![]() |
| क्या शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का 'धर्मयुद्ध' धर्मनीति से भटककर राजनीतिक पाखंड मात्र है? |
अविमुक्तेश्वरानंद का 'धर्मयुद्ध' सनातन के लिए आत्मघाती कैसे?
आदि भगवत्पाद शंकराचार्य ने जब अद्वैत वेदांत की दिग्विजय यात्रा आरंभ की थी, तब उनके समक्ष खंडित, निस्तेज और दिशाहीन भारतीय समाज था। उन्होंने भारतवर्ष की चतुर्दिक् सीमाओं पर चार आम्नाय पीठों की स्थापना कर सनातन सभ्यता के लिए एक अभेद्य आध्यात्मिक दुर्ग का निर्माण किया था। इन पीठों का उद्देश्य मात्र कर्मकांडों का निर्वहन या शुष्क प्रवचन नहीं था, अपितु राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता और सभ्यतागत सीमाओं (Civilizational Frontiers) की अहर्निश रक्षा करना था। यह एक ऐसा सुरक्षा तंत्र था, जिसे यह सुनिश्चित करना था कि सनातन राष्ट्र कभी भी वैचारिक या आध्यात्मिक रूप से पराधीन न हो।
दुर्भाग्य से, आज उसी पावन प्राचीर से 'धर्मयुद्ध' के नाम पर जो उद्घोष हो रहा है, वह आसुरी शक्तियों के विरुद्ध नहीं, अपितु उसी राष्ट्र-आराधक चेतना के विरुद्ध है जो सहस्राब्दियों के रक्तरंजित संघर्ष के पश्चात पुनः अंगड़ाई ले रही है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा उद्घोषित यह तथाकथित 'धर्मयुद्ध', इसका सूक्ष्म परीक्षण करने पर, धर्म की रक्षा का शंखनाद कम और वामपंथी-तुष्टिकरण इकोसिस्टम का एक प्रायोजित प्रलाप अधिक प्रतीत होता है। यह एक ऐसा छद्म आवरण है, जिसके भीतर सनातन के विखंडन के बीज बोये जा रहे हैं।
धर्म की मर्यादा और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा की भयंकर टकराहट
संन्यास का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ है—सम्यक् न्यास, अर्थात सर्वस्व का त्याग, जिसमें अहंकार और पद-लोलुपता का पूर्ण शमन सन्निहित है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'मठाम्नाय महानुशासनम्' यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि पीठाधीश्वर का आचरण वीतराग, राग-द्वेष से सर्वथा मुक्त और संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक निष्पक्ष मार्गदर्शक का होना चाहिए। परंतु वर्तमान परिदृश्य में, धर्मदंड को व्यक्तिगत कुंठाओं, क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं और आत्म-प्रसार की वेदी पर निर्ममता से बलि चढ़ाया जा रहा है।
जब एक संन्यासी का वैराग्य, 'कैमरा-जीविता' (camera-consciousness) और मीडिया की सनसनीखेज सुर्खियों में बने रहने की सस्ती भूख के समक्ष आत्मसमर्पण कर दे, तो वह किसी पीठ की मर्यादा का सबसे भीषण पतन है। 'धर्मयुद्ध' शब्द स्वयं में अत्यंत पवित्र और गंभीर है। यह तब लड़ा जाता है जब धर्म के मूल अस्तित्व पर अस्तित्वगत संकट मँडरा रहा हो। आज जब जनसांख्यिकीय आक्रमण (Demographic Invasion), संस्थागत अतिक्रमण और वामपंथी अकादमिक आतंकवाद से सनातन का अस्तित्व चारों ओर से घिर चुका है, तब स्वामी जी का यह 'धर्मयुद्ध' इन वास्तविक आसुरी प्रवृत्तियों के विरुद्ध आपराधिक रूप से मौन है। उनका सम्पूर्ण आक्रोश, उनकी वाग्मिता और उनका समूचा बौद्धिक चातुर्य केवल उन शक्तियों को लांछित करने में व्यय हो रहा है, जो भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए अपना रक्त और स्वेद बहा रही हैं। यह अहंकार की वह आत्मघाती अवस्था है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को, अपनी मान्यताओं को, साक्षात् 'धर्म' से भी बड़ा मान बैठता है।
राजनीतिक हस्तक्षेप पर उठते प्रखर प्रश्न: संन्यासी या विपक्ष का भोंपू?
