मनोज चतुर्वेदी अधिकारिक
इराक से लेकर सीरिया तक, पश्चिमी साम्राज्यवादी नीतियों और बेतहाशा सैन्य हस्तक्षेप ने कैसे उस राजनीतिक शून्य को जन्म दिया जिसमें आज का आधुनिक कट्टरपंथ फला-फूला? एक निष्पक्ष और ऐतिहासिक पड़ताल।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी घटना शून्य में नहीं घटती। आज जब हम मध्यपूर्व को सुलगते हुए देखते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि यह कोई रातों-रात पैदा हुआ संकट नहीं है। यह दशकों की उन पश्चिमी साम्राज्यवादी नीतियों, तेल कूटनीति और बेतहाशा सैन्य हस्तक्षेप का सीधा नतीजा है, जिसने इस पूरे क्षेत्र को एक अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशाला बना दिया। इराक से लेकर सीरिया और लीबिया से लेकर लेबनान तक—अमेरिकी वर्चस्व की महत्वाकांक्षाओं ने जिस तरह स्थानीय सत्ताओं से खिलवाड़ किया, उसी राजनीतिक और सामाजिक शून्य से आधुनिक इस्लामिक कट्टरपंथ ने आकार लिया। इस लेख में हम उस कड़वे सत्य का निष्पक्ष और तथ्यात्मक विश्लेषण करेंगे कि कैसे 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' ने वास्तव में उसी आतंक को पुष्पित-पल्लवित किया.
तेल, सत्ता और कूटनीति का प्रवेश
मध्यपूर्व के वर्तमान संकट को समझने के लिए हमें द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के दौर में लौटना होगा। जब ब्रिटिश और फ्रांसीसी साम्राज्यवाद की पकड़ मध्यपूर्व से ढीली पड़ने लगी, तो उस शून्य को भरने के लिए अमेरिका ने कदम रखा। शुरुआत में अमेरिका का उद्देश्य उस समय के सोवियत संघ के प्रभाव को रोकना और सऊदी अरब तथा खाड़ी देशों के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण सुरक्षित करना था। लेकिन कूटनीति के नाम पर जल्द ही यह 'हस्तक्षेप की राजनीति' में बदल गया।
साल 1953 इसका सबसे बड़ा और पहला ऐतिहासिक उदाहरण है। ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ ने जब देश के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला किया, तो अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और ब्रिटिश एमआई6 (MI6) ने मिलकर उनका तख्तापलट कर दिया। 'ऑपरेशन अजाक्स' (Operation Ajax) नामक इस अभियान ने ईरान में शाह रज़ा पहलवी की क्रूर तानाशाही स्थापित की। इसी पश्चिमी दादागिरी के खिलाफ ईरान में जो जन-आक्रोश पनपा, उसने अंततः 1979 की 'इस्लामिक क्रांति' को जन्म दिया, जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीति को हमेशा के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर धकेल दिया।
अफगान युद्ध से इराक के विध्वंस तक
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक बिसात पर 'धर्म' का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया। 1980 के दशक में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया, तो सीआईए ने सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ मिलकर 'मुजाहिदीन' को हथियार और पैसा मुहैया कराया। अमेरिका ने सोवियत संघ को हराने के लिए धार्मिक कट्टरपंथ को एक रणनीतिक टूल के रूप में बढ़ावा दिया। लेकिन जब 1989 में सोवियत सेना वापस लौटी, तो अमेरिका ने भी उस क्षेत्र को उसके हाल पर छोड़ दिया। इन्हीं मुजाहिदीनों की राख से बाद में अल-कायदा (Al-Qaeda) और तालिबान का जन्म हुआ, जिसने 9/11 के रूप में खुद अमेरिका को लहूलुहान कर दिया।
9/11 के बाद शुरू हुआ अमेरिका का 'वॉर ऑन टेरर' (आतंकवाद के खिलाफ युद्ध) इस पूरे दुष्चक्र का सबसे विनाशकारी अध्याय साबित हुआ। 2003 में 'सामूहिक विनाश के हथियारों' का झूठा हवाला देकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया। सद्दाम हुसैन की सत्ता उखाड़ फेंकने के बाद लागू की गई 'डी-बाथिस्टिफिकेशन' की नीति ने लाखों सुन्नी सैनिकों को सड़कों पर ला दिया। इसी राजनीतिक शून्यता और अबू ग़रीब जेल जैसी जगहों पर हुए अमानवीय अत्याचारों ने उस खूंखार संगठन को जन्म दिया जिसे दुनिया आईएसआईएस (ISIS) के नाम से जानती है। अमेरिकी दादागिरी ने इराक को विनाश के गर्त में धकेल दिया, और बदले में इराक के खंडहरों ने दुनिया को एक नया कट्टरपंथ सौंप दिया।
