पवित्र चोला ओढ़ रखा है, ताकि इसे किसी भी प्रकार की बौद्धिक, तार्किक या विधिक समीक्षा से बचाया जा सके। परंतु यदि हम इसके आवरण को हटाकर इसकी मूल संरचना का विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई आध्यात्मिक या उपासना पद्धति नहीं है; यह विशुद्ध रूप से सत्ता पर एकाधिकार प्राप्त करने का एक क्रूर, विस्तारवादी और साम्राज्यवादी राजनीतिक दर्शन है।
भारतीय सभ्यता ने सदैव 'एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति' के शाश्वत सिद्धांत पर विश्वास किया है, जो बहुलवाद (Pluralism) और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नींव है। इसके ठीक विपरीत, पॉलिटिकल इस्लाम की वैचारिक धुरी 'दार-उल-इस्लाम' (शांति या इस्लाम का क्षेत्र) और 'दार-उल-हर्ब' (युद्ध का क्षेत्र) के कठोर और असहिष्णु विभाजन पर टिकी है। इस दर्शन के अनुसार, जब तक संपूर्ण विश्व 'दार-उल-इस्लाम' में परिवर्तित नहीं हो जाता, तब तक एक निरंतर वैचारिक और भौतिक संघर्ष अपरिहार्य है। यह आधुनिक राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की अवधारणा, भौगोलिक सीमाओं और संविधान को सिरे से खारिज करता है, क्योंकि इसकी एकमात्र निष्ठा 'उम्माह' (वैश्विक मजहबी भाईचारे) और 'शरिया' के प्रति है।
जब हम इसके कार्यप्रणाली का सूक्ष्मता से विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि इस्लामिक कट्टरपंथ और पॉलिटिकल इस्लाम अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही रणनीतिक सिक्के के दो पहलू हैं। इनके बीच एक अत्यंत परिष्कृत सहजीवी संबंध (Symbiotic relationship) है। कट्टरपंथी तत्व, जो हाथ में एके-47 लेकर या आत्मघाती जैकेट पहनकर निर्दोषों का रक्त बहाते हैं, वे केवल इस व्यवस्था के 'फुट सोल्जर' या जमीनी मोहरे हैं। असली और कहीं अधिक घातक नियंत्रण उन लोगों के हाथ में है जो विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार आयोगों, अंतरराष्ट्रीय अदालतों और मुख्यधारा के मीडिया में सूट पहनकर बैठते हैं। यह पॉलिटिकल इस्लाम का बौद्धिक विंग है।
आज पूरा पश्चिमी जगत इस आत्मघाती उदारवाद की कीमत चुका रहा है। 'पॉलिटिकल इस्लाम' ने पश्चिमी देशों में वामपंथी इकोसिस्टम के साथ एक अत्यंत अप्राकृतिक लेकिन मारक गठजोड़ (Islam-o-Leftism) बना लिया है। वामपंथियों को राष्ट्रवाद और स्थानीय संस्कृति से घृणा है, और पॉलिटिकल इस्लाम को भी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से नफरत है; इसी बिंदु पर दोनों सेनाएं मिल जाती हैं। इस इकोसिस्टम ने लोकतंत्र के ही उपकरणों—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों—को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया है। जब ये किसी देश में अल्पसंख्यक होते हैं, तो ये संविधान और मानवाधिकार की सबसे ऊंची आवाज में दुहाई देते हैं। परंतु जैसे ही किसी विशिष्ट क्षेत्र में इनका जनसांख्यिकीय प्रभुत्व (Demographic dominance) स्थापित होता है, वहां से धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद का नामोनिशान मिटा दिया जाता है।
फ्रांस का उदाहरण हमारे सामने है। जो फ्रांस कभी यूरोपीय उदारवाद और कठोर धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक था, आज वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षक सैमुअल पैटी का दिनदहाड़े गला रेत दिया जाता है और शार्ली एब्दो के कार्यालय को श्मशान बना दिया जाता है। स्वीडन, जिसे दुनिया का सबसे शांतिप्रिय देश माना जाता था, आज वहां गैंगवार और बम धमाके आम हो गए हैं। ब्रिटेन के कई शहरों में 'नो-गो जोन्स' (No-go zones) बन चुके हैं, जहां पुलिस जाने से डरती है और स्वयंभू 'शरिया गश्ती दल' तय करते हैं कि लोग क्या पहनेंगे और कैसे रहेंगे। यह जनसांख्यिकी को हथियार बनाकर किसी संप्रभु राष्ट्र के भीतर एक समानांतर सत्ता (Parallel state) खड़ी करने का एक अचूक मॉडल है।