"राष्ट्र कोई मिट्टी का निर्जीव पिंड नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई है।"

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर का यह सिंहनाद आज उन छद्म-बौद्धिकों और राजनीतिक अवसरवादियों के कानों में पिघले हुए सीसे की भांति उतरना चाहिए, जो गाहे-बगाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध का प्रलाप करते हैं। वर्तमान राजनीतिक विमर्श में, जब भी राष्ट्रविरोधी, अलगाववादी या जिहादी तत्वों के मूल पर प्रहार होता है, वामपंथी-इस्लामी गठजोड़ का एक रुदाली-दल 'संघ पर प्रतिबंध' का घिसा-पिटा कुतर्क लेकर खड़ा हो जाता है।

यह कोई साधारण या तात्कालिक राजनीतिक मांग नहीं है; यह भारत की सनातन चेतना, उसकी आंतरिक प्रतिरोध क्षमता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूलाधार को छिन्न-भिन्न करने का एक सुविचारित, विषैला वैचारिक आक्रमण है। समस्या यह नहीं है कि ये विघटनकारी शक्तियां संघ से घृणा करती हैं; क्षोभ इस बात का है कि वे एक राष्ट्र-निर्माता यज्ञशाला को उन कट्टरपंथी गिरोहों के समकक्ष खड़ा करने का दुस्साहस करती हैं, जिनका एकमात्र ध्येय भारत का विखंडन है। इस वैचारिक पाखंड का उत्तर किसी रक्षात्मक स्पष्टीकरण से नहीं, अपितु आचार्य चाणक्य के उस प्रखर राज्यशिल्प से दिया जाना चाहिए, जहाँ राष्ट्र-शत्रु के वैचारिक समूल नाश को ही परम धर्म माना गया है।

'मिथ्या तुल्यता' का बौद्धिक पाखंड

लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कक्षों में बैठकर विमर्श गढ़ने वाला यह वामपंथी ईकोसिस्टम दशकों से एक 'मिथ्या तुल्यता' का बौद्धिक षड्यंत्र रचता आया है। वे घोषित राष्ट्र-विघटनकारी, हिंसक संगठनों की तुलना एक ऐसे संगठन से करते हैं, जिसका दैनंदिन ध्येय वाक्य ही 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' है। यह तुलना किसी अज्ञानता का परिणाम नहीं, अपितु एक कुत्सित बौद्धिक धूर्तता है। एक ओर वे शक्तियां हैं जो विदेशी वित्त-पोषण से भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का संकल्प लेती हैं, और दूसरी ओर वह अनुशासित बल है जो किसी भी राष्ट्रीय आपदा में सबसे पहले धरातल पर पहुँचता है।

"इतिहास इस सत्य का निर्मम साक्षी है कि सत्ता के अहंकार ने जब-जब संघ को बलपूर्वक कुचलने का प्रयास किया, यह संगठन तपे हुए कुंदन की भांति और अधिक दैदीप्यमान होकर उभरा।"

अग्नि-परीक्षाओं का ऐतिहासिक साक्ष्य

1948 में राजनीतिक द्वेष की आड़ में प्रथम प्रहार किया गया। 1975 में जब लोकतंत्र का गला घोंटकर आपातकाल की निरंकुशता थोपी गई, तब उस तानाशाही के विरुद्ध सबसे बड़ा और संगठित भूमिगत प्रतिरोध इसी वैचारिक अधिष्ठान ने किया। 1992 में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय पुनः वही प्रतिशोध की राजनीति दोहराई गई। परंतु इन क्रूर सत्ता-विमर्शों का परिणाम क्या हुआ? हर बार देश के सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न जांच आयोगों ने इन प्रतिबंधों को असंवैधानिक और राजनीति-प्रेरित मानकर कूड़ेदान में फेंक दिया। न्यायपालिका की यह मुहर प्रमाणित करती है कि संघ पर प्रहार केवल सत्ता-लोलुपों की वैचारिक कुंठा है।

संकटकाल का अघोषित 'रक्षक'