दादागिरी और कट्टरपंथ का 'सिम्बायोटिक' रिश्ता
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें, तो आज मध्यपूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और इस्लामिक कट्टरपंथ के बीच एक अघोषित सहजीवी (Symbiotic) रिश्ता बन गया है। दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं, लेकिन दोनों को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक-दूसरे की जरूरत है।
अमेरिका को मध्यपूर्व में अपने सैन्य अड्डे बनाए रखने और भू-राजनीतिक नियंत्रण रखने के लिए एक स्थायी 'खतरे' की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को युवाओं की भर्ती करने और अपने हिंसक कृत्यों को 'जिहाद' का नाम देने के लिए एक 'विदेशी दुश्मन' या 'साम्राज्यवादी शक्ति' की जरूरत होती है। अमेरिकी ड्रोन हमले, जिनमें अक्सर निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं, इन कट्टरपंथी समूहों के लिए सबसे बेहतरीन प्रचार सामग्री का काम करते हैं। यह 'एक्शन' और 'रिएक्शन' का एक कभी न खत्म होने वाला खूनी लूप है।
वर्तमान परिदृश्य
आज की स्थिति और भी ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है। 2011 के 'अरब स्प्रिंग' के दौरान जब पश्चिमी देशों ने सीरिया और लीबिया में 'शासन परिवर्तन' का खेल खेला, तो इन देशों में गृहयुद्ध छिड़ गया। गद्दाफी की हत्या के बाद लीबिया एक पूर्ण विफल राष्ट्र बन गया।
हालिया गाजा संघर्ष इस टकराव का सबसे जीवंत और खडरावना उदाहरण है। एक तरफ हमास का क्रूर और कट्टरपंथी हमला है, तो दूसरी तरफ इजरायल की वह सैन्य प्रतिक्रिया है जिसे अमेरिका का खुला समर्थन प्राप्त है। गाजा के खंडहरों में दबी हजारों मासूमों की लाशें आने वाले दशकों के लिए कट्टरपंथ का ऐसा बीज बो रही हैं, जिसकी फसल पूरी दुनिया को काटनी पड़ेगी। लाल सागर में हूती विद्रोहियों का उभार इसी चौतरफा अस्थिरता का संकेत है।
भविष्य की आहट
क्या मध्यपूर्व इसी तरह जलता रहेगा? भविष्य के संकेत चिंताजनक भी हैं और कुछ हद तक बदलाव की गवाही भी देते हैं। चीन और रूस जैसी महाशक्तियां इस क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं। पिछले साल चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के बीच हुआ शांति-समझौता इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मध्यपूर्व के देश अब खुद अमेरिकी चंगुल से बाहर निकलकर अपनी सुरक्षा का ढांचा तैयार करना चाहते हैं।
हालाँकि, खतरा अभी टला नहीं है। जब तक 'प्रोक्सी वॉर' और दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी बंद नहीं होती, तब तक मध्यपूर्व 'विनाश से सर्वनाश' की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ता रहेगा।
अमरीकी मॉडल की विफलता
इतिहास गवाह है कि ताकत के बल पर कभी भी विचारों को नहीं मारा जा सकता। 'बमबारी से शांति' लाने का अमेरिकी मॉडल पूरी तरह विफल हो चुका है। गरीबी, विदेशी हस्तक्षेप, अन्याय और राजनीतिक शून्यता—यही वो दलदल हैं जिसमें इस्लामिक कट्टरपंथ का विषैला वृक्ष पनपता है। जब तक महाशक्तियां अपने भू-राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस क्षेत्र को बिसात की तरह इस्तेमाल करना बंद नहीं करेंगी, तब तक न अमेरिकी वर्चस्व सुरक्षित रहेगा और न ही दुनिया को इस्लामिक कट्टरपंथ के साये से मुक्ति मिलेगी
विनाशकाले विपरीतबुद्धिः
- चाणक्य नीति
(अर्थात, जब सर्वनाश का समय निकट आता है, तो महाशक्तियों की बुद्धि और विवेक भी भ्रष्ट हो जाते हैं।)






