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| एक वैचारिक विश्लेषण जो खिलाफत आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ों और आधुनिक मध्यपूर्व युद्ध के बीच संबंध को दर्शाता है, जिसे "नेशन फर्स्ट" के भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। |
अतीत की ऐतिहासिक भूलों से लेकर वर्तमान मध्यपूर्व संकट और भारत की कूटनीतिक प्रखरता तक का एक वैचारिक विश्लेषण
एक सदी पहले की बात है। भारत की धरती पर एक ऐसा आंदोलन आकार ले रहा था, जिसका भारत के स्वाधीनता संग्राम या भारतीय हितों से कोई सीधा सरोकार नहीं था। यह आंदोलन था— हजारों किलोमीटर दूर तुर्की में एक खलीफा की सत्ता बचाने की जद्दोजहद, जिसे इतिहास 'खिलाफत आंदोलन' के नाम से जानता है। इस आंदोलन ने भारतीय उपमहाद्वीप में 'पैन-इस्लामिज्म' (Pan-Islamism) और 'उम्माह' (वैश्विक इस्लामी भाईचारे) के जिस जहरीली विचारधारा को बोया, उसने न केवल मोपला नरसंहार और अंततः देश के विभाजन की पटकथा लिखी, बल्कि उसी जहरीली विचारधारा ने आज मध्यपूर्व को युद्ध की आग में झोंक दिया है। आज जब गाजा से लेकर लेबनान तक संघर्ष की लपटें उठ रही हैं, तो हमारा यह लेख इस बात की ऐतिहासिक पड़ताल करेगा कि कैसे सौ वर्ष पुराना वह कट्टरपंथ आज भी प्रासंगिक है, और कैसे आज का नया भारत अतीत की तुष्टिकरण वाली भूलों से सबक लेकर मध्यपूर्व में एक बेबाक और यथार्थवादी कूटनीति का प्रदर्शन कर रहा है。
'अतिरिक्त-क्षेत्रीय निष्ठा' का बीजारोपण
इतिहास का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अक्सर तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ा दी जाती है। 1919-1924 के बीच चला खिलाफत आंदोलन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। प्रथम विश्वयुद्ध में ओटोमन साम्राज्य (तुर्की) की हार के बाद, जब अंग्रेजों ने खलीफा के पद को समाप्त करने का निर्णय लिया, तो भारत के कुछ मुस्लिम नेताओं ने इसके खिलाफ बिगुल फूंक दिया। हैरान करने वाली बात यह थी कि तुर्की के मुस्तफा कमाल अतातुर्क स्वयं अपने देश को एक आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे और उन्होंने खुद खलीफा के पद को अप्रासंगिक मान लिया था, लेकिन भारत में इसे इस्लाम पर हमले के रूप में प्रचारित किया गया।
उस समय के भारतीय नेतृत्व, विशेषकर महात्मा गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनैतिक विचारधारा के तहत इस आंदोलन को कांग्रेस का समर्थन दे दिया। यह एक ऐतिहासिक भूल थी। इस कदम ने भारत की राजनीति में मजहबी उलेमाओं और कट्टरपंथियों को मुख्यधारा में स्थापित कर दिया। राष्ट्रवाद के ऊपर एक ऐसी 'अतिरिक्त-क्षेत्रीय निष्ठा' (Extra-territorial loyalty) को मान्यता दे दी गई, जिसने मुसलमानों को यह सिखाया कि उनकी पहली निष्ठा उनके राष्ट्र (भारत) के प्रति नहीं, बल्कि एक काल्पनिक वैश्विक इस्लामी राष्ट्र (उम्माह) के प्रति है।
मोपला से लेकर विभाजन तक
खिलाफत आंदोलन का परिणाम हिंदू-मुस्लिम एकता के रूप में नहीं, बल्कि भयावह कट्टरपंथ के रूप में सामने आया। जब तुर्की में खलीफा का पद समाप्त हो गया और यह आंदोलन विफल हुआ, तो उस उग्र मजहबी उन्माद ने अपना रुख भारत के भीतर ही मोड़ लिया। 1921 का कुख्यात 'मोपला नरसंहार' इसी उग्रता का सीधा परिणाम था, जहां केरल के मालाबार में हजारों निर्दोष हिंदुओं का कत्लेआम किया गया, उनका जबरन धर्मांतरण हुआ और महिलाओं के साथ बर्बरता की गई।
विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम लीग के लिए वैचारिक जमीन तैयार कर दी थी। जब आप किसी समुदाय को यह विश्वास दिला देते हैं कि उनका धर्म किसी राष्ट्र की सीमाओं से बड़ा है, तो 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) का जन्म अपरिहार्य हो जाता है। 1947 का भारत विभाजन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी; वह 1920 के दशक में बोए गए पैन-इस्लामिज्म के बीजों की ही रक्तरंजित फसल थी। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस खतरे को बहुत पहले ही भांप लिया था।
"इस्लाम का भाईचारा मानवता का सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है। यह केवल मुसलमानों का मुसलमानों के लिए भाईचारा है। इस बिरादरी के बाहर वालों के लिए इसमें केवल घृणा और शत्रुता है।"— डॉ. अंबेडकर (पुस्तक: पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया)
