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गुरुवार, 30 सितंबर 2021

अखिलेश यादव जी इन समाजवादी पप्पुओं से ज़रा सावधान रहिए

इसौली से समाजवादी पार्टी के विधायक अबरार अहमद साहब का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. जिसमें वह *ब्राह्मण और क्षत्रिय जाति के मतदाताओं को *'चोट्टा'* बोलते हुए सुने जा सकते हैं. अबरार अहमद ने इस वीडियो में कहा कि- *चुनाव जीतने के लिए उन्हें ब्राह्मणों और क्षत्रियों के वोट की जरूरत नहीं है. उनके बिना भी वह जीत सकते हैं.* वह आगे कह रहे हैं कि *"मुसलमान ही उनके वास्तविक वोटर्स हैं."* 
यहां मज़े की बात यह है कि इस प्रकार के समाज को तोड़ने और साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ाने वाले बयान देने वाले सपा नेता अबरार अहमद साहब की ज़बान पर आखिरकार सच आ ही गया। शायद सच यही है कि आजकल उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी मुस्लिम लीग की भूमिका निभा रही है। दरअसल, समाजवादी पार्टी में ब्राह्मण और क्षत्रिय सहित अन्य वर्ग के वोटों की गिनती होती ही नहीं है। वहां तो केवल एक वर्ग विशेष और जाति विशेष के वोटों को ही गिना जाता है, बाकी तो बस लुभाव के वोट माने जाते हैं।
 वैसे सपा विधायक ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज पर उंगली उठाने से पहले यह भूल गए कि तीन उंगलियां उनकी ओर भी उठ रही हैं। समाज को तोड़ने और साम्प्रदायिक विद्वेष का ज़हर फैलाने से पहले अबरार अहमद साहब ने अगर किसी विद्वान से सलाह ली होती तो शायद ऐसे घटिया और शर्मनाक बयान देने से बच जाते।

प्राचीन साहित्यों से पता चलता है कि क्षत्रिय वर्ण आनुवंशिक नहीं था और यह किसी जाति विशेष से सम्बंधित नहीं था। जातकों, रामायण और महाभारत ग्रंथों में क्षत्रिय शब्द से सामंत वर्ग और युद्धरत अनेक जातियां जैसे अहीर, गड़ेडिया, गुर्जर, मद्र, शक आदि का भी वर्णन हुआ है। वास्तव में क्षत्रिय समस्त राजवर्ग और सैन्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था। क्षत्रिय वर्ग का मुख्य कर्तव्य युद्ध काल में समाज की रक्षा के लिए युद्ध करना तथा शांति काल में सुशासन प्रदान करना होता था। अर्थात शासन और प्रशासन चलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति और सेना और सुरक्षा बल का प्रत्येक जवान "क्षत्रिय" ही है।

जातियों की बात करें तो चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण।
भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान
चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण.।।"

अर्थ:-दस सूर्यवंशीय क्षत्रिय, दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है, बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है।
 सूर्यवंशी, यदुवंशी, चौहान, सिसौदिया, सोलंकी , तोमर, गुर्जर, जाट, कुर्मी, राजभर आदि यह सभी जातियां क्षत्रिय समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। 
जहां तक ब्राह्मण समाज का विषय है तो ब्राह्मण हिन्दू वर्ण व्‍यवस्‍था का एक वर्ण है। ... यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार, ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: अर्थात् ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है "ईश्वर का ज्ञाता"। 
अबरार साहब को यह समझना चाहिए कि उनकी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव जिस यदुवंश से आते हैं वह क्षत्रिय वर्ण का ही है। 

दूसरी मज़े की बात यह है कि एक तरफ़ सपा प्रमुख ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज को अपने पक्ष में एकजुट करने के प्रयास में जगह-जगह "प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन" कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के कुछ निर्बुद्धि अर्थात मूढ़बुद्धि नेता उनकी मेहनत पर पानी फेरने में लगे हैं। यह तो वही कहावत हुई कि "मां फिरे चोथी-चोथी और पूत बिटौड़े बख़्श रहा है". मतलब यह है कि मां उपले बनाने के लिए जगह जगह से गोबर चुगती फिर रही है, और पूत बिटौड़े बख़्श रहा है। 

लगता है कि समाजवादी पार्टी पर कांग्रेस की छाया पड़ गई है, और समाजवादी में भी "पप्पू" पैदा हो गए हैं, जो कि अपने "पप्पू ब्रांड वक्तव्यों" से समाजवादी पार्टी के किये कराए पर पानी फेरने में लग गए हैं। श्री अखिलेश यादव को इन समाजवादी पप्पुओं से चौकस रहने की परम आवश्यकता है।

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट* - उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

बुधवार, 29 सितंबर 2021

टिकैत साहब अब आप भी मीडिया को धमकाने लगे, आप तो ऐसे नहीं थे

किसी ने क्या ख़ूब कहा है कि सच्चाई छुप नहीं सकती, कभी बनावट के उसूलों से।
के ख़ुशबू आ नहीं सकती, कभी बनावट के उसूलों से।।

 किसानों के स्वयंभू हितैषी बने श्रीमान राकेश टिकैत औऱ उनके भाई श्रीमान नरेश टिकैत पर यह शेर बिल्कुल सटीक बैठता है। टिकैत बंधुओं ने राष्ट्रवादी चैनल ज़ी न्यूज़ के एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद जिस प्रकार की प्रतिक्रिया दी है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने वाले श्री राकेश टिकैत लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को किस अधिकार से धमका रहे हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर अनाप-शनाप बयानबाजी करने वालों को मीडिया की आज़ादी रास क्यों नहीं आ रही है। यह तो बिल्कुल वही बात हुई "या तो भेली दे, नहीं तो चल प्रधान के पास।" मतलब या तो कथित किसान नेताओं के सुर में सुर मिलाओ, अन्यथा "किसान विरोधी" कहलाओ। व्हाट एन आइडिया टिकैत जी! 

श्री नरेश टिकैत साहब ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान जो सच उगला है, उसने कम से कम "कथित किसान आंदोलन" की कलई तो खोलकर रख ही दी। पूरा देश इस बात को भलीभांति समझ चुका है कि "कथित किसान हितों" की आड़ में "राजनीतिक हितों और स्वार्थों" को सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। इसे कुछ यूं भी कहा जा सकता है कि 
"कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना। 
टिकैत के खेल को समझ गया सारा ज़माना।।"  

यहां उल्लेखनीय है कि भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तथाकथित किसान नेता श्री राकेश टिकैत के भाई श्री नरेश टिकैत, ज़ी न्यूज़ द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन में अपनी दोहरी नीतियों के कारण पकड़े गए हैं, जिसमें उन्हें यह कहते हुए पाया गया कि विदेशी कंपनी को न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) से कम कीमत पर गन्ना और फ़ैक्ट्री के लिए सस्ती जमीन भी दिला सकते हैं यदि नकद में भुगतान किया जाए। मतलब भुगतान नकदी में होना चाहिए ताकि आयकर इत्यादि से बचा जा सके, और उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत भी न हो।

 अम्बानी-अडानी को अपनी जमीनें न देने का ढोल पीटने वालों की सारी पोल खुलकर सामने आ गई है। करीब 9 महीने से मुख्य मार्गों को घेरकर लंगर चलाने वाले और कथित रूप से एयरकंडीशनर तंबुओं में झपकी मारने वाले "किसान नेताओं" की पोल का ढोल बीच बजरिया में ही खुल गया।
हालांकि इस बात से कदापि इंकार नहीं किया जा सकता है, कि किसानों के साथ समस्याएं हैं, और  हमेशा और हर सरकार में किसानों और सरकारों के बीच रस्साकशी चलती रही है और आगे भी इसी प्रकार चलती रही है। लेकिन किसान हितों की आंच पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का शायद यह पहला मामला है।

श्रीमान टिकैत साहब आप किसानों के हित की बात ख़ूब कीजिये लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का गला घोंटने की धमकी देकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं।

श्रीमान राकेश टिकैत और उनके भ्राता श्री नरेश टिकैत को यह समझना ही होगा कि सर-फुटटॉवल और धमकियां देने से किसानों का हित नहीं सधेगा, बल्कि बातचीत से ही कोई शांतिपूर्ण समाधान निकालना होगा। साथ ही भारत सरकार को भी इस समस्या का जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालने हेतु पहल करनी होगी, यूं टिकैत साहब को नेता बनाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है।

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यदि वास्तव में ऐसा होता है तो यह "गांधी परिवार" का दुर्भाग्य ही होगा

कांग्रेस ने कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी के कंधों पर अपना सर रख दिया है। कहते हैं कि डूबते को तिनके सहारा चाहिए होता है, और कांग्रेस का जहाज डूब रहा है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि ख़ुद कन्हैया कुमार कह रहे हैं। कन्हैया कुमार वही हैं जो जेएनयू में प्रति वर्ष दुर्दांत आतंकी अफ़ज़ल गुरु की मौत पर "अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल जिंदा हैं" कहकर छाती पीट-पीटकर आंसू बहाते थे। यही कन्हैया कुमार कहते थे- भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह। यह वही कन्हैया कुमार हैं जो बिहार में बेगूसराय से चुनाव लड़े थे और गिरिराज सिंह ने उन्हें 4 लाख से भी अधिक मतों से हरा दिया था। दूसरे किरदार हैं जिग्नेश मेवाणी, जिन्होंने कहा था कि "मोदी की जीत सामूहिक पागलपन का नतीजा है"। यह कहकर न केवल उन्होंने लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों का अपमान किया था, बल्कि देश के उस प्रत्येक नागरिक को "पागल" बताने दुस्साहस किया था, जिन्होंने श्रीमान मोदी को अपना कीमती मत दिया था। विडम्बना देखिये कि देश की सबसे पुरानी और गांधीवादियों की जमात कांग्रेस पार्टी ने अपनी डूबती हुई नैया की पतवार इन दोनों नौसिखिया राजनीतिज्ञों को सौंप दी है। क्या कांग्रेस को श्री राहुल गांधी के युवा नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा या फ़िर कन्हैया कुमार की तरह ही कांग्रेस को "भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह" का नारा रास आने लगा है और अब कांग्रेस भी टुकड़े-टुकड़े गैंग में शामिल हो गई है? यूं बाटला हाउस कांड में मारे गए आतंकियों की मौत पर रातभर रोने वाली कांग्रेस के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग से रिश्ता कोई नया नहीं है। यह वही कांग्रेस है जिसमें सैफुद्दीन सोज, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे तमाम लोग शामिल हैं जिन्होंने हमेशा पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दों पर भारत सरकार विरोधी रुख अपनाने का प्रयास किया है। कांग्रेस में आतंकियों और पत्थरबाजों को "भटका हुआ नौजवान" बताने की बहुत पुरानी परम्परा है। 

सत्तामोह में धृतराष्ट्र बन चुकी कांग्रेस को इन दोनों, दुर्योधन और दुःशासन के कुकृत्य दिखाई नहीं पड़ रहे, या फिर वह देखना ही नहीं चाहती है। विडम्बना तो यह है कि सदैव अपने आपको स्वतंत्रता संग्राम का नायक बताने वाली औऱ गांधीवाद की दुहाई देने वाली कांग्रेस कन्हैया कुमार जैसे "खलनायक" को अपना "नायक" बनाने पर क्यों तुली है?