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी अधिक संवेदनशील और खतरनाक है। भारत ने पिछले एक हजार वर्षों तक इस हिंसक विस्तारवाद का सीधा सामना किया है और अपने सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाए रखा है। लेकिन आज भारत में पॉलिटिकल इस्लाम ने एक नया, अत्यधिक चालाक और परिष्कृत रूप ले लिया है। यह सीधे तौर पर हमारी आंतरिक सुरक्षा, अखंडता और सभ्यतागत संप्रभुता को चुनौती दे रहा है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) जैसे प्रतिबंधित संगठनों का मॉडल इसका सबसे सटीक उदाहरण है। इस मॉडल के तहत एक सामाजिक संगठन का मुखौटा तैयार किया जाता है...,उसके पीछे एक राजनीतिक दल खड़ा किया जाता है, और सबसे भीतर एक 'हिट स्क्वाड' काम करता है, जो योजनाबद्ध तरीके से हत्याएं करता है और दंगों की साजिश रचता है।
शाहीन बाग जैसे प्रयोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि 'गजवा-ए-हिंद' की वैचारिक नींव को अब तिरंगे झंडे और 'संविधान बचाओ' के नारों के पीछे छिपाने की कला सीख ली गई है। मांग वही पुरानी है—राष्ट्र की संसद और संविधान के ऊपर मजहबी वीटो (Religious Veto) स्थापित करना, लेकिन तरीका अब सड़क जाम करने और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत को बदनाम करने का हो गया है। इसके साथ ही, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार के सीमांचल जैसे सीमावर्ती राज्यों में जिस तीव्र गति से जनसांख्यिकीय अतिक्रमण और अवैध घुसपैठ को राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है, वह भविष्य के एक भयानक गृहयुद्ध की आहट है। जब किसी क्षेत्र का जनसांख्यिकीय चरित्र बदलता है, तो वहां का लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक चरित्र स्वतः ही समाप्त हो जाता है; कश्मीर घाटी इसका सबसे बड़ा और दर्दनाक ऐतिहासिक प्रमाण है.
इन परिस्थितियों में, चाणक्य नीति और कूटनीतिक यथार्थवाद यह स्पष्ट करता है कि किसी भी प्रकार की तुष्टिकरण की नीति राज्य के विनाश का कारण बनती है। इस संदर्भ में 'उत्तर प्रदेश मॉडल' संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक दिशा-निर्देशक सिद्धांत बनकर उभरा है। एक राज्य जो कभी तुष्टिकरण, माफिया तंत्र और मजहबी दंगों की आग में झुलसता था, वहां जब राज्य सत्ता ने बिना किसी भेदभाव के कठोर राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया, तो परिणाम सबके सामने हैं। उपद्रवियों की संपत्तियों की जब्ती, दंगाइयों पर आर्थिक प्रहार और जीरो-टॉलरेंस की नीति ने इस पूरे पॉलिटिकल-इस्लामिक इकोसिस्टम की कमर तोड़ दी है। यह मॉडल सिद्ध करता है कि संविधान की सर्वोच्चता तभी स्थापित की जा सकती है, जब राज्य के पास उसे लागू करने का निर्मम संकल्प हो। कानून केवल किताबों में लिखे वाक्यों से काम नहीं करता; कानून का प्रताप उसके कठोर क्रियान्वयन से जन्म लेता है।
सभ्यताओं के इस निर्णायक संघर्ष में 'बैलेंसिंग' या 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' कोई विकल्प नहीं है। इतिहास क्रूर होता है; वह उन सभ्यताओं को क्षमा नहीं करता जो अपने शत्रुओं को पहचानने में भूल करती हैं या अपनी कायरता को सहिष्णुता का नाम देकर स्वयं को धोखा देती हैं। आज भारत सहित संपूर्ण लोकतांत्रिक विश्व एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ सत्य और राष्ट्रीय अस्मिता है, और दूसरी तरफ आत्मघाती विमर्श का अंधकार।

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