मध्यपूर्व का वर्तमान संकट और वैचारिक समानता
आज जब हम अपनी दृष्टि भारत के अतीत से हटाकर मध्यपूर्व (Middle East) के वर्तमान पर डालते हैं, तो पात्र और भूगोल भले ही बदल गए हों, लेकिन पटकथा और वैचारिक आधार वही है। इजरायल के खिलाफ हमास (Hamas), हिजबुल्लाह (Hezbollah) और हूती विद्रोहियों का जो हिंसक गठजोड़ काम कर रहा है, उसे ईरान जैसे देशों का समर्थन प्राप्त है। यह संघर्ष केवल एक भूमि विवाद नहीं है; यह उसी 'उम्माह' और 'पैन-इस्लामिक वर्चस्ववाद' का आधुनिक विस्तार है।
हमास के 7 अक्टूबर 2023 के क्रूर आतंकवादी हमले हों या हिजबुल्लाह की रॉकेट वर्षा, इन संगठनों के घोषणा-पत्रों में राष्ट्र-निर्माण की नहीं, बल्कि उसी वैश्विक खिलाफत और काफिरों के विनाश की भाषा गूंजती है जो एक सदी पहले भारतीय उप-महाद्वीप में गूंजी थी। यह कट्टरपंथ किसी भी लोकतांत्रिक, बहुलवादी या आधुनिक राष्ट्र-राज्य (Nation-State) के सह-अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। इजरायल का अस्तित्व उनके लिए इसलिए भी असहनीय है क्योंकि वह एक ऐसे क्षेत्र में एक गैर-इस्लामिक संप्रभु राष्ट्र है, जिसे वे अपनी 'धार्मिक जागीर' मानते हैं।
भारत का कूटनीतिक यथार्थवाद
बीते कुछ दशकों तक, भारत की विदेश नीति भी इसी 'वोट-बैंक' और 'तुष्टिकरण' के दबाव में फंसी रही। फिलिस्तीन के प्रति हमारा अंध-समर्थन कई बार इसी 'उम्माह' की भावुकता से प्रेरित था, जहां हम इजरायल जैसे स्वाभाविक मित्र से खुलकर कूटनीतिक संबंध बनाने में झिझकते थे। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में भारत ने इस ऐतिहासिक जड़ता को तोड़ दिया है।
आज का भारत 1920 का वह 'खोखला आदर्शवादी' भारत नहीं है जो तुष्टिकरण से प्रेरित राजनीतिक विचारधारा के लिए कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की मध्यपूर्व नीति 'डी-हाइफनेशन' (De-hyphenation) के परिपक्व सिद्धांत पर चल रही है। इसका अर्थ है कि इजरायल और फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंध स्वतंत्र हैं और एक-दूसरे के मोहताज नहीं हैं।
जब 7 अक्टूबर को हमास ने इजरायल पर हमला किया, तो भारत ने बिना किसी कूटनीतिक लाग-लपेट के इसे 'आतंकवाद' करार दिया और इजरायल के साथ मजबूती से खड़ा हुआ। भारत यह भली-भांति समझता है कि आतंकवाद चाहे कश्मीर में हो या किबुत्ज में, उसका स्रोत और उसकी विचारधारा एक ही है। इसके साथ ही, भारत ने यथार्थवाद का परिचय देते हुए गाजा के नागरिकों के लिए मानवीय सहायता भी भेजी और 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (Two-State Solution) का समर्थन किया। यह नीति स्पष्ट करती है कि भारत शांति का समर्थक है, लेकिन आतंकवाद के तुष्टिकरण का नहीं।
राष्ट्र-प्रथम की अटूट नीति
खिलाफत आंदोलन से लेकर गाजा युद्ध तक के इस लंबे कालखंड का सबसे बड़ा सबक यही है कि राष्ट्रीय हितों की कीमत पर किया गया वैचारिक या मजहबी समझौता हमेशा विनाशकारी होता है। 'उम्माह' एक ऐसा भ्रम है जिसने न केवल भारतीय उप-महाद्वीप को गहरे घाव दिए, बल्कि आज पूरे मध्यपूर्व को एक कभी न खत्म होने वाले रक्तपात में धकेल दिया है।
भारत ने अपने इतिहास के कड़वे अनुभवों से यह सीख ली है कि वैश्विक राजनीति में सम्मान केवल शक्ति, स्पष्टता और यथार्थवाद से मिलता है। मध्यपूर्व के वर्तमान संघर्ष में भारत का रुख यह प्रमाणित करता है कि अब नई दिल्ली की नीतियां किसी 'अतिरिक्त-क्षेत्रीय निष्ठा' के दबाव में नहीं, बल्कि 'राष्ट्र-प्रथम' (Nation First) के परम सत्य से संचालित होती हैं। इतिहास की चेतावनियों को जो राष्ट्र समझ लेते हैं, वे ही भविष्य का नेतृत्व करते हैं।
"स्वराष्ट्रे रक्षणं कार्यं सर्वदा यत्नमास्थितैः। राष्ट्रे सुरक्षिते यस्मात् सर्वं भवति रक्षितम्॥"— अर्थात: हमेशा पूर्ण प्रयास के साथ अपने राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि राष्ट्र के सुरक्षित रहने पर ही सब कुछ सुरक्षित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: खिलाफत आंदोलन क्या था और इसका भारत के स्वाधीनता संग्राम से क्या संबंध था?