यक्ष प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस कन्हैया कुमार जैसे खलनायकों को भारत की युवापीढ़ी का आदर्श बनाना चाहती है? क्या शहीदे आज़म भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक-उल्ला -खान, चंद्रशेखर आज़ाद और मंगल पांडे सरीखे नौजवानों और कांग्रेसी नेताओं ने देश को आजादी इसीलिए दिलवाई थी कि भारत की सबसे पुरानी गांधीवादी पार्टी इस देश की युवापीढ़ी को दुर्योधन और दुःशासन का चरित्र अपनाने और उन्हें अपना आदर्श बनाने के लिए प्रेरित करेगी?
कांग्रेस की जिस डूबती हुई नैया को श्रीमान राहुल गांधी और श्रीमति प्रियंका वाड्रा नहीं बचा पाए, क्या उसे कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे राजनीति के बाल कलाकार बचा पाएंगे? और यदि वास्तव में ऐसा हो जाता है तो निश्चित रूप से यह "गांधी परिवार" का दुर्भाग्य ही होगा।

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मंगलवार, 28 सितंबर 2021

श्रीराम मंदिर बनवाकर भाजपा ने महापाप किया था, अब सजा भुगतो

कभी-कभी सोचता हूँ कि श्री अयोध्या में प्रभु श्रीराम का मंदिर बनवाकर भारतीय जनता पार्टी ने महापाप किया। काश अगर इसके स्थान पर बाबरी मस्जिद बनवा दी होती तो पश्चिम बंगाल सहित सभी राज्यों में आज भाजपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बन होती। और श्रीमान नरेंद्र मोदी को 21वीं सदी का "महापुरुष" बना दिया गया होता। लेकिन हाय री बदकिस्मती, कि श्रीमान मोदी ने 1990 के श्रीरामभक्तों की वीरगति को नमन करते हुए, श्री अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनवा दिया। श्री मोदी शायद भूल गए कि हिंदुओं को मंदिर नहीं सस्ता पेट्रोल चाहिये, सस्ते प्याज-टमाटर, सस्ता राशन, सरकारी नौकरियां, और मुफ़्त की बिजली और पानी चाहिए। इन्हें गन्ने के बढ़ते हुए दाम और मुफ़्त के लैपटॉप चाहिए। सैंकडों वर्षों से विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन करने वाले गुलामों को गुलामी के प्रतीक सुहाते हैं, इन्हें श्रीराम का मंदिर नहीं चाहिए, इन्हें अस्पताल चाहिए। इन्हें मुफ़्त की वैक्सीन चाहिए, इन्हें ऑक्सीजन के सिलेंडर चाहिए। इनकी मानसिकता खाने, सोने और हगने से ज़्यादा कुछ सोच ही नहीं सकती। यह धर्म के प्रति कभी कृतज्ञ नहीं रहे, यह हमेशा ही कृतघ्न रहे हैं। इन्हें आदत है गुलामी की, इन्हें स्वाभिमान से मरना पसंद नहीं है, यह घुटनों के बल रेंगकर जीना पसंद करते हैं। इन कृतघ्न हिंदुओं की इस गुलाम मानसिकता को विपक्ष ने बख़ूबी समझ लिया था। इसीलिए उन्होंने इनको मुफ्तखोरी की आदत डाल दी।

श्री मोदी जी, यदि आपने बाबरी मस्जिद का जीर्णोद्धार कराया होता तो आज पूरी दुनिया में आपके नाम का डंका बज रहा होता और यह कायर, बुजदिल और गुलाम मानसिकता का हिन्दू समाज आपकी जय जयकार कर रहा होता। आप "सेक्युलिरिज्म के देवता" बन गये होते। पूरे देश का मुसलमान आपको अपना मसीहा मानने लगता, लेकिन अहो दुर्भाग्य कि आपने अपनी अंतरात्मा और अपने धर्म से समझौता नहीं किया। शायद आप समझ ही नहीं सके कि इस देश में रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा किसी को कुछ न सुनाई देता है, न ही दिखाई देता है। जातिवाद और पंथवाद के बोझ तले दबा यह कायर हिन्दू समाज कभी अपनी अंतरात्मा, अपने स्वाभिमान, अपने धर्म और अपने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझ ही नहीं पाया। सैंकड़ो वर्ष बीतने के पश्चात भी यह अपने आपको ग़ुलामी की बेड़ियों से मुक्त नहीं करा सका। 
शायद मोहनदास करमचंद गांधी हिंदुओं की इस गुलाम मानसिकता को बहुत अच्छी तरह से समझ गए थे, इसीलिये वह "महात्मा" बन गए, लेकिन नाथूराम गोडसे इस सच्चाई को कभी नहीं समझ सका इसलिए वह "आतंकी" कहलाता है।

इस देश की यह विडंबना है कि जिस-जिसने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, परम्पराओं और जीवन मूल्यों को जीवित रखने का प्रयास किया वही व्यक्ति "गोड़सेवादी",  "संघी" और "भगवा आतंकी" कहलाया। और जिसने इस देश लूटने वालों, आक्रांताओं, वहशी-दरिंदों और गद्दारों का महिमामंडन किया, उत्साहवर्धन किया, उन्हें संरक्षण दिया वह सभी "कथित सेक्युलर" , शांतिदूत, और देशभक्त कहलाये।

ज़रा गौर कीजिए साहब, जिन्होंने प्रभु श्रीराम को काल्पनिक कहा, जिन्होंने श्रीरामभक्तों पर गोलियां चलवाईं आज वह छाती ठोककर सराकर बनाने का दावा कर रहे हैं और जिन्होंने प्रभु श्रीराम के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, जिहोंने गुलामी की निशानियों को मिटाने के लिए अपने अस्तित्व को मिटा दिया, वह ख़ामोश बैठे मंचों से "अल्लाह हू अकबर" के नारे सुन रहे हैं।

कौन कहता है कि सत्यमेव जयते, कड़वा सच तो यह है साहब कि इस देश में झूठ, अन्याय और अधर्म फलफूल रहा है, सड़कों पर जाम लगा रहा है और सत्य, न्याय और धर्म की हार का जश्न मनाया जा रहा है।
अब भी समय है, मोदी जी जाग जाइये, बाबरी मस्जिद बनवा दीजिये, गाय को खुलेआम चौराहों पर कटवाकर बीफ़ पार्टी करवाइए, रोहिंग्या को पलकों पर बैठाइए, दरगाहों पर चादर चढ़ाइए, कश्मीर से धारा 370 हटाइये, बाटला हाउस कांड पर आंसू बहाइये, NRC-CAA में मुस्लिम शब्द जोड़िए, गंगा-जमुनी तहज़ीब की नदियां बहाइये, सर पर टोपी रखकर रोज़ा अफ्तारी कराइये, तालिबानी हुक़ूमत से हाथ मिलाइए, इमरान साहब से गले मिल जाइये और मंदिरों में कुरआन ख्वानी कराइये, मिशनरियों को धर्मांतरण की खुली छूट दे दीजिये। हरामखोरी की आदत डलवाईये और मुफ्तखोरों को बिजली, पानी, बस का सफ़र इत्यादि दिलवाइये।

बस फिर कोई आपसे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्या और गैस के सिलेंडर पर सवाल नहीं पूछेगा। क्योंकि उनके लिए मज़हब पहले है और देश बाद में।

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शनिवार, 25 सितंबर 2021

राकेश टिकैत साहब ने तो तमंचे का लाइसेंस लेकर सीधा तोप का ऑर्डर दे दिया

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बीती 24 सितंबर को अमेरिका के राष्ट्रपति को टैग करके ट्वीट किया। टिकैत ने लिखा कि "भारतीय किसान पीएम मोदी की सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। पिछले 11 महीने के विरोध प्रदर्शन के दौरान 700 किसानों की जान जा चुकी हैं। इस काले कानून से हमारी रक्षा होनी चाहिए। कृपया पीएम मोदी से अपनी मीटिंग में हमारे मुद्दों पर भी ध्यान दें।"
इससे पूर्व पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती साहिबा ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान से बात करने की सलाह दी थी। AIMIM अध्यक्ष जनाब असदुद्दीन ओवैसी और नेशनल कांफ्रेंस के फ़ारुख अब्दुल्ला साहब ने तालिबान से बातचीत करने की सलाह दी थी। कांग्रेस नेताओं ने हमेशा ही भारत के अंदरूनी मसलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की कोशिश की है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण न किया होता तो आज POK हमारा होता। कांग्रेस के युवराज श्री राहुल गांधी ने भी विदेशों में भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अपने घर का झगड़ा चौराहों पर ले जाना शायद विपक्ष की सबसे बड़ी कमज़ोरी रही है। जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अक्सर भारत की छवि धूमिल हुई है। 

अब स्व. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के सुपुत्र और भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति को ट्वीट करके भारत के अंदरूनी मामलों को अंतरराष्ट्रीय पटल पर रखने का असफ़ल प्रयास किया है। 

अपने मंचों से "अल्लाह हू अकबर" का नारा लगाने वाले टिकैत साहब से हमें यह आशा नहीं थी कि वह सीधे जो बाइडेन साहब के दरबार में घण्टा बजायेंगे, हमें तो पूरा विश्वास था कि टिकैत साहब तालिबान के मुल्ला बरादर से गुहार लगाएंगे या फिर इमरान खान से अपनी समस्याओं को साझा करेंगे। तुर्की और बांग्लादेश के मुखियाओं से बात करेंगे अन्यथा शी जिनपिंग से तो शत-प्रतिशत मुलाकात कर ही लेंगे। लेकिन टिकैत साहब ने हमारी सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। राकेश टिकैत साहब ने तो तमंचे का लाइसेंस लेकर सीधा तोप का ऑर्डर दे दिया।

क्या कभी राकेश टिकैत ने यह विचार किया कि उनके स्व. पिताश्री महेंद्र टिकैत ने कभी किसी बाहरी हस्तक्षेप के लिए मदद की गुहार क्यों नहीं लगाई? जबकि बाबा टिकैत अपने समय के बड़े किसान नेताओं में गिने जाते थे। श्रीमान राकेश टिकैत को यह समझ नहीं आ पा रहा है कि वह किसान हितों की बात करते-करते विपक्ष के राजनीतिक हितों को साधने में लग गए हैं। इस देश का सच्चा किसान भारत की आन, बान और शान के लिए अपनी जान दे सकता है। जिस किसान का बेटा सीमाओं पर बंदूक ताने, और दुश्मन को निशाने पर लिए खड़ा है, उस किसान का हित देशहित से बड़ा नहीं हो सकता, और यह बात शायद टिकैत साहब बहुत बेहतर तरीके से समझ पा रहे होंगे। 
इस समय पूरा विश्व आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है और अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के बाद तो ख़तरा और भी बढ़ गया है, उधर चीन, पाकिस्तान और तुर्की लगातार भारत को घेरने में लगे हैं। ऐसे समय में भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय सेना का उत्साहवर्धन करे। श्रीमान राकेश टिकैत को यह भी समझना होगा कि राष्ट्र प्रथम है और राष्ट्र सर्वोपरि है। कोई भी समस्या राष्ट्र की समस्या से बड़ी नहीं हो सकती और कोई भी हित राष्ट्र के हित से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकता।