इतिहास साक्षी है कि जब-जब धर्मसत्ता ने राजसत्ता का निरंकुश होकर या व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित होकर विरोध किया है, तब-तब राष्ट्र विखंडित हुआ है। महर्षि वशिष्ठ हों, महर्षि विश्वामित्र हों या आचार्य चाणक्य, उन्होंने राजसत्ता को धर्म-सम्मत मार्ग दिखाया, उसे अनुशासित किया, न कि राष्ट्र-विरोधियों के साथ मिलकर अपने ही राष्ट्र-आराधक राजा को अपदस्थ करने का मलिन षड्यंत्र रचा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का हालिया आचरण एक परम आदरणीय पीठाधीश्वर का कम और एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा के अघोषित प्रवक्ता का अधिक प्रतीत होता है।
उनके राजनीतिक हस्तक्षेप की दिशा अत्यंत अचंभित करने वाली और चिंताजनक है। जिन राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में सनातन को समूल नष्ट करने का परोक्ष या अपरोक्ष संकल्प लिया है, जो रामचरितमानस को विषैला बताते हैं, जो हिंदू देवी-देवताओं का सार्वजनिक उपहास करते हैं और जो 'जाति' के नाम पर हिंदुओं को बांटने का खुला खेल खेलते हैं, उनके समक्ष स्वामी जी का 'धर्म-दंड' नतमस्तक हो जाता है। उनके लिए उनके पास कोई कटु शब्द नहीं है। परंतु, जो नेतृत्व काशी विश्वनाथ धाम के पुनरुद्धार, अयोध्या में राम जन्मभूमि की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा और भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है, उस पर उनके शब्द-बाण निरंतर, बिना किसी विश्राम के चलते हैं। यह स्पष्ट, निर्लज्ज और नग्न राजनीतिक पक्षपात है। आज राष्ट्र यह पूछने का पूर्ण अधिकारी है कि क्या यह 'धर्मयुद्ध' है या तुष्टिकरण के पैरोकारों को पुनः सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाने का एक सुनियोजित 'पाखंड-युद्ध'? क्या शंकराचार्य का पद किसी राजनीतिक दल के 'टूलकिट' का हिस्सा बनने के लिए है?
'न्याय यात्रा' का भगवा संस्करण
यदि आप स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की वर्तमान 'धर्मयुद्ध यात्रा' के स्वरूप, इसकी शैली और इसके निहितार्थों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें, तो आपको इसमें और राहुल गांधी की 'कथित न्याय यात्रा' में एक हास्यास्पद किंतु अत्यंत भयंकर वैचारिक साम्य (Ideological Symmetry) दिखाई देगा।
राहुल गांधी की उस दिशाहीन यात्रा का मूल उद्देश्य क्या था? जातियों के नाम पर सघन रूप से एकजुट हो रहे हिंदू समाज को पुनः विखंडित करना, स्थापित राष्ट्रवादी नैरेटिव को छिन्न-भिन्न करना और समाज में एक कृत्रिम असंतोष (Artificial Discontent) पैदा करना। ठीक इसी तर्ज़ पर, स्वामी जी की यह भगवा-रंजित यात्रा कार्य कर रही है। दोनों ही यात्राओं के केंद्र में सनातन चेतना का विखंडन है। जहाँ राहुल गांधी 'न्याय' और 'संविधान' के नाम पर सामाजिक दरारें चौड़ी कर रहे थे, वहीं स्वामी जी 'गौ-रक्षा' और 'शास्त्र-सम्मत धर्म' के आवरण में सनातनी समाज में वैचारिक भ्रम और अंतर्कलह का हलाहल विष घोल रहे हैं। दोनों का गंतव्य एक है, दोनों का इकोसिस्टम एक है, और दोनों के प्रहार का लक्ष्य भी एक ही है—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रखर उभार। राहुल गांधी की यात्रा को वामपंथी मीडिया, अर्बन नक्सलियों और भारत-विरोधी विदेशी शक्तियों का जो खुला प्रश्रय प्राप्त था, अद्भुत विडंबना देखिए कि ठीक वही प्रश्रय आज अविमुक्तेश्वरानंद के प्रलापों को मिल रहा है। जब 'द वायर', 'रवीश कुमार' और वामपंथी इकोसिस्टम के स्वघोषित बौद्धिक किसी 'शंकराचार्य' के वक्तव्यों को हाथों-हाथ लेने लगें, उन्हें अपने एजेंडे का मुखौटा बना लें, तो बिना किसी संशय के समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति धर्म का कार्य नहीं, अपितु अधर्म की वैचारिक दलाली कर रहा है।