1962 के चीनी आक्रमण के समय जब भारत का वामपंथी धड़ा चीन के समर्थन में खड़ा था, तब सीमाओं पर रसद पहुँचाने वाले और रक्तदान करने वाले संघ के स्वयंसेवक ही थे। इसी नि:स्वार्थ राष्ट्र-समर्पण से विवश होकर पंडित नेहरू को 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को आमंत्रित करना पड़ा था। कश्मीर विलय के समय जब पाकिस्तानी कबाइलियों ने बर्बर आक्रमण किया, तो सेना के पहुँचने से पूर्व श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए कितने ही स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान दिया।

राज्यशिल्प और राष्ट्र की आत्मा

आचार्य चाणक्य के राज्यशिल्प में 'राष्ट्र' और 'राज्य' के मध्य एक स्पष्ट भेद है। राज्य की भौतिक सीमाओं की रक्षा सेना करती है, परंतु राष्ट्र की आत्मा की रक्षा के लिए एक अनुशासित, नि:स्वार्थ वैचारिक शक्ति अपरिहार्य है। संघ मात्र एक संस्था नहीं है; यह 'व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण' की एक अनवरत यज्ञशाला है। जो लोग प्रतिबंध का प्रलाप कर रहे हैं, उनका मूल भय वह सनातन चेतना है, जो अब सदियों की निद्रा से जागृत हो चुकी है।

जो विषैले संगठन भारत के विघटन की योजनाएँ बनाते हैं और आतंकियों के मानवाधिकारों के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय के द्वार खटखटाते हैं, वे लोग भारत माता की जय बोलने वालों पर प्रतिबंध की मांग किस नैतिक धरातल पर करते हैं? क्या भारत के ही संसाधनों पर पलकर, भारत के ही सांस्कृतिक अधिष्ठान को नष्ट करने की इस वैचारिक-आतंकी साजिश को अब भी सहिष्णुता का नाम दिया जाना चाहिए?

FAQ

📌 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर बार-बार प्रतिबंध लगाने की मांग क्यों उठती है?
यह मांग किसी विधिक आवश्यकता का परिणाम नहीं है, अपितु वामपंथी-जिहादी गठजोड़ का एक कुत्सित वैचारिक षड्यंत्र है। भारत की सनातन चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जागरण से भयभीत विघटनकारी शक्तियां संघ को कुचलना चाहती हैं, क्योंकि संघ भारत की 'आंतरिक प्रतिरोध क्षमता' का अभेद्य दुर्ग है।
📌 क्या पूर्व में भी संघ पर प्रतिबंध लगाए गए हैं? न्यायपालिका का इस पर क्या रुख रहा है?
हाँ, सत्ता के अहंकार में 1948, 1975 (आपातकाल), और 1992 में राजनीति-प्रेरित प्रतिबंध लगाए गए थे। परंतु हर बार देश के सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न जांच आयोगों ने इन प्रतिबंधों को पूर्णतः असंवैधानिक और निराधार मानकर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। यह न्यायपालिका की मुहर है कि संघ पर प्रहार केवल वैचारिक कुंठा है।
📌 वामपंथी ईकोसिस्टम द्वारा संघ की तुलना कट्टरपंथी संगठनों से क्यों की जाती है?
यह लुटियंस दिल्ली द्वारा रचा गया 'मिथ्या तुल्यता' (False Equivalence) का सबसे बड़ा बौद्धिक पाखंड है। राष्ट्र को विखंडित करने का संकल्प लेने वाले हिंसक गिरोहों की तुलना, राष्ट्र-निर्माण को समर्पित और 'नमस्ते सदा वत्सले' का गान करने वाले अनुशासित बल से करना विशुद्ध तुष्टिकरण और धूर्तता है।
📌 राष्ट्रीय संकट के समय संघ की ऐतिहासिक भूमिका क्या रही है?
1962 के चीनी आक्रमण से लेकर कश्मीर विलय और भयंकर प्राकृतिक आपदाओं तक, संघ सदैव भारत की अघोषित द्वितीय रक्षा पंक्ति रहा है। 1962 में स्वयंसेवकों के निस्वार्थ राष्ट्र-समर्पण से विवश होकर ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन्हें 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में ससम्मान आमंत्रित किया था।

राष्ट्रजागरण के इस महायज्ञ में आहुति दें!

वामपंथी ईकोसिस्टम के मिथ्या आख्यानों को ध्वस्त करने और 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का शंखनाद करने के लिए इस तथ्यात्मक विश्लेषण को हर सच्चे भारतीय तक पहुँचाएँ।
सत्य को फैलने से कोई रोक नहीं सकता!