राकेश टिकैत साहब को समझना होगा कि विपक्ष उनके कंधे पर रखकर निशाना लगा रहा है। विपक्ष को किसानों के हित की इतनी अधिक चिन्ता होती तो शायद आज किसानों के समक्ष कोई समस्या ही नहीं होती। किसान तो किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह के पास भी गुहार लगाने गया था, और स्वयं बाबा टिकैत अपने पूरे जीवन किसान हितों के लिए पूर्ववर्ती सरकारों से लड़ते रहे। इस सबके बावजूद आज तक किसान और सरकार के बीच का संघर्ष अनवरत जारी है। और हमेशा चलती रहेगी। कोई बाइडेन या टिकैत उस संघर्ष को सदा के लिए नहीं मिटा सकता।

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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

ऐसे तथाकथित ब्राह्मणों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए

आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें एक ऑडियो क्लिप सुनाई पड़ रही है जिसमें दो शख़्स धर्मांतरण को लेकर आपस में टेलीफोन पर वार्तालाप कर रहे हैं, जो कि काफी आपत्तिजनक है। ऑडियो मैसेज में मौलाना कलीम सिद्दीकी दूसरी तरफ एजेंट से कहते हुए साफ सुनाई दे रहे हैं कि धर्मांतरण उस रफ्तार से नहीं हो पा रहे. इसके जवाब में एजेंट मौलाना से बोल रहा है कि लॉकडाउन के चलते हिंदू लड़कियां नहीं मिल पा रही हैं. एजेंट ये भी कहता है कि कुछ छोटी जाति की लड़कियां मिल रही थी... इसपर मौलाना कहते हैं कि नहीं, बड़ी जाति की लड़की खासतौर पर ब्राम्हण वगैरह की लडकियां हों तो ठीक रहेगा. ऑडियो मैसेज से साफ है कि मौलाना बड़े पैमाने पर हिंदू लड़कियों विशेषकर ब्राह्मण वर्ग की लड़कियों के धर्मपरिवर्तन की तैयारियों में लगे थे। हालांकि हम इस ऑडियो क्लिप की पुष्टि नहीं कर रहे। परन्तु दूध में पड़ी हुई मक्खी देखकर उसे अनदेखा करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि इन मौलाना कलीम सिद्दीकी को उत्तरप्रदेश ATS (एंटी टैरर स्क्वाड) ने जबरन धर्मांतरण सहित कई संगीन आरोपों में गिरफ्तार किया है। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी के सांसद जनाब शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब, कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता जनाब राशिद अल्वी साहब और आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुतल्ला खान और प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने इन मौलाना साहब की गिरफ्तारी का न सिर्फ़ कड़ा विरोध किया बल्कि उन्हें पूरी तरह से क्लीन चिट देने का हरसम्भव प्रयास भी किया। 

विडम्बना देखिये कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमान अखिलेश यादव लगातार ब्राह्मण समाज की सुरक्षा और सम्मान की दुहाई दे रहे हैं, कांग्रेस पार्टी के युवराज श्री राहुल गांधी स्वयं को दत्तात्रेय गोत्र का जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हुए नहीं थक रहे। इस सबके बावजूद भी सपा और कांग्रेस के नेता मौलाना कलीम सिद्दीकी  के बचाव के लिए लगातार हाथ-पैर पीट रहे हैं।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि सपा औऱ कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल ब्राह्मण समाज को अपने पाले में करने के लिए लगातार "सम्मान समारोह" कर रहे हैं। दूसरी तरफ़ ब्राह्मण बेटियों को अपमानित करने का षड्यंत्र रचने वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मण समाज के जो लोग इस सबको अनदेखा करके इन "ब्राह्मण विरोधी मानसिकता" के पैरोकारों के दरबारों में हाजिरी लगा रहे हैं, क्या वह किसी भी दृष्टिकोण से ब्राह्मण कहलाने योग्य हैं? सच पूछिए तो ऐसे लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिये। परन्तु इनकी आंख का पानी उतर चुका है। इन चंद "नौताखाऊ पोंगा पंडितों" के कारण ही पूरे ब्राह्मण समाज को शर्मिंदा होना पड़ता है। ऐसे कुलद्रोही और कुल कलंकी ब्राह्मणों से तो रावण कहीं अधिक अच्छा था, जिसने अपने जीते जी श्रीराम और उनकी सेना को अपनी लंका में प्रवेश नहीं करने दिया था।
ब्राह्मणों को चाहिए कि वह मौजूदा सरकार से मांग करें कि वह इस ऑडियो क्लिप की हर प्रकार से पुष्टि कराये और साथ ही उन तमाम राजनीतिक दलों से भी माफ़ी की मांग रखें जिन्होंने मौलाना कलीम सिद्दीकी के बचाव का हरसम्भव प्रयास किया था। अन्यथा ऐसे तमाम नेताओं और दलों का खुलकर विरोध किया जाना चाहिए जो कि इस प्रकार के षड्यंत्रकारियों की पीठ थपथपाते हैं।


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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

हिन्दू माता-पिता अपनी बेटियों को मुस्लिम लड़कों के पीछे लगाते हैं-मसूद हाशमी

इस देश में दो प्रकार के आतंकवादी जिहाद चला रहे हैं। एक वह जो "गोली" से आतंकवाद फैलाते हैं, और दूसरे वह हैं जो "बोली" से आतंक फैलाने की साजिश कर रहे हैं। यह दोनों ही प्रकार के आतंकी भारत की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। 
"बोली" यानी विचारों से आतंकवाद करने वाले लोगों को आप "वैचारिक आतंकी" की संज्ञा दे सकते हैं। वैचारिक आतंकवाद का एक नमूना हमें तब देखने को मिला जब कल राष्ट्रीय स्तर के एक चैनल पर मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब की गिरफ्तारी को लेकर एक परिचर्चा (डिबेट) चल रही थी। जिसमें कई पार्टियों के प्रवक्ताओं के साथ-साथ इत्तेहाद सोसायटी के अध्यक्ष और राजनीतिक विश्लेषक मसूद हाशमी भी वहाँ उपस्थित थे। लव जिहाद से सम्बंधित एक प्रश्न के उत्तर में मसूद हाशमी ने कहा कि - *"मुस्लिम लड़के किसी प्रकार का कोई 'लव जिहाद' नहीं करते बल्कि सत्य यह है कि हिन्दू लोग दहेज न देने से बचने के लिए अपनी बहन-बेटियों को मुस्लिम लड़कों के पीछे लगाते हैं।"*
हालांकि इस बेहद घटिया औऱ शर्मनाक बयान के बाद कार्यक्रम के एंकर ने तुरन्त मसूद हाशमी को परिचर्चा से बाहर कर दिया। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या मसूद हाशमी जैसे "वैचारिक आतंकियों" की घिनौनी, घृणित और समाज विरोधी मानसिकता में कोई बदलाव आ पायेगा? मसूद हाशमी ने यह बयान एक राष्ट्रीय चैनल पर दिया, जिसे देश-विदेश के लाखों-करोड़ों हिन्दू परिवारों ने देखा होगा, और उन सभी की भावनाओं को कितना गहरा आघात पहुंचा होगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

 मसूद हाशमी जैसे लोग वही हैं जो यह कहते हैं कि भारत में मुसलमानों को डर लग रहा है, यह वही लोग हैं जो कहते हैं कि भारत के मुसलमानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। दरअसल मसूद हाशमी जैसे "वैचारिक आतंकी" अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अक्सर देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता पर कुठाराघात करते रहते हैं। 
यह वही लोग हैं जो हिंदुत्व की कब्र खोदने वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं। मसूद हाशमी जैसे लोग भारत में असहिष्णुता और मॉबलिंचिंग की दुहाई देते नहीं थकते हैं, लेकिन जिस प्रकार से यह लोग "शब्दों की मॉबलिंचिंग" करते हैं, उसका अनुमान मसूद हाशमी के उपरोक्त बयान से सहज ही लगाया जा सकता है।
गंगा-जमुनी तहज़ीब और साम्प्रदायिक सौहार्द की बात करने वालों को मसूद हाशमी का उपरोक्त बयान क्यों नहीं दिखाई देता है? आरएसएस, भाजपा और तमाम हिन्दू संगठनों को देश के सांप्रदायिक सद्भाव, शांति, धर्मनिरपेक्षता और  एकता के लिए ख़तरा बताने वाले कांगी, वामी, जिहादी और तथाकथित बुद्धिजीवियों को मसूद हाशमी जैसे वैचारिक आतंकवादी का यह बयान क्यों नहीं सुनाई पड़ता है? 

क्या मसूद हाशमी पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होनी चाहिए, क्या मसूद हाशमी का यह बयान इस देश के करोड़ों हिन्दू परिवारों के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने वाला नहीं है? प्रश्न यह है कि यदि ऐसी घिनौनी, घृणित और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किसी अन्य मज़हब की बहन-बेटियों के लिए किया जाता तो क्या अब तक सर कलम करने के फ़तवे जारी न हो जाते? क्या ऐसे समाज और देशविरोधी बयान देने वालों को माफ़ कर देना उचित होगा?
मसूद हाशमी जैसे लोग अपने ही मज़हब और क़ौम के लोगों की निष्ठा और देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। ऐसे लोग पूरे देश, समाज और मज़हब के दुश्मन हैं। इन लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना ही चाहिए। यह लोग मानसिक रोगी हैं, इनको ईलाज की सख़्त जरूरत है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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गुरुवार, 23 सितंबर 2021

अखिलेश जी आपने परिवार द्वारा परिवार के लिए परिवार का शासन बना दिया

मीडिया के हवाले से ख़बर मिली है कि
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव ने कहा है कि "भाजपा के कारण लोकतंत्र कमजोर हुआ है।"
यहाँ एक प्रश्न श्री अखिलेश यादव से बनता है कि महोदय क्या मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे गुंडों-माफियाओं के बलबूते पर शासन चलाने वालों के शासनकाल में लोकतंत्र मज़बूत था? लोकतंत्र का अर्थ है- जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन। परन्तु पूर्ववर्ती सरकारों ने लोकतंत्र की परिभाषा को पूरी तरह बदलते हुए इसे - *"परिवार द्वारा, परिवार के लिए, परिवार का शासन बना दिया।"*

पूर्ववर्ती सरकारों में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों ने और गायत्री प्रजापति जैसे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनीतिज्ञों ने लोकतंत्र का मख़ौल बनाया। आजम खान जैसे लोगों ने गरीब जनता को न्याय दिलाने के स्थान पर पुलिस-प्रशासन को भैंसों की रखवाली पर लगा दिया। संवैधानिक संस्थाओं का इससे बड़ा दुरुपयोग भला और क्या हो सकता है। उत्तरप्रदेश जनता शायद अभी नहीं भूली है कि 2016 में किस प्रकार से सत्तामोह में फंसा "मुलायम कुनबा" एक-दूसरे के प्रति ज़हर उगल रहा था, जिसके चलते भाजपा ने बाजी मार ली थी। क्या उस लड़ाई में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मान-सम्मान रखा गया था? शायद नहीं। 