सजग सनातनियों के निशाने पर पाखंड-युद्ध और सभ्यतागत संकट
आज का सनातनी वह नहीं है जो मात्र अंधश्रद्धा के वशीभूत होकर आँखें मूंदकर हर भगवा वस्त्र धारी को ईश्वर का अवतार मान ले। आज का राष्ट्रवादी बौद्धिक रूप से जाग्रत है, वह तथ्यों का अन्वेषण करता है और तर्कों की कसौटी पर हर वक्तव्य को कसता है। वह भली-भांति जानता है कि हम एक निर्मम 'सभ्यतागत युद्ध' (Civilizational War) के ठीक मध्य में खड़े हैं, जहाँ शत्रु अस्त्रों से नहीं, बल्कि नैरेटिव और विमर्श के माध्यम से प्रहार कर रहा है। सनातन पर हो रहे इस चौतरफा वैचारिक आघात और हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विस्तृत चुनौतियों को गहराई से समझने के लिए, मेरे आधिकारिक पोर्टल manojchaturvediofficial.com पर उपलब्ध वैचारिक शल्य-क्रियाओं का निरंतर अध्ययन आवश्यक है।
जब गाजा से लेकर बांग्लादेश तक हिंदुओं के निर्मम संहार पर यह पीठ रहस्यमयी मौन धारण कर लेती है, जब बंगाल और केरल में सनातनी रक्तिम हो रहे होते हैं तब इनके मुख से एक शब्द नहीं फूटता, और अपने ही देश में राष्ट्रभक्तों को लांछित करने के लिए यह पीठ अचानक से अत्यंत मुखर हो जाती है, तो सजग सनातनियों का आक्रोशित होना सर्वथा स्वाभाविक है। विरोधियों के निशाने पर आज स्वामी जी नहीं हैं, बल्कि स्वामी जी स्वयं उन विरोधियों के निशाने का मोहरा बन गए हैं, जिनका अंतिम लक्ष्य सनातन का समूल नाश है। उनका यह कृत्य उस विषबेल को अपने ही हाथों से सींच रहा है जो एक दिन उसी पीठ को और संपूर्ण हिंदू समाज को निगल जाएगी.
आंतरिक कलह ही सबसे बड़ा राजद्रोह है
आचार्य चाणक्य ने 'अर्थशास्त्र' में स्पष्ट चेतावनी दी है कि बाह्य शत्रु किसी राष्ट्र या सभ्यता को उतना गहरा आघात नहीं पहुँचा सकते, जितना कि आंतरिक भेदी और सत्ता-लोलुप या दिग्भ्रमित धर्माधिकारी। आज भारत एक अभूतपूर्व चौराहे पर खड़ा है। एक ओर सहस्राब्दियों की दासता के घावों को भरता हुआ, अपने मंदिरों का पुनर्निर्माण करता हुआ सांस्कृतिक पुनर्जागरण है, तो दूसरी ओर हमें पुनः खंडित कर हमारी चेतना को कुंद करने को आतुर वैश्विक और आंतरिक शक्तियों का एक अपवित्र गठजोड़।
ऐसे अत्यंत निर्णायक कालखंड में, एक शीर्ष धर्मगुरु द्वारा सनातनी समाज में भ्रम, भेद और अविश्वास के बीज बोना, केवल एक वैचारिक भूल नहीं है; यह सभ्यता के प्रति किया गया एक अक्षम्य अपराध है। यह समय अंध व्यक्ति-पूजा का नहीं, अपितु कठोर सत्य और सभ्यता के समग्र संरक्षण का है। 'धर्म' किसी एक व्यक्ति के पद, उसके व्यक्तिगत अहंकार या उसकी राजनीतिक कुंठाओं की जागीर नहीं है। सनातन समाज को इस छद्म 'धर्मयुद्ध' के पाखंड को इसकी संपूर्ण नग्नता में पहचानकर इसे पूर्णतः अस्वीकार करना ही होगा। यदि हम आज भी केवल भगवे रंग के प्रति अंध-मोह में मौन रहे, तो आने वाला इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा। धर्म की रक्षा के लिए यदि धर्म के ठेकेदारों से ही प्रश्न पूछने पड़ें, तो यह भी युग-धर्म ही है।
(भावार्थ: जो धर्म या तथाकथित धार्मिक कृत्य वास्तविक धर्म की मूल भावना को ही हानि पहुँचाए, वह धर्म नहीं, अपितु कुधर्म (पाखंड) है। जो बिना किसी विरोधाभास के, सत्य और सम्यक् रूप से धर्म की रक्षा करे, वही सच्चा धर्म है।)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Your comment has been received and is subject to moderation. Abusive, defamatory, or legally objectionable comments will not be published.