आज का वैश्विक परिदृश्य किसी एक चुनाव, किसी एक युद्ध या किसी एक क़ानून से परिभाषित नहीं हो रहा। यह एक पीढ़ीगत वैचारिक संघर्ष से आकार ले रहा है—जहाँ Gen Z (1997 के बाद जन्मी पीढ़ी) और इस्लामिक कट्टरपंथ आमने-सामने हैं। यह संघर्ष धर्म-विरोध का नहीं, बल्कि वैधता, सत्ता और स्वतंत्रता की परिभाषाओं का है।
कट्टरपंथ की शक्ति ऐतिहासिक रूप से आदेश और अनुशासन पर टिकी रही है—क्या सही है, क्या वर्जित; क्या पहनना है, क्या कहना है। Gen Z इस संरचना को एक सरल प्रश्न से चुनौती देती है—“क्यों?”
आधुनिक युवाओं के लिए वैधता दंड से नहीं, तर्क, सहमति और अधिकार से आती है। जब आदेश का नैतिक औचित्य स्पष्ट नहीं होता, तो आज्ञाकारिता क्षीण पड़ती है। यही कारण है कि कट्टरपंथ की वैधता आज सांस्कृतिक नहीं, संस्थागत संकट से गुजर रही है।
Gen Z डिजिटल नागरिक है—सूचना, तुलना और बहस इसकी रोज़मर्रा की भाषा है। इसके ठीक विपरीत, कट्टरपंथ सूचना-नियंत्रण, सेंसरशिप और नैतिक पुलिसिंग पर निर्भर करता है। डिजिटल पारदर्शिता ने सत्ता के उस पारंपरिक आवरण को हटाया है, जिसमें प्रश्न पूछना अपराध माना जाता था। परिणामस्वरूप, नियंत्रणकारी सत्ता डर पैदा तो कर सकती है, सहमति नहीं।
यह टकराव सबसे तीखा महिलाओं के प्रश्न पर उभरता है—वेशभूषा, शिक्षा, सार्वजनिक उपस्थिति और निर्णय का अधिकार। Gen Z इसे गरिमा और स्वायत्तता का प्रश्न मानती है; कट्टरपंथ इसे आदेश-पालन का। हाल के वर्षों में में हिजाब-विरोधी आंदोलनों ने दिखाया कि यह संघर्ष कपड़े का नहीं, राज्य-नियंत्रण बनाम नागरिक अधिकार का है। जब आधी आबादी नेतृत्व करती है, तो सामाजिक दिशा बदलती है।
Gen Z के लिए धर्म निजी आस्था है; राज्य का दायित्व नागरिक अधिकारों की रक्षा। इस्लामिक कट्टरपंथ धर्म और राज्य का अतिविलय चाहता है—जहाँ आस्था सार्वजनिक आदेश बन जाती है। यह विलय आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के लिए अस्वीकार्य है। यही कारण है कि यह संघर्ष किसी एक देश तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक है—मध्य-पूर्व से दक्षिण एशिया तक।
युवा पीढ़ी अवसर, गतिशीलता और वैश्विक सहभागिता चाहती है। कठोर धार्मिक नियंत्रण अक्सर आर्थिक ठहराव, निवेश-घाटा और प्रतिभा-पलायन से जुड़ जाता है। यह विरोध को वैचारिक से अधिक व्यावहारिक बना देता है—जहाँ प्रश्न रोज़गार और भविष्य का है।
भारत में यह संघर्ष ईरान जैसा टकराव नहीं बनता। यहाँ संविधान, न्यायपालिका और सामाजिक विविधता संवाद का मार्ग खोलते हैं। किंतु चुनौती स्पष्ट है—यदि पहचान-राजनीति और धार्मिक प्रतीकों का अति-राजनीतिकरण बढ़ता है, तो वैधता का संकट यहाँ भी गहराएगा। भारत का उत्तर प्रतिबंध नहीं, बल्कि दबाव-मुक्त विकल्प, शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण है।
Gen Z और इस्लामिक कट्टरपंथ का संघर्ष किसी आस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि अधिनायकवादी व्याख्याओं के विरुद्ध है। एक ओर भविष्य की पीढ़ी है, जो वैधता, स्वतंत्रता और अवसर की भाषा बोलती है; दूसरी ओर आदेश और नियंत्रण पर टिकी संरचनाएँ।
इतिहास साक्षी है—जहाँ युवा पीढ़ी वैधता की कसौटी बदल देती है, वहाँ सत्ता को स्वयं को बदलना पड़ता है। यह प्रक्रिया त्वरित नहीं, पर दिशा स्पष्ट है।

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