श्री अखिलेश यादव ने आगे कहा कि- "भाजपा द्वारा बिना कोई जनहित कार्य किये सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग करना जनता के साथ धोखा है। गन्ने का बकाया, बिजली बिल बढोत्तरी, बुनकरों की समस्या, बेरोजगारी की समस्या, महिला उत्पीड़न, अपराध के आंकड़ों में आज उत्तर प्रदेश अन्य राज्यों से आगे है। समाज का प्रत्येक वर्ग परेशान और दुखी है। सरकारी लूट से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। बीजेपी सिर्फ झूठ फैलाकर दूसरे के कार्यों को अपना बताने में लगी है।"

यहां उल्लेखनीय है कि इंग्लिश अखबार मेल टुडे के मुताबिक समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया की 46वीं पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित पार्टी मीटिंग में श्री अखिलेश यादव के पिताश्री माननीय मुलायम सिंह यादव ने कहा था, *"समाजवाद पार्टी के मंत्रियों के आचरण पर कोई सवाल नहीं उठना चाहिए। संयम से काम लीजिए। कुछ सुविधा ले लीजिए, कुछ कमा लीजिए, कुछ खा लीजिए लेकिन पांच सालों में नौजवानों ने जो कुर्बानियां दी हैं, उन पर आंच नहीं आनी चाहिए।"*
मुलायम सिंह यादव का यह बयान उनके छोटे भाई और तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर शिवपाल यादव की उस सलाह को दोहराता नज़र आया था, जो उन्होंने नौकरशाहों को दी थी। 9 अगस्त 2012 को शिवपाल यादव ने कहा था, *'अगर मेहनत करोगे तो थोड़ी-बहुत चोरी कर सकते हो, लेकिन आप डकैती नहीं डाल सकते।'* हालांकि, बाद में शिवपाल ने कहा था कि उन्होंने यह कॉमेंट मजाकिया लहजे में किया था। इस मामले को हाइलाइट करने पर उन्होंने कुछ पत्रकारों को धमकी भी दी थी। (यह पूरी खबर नवभारतटाइम्स की वेबसाइट पर 2012 में छपा था)
श्रीमान अखिलेश यादव ने यदि अपने पिताश्री मुलायमसिंह यादव और तातश्री शिवपाल यादव को नौकरशाहों और सपा सरकार के मंत्रियों को ग़लत नसीहतें देने से रोका होता और गायत्री प्रजापति जैसे नेताओं पर लगाम कसी होती तो शायद आज समाजवादियों को बुरे दिन न देखने पड़ते। उत्तरप्रदेश की जनता ने माननीय  अखिलेश यादव को प्रदेश सरकार की बागडोर क्या इसीलिए सौंपी थी कि वह केवल एक मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते रहें, क्या उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं था?  आख़िर क्या कारण था कि 2017 में उत्तरप्रदेश की जनता ने "विकास पुरुष" के हाथों से सत्ता छीनकर भाजपा के हाथों में थमा दी थी। श्री अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को गम्भीरता पूर्वक आत्ममंथन करना चाहिए था कि आख़िर किन कारणों से उनके हाथों से सत्ता फिसल गई थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में तमाम कोशिशों के बावजूद भी समाजवादी पार्टी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई थी। क्या सपा के थिंकटैंक ने इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने का कष्ट किया?
समाजवादी पार्टी ने जिस प्रकार से खुलेआम तुष्टिकरण की राजनीति की है, और लगातार गुंडों-माफियाओं और आतंकियों को संरक्षण दिया, क्या उससे उनकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा? 
श्री अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार , गुंडागर्दी और तुष्टिकरण किस हद तक था। सपा सरकार में किस प्रकार से सरकारी योजनाओं में तुष्टिकरण का खेल खेला गया, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार द्वारा संचालित ‘हमारी बेटी उसका कल’ योजना के तहत मुस्लिम लड़कियों को तीस हजार रुपये का अनुदान उच्च शिक्षा के तहत दिया गया। जिसपर तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री अवधेश प्रसाद ने विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के रघुनंदन भदौरिया के प्रश्न के लिखित उत्तर मे कहा था कि मुस्लिम लड़कियों की तरह निर्धन हिंदू या अन्य वर्ग की लड़कियों को अनुदान देने की कोई योजना नहीं है।"
सरकारी योजनाओं में इस प्रकार के भेदभावपूर्ण रवैये को क्या संवैधानिक माना जा सकता है? क्या एक "सेक्युलर" सरकार के  लिए ऐसा करना न्यायपूर्ण और निष्पक्षता का उदाहरण माना जा सकता है? 
माननीय अखिलेश यादव को इन तमाम प्रश्नों के उत्तर जनता को देने ही होंगे।


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बुधवार, 22 सितंबर 2021

किसान हित तो केवल एक बहाना है, असली मक़सद तो योगी-मोदी को हटाना है

मीडिया सूत्रों से मिली खबरों के अनुसार भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमान राकेश टिकैत ने अपने एक बयान में कहा कि *"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीच में ही अपने पद से हट जाएंगे और वह राष्ट्रपति बनेंगे. उन्होंने यह भी कहा, ''योगी जी का प्रमोशन होना चाहिए, और वह पीएम बन जाएं."*
हमारी समझ से यह बाहर की बात है कि कल तक जो राकेश टिकैत किसान हितों की बातें कर रहे थे और मंचों से "अल्लाह हू अकबर" के नारे लगा रहे थे, आज वही राकेश टिकैत किसान भाइयों के हितों की चिंता छोड़कर श्री मोदी-योगी के प्रमोशन  के लिए इतने उतावले क्यों हो रहे हैं। जो टिकैत कल तक "मोदी-योगी मुक्त भारत" बनाने का संकल्प लेकर देशभर में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, वही टिकैत आज श्री मोदी को राष्ट्रपति और श्री योगी को प्रधानमंत्री बनाने पर क्यों तुले हुए हैं? प्रश्न यह भी है कि बकौल श्रीमान राकेश टिकैत के यदि श्री योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री बना दिया गया तो "टिकैत एंड कम्पनी" के प्रायोजक श्रीमान राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के "हसीन सपनों" पर पानी नहीं फिर जाएगा? श्री राकेश टिकैत को यह समझना चाहिये कि "गांधी एंड संस् कम्पनी" की एक ही महत्वाकांक्षा है कि श्री राहुल गांधी इस देश के प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन लगता है कि श्री राकेश टिकैत श्री योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री बनाने की भीष्म प्रतिज्ञा ले चुके हैं। इसे कुछ यूं कहा जाए कि खाये भैया का और गीत गाये सैंया का।।

साथ ही श्री राकेश टिकैत ने एक कार्यक्रम में सवालों का जवाब देते हुये कहा- *''बीजेपी का हारा हुआ उम्मीदवार भी जीत का प्रमाण-पत्र लेकर जाएगा क्योंकि मुझे ईवीएम पर भरोसा नहीं है."*
उल्लेखनीय है कि यह वही राकेश टिकैत हैं जो कल तक यह दावा करते नहीं थक रहे थे कि "टिकैत आंदोलन" के कारण भाजपा को पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। और अब यह कहकर जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें ईवीएम पर भरोसा नहीं है। अरे टिकैत साहब सच बताइये, "आपका ईवीएम पर से भरोसा उठ गया है या फिर अपने आप पर से भरोसा उठा है।" लगता है कि टिकैत साहब को धीरे-धीरे यह समझ आने लगा है कि जनता जनार्दन उनके "किसान हितों की नौटँकी" को भलीभांति समझ गई है और अब उनके सभी नाटक-नौटँकी बन्द होने की कगार पर आ गए हैं। 
राकेश टिकैत यह भी दावा कर रहे हैं कि *"वह कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे।"* सुधि पाठकों को शायद जानकारी हो कि श्री राकेश टिकैत अब से पहले दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, 2007 विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े थे जबकि 2014 में राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर अमरोहा लोकसभा से चुनाव लड़े थे, चुनावी मैदान में टिकैत को दोनों बार हार का सामना करना पड़ा। और दोनों ही बार उनकी ज़मानत ज़ब्त हो चुकी है। ऐसे में तीसरी बार अगर फिर से उनकी जमानत ज़ब्त हो गई, तो विपक्ष की जो बची-खुची उम्मीद उनसे है, वह भी टूट जाएगी। टिकैत साहब जानते हैं कि उनका खुद का कोई जनाधार नहीं है, अलबत्ता "कथित किसान हित" के नाम पर उन्होंने खासी भीड़ जरूर इकट्ठा कर ली थी, जो कि अब समझ गई कि किसान हित तो केवल एक बहाना है, असली मक़सद तो योगी-मोदी को हटाना है।

दरअसल, किसानों के हित की आड़ में तथाकथित किसान नेता और विपक्षी दलों ने जो खेल खेला है, उसकी सच्चाई को अब पूरा देश समझ गया है। बार-बार लगातार जिस प्रकार से श्री मोदी-योगी को निशाना बनाया जा रहा है और श्री राहुल गांधी की शान में कसीदे गढ़े जा रहे हैं, मंचों से धार्मिक नारे लगाए जा रहे हैं, और ईवीएम को टारगेट किया जा रहा है, उससे सबकुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है। 
कथित किसान आंदोलन की आड़ में जिस प्रकार से मुख्य मार्गों और राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम कर, आम जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा सुविधाओं और रोजगार को बाधित किया जा रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है। आम आदमी को परेशान करके आप किसका भला कर रहे हैं, लालकिले के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करके आप किसको खुश करना चाहते हैं, यह अब सबको मालूम हो चुका है। सम्पूर्ण विपक्ष जान चुका है कि योगी को हटाना मुश्किल ही नहीं वरन नामुमकिन है। 

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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मिलते हैं मुस्कुरा कर वो गले, मगर "ख़ंजर" पीठ पर घोंपते हैं