उत्तर: खिलाफत आंदोलन (1919-1924) प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के ओटोमन खलीफा की सत्ता बचाने के लिए भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग द्वारा चलाया गया था। इसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम या भारतीय हितों से कोई सीधा संबंध नहीं था। तत्कालीन नेतृत्व ने हिंदू-मुस्लिम एकता की उम्मीद में इसका समर्थन किया था, लेकिन इसने भारत में 'अतिरिक्त-क्षेत्रीय निष्ठा' (देश के बजाय मज़हब के प्रति निष्ठा) और कट्टरपंथ को मुख्यधारा में ला दिया, जिसका अंततः परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया।
प्रश्न 2: 'उम्माह' (Ummah) का क्या अर्थ है और यह आधुनिक राष्ट्र-राज्यों (Nation-States) के लिए चुनौती क्यों है?
उत्तर: 'उम्माह' का अर्थ है 'वैश्विक इस्लामी भाईचारा'। यह अवधारणा मानती है कि एक मुसलमान की पहली और सर्वोच्च निष्ठा उसके मज़हब के प्रति है, न कि उस राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं या संविधान के प्रति जहाँ वह रहता है। यह विचारधारा आधुनिक राष्ट्र-राज्य और देशभक्ति के विचार से सीधे टकराती है, क्योंकि यह राष्ट्रवाद (Nationalism) को खारिज करती है।
प्रश्न 3: 1920 के दशक के खिलाफत आंदोलन और वर्तमान हमास-इजरायल युद्ध के बीच क्या वैचारिक समानता है?
उत्तर: दोनों के मूल में 'पैन-इस्लामिज्म' (Pan-Islamism) और धार्मिक वर्चस्ववाद की भावना है। जिस तरह खिलाफत आंदोलन में राष्ट्रीयता के ऊपर मज़हब को रखा गया, उसी तरह आज हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठन राष्ट्र-निर्माण के बजाय एक वैश्विक इस्लामी सत्ता और काफिरों (गैर-मुस्लिमों) के विनाश की चरमपंथी विचारधारा पर काम कर रहे हैं।
प्रश्न 4: मध्यपूर्व संकट को लेकर भारत की विदेश नीति में क्या बुनियादी बदलाव आया है?
उत्तर: दशकों तक भारत की मध्यपूर्व नीति घरेलू वोट-बैंक और 'तुष्टिकरण' के दबाव में रहती थी। लेकिन आज भारत 'यथार्थवाद' (Realism) पर चल रहा है। 7 अक्टूबर के हमले के बाद भारत ने बिना किसी झिझक के हमास के कृत्य को 'आतंकवाद' करार दिया। भारत अब यह स्पष्ट कर चुका है कि वह गाजा में मानवीय सहायता और शांति का समर्थक तो है, लेकिन किसी भी प्रकार के इस्लामी कट्टरपंथ या आतंकवाद का तुष्टिकरण नहीं करेगा।
प्रश्न 5: भारत की विदेश नीति के संदर्भ में 'डी-हाइफनेशन' (De-hyphenation) सिद्धांत क्या है?
उत्तर: कूटनीति में 'डी-हाइफनेशन' का अर्थ है दो देशों के साथ स्वतंत्र और अलग-अलग संबंध रखना। पहले भारत इजरायल के साथ संबंधों को फिलिस्तीन के चश्मे से देखता था। 'डी-हाइफनेशन' के तहत, अब भारत के इजरायल के साथ संबंध फिलिस्तीन के साथ उसके संबंधों के मोहताज नहीं हैं। यह 'राष्ट्र-प्रथम' (Nation First) की नीति का एक शानदार उदाहरण है।

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