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सोनिया गांधी का प्रलाप और मोदी की चुप्पी का कड़वा सत्य

ईरान संकट पर भारतीय कूटनीति: धुएं और आग में विलीन होते ईरानी नेता, राजनीतिक विरोध जतातीं सोनिया गांधी और 'सामरिक मौन' (Strategic Silence) साधे अडिग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रतीकात्मक चित्र।
पश्चिम एशिया की सुलगती भू-राजनीति (ईरान संकट) के बीच जहाँ विपक्ष भावुक 'सिद्धांतों' की दुहाई दे रहा है, वहीं भारतीय नेतृत्व एक अडिग 'सामरिक मौन' (Strategic Silence) के साथ केवल राष्ट्रहित साध रहा है।

ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या और भारतीय कूटनीति

ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या और भारतीय कूटनीति: क्या मौन वास्तव में 'रणनीतिक विफलता' है?

लेख का मर्म (Executive Summary)

कूटनीति में 'मौन' शून्यता नहीं, बल्कि 'सामरिक अस्पष्टता' (Strategic Ambiguity) का सबसे धारदार अस्त्र है। भारत का मौन इज़राइल, अरब राष्ट्रों और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की यथार्थवादी नीति है। 90 लाख प्रवासियों की सुरक्षा और $80B+ का ऊर्जा व्यापार, खोखले 'सिद्धांतों' के मिथ्या रुदन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

भू-राजनीति का प्रथम और अंतिम यथार्थ केवल 'राष्ट्रीय हित' है, कोई अमूर्त और खोखला आदर्शवाद नहीं। ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के उपरांत, नई दिल्ली द्वारा साधे गए सुविचारित सामरिक मौन को कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने 'रणनीतिक विफलता' और 'सिद्धांतों का परित्याग' करार दिया है। यहाँ यक्ष प्रश्न यह है कि किसी विदेशी सत्ता-संघर्ष या अन्य संप्रभु राष्ट्र के नेतृत्व के पतन पर भारत का विलाप न करना 'विफलता' कैसे हो सकता है? वस्तुतः, श्रीमती गांधी का यह आक्षेप कूटनीतिक अपरिपक्वता और विदेश नीति को घरेलू वोट-बैंक व तुष्टिकरण का मोहरा बनाने की उसी ऐतिहासिक कुचेष्टा का परिचायक है, जिसका दंश भारत दशकों तक झेलता रहा है।

मूल संदर्भ (The Indian Express): "Government's silence on killing of Iran leader is not neutral, it is abdication" - Sonia Gandhi

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बिसात पर 'मौन' कोई शून्यता या निर्णय-हीनता नहीं होती; यह राज्य-कला (Statecraft) का एक अत्यंत धारदार अस्त्र है। राजनीतिक यथार्थवाद का स्पष्ट सिद्धांत है कि विदेश नीति कोई पारमार्थिक संस्था नहीं है। किसी अन्य राष्ट्र के आंतरिक संकट पर प्रतिक्रिया देना या न देना, केवल इस निर्मम गणितीय आकलन पर निर्भर करता है कि उस प्रतिक्रिया से हमारे अपने हितों को क्या लाभ या हानि होगी। भारत का मौन 'सामरिक अस्पष्टता' (Strategic Ambiguity) का उत्कृष्ट उदाहरण है। यदि नई दिल्ली इस प्रकरण में पश्चिमी शक्तियों के सुर में सुर मिलाती है, तो वह ईरान के साथ अपने पारगमन हितों को नष्ट करती है। वहीं, यदि वह ईरान के प्रति अनावश्यक सहानुभूति या प्रतिशोधात्मक स्वर अपनाती है, तो वह अरब राष्ट्रों के साथ अपने नव-निर्मित आर्थिक समीकरणों को खतरे में डालती है।

सोनिया गांधी का 'सिद्धांतों' का तर्क एक-आयामी विश्व-दृष्टि पर आधारित है, जबकि 21वीं सदी के भारत की कूटनीति बहु-आयामी (Multi-aligned) है। पश्चिम एशिया में भारत को एक अत्यंत नाजुक त्रिकोणीय संतुलन साधना पड़ता है। एक ओर इज़राइल है, जो रक्षा तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हमारा अपरिहार्य सहयोगी है। दूसरी ओर अरब राष्ट्र हैं, जिन पर हमारी ऊर्जा सुरक्षा और 90 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों का भविष्य निर्भर है, जो प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। और तीसरा कोण ईरान है, जिसका चाबहार बंदरगाह मध्य एशिया तक पहुँचने का हमारा एकमात्र सामरिक द्वार है।

इस त्रिकोणीय चक्रव्यूह में किसी एक पक्ष की ओर झुकने वाली भावुक बयानबाजी रातों-रात इस संपूर्ण तंत्र को पंगु बना सकती है। जब दांव पर अरबों का व्यापार और लाखों नागरिकों की आजीविका हो, तब विदेश नीति 'सिद्धांतों' के मिथ्या रुदन से नहीं चलती।

गहराई से समझें: घरेलू राजनीति और राष्ट्रहित के द्वंद्व पर मनोज चतुर्वेदी के वैचारिक आलेख

यदि इतिहास के पन्नों का तार्किक अन्वेषण करें, तो विपक्ष के इन तथाकथित 'सिद्धांतों' का पाखंड स्वतः उद्घाटित हो जाता है। 1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था, तब स्वयं इंदिरा गांधी की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में मौन साधे रखा था। वह मौन 'सिद्धांतों का परित्याग' नहीं, बल्कि सोवियत रक्षा-निर्भरता के कारण अपनाया गया यथार्थवादी दृष्टिकोण था। आज जब सत्ता विपक्ष के पास नहीं है, तो वही सामरिक मौन उन्हें विफलता प्रतीत होने लगा है।

कूटनीति के निर्मम अखाड़े में 'सिद्धांत' अक्सर उन राष्ट्रों का विलाप होते हैं, जिनमें यथार्थ का सामना करने की सामर्थ्य नहीं होती। सोनिया गांधी द्वारा भारत के मौन को 'विफलता' का नाम देना वस्तुतः उसी पुरानी आदर्शवादिता का अवशेष है, जिसने दशकों तक भारत को वैश्विक मंच पर एक 'नैतिक उपदेशक' तो बनाए रखा, परंतु सामरिक रूप से पंगु कर दिया। आज का भारत पश्चिम एशिया में किसी एक खेमे का झंडा उठाने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों को साध रहा है। अतः नई दिल्ली की यह 'चुप्पी' कोई কমান্ড विफलता नहीं, बल्कि पूर्णतः परिकलित 'सामरिक तटस्थता' है—एक ऐसा अजेय अस्त्र, जो बिना एक भी शब्द बोले, भारत के राष्ट्रीय हितों की सबसे मुखर उद्घोषणा कर रहा है।

प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं बलम्।
आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥
"अर्थात: जो अवसर और परिस्थिति के अनुकूल बोलना या मौन रहना जानता है, वही सच्चा नीतिकार है।"
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