आजकल उत्तरप्रदेश में बहरूपियों की मानो बाढ़ सी आई हुई है। जिधर देखिये आपको कुछ लोग रामनाम का दोशाला ओढ़े हुए मंदिर-मंदिर भटकते हुए मिल जाएंगे। जहां कुछ लोग राम नाम का जप कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ बहरूपियों को हरे कृष्णा-हरे कृष्णा का जाप करते हुए भी देखा जा सकता है। कुछ तो अपने आपको श्रीकृष्ण का वंशज बताने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। दो बहरूपिये तो विशेष रूप से दिल्ली से इम्पोर्ट हुए हैं, जिनमें से एक सज्जन तो किसी ज़माने में सिनेमाओं के टिकट ब्लैक करने का घोर पाप भी किया करते थे। और उत्तरप्रदेश की जनता ने स्याही से उनका मुहं भी काला कर दिया था, और वह अपना मुहं काला कराकर दबे पांव भाग निकले थे। लेकिन बेशर्मी की हद देखिये कि इतना सबकुछ होने के बावजूद भी वह अपना काला मुहं लेकर उत्तरप्रदेश में पुनः प्रयासरत हैं। एक और भाई-बहन का जगप्रसिद्ध जोड़ा उत्तरप्रदेश में माथा टेकते हुए घूम रहा है, गले में जेएनयू धारण किये हुए, सत्तात्रेय गोत्र के यह पोंगापण्डित इससे पहले भी मंदिरों में काफी माथा फोड़ चुके हैं, लेकिन इनके हाथ में आया बाबा जी का ठुल्लू।
मजे की बात यह है कि आजकल जो लोग भगवा वस्त्र लपेटकर और माथे पर लम्बा-चौड़ा तिलक लगाए गली-गली भटक रहे हैं, यह वही लोग हैं जो कल तक "सेखयुलर" नामक ख़तरनाक़ बीमारी के वायरस से पीड़ित थे। यह वही बीमारी है जो कि एक समय हमारे देश में एक महामारी के रूप में तेज़ी से फैल रही थी। इस घातक बीमारी के मरीज़ को राष्ट्रवाद, हिन्दू, हिंदुत्व और हिंदी से मानो घृणा सी होने लगती थी। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति "भगवा रंग" से ऐसे घबराता है कि जैसे कुत्ता काटे का मरीज़ पानी देखकर डरता है। इसे हिन्दुफोबिया भी कह सकते हैं। इस बीमारी के मरीज़ को भगवान श्रीराम का नाम सुनते ही लकवा मार जाता है। और तो और इस बीमारी का मरीज़ दरगाहों पर चादर चढ़ाने लगता था, कव्वाली गाने लगता था। 
लेकिन जैसे ही भारत में आरएसएस नामक एक देशभक्त संस्था ने "योगी-मोदी" नामक "दो वैक्सीनो" का अविष्कार किया, तैसे ही इस वायरस का तेज़ी से खात्मा शुरू हो गया और पूरे देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और श्रेष्ठ संस्कारों की बयार सी बहने लगी। अब यह बहरूपिये दरगाहों और कब्रिस्तानों में चादर चढ़ाना और अगरबत्ती लगाना छोड़कर, मंदिरों में दीपक जलाने और तिलक लगाने में ही अपना समय बिताने लगे हैं।
कब्रिस्तानों की दीवारें अब सूनी पड़ी हैं और यह लोग श्मशानों में लाशों की तस्वीरें खींचने में व्यस्त हैं।  सत्ता की मलाई चाटने के लिए इन्होंने मुफ्तखोरों को मुफ्त की बिजली, मुफ़्त का पानी और मुफ़्त का राशन बांटने का प्रलोभन भी देना शुरू कर दिया है।
पर ये बहरूपिये यह बताना भूल गए कि 300 यूनिट मुफ़्त बिजली की सौगात बांटने वालों ने, अंकित शर्मा के शरीर पर 300 जानलेवा घाव भी किये थे। जिस डायन के इशारों पर पश्चिम बंगाल में हजारों श्रीरामभक्तों की माताओं-बहनों की इज़्ज़त-आबरू लूटी गईं, लाखों श्रीरामभक्तों की लाशों को गिद्ध नोच-नोचकर खा गए, अनेक श्रीरामभक्त घर से बेघर हो गए, उसी डायन से यह बहरूपिये गले मिलने गए थे और उत्तरप्रदेश में जीत का मंत्र पूछ रहे थे।

कल तक अपने मंचों से अल्लाह हू अकबर और अपनी रैलियों में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगवाने वाले आज क्योंकर भगवा पहनकर हरे राम-हरे कृष्ण का जाप करते घूम रहे हैं, यह बात पब्लिक बख़ूबी समझ रही है। यह पब्लिक है यह सब जानती है। कौन रामभक्त है औऱ जिन्नाभक्त सब पहचानती है।

इस मौके पर किन्हीं साहब का एक शेर इन बहरूपियों की नज़र अर्ज करते हैं-

*मिलते हैं मुस्कुरा कर वो गले, मगर "ख़ंजर" पीठ पर घोंपते हैं।*

*बातों में तो उनकी शहद घुला है, मगर नियत है "क़त्ल" करने की।।*




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*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

राहुल गांधी की बातों में तर्क ढूंढना मतलब चील के घोंसले में मांस ढूंढना

गांधी परिवार के एकमात्र चश्मेचिराग श्री राहुल गांधी ने 14 सितंबर को अखिल भारतीय महिला कांग्रेस समिति को समर्पित एक नए लोगो का अनावरण किया। इस दौरान श्री राहुल गांधी ने भाजपा और आरएसएस की विचारधाराओं पर हमला करते हुए कहा, *"मैं अन्य विचारधाराओं के साथ समझौता कर सकता हूं, लेकिन मैं आरएसएस और भाजपा की विचारधारा से कभी समझौता नहीं कर सकता।”* 
यहाँ प्रथम प्रश्न तो यह है कि क्या श्री राहुल गांधी यह जानते हैं कि भाजपा और आरएसएस की विचारधारा क्या है? जिन्होंने अपना पूरा जीवन मुगलों, तुर्कों और अफ़ग़ान आक्रान्ताओं की शान में कसीदे गढ़ते हुए निकाल दिया, जो हिंदी, हिन्दू और हिंदुत्व के नाम से घृणा करते हों, जिन्होंने "हिन्दू आतंकवाद" की मनगढ़ंत परिभाषा गढ़ी हो, जो सत्तात्रेय गोत्र के जेएनयूधारी पोंगा पंडित हों, जो गोमांस-भक्षियों को संरक्षक बने हों, और जो अपने अतिथियों को कुत्तों का झूठा परोसते हों, जिन्हें राष्ट्र और राष्ट्रवाद का क ख ग न मालूम हो, वह भला आरएसएस की पवित्र और पावन विचारधाराओं से समझौता कर भी कैसे सकते हैं। सच तो यह है कि श्री राहुल गांधी स्वयं कांग्रेस की विचारधारा को भी कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाए।

इसके बाद राहुल गांधी ने अपने संबोधन में *बीजेपी को ‘नकली हिंदू’ बताते हुए कहा, “वे किस तरह के हिंदू हैं? वे हिंदुओं का उपयोग करते हैं, वे धर्म की दलाली करते हैं लेकिन वे हिंदू नहीं हैं।”*

श्री राहुल गांधी ने अपने एक पूर्व वक्तव्य में यह भी कहा था, *'जो हमारे जवान हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में अपना खून दिया है, जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए सर्जिकल स्ट्राइक किए हैं, उनके खून के पीछे आप (पीएम) छुपे हैं, उनकी आप दलाली कर रहे हो, ये बिल्कुल गलत है।*
कुल मिलाकर श्री राहुल गांधी भाजपा को कभी हिन्दू धर्म का दलाल तो कभी जवानों के खून का दलाल बताते हैं। दरअसल , जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी। अब श्री राहुल गांधी की भावना ही कुछ ऐसी है कि बोफ़ोर्स दलाली से लेकर नेशनल हेराल्ड घोटाले तक उन्होंने दलाली ही दलाली देखी है, इसलिये सावन के अंधे को सब ओर हरा ही हरा नज़र आता है। क्या श्री राहुल गांधी भूल गए जब पूरा देश चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध कर रहा था, तब वह स्वयं शी जिनपिंग के साथ कोई गुप्त समझौता कर रहे थे। हलांकि यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि वह समझौता क्या था, और न ही यह कि 4 दिसम्बर 2006 को चीनी दूतावास द्वारा राजीव गांधी फाउंडेशन को जो 90 लाख रुपये की रकम दी गई थी, उसके पीछे का असल उद्देश्य क्या था? क्या कोई चीन की दलाली कर रहा था?? यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राजीव गांधी फाउंडेशन गांधी परिवार की ही संस्था है।
 इसके अतिरिक्त, श्री राहुल गांधी ने यह भी टिप्पणी की, *“जब आप (महात्मा) गांधी की तस्वीर देखते हैं, तो आप उनके चारों ओर 2-3 महिलाएं देखेंगे। क्या आपने मोहन भागवत की किसी महिला के साथ तस्वीर देखी है?”* अब श्री राहुल गांधी को कौन समझाए कि महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग किया करते थे जिसमें वह तथाकथित रूप से जवान और कुंवारी कन्याओं के साथ नग्नावस्था में सोते थे। लेकिन श्री मोहन भागवत को ऐसा कोई प्रयोग करते न किसी ने देखा है और न ही सुना है। इसके अतिरिक्त ऐसे कई महान कार्य थे जो महात्मा गांधी किया करते थे, लेकिन श्री मोहन भागवत नहीं कर पाए और शायद न ही कभी कर पाएंगे। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे असाधारण मनुष्य के क्रियाकलापों की तुलना श्री मोहन भागवत जैसे साधारण व्यक्ति से करना अतार्किक ही कहा जायेगा। 

लेकिन वैसे एक सच यह भी है कि श्री राहुल गांधी की बातों में तर्क ढूंढना मानो चील के घोंसले में मांस ढूंढने के बराबर ही है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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बुधवार, 15 सितंबर 2021

अब्बाजान और चचाजान के बीच फंसे हैं भाईजान

12 सितंबर को यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने कुशीनगर में पूर्ववर्ती सरकारों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाते हुए कथिततौर पर कहा था, "अबसे पहले "अब्‍बाजान" कहने वाले गरीबों की नौकरी पर डाका डालते थे। पूरा परिवार झोला लेकर वसूली के लिए निकल पड़ता था। "अब्‍बाजान" कहने वाले राशन हज़म कर जाते थे। राशन नेपाल और बांग्‍लादेश पहुंच जाता था। आज जो गरीबों का राशन निगलेगा, वह जेल चला जाएगा।"

उधर स्वयंभू किसान नेता श्री राकेश टिकैत ने बागपत में दिए अपने एक बयान में असदुद्दीन ओवैसी साहब को कथिततौर पर भाजपा का "चचाजान" बताया है।
 इस "अब्बाजान" और "चचाजान" के बयानों के बीच कुछ "भाईजान" फंसते नज़र आ रहे हैं। इन "भाईजानों" को श्री योगी का "अब्बाजान" वाला बयान हज़म नहीं हो रहा है, और इन लोगों ने सोशल मीडिया पर #hamare abbahan नाम से एक ट्रेन्ड चला रखा है। 

श्री योगी के "अब्बाजान" वाले बयान को लेकर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अहियापुर थाना क्षेत्र के भीखनपुर निवासी तमन्ना हाशमी ने श्री योगी पर अपमानजनक टिपण्णी करने का आरोप लगाया है और साथ ही उन्होंने कहा कि सीएम की इस टिपण्णी से समुदाय विशेष के लोग अपमानित महसूस कर रहे है. उल्लेखनीय है कि मुजफ्परपुर सीजेएम कोर्ट में सीएएम योगी के खिलाफ धारा 295, 295 (क) 296, और 511 के तहत परिवाद दर्ज कराया गया है. याचिका में यह आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना करते हुए सीएम योगी ने एक जाति विशेष को टारगेट करते हुए कहा कि पूर्व की सरकार में अब्बाजान कहने वाले लोग गरीबों का राशन हजम कर लेते थे, लेकिन अब उनके राज्य में यह बंद हो गया है. इसी को लेकर तमन्ना हाशमी ने परिवाद दायर किया है. उनका कहना है कि सूबे के एक बड़े संवैधानिक पद पर बैठे सीएम का यह बयान देश को तोड़ने वाला है.

