'शिर्क' का खौफ या सनातन से दुराव
फाल्गुन की बयार जब भारतीय उपमहाद्वीप के पलाश और अमलतास को चूमती है, तब समूचा आर्यावर्त एक सतरंगी उल्लास में डूबने को आतुर हो उठता है। होली मात्र अबीर और गुलाल का भौतिक विनिमय नहीं है; यह हमारी चेतना का विस्तार है, शीत ऋतु की जड़ता के अंत और नवसृजन का ब्रह्मांडीय उत्सव है। किंतु, जब पूरा राष्ट्र इस सांस्कृतिक महाकुंभ में एकाकार हो रहा होता है, तब एक विशिष्ट वैचारिक खेमे में अजीब सी बेचैनी दिखाई देती है। मदरसों और कट्टरपंथी उलेमाओं के कक्षों से अचानक फतवों की झड़ी लग जाती है, जो मुस्लिम युवाओं को 'काफिरों के त्योहार' से दूर रहने की हिदायत देते हैं। जब हम इस अलगाववादी मानसिकता का तार्किक विश्लेषण करते हैं, तो सतह पर दिखने वाला 'मजहबी निषेध' दरअसल एक बहुत गहरे और सुनियोजित सांस्कृतिक दुराव का मुखौटा मात्र सिद्ध होता है।
तौहीद की आड़ और बहुलतावाद से भय
कट्टरपंथी विमर्श का सबसे बड़ा अस्त्र 'तौहीद' (एकेश्वरवाद) की अवधारणा है। मौलानाओं द्वारा यह स्थापित किया जाता है कि होली की जड़ें होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा से जुड़ी हैं, अतः इसमें भाग लेना या केवल रंग लगाना भी 'शिर्क' (अल्लाह के साथ किसी और को साझीदार मानना) है। इस्लाम में शिर्क सबसे बड़ा और अक्षम्य अपराध माना गया है। परंतु, ज़रा ठहरकर सोचिए। क्या वाक़ई कोई केवल एक चुटकी गुलाल लगाने से अपना ईमान खो बैठता है? वस्तुतः, समस्या रंगों से है ही नहीं। मूल भय उस 'सांस्कृतिक गुरुत्वाकर्षण' से है, जो इस माटी के प्रत्येक जीव को अपनी सनातन जड़ों की ओर खींचता है। कट्टरपंथियों को यह डर सताता है कि यदि उत्सवों के बहाने सामाजिक समरसता स्थापित हो गई, तो दशकों के प्रयास से खड़ी की गई 'हम बनाम वो' की कृत्रिम दीवार एक झटके में ढह जाएगी।
इतिहास के पन्नों में दर्ज समन्वय की 'होरी'
तथाकथित 'विशुद्ध इस्लाम' के पैरोकार जब यह दावा करते हैं कि मुसलमानों का होली से कभी कोई नाता नहीं रहा, तो वे भारत के वास्तविक इतिहास की हत्या कर रहे होते हैं। नज़ीर अकबराबादी की कालजयी पंक्तियाँ— "जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की"— क्या किसी अरबी आयातित संस्कृति का हिस्सा हैं? इतिहास के पन्ने खंगालें तो अवध के नवाब वाजिद अली शाह का वह प्रसंग सामने आता है जब मुहर्रम के मातम के बीच भी उन्होंने होली खेलकर समरसता का अभूतपूर्व संदेश दिया था।
रसखान की कृष्ण-भक्ति से लेकर अमीर खुसरो के रचे रंगों तक, और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की खानकाह में गाई जाने वाली बसंत की फाग तक, इतिहास प्रामाणिक साक्ष्यों से अटा पड़ा है। रंग-द्वेष भारतीय मुसलमानों का मूल स्वभाव था ही नहीं, यह तो इस सहिष्णु समाज पर बाहर से थोपा गया एक कृत्रिम आवरण है।
आयातित अरबीकरण: जड़ों को काटने का वैचारिक षड्यंत्र
यदि इतिहास में होली का इतना उल्लास था, तो आज यह दुराव कहाँ से आया? इसका उत्तर 18वीं और 19वीं सदी के उन वहाबी और देवबंदी आंदोलनों में छिपा है, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में 'शुद्ध इस्लाम' की स्थापना का बीड़ा उठाया। इस आयातित शुद्धतावाद (Puritanism) ने भारतीय मुसलमानों को उनकी ही सनातनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से काटकर एक विदेशी 'अरबी पहचान' थोपने का षड्यंत्र रचा। भारतीय राजनीति और समाज में इस कृत्रिम वैचारिक विभाजन के दूरगामी परिणामों को समझने के लिए आप मनोज चतुर्वेदी ऑफिशियल पर प्रकाशित मेरे अन्य गहन विमर्श पढ़ सकते हैं। जो समाज अपनी माटी से कट जाता है, वह हमेशा पहचान के संकट से जूझता रहता है।
मनोवैज्ञानिक अलगाववाद: 'अल-वला वल-बरा' का अस्त्र
इसे लागू करने के लिए कट्टरपंथी उलेमा अक्सर हदीसों का हवाला देकर 'तशब्बुह बिल कुफ्फार' (गैर-मुस्लिमों की नकल करने) का मनोवैज्ञानिक भय दिखाते हैं। इस्लामी फतवों में स्पष्ट कहा जाता है कि गैर-मुस्लिम त्योहारों में भाग लेना उनके ईमान को खतरे में डालता है (फतवा और उसका शरिया आधार यहाँ पढ़ें)। 'अल-वला वल-बरा' (निष्ठा और अस्वीकृति) के सिद्धांत के तहत यह सिखाया जाता है कि मुस्लिम समाज को हर उस चीज़ का बहिष्कार करना चाहिए जो 'काफिरों' से जुड़ी है। यह कोई आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि एक धारदार राजनीतिक अस्त्र है। इसका एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम समाज को भारत की सांस्कृतिक मूलधारा से दूर रखकर एक विशेषाधिकार प्राप्त और अलग-थलग (Ghettoized) समूह में बदलना है।
एकतरफा 'गंगा-जमुनी' विमर्श का यथार्थ
आज विडंबना यह है कि भारत में तथाकथित 'गंगा-जमुनी तहजीब' को बचाने का सारा बोझ केवल बहुसंख्यक हिंदू समाज के कंधों पर डाल दिया गया है। हिंदू इफ्तार पार्टियों में जालीदार टोपी पहनकर खजूर खाए, तो वह धर्मनिरपेक्षता का सर्वोच्च प्रमाण है; किंतु मुस्लिम यदि होली के दिन एक चुटकी गुलाल भी लगा ले, तो उसका दीन खतरे में आ जाता है। यह एकांगी और पाखंडपूर्ण विमर्श अब अपनी समाप्ति की ओर है। भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण इस बात की मांग करता है कि हम इस सत्य को निर्भीकता से स्वीकार करें— रंग किसी मजहब के मोहताज नहीं होते, वे माटी की गंध से उपजते हैं। जो इस माटी के रंग से परहेज करता है, वह वस्तुतः इस राष्ट्र की आत्मा से परहेज कर रहा है।
"सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।"
(ऋग्वेद - 10.191.2)
अर्थ: हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें और हमारे मन एक हों। सनातन की यह सर्वसमावेशी पुकार उस आयातित और संकीर्ण मानसिकता को एक मौन चुनौती है, जो रंगों के उत्सव में भी अलगाव की दीवारें तलाश लेती है।
इस विषय पर कुछ ज्वलंत प्रश्न (FAQs)
जागरूकता ही राष्ट्र की ढाल है!
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