केवल "अब्बाजान" कहने मात्र से किसी जाति या वर्ग विशेष का अपमान कैसे हो सकता है। क्या अब्बाजान इतना असंसदीय, असंवैधानिक और अपमानजनक शब्द है? प्रश्न यह भी है कि अगर श्री योगी ने "अब्बाजान" के स्थान पर फादर या डैडी शब्द का प्रयोग किया होता तो क्या तब भी इतना हंगामा मचाया जाता। फिर यदि "अब्बाजान" शब्द अपमानित करने वाला है तो फिर "चचाजान" सम्मानित शब्द कैसे हो गया?? यदि कोई यह कहे कि महात्मा गांधी हमारे राष्ट्र के अब्बा थे, तो क्या यह आपत्तिजनक होगा? जब हम पिता को अंग्रेजी में फादर कहते हैं तो उर्दू में अब्बाजान कहने में आपत्ति क्यों है?
यह कहा जाता है कि श्री मुलायम सिंह यादव अपने आपको "मुल्ला" मुलायम अथवा "मौलाना" मुलायम कहलवाना अपनी शान समझते थे। समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट रूप से एक बार कहा था कि "केवल मुस्लिम बेटियां ही हमारी बेटियां हैं"। उधर पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि "इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है"। कांग्रेस पार्टी के "युवराज" ने कथितरूप से कहा कि कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है। तब किसी "भाईजान" ने किसी न्यायालय में कोई परिवाद दायर क्यों नहीं किया था? तब इन भाईजानों को देश टूटता हुआ नज़र क्यों नहीं आया? तब किसी जाति या धर्म का अपमान क्यों नहीं हुआ था?? जब उद्दंड बच्चे अपने "अब्बाजान" के पक्ष में नारे लगाते हुए "पाकिस्तान जिंदाबाद" कहते हैं, तब कोई क्यों नहीं बोलता?

जो लोग खुलकर
भरी सभाओं में "अल्लाह हू अकबर" बोलते हैं, या फिर जालीदार टोपियां पहनकर बिना रोज़े रखे रोजेदारों के साथ बैठकर इफ्तारी करते हैं, वह "अब्बाजान" ही कहे जाएंगे। इसमें बुरा क्या मानना है। यह तो उनके लिये गौरव की बात होनी चाहिये।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

मौलाना जौहर अली यूनिवर्सिटी बनाम राजा महेंद्र प्रताप यूनिवर्सिटी

आज 14 सितंबर 2021 को श्री योगी सरकार ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी है। जिसका शिलान्यास प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया। राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के मुरसान रियासत के राजा थे. जाट परिवार से निकले राजा महेंद्र प्रताप सिंह अपने इलाक़े के काफ़ी पढ़े-लिखे शख़्स तो थे ही, लेखक और पत्रकार की भूमिका भी उन्होंने निभाई. पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफ़ग़ानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई. वे इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे. एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी. निर्वासित सरकार का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा. राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो काम किया था, वही काम बाद में सुभाष चंद्र बोस ने किया था.

महात्मा गांधी ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में कहा था, "राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था. उससे पहले भी उनकी ख्याति का हाल अफ़्रीका में मेरे पास आ गया था. उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं. उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है."

दूसरी ओर 18 सितम्बर, 2012 को रामपुर में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर एक विश्वविद्यालय का उदघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने किया था। इस अवसर पर उनके पिता श्री मुलायम सिंह भी उपस्थित थे। इस वि0वि0 के सर्वेसर्वा श्री आजम खां थे। उन्होंने इसे अपना स्वप्नदर्शी प्रकल्प बताते हुए मौ0 अली जौहर को महान देशभक्त बताया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री महोदय ने भी इस संस्थान को भरपूर धन देने तथा अलीगढ़ वि0वि0 की तरह विश्वविख्यात बनाने की घोषणा भी की थी। 

कांग्रेस के इतिहास में जिन अली भाइयों (मोहम्मद अली तथा शौकत अली) का नाम आता है, ये उनमें से एक थे। ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान ही मौहम्मद अली जौहर ने अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया था। 1930 के दांडी मार्च के समय गांधी जी की लोकप्रियता देखकर मौलाना मौहम्मद अली जौहर ने कहा था कि "व्यभिचारी से व्यभिचारी मुसलमान भी गांधी से अच्छा है।"

1931 में वे मुस्लिम लीग की ओर से लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गये थे। वहीं चार जनवरी, 1931 को उनकी मृत्यु हो गयी। मरने से पहले उन्होंने भारत की बजाय मक्का में दफन होने की इच्छा व्यक्त की थी; पर मक्का ने इसकी अनुमति नहीं दी, अत: उन्हें येरुशलम में दफनाया गया था। 
राजा महेंद्र प्रताप सिंह और मौलाना मौहम्मद अली जौहर के इतिहास को पूरी गम्भीरता से पढ़ने और समझने के पश्चात यह अनुमान लगाना सहज हो जाता है कि दोनों की विचारधाराओं में कितना विरोधाभास था। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए 3.8 एकड़ भूमि दान दी थी। जबकि मौलाना मौहम्मद अली जौहर ने भारत में ख़िलाफ़त आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि उस आंदोलन का भारत के स्वतंत्रता से संग्राम से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। यहां तक कि ख़ुद मौहम्मद अली जिन्ना ने इस आंदोलन में भारतीयों की दखलंदाजी का खुलकर विरोध किया था और गांधी जी से इसमें भाग न लेने का अनुरोध भी किया था। लेकिन अली बंधुओं ने इसका हर प्रकार से समर्थन किया था। 
यहां प्रश्न दो व्यक्तियों की तुलना का नहीं और न ही दो विश्वविद्यालयों की स्थापना का है, परन्तु यहां पर मूल प्रश्न दो विचारधाराओं का है, जिन्हें दो अलग-अलग पार्टियां प्रचारित-प्रसारित कर रही हैं। इस देश का यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि यहां कथित सेक्युलिरिज्म की आड़ में कट्टरपंथी विचारधाराओं को पुष्पित-पल्लवित करने का हरसम्भव प्रयास किया गया।

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पप्पू साहब केवल "पप्पू" बन सकते हैं, प्रधानमंत्री नहीं बन सकते

राजनीति में समझदार व्यक्ति वह होता है जो अपनी लकीर को खींचकर बड़ा करने की कोशिश करता है, वह नहीं जो दूसरों की लकीरों को मिटाकर अपनी लकीर बड़ा करने की सोचता है। विरोध एक सीमा तक सही होता है, लेकिन जब वह हद पार कर जाता है तब वह विरोध न रहकर केवल "पूर्वाग्रह" बन जाता है, और पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति "बेचारा" बनकर रह जाता है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में "पप्पू" कहते हैं।
जब आप किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां आपकी तरफ़ भी उठ जाती हैं। 
राजनीति में किसी पर उंगली उठाने से पहले यह जरूर समझ लेना चाहिए कि पहले तो आप उसका बेवजह प्रचार करने लगते हैं। सही मायने में आप उसके "स्टार प्रचारक" बन जाते हैं। जिस व्यक्ति की राजनीति "खत्म" करनी हो, तो उसकी चर्चा करना ही बन्द कर दो, वह अपने आप ख़त्म हो जाएगा।

दूसरे जब आप किसी का लगातार विरोध करते हैं तो आप केवल उसके अवगुण देखते हैं, उसके गुणों को भूल जाते हैं। आप इतना नकरात्मक हो जाते हैं कि आपके चारों ओर एक नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है और जो भी व्यक्ति आपके सम्पर्क में आता है, वह भी उस नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होता है। इसके विपरीत यदि आप अपने विरोधी के गुणों को पहचान कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयास करें तो शायद आप उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकते हो। साथ ही आपमें एक सकारात्मक ऊर्जा का भी संचार होने लगता है जो सदैव आपके विकास में सहायक सिद्ध होता है। तीसरे आप "बेचारे" अर्थात "पप्पू" बनने से भी बच जाते हैं। 
श्री राहुल गांधी प्रत्येक दृष्टिकोण से एक बेहतर और विद्वान व्यक्ति हैं, परन्तु श्री मोदी विरोध की सीमा को लांघकर वह अब केवल "पप्पू" बनकर रह गए। उन्होंने केवल श्री मोदी के अवगुणों को ही देखने का प्रयास किया। श्री राहुल गांधी कभी श्री मोदी की सकारात्मक ऊर्जा, ओजस्विता और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को आत्मसात नहीं कर पाए। यदि श्री गांधी ने अपने आपको केवल राष्ट्र के प्रति समर्पित ही कर दिया होता, तो आज वह इस देश के प्रधानमंत्री होते। लेकिन वह केवल "पप्पू" बनकर रह गए और पप्पूजीवी उन्हें शेखचिल्ली वाले सपने दिखाकर सुलाते रहे, आज भी सुला रहे हैं। न जाने वह कब जागेंगे।

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सोमवार, 13 सितंबर 2021

मोदी ने सोते हुए हिंदुओं को जगा दिया बस यही उसका अपराध है

विरोध हमेशा उसी का होता है जो या तो किसी का कुछ बना सकता हो या फिर किसी का कुछ बिगाड़ सकता है। जो न तो किसी का कुछ बिगाड़ सकता है और न ही बना सकता है, उसका न तो कोई विरोध होता है और न ही समर्थन। जिसका न विरोध हो और न ही समर्थन, वह व्यक्ति कभी नेता नहीं बन सकता। 
आज सम्पूर्ण विपक्ष श्री मोदी का डटकर विरोध कर रहा है और वहीं दूसरी ओर जनता लगातार "हर-हर मोदी, घर-घर मोदी" कर रही है।
एक समय था जब भूतपूर्व  प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का जबरदस्त विरोध  हुआ था, और दूसरी ओर उनके समर्थक "इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया" का नारा बुलंद कर रहे थे। आज वह नारा बदल गया है, अब कहा जा रहा है - मोदी है तो मुमकिन है। 
विरोध या समर्थन व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि व्यक्तित्व का होता है, विचारों का होता है। मतभेद हमेशा वैचारिक ही होते हैं। *"विचारों से संगठन का निर्माण होता है और संगठन से शक्ति का निर्माण होता है, और जहां शक्ति होती है वहां राष्ट्र का निर्माण होता है।"* इसीलिए कहा जाता है कि संगठन में ही शक्ति है।

श्री नरेन्द्र मोदी ने इस देश के हिन्दू समाज को "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" का एक विचार दिया है। ठीक उसी प्रकार जैसे वीर दामोदर सावरकर ने "हिन्दुराष्ट्र" का विचार दिया था। 
जो हिन्दू समाज कल तक गांधीवाद की बात करता हुआ, गांधी के तीन बंदरों की तरह अपना मुंह, आंख और कान बन्द किये बैठा था। वह हिन्दू जो अपने आपको "हिन्दू" कहते हुए डरता था, हिन्दू संस्कृति की बात करते हुए घबराता था, वह आज "जय श्रीराम" का उदघोष कर रहा है। जो हिन्दू अयोध्या में अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के दर्शनों के लिए तरसता था, वह आज श्रीरामजन्मभूमि पर एक भव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण का श्रीगणेश कर रहा है। जो कल तक कश्मीर में जिहादियों की ललकार सुनकर ख़ामोश हो जाता था, वही हिन्दू आज उन्हें ललकार रहा है। श्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका और उनका योगदान यही है कि उन्होंने सोते हुए हिंदुओं को जागरूक किया है, उन्हें संगठित किया है और उनका मार्गदर्शन किया है। मोदी विरोध का सबसे बड़ा कारण ही यह है कि जिन हिंदुओं को "धर्मनिरपेक्षता" और "भाईचारे" की घुट्टी पिलाकर गहरी नींद में सुला दिया गया था, मोदी ने उन हिंदुओं के स्वाभिमान को ललकार कर उन्हें सुषुप्त अवस्था से जाग्रत अवस्था में ला दिया है। 
नरेंद्र मोदी हमें जाग्रत करता है, प्रेरित करता है और हमें हमारे राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए आगे बढ़ने के लिए ललकारता है। मोदी हमें जीवन मूल्यों के प्रति, अपने देश के प्रति, अपनी संस्कृति, अपने समाज और अपने कुल के प्रति स्वाभिमानी बनने की प्रेरणा देता है।
कांग्रेस ने हमें गांधीवाद सिखाया और मोदी ने हमें राष्ट्रवाद सिखाया। हम अपने राष्ट्र में रहकर उसके अन्न-जल से पोषण प्राप्त करके अपना, अपने परिवार और अपने समाज के विकास में सहयोगी बनते हैं। इसलिए उस राष्ट्राभिमान को जाग्रत रखना चाहिए। वर्षों पुराने इस मूलमंत्र को आज मोदी ने पुनः हमारे कानों में फूंक दिया है।
बस यही किया है मोदी ने, यही योगदान है मोदी का, यही बनाया है मोदी ने औऱ यही मोदी विरोध का महत्वपूर्ण कारक है। लेकिन याद रखिये मोदी का जितना विरोध होगा, उतना ही उसका समर्थन बढ़ेगा, क्योंकि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, जो बल में समान होती है परन्तु दिशा में विपरीत होती है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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रविवार, 12 सितंबर 2021

उद्धव ठाकरे साहब यह योगी प्रदेश है यहाँ गुंडाराज नहीं चलता

राजनीतिक गलियारों में ख़बर है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के अखाड़े में श्री उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी मैदान में उतरने का मन बना चुकी है। शिवसेना ने स्पष्ट किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए वह सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।
यूपी की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला शिवसेना की प्रांतीय कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया है। बैठक में शिवसेना के नेताओं ने योगी सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि "भाजपा सरकार के शासन में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पूरी तरह फेल हो गई है। प्रदेश में बहन-बेटियां कोई भी सुरक्षित नहीं हैं। बेरोजगारी और महंगाई से जनता त्रस्त है।"

इस बयान को सुनकर बड़े-बूढों की एक कहावत याद आ गई- "छाज बोले सो बोले, छलनी बोले जिसमें 72 छेद।"
योगी सरकार पर उंगली उठाने से पहले शिवसेना को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जब आप किसी दूसरे के ऊपर एक उंगली उठाते हैं तो बदले में तीन उंगलियां आपकी तरफ़ भी ईशारा करती हैं। 
 
शिवसेना का यह कहना है कि उत्तरप्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह फेल हो गई है। अब ज़रा शिवसेना यह बताने का कष्ट करे कि महाराष्ट्र के पालघर के गढ़चिंचले गांव में 16 अप्रैल को हुई साधुओं की मॉबलिंचिंग का वीडिया ख़ूब वायरल हुआ था. जिसमें साफ दिखाया गया था कि भीड़ ने तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी जिसमें दो साधुओं की पहचान 70 साल के महाराज कल्पवृक्षगिरी, 35 साल के सुशील गिरी महाराज और एक उनके ड्राइवर नीलेश तेलगाने के तौर पर गई थी। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस निर्मम हत्याकांड के समय महाराष्ट्र पुलिस मौके पर तमाशबीन बनी हुई थी। अभी हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री के बयान पर शिवसैनिकों ने जिस प्रकार से सड़कों पर तोड़फोड़ और उपद्रव मचाया वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। एक उभरते हुए कलाकार सुशांत सिंह की हत्या और फ़िल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के कार्यालय में तोड़फोड़ किसने नहीं देखी। शिवसैनिकों की गुंडागर्दी से पूरा महाराष्ट्र त्राहिमाम-त्राहिमाम करता है और यह बात स्वयं श्री उद्धव ठाकरे भी अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन उसके बावजूद उनके मुंह से शब्द नहीं निकलते। 

शिवसेना का यह भी कहना है कि "उत्तरप्रदेश में बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं।" अभी हाल ही में 
बीते शुक्रवार (9 सितंबर) को एक महिला साकीनाका के ख़ैरानी रोड इलाक़े में बेहोशी की हालत में मिली थी। पुलिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया। पुलिस ने बताया था कि पीड़िता की हालत नाज़ुक थी। मीडिया सूत्रों के हवाले से ख़बर मिली कि पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया था और बलात्कारियों ने हैवानियत की सारी हदों को पार करते हुए महिला के गुप्तांग में रॉड डाली थी. यह ठीक वैसा ही है जैसा कि "निर्भया"  के साथ हुआ था। लेकिन इस जघन्य अपराध के पश्चात भी ठाकरे सरकार को महाराष्ट्र में बहन-बेटियां सुरक्षित दिखाई देती हैं। 

शिवसेना प्रमुख माननीय उद्धव भाई ठाकरे को यह भली प्रकार ज्ञात होना चाहिए कि यह उत्तरप्रदेश है। यहाँ कि जनता अपने हर प्रश्न का उत्तर "तर्क" से लेती है, "तलवार" से नहीं।
उत्तरप्रदेश में योगीराज चलता है, गुंडाराज नहीं चलता।
  
🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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महबूबा मुफ़्ती साहिबा सुनिए- महिलाएं केवल बच्चे पैदा करने के लिए होती हैं

महबूबा मुफ्ती ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था, ” इस्लामी इतिहास सशक्त महिलाओं के उदाहरणों से भरा है. हजरत खदीजा तुल कुबरा, पैगंबर एसडब्ल्यूए की पहली पत्नी एक स्वतंत्र और सफल व्यवसायी महिला थीं. हजरत आयशा सिद्दीकी ने ऊंट की लड़ाई लड़ी थी और 13000 सैनिकों के दल का नेतृत्व किया था. मुसलमानों से हमेशा यह साबित करने की अपेक्षा की जाती है कि वे हिंसा के पक्ष में नहीं हैं. मैं देख सकती हूं कि इस धारणा को आगे बढ़ाने के लिए मेरे बयान का इस्तेमाल किस तरह से किया जा रहा है.”

हाल ही में पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि तालिबान एक हकीकत के रूप में उभर रहा है. "अपने पहले शासन के दौरान उनकी मानवाधिकार विरोधी छवि थी. लेकिन वे दुनिया के लिए एक उदाहरण स्थापित कर सकते हैं अगर वो वास्तविक शरिया कानून का पालन करते हैं जिसमें महिलाओं के अधिकार भी शामिल हैं."

उधर तालिबानी संगठन के प्रवक्ता सईद जकरुल्लाह हाशमी (Sayed Zekrullah Hashimi) ने स्थानीय चैनल टोलो न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ‘एक महिला कभी मंत्री नहीं बन सकती. ये कुछ ऐसा है, जैसे आपने उसकी गर्दन में वो डाल दिया है, जिसे वो उठा नहीं पा रही. कैबिनेट में महिलाओं का रहना कोई जरूरी नहीं है, उन्हें बच्चे पैदा करने चाहिए. 
उल्लेखनीय है कि तालिबान ने कुछ दिन पहले अपनी अंतरिम सरकार का गठन किया है. कैबिनेट में केवल पुरुष सदस्य हैं, इसमें एक भी महिला या अल्पसंख्यक समुदाय या फिर किसी अन्य पार्टी का नेता शामिल नहीं है. कैबिनेट में वैश्विक आतंकियों को उच्च पदों पर रखा गया है. इंटरव्यू के दौरान जब प्रवक्ता से कहा गया कि ‘महिलाएं समाज का आधा हिस्सा हैं.’ तो उसने कहा, ‘लेकिन हम उन्हें आधा हिस्सा नहीं मानते. किस तरह का आधा हिस्सा? 
महबूबा मुफ़्ती सहित तमाम तालिबानी प्रेमियों को तालिबानी प्रवक्ता का यह बयान बहुत ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता और सुमैया राना, शोभा डे, स्वरा भास्कर, सहित शाहीन बाग़ में आंदोलनकारी दादियों,  तीन तलाक कानून का विरोध करने वाली पर्दानशीन महिलाओं को भी तालिबानी प्रवक्ता के इस बयान पर अपने विचार व्यक्त करने चाहिए। भारत में नारी स्वतंत्रता पर बड़े-बड़े व्याख्यान देने वाले और महिला अधिकारों की बात करने वाले "क्रांतिकारियों" की ज़बान को अब लकवा क्यों मार गया है? जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में ढपली बजाने वाली "जीन्स टॉप गर्ल" और फिल्मों में अंग प्रदर्शन, फूहड़ता और अश्लीलता को बोल्डनेस और आधुनिकता बताने वाले कांगियो, आपियों, वामियों और "बौद्धिक जिहादियों" को समझ लेना चाहिए कि शरिया और इस्लाम के सबसे बड़े पैरोकार बन रहे तालिबान का मानना है कि "औरतें सिर्फ़ बच्चा पैदा करने की मशीन हैं" और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। 


🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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शनिवार, 11 सितंबर 2021

एक बार फिर जिन्ना का जिन्न बोतल से बाहर निकला

एक बार फिर जिन्ना का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया है। बीजेपी कार्यकर्ता शिवांग तिवारी ने कथिततौर पर खून से खत लिखकर पीएम मोदी से मांग की है कि जिन्ना की तस्वीर हटवाई जाए. वही जिन्ना जिसने पाकिस्तान बनाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े करवाए. उल्लेखनीय है कि 14 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अलीगढ़ जाने वाले हैं, ऐसे में एक बार फिर जिन्ना की तस्वीर पर विवाद शुरू हो गया है.
बीजेपी कार्यकर्ताओं ने साफ कहा है कि अगर प्रशासन जिन्ना की तस्वीर AMU से नहीं हटाता है तो वो खुद ही ये काम कर देंगे.
इससे पहले अगस्त 2021 में हुए करणी सेना के जिला स्तरीय अधिवेशन में करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष व भाजपा के हरियाणा प्रदेश के प्रवक्ता सूरजपाल अम्मू ने समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि "एएमयू में जिन्ना की तस्वीर को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जो लोग जिन्ना की तस्वीर का समर्थन करते हैं, उन्हें करणी सेना जाने का खर्च देगी और पाकिस्तान के बॉर्डर तक छोड़कर भी आएगी।"
मालूम हो कि इससे पहले भी अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने जिन्ना की तस्वीर हटाने की मुहिम शुरू की थी लेकिन जिन्नागैंग ने इस मांग का पुरजोर विरोध किया था। 

जिस तस्वीर को लेकर हंगामा मचाया जा रहा है वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट यूनियन हॉल में 1938 से लगी हुई है। उस समय मौहम्मद अली जिन्ना को AMU की आजीवन सदस्यता दी गई थी। यह आजीवन मानद सदस्यता AMU स्टूडेंट यूनियन देता है, जिसने महात्मा गांधी, BR अम्बेडकर, सीवी रमन, जेपी नारायण और मौलाना आज़ाद को भी आजीवन सदस्यता दी थी। 
भाजपा सांसद सतीश गौतम के हवाले से लिखा गया था, ''ये तस्वीर भले ही आज़ादी से पहले लगाई गई हो लेकिन इसे अब तक लगाए रखने का क्या औचित्य है. जिन्ना के कारण देश का बंटवारा हो गया. इस तस्वीर को पाकिस्तान भेज देना चाहिए।"

जिन्ना की तस्वीर हटाने के मुद्दे पर छात्रसंघ के अध्यक्ष उस्मानी ने कहा था कि ''ये लोग जिन्ना की तस्वीरों की बात करते हैं लेकिन गांधी की हत्या के अभियुक्त सावरकर को भूल जाते हैं. देश की संसद, जहां संविधान की रक्षा होती है वहां सावरकर की तस्वीर क्यों लगाई हुई है. फिर सावरकर की तस्वीर भी हटाइए."

हमारा प्रश्न यह है कि आखिर जिन्ना की तस्वीर हटाने के लिए इतना शोर क्यों? क्या केवल जिन्ना की तस्वीर हटाने मात्र से भारत आतंक मुक्त हो जाएगा? 
जिन्ना एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचारधारा है। मौहम्मद अली जिन्ना आज इस देश में क्या दुनिया में भी नहीं है। लेकिन जिन्नावादी विचारधारा आज भी इस देश में जीवित है और लगातार पुष्पित-पल्लवित हो रही है। भारत की तुष्टिकरण की राजनीति ने जिन्नावादी विचारधारा को हमेशा सींचने का कार्य किया है और आज वही जिन्नावाद एक छोटे से पौधे से वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। जिसका वास्तविक रूप हम और आप CAA-NRC के विरोध के समय देख चुके हैं। मज़हबी कट्टरता और राष्ट्रवादियों के विरुद्ध नफ़रत का वह नमूना हम शाहीन बाग़ में भी देख चुके हैं।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की नींव रखने वाले सर सैयद अहमद खान के हिन्दू और हिंदी को लेकर जो विचार थे, उन्हें मौहम्मद अली जिन्ना ने तो केवल आगे बढ़ाने का ही कार्य किया है।
जिन्ना का चरित्र भारत में आज भी जीवित है, तो फिर उसका चित्र हटाने मात्र से किसी को क्या लाभ हो सकता है? जिस जिन्ना ने मज़हब के नाम पर भारत के दो टुकड़े किये, उसी जिन्ना की तस्वीर को कुछ कट्टरपंथियों ने अपने हृदय में बसाया हुआ है। आप एक चित्र को तो हटा सकते हैं लेकिन हजारों-लाखों की तादाद में जो "जिन्ना" इस देश में रहकर निरन्तर इसके टुकड़े करने के मंसूबे बना रहे हैं और अंदर ही अंदर इसे खोखला बनाने पर तुले हैं, उनसे आप कैसे निपटेंगे।

कोई भी व्यक्ति ताक़तवर या कमज़ोर नहीं होता बल्कि उसकी सोच उसे ताक़तवर या कमज़ोर बनाती है। जिन्ना का चित्र कोई मायने नहीं रखता किंतु उसका चरित्र बहुत मायने रखता है। सांप को मारने से पहले उसके ज़हर को ख़त्म कर देना चाहिए। बिना ज़हर का सांप एक रस्सी से ज़्यादा कुछ नहीं होता और रस्सी से किसी को डरना नहीं चाहिए।

प्रश्न यह भी है कि आप रस्सी से क्यों डर रहे हैं, या फिर आप रस्सी को सांप बताकर दूसरों को डराने का प्रयास क्यों कर रहे हैं। आख़िर क्या कारण है कि चुनाव से ठीक पहले ही जिन्ना का जिन्न बोतल से बाहर निकलता है और चुनाव बीतने के तुरन्त बाद वह वापस बोतल में समा जाता है। सबको मालूम है कि 2022 में उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, और यह भी सभी जानते हैं कि देश में भाजपा की डबल इंजन की सरकार है। उत्तरप्रदेश में श्री योगी आदित्यनाथ जैसे हिन्दू शिरोमणि मुख्यमंत्री पद को सुशोभित कर रहे हैं और  केंद्र में हिन्दू हृदय सम्राट श्री नरेन्द्र मोदी शासन चला रहे हैं। तब ऐसे में क्या यह प्रश्न उठना  न्यायसंगत नहीं है कि पिछले 5 सालों में जिन्ना की तस्वीर हटाने के लिए कोई कड़ा कदम क्यों नहीं उठाया गया? क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का प्रशासन और छात्रसंघ भारत सरकार से अधिक ताक़तवर हो गया है? क्या जिन्नागैंग उत्तरप्रदेश सरकार पर हावी है? आख़िर क्या कारण है कि राष्ट्रवादी सरकारें मज़हबी कट्टरता के प्रतीक और भारत के पहले आतंकी मौहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को AMU के हॉल से नहीं हटा सके। 
जिन्ना इस देश और देशवासियों का सबसे बड़ा दुश्मन है, था और हमेशा रहेगा। जहां तक वीर दामोदर सावरकर का प्रश्न है वह इस देश के लिए जिये और इसी देश में उन्होंने अपने प्राण भी त्याग दिए। लेकिन जिन्ना एक भगोड़ा आतंकी था जिसने इस देश को एक ऐसा ज़ख्म दिया है जो अब नासूर बनता जा रहा है। इसलिए प्रत्येक राष्ट्रभक्त और देशभक्त को चाहिये कि वह जिन्ना को अपने दिल और दिमाग़ दोनों से निकालकर बाहर फेंक दे। परन्तु इसके लिए राष्ट्रवादी संगठनों और सरकारों को सकारात्मक और सार्थक पहल करनी होगी। केवल क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए देशवासियों की भावनाओं से खिलवाड़ भी एक प्रकार का देशद्रोह ही है।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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सुना है ब्राह्मणों की थाली में पुलाव आ गया है, लगता है फिर से कोई चुनाव आ गया है

सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि कल 12 सितंबर को  बिजनौर में ब्राह्मणों का "महामिलन" होने जा रहा है जिसमें  केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र "टेनी" पधार रहे हैं। अजय कुमार मिश्र खीरी लोकसभा से सांसद हैं और 2022 में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ब्राह्मण वोटों को भाजपा के पक्ष में एकजुट करने का दारमोदार सांसद केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र "टेनी" के कंधों पर डाला गया है। 
इससे पहले बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र भी बिजनौर का दौरा करके जा चुके हैं। उन्हें भी बसपा पार्टी हाईकमान की ओर से ब्राह्मणों को बसपा के पाले में लाने एक दायित्व सौंपा गया है। अब केवल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के किसी ब्राह्मण नेता के आगमन की प्रतीक्षा है।
सही पूछिये तो जैसे कूड़ी के भाग्य 12 साल में एक बार जागते हैं, ठीक वैसे ही ब्राह्मणों के भाग्य भी 5 साल में एक ही बार जागते हैं। इसको कुछ इस तरह समझिये 
*सुना है ब्राह्मणों की थाली में पुलाव आ गया है।*
*लगता है फिर से कोई चुनाव आ गया है।।*

उसके बाद तो ब्राह्मण केवल फुटबॉल बनकर रह जाता है, इस कार्यालय से उस कार्यालय और इस नेता से उस नेता तक, रातदिन चक्कर काटता है। 
अब ख़बर मिली है कि कल होने वाले "ब्राह्मण महामिलन" में पुरोहितों के लिये वेतन और सम्मान निधि की मांग उठाई जाएगी। कोई समझदार इंसान इन लोगों से पूछे कि पिछले 5 वर्षों में भाजपा ने मदरसों को हाईटेक करने के लिए सारे जतन किये, लेकिन क्या एक बार भी किसी ब्राह्मण नेता ने मंदिरों और संस्कृत विद्यालयों को हाईटेक करने के लिए आवाज़ उठाई? हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार कहा कि वह मदरसों के छात्रों के एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कम्प्यूटर देखना चाहते हैं। लेकिन कभी उन्होंने यह कहने का साहस किया कि वह भारतवर्ष के तमाम संस्कृत विद्यार्थियों और पुरोहितों के एक हाथ में वेद और दूसरे हाथ में कम्प्यूटर देखना चाहते हैं?   एससी-एसटी एक्ट पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने वाली मोदी सरकार ने कभी वैदिक ब्राह्मणों को अलग से आरक्षण करने की मांग पर विचार करने की ज़हमत उठाई है। कभी श्री मोदी-योगी सरकार ने ब्राह्मण समाज के सम्मान, सुरक्षा और उनके आर्थिक विकास हेतु कोई ठोस कदम उठाए हैं? गोरक्षा के लिए हथियार उठाने वालों ने कभी किसी ब्राह्मण की रक्षा के लिए कोई दृढ़ संकल्प किया है? इन सवालों का जवाब किसी के भी पास नहीं है और कभी होगा भी नहीं। क्योंकि ब्राह्मण स्वयं एकजुट होकर अपने ही समाज की सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक उन्नति के विषय में नहीं विचार करता है तो फिर बाकी लोगों को क्या कहा जा सकता है? 
पुरोहितों को वेतन और सम्मान निधि पर चर्चा करने से पहले यह भी आवश्यक है कि भारतवर्ष के समस्त मंदिरों को सरकारी अधिग्रहण से मुक्ति मिले। जिसपर आजतक किसी ब्राह्मण संगठन ने कोई सार्थक प्रयास नहीं किया और न ही किसी सरकार ने कोई पहल की है। 
"ब्राह्मण महामिलन" नाम तो दे दिया गया है, परन्तु प्रश्न यह भी है कि ब्राह्मणों को एकजुट कौन करेगा? ब्राह्मणों को एकजुट कर, उन्हें एक मंच पर लाना ठीक ऐसा ही है जैसे रेत को मुट्ठी में करना।
ब्राह्मण का सबसे बड़ा विरोधी भी ब्राह्मण ही है। अगर ब्राह्मण एकजुट हो जाये और एकमत होकर किसी एक दिशा में चलने लगे तो निश्चित रूप से वह समस्त विश्व का नेतृत्व कर सकता है। परन्तु बिल्ली के गले में घण्टी बांधेगा कौन? यहां तो सब चूहे बने बैठे हैं।

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सोमवार, 6 सितंबर 2021

एक दिन आप भी हवाई जहाज पर लटकते नज़र आओगे

माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने हाल ही में गोहत्या के एक मामले में टिपण्णी करते हुए कहा कि - *"हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जब हम अपनी संस्कृति को भूले हैं, तब विदेशियों ने हम पर आक्रमण कर गुलाम बनाया है। आज भी हम न चेते तो अफगानिस्तान पर निरंकुश तालिबानियों का आक्रमण और कब्ज़े को हमें भूलना नहीं चाहिए।"*

माननीय उच्च न्यायालय की यह महत्वपूर्ण और समयानुकूल टिप्पणी निश्चित रूप से एक चेतावनी है जो कि भारत में रहने वाले प्रत्येक राष्ट्रभक्त को समझ लेनी चाहिए। यह एक सन्देश है जो कि उन लोगों के लिए एक सबक़ हो सकता है जो कि आज तक इसी भ्रम में जीवन जी रहे हैं कि-
*कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।*
*सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा।।*

भारत की यह विडंबना रही है कि यहां के कुछ लोगों ने भविष्य के खतरों के प्रति घोर लापरवाही बरतने की भूल की है। हम हमेशा से उस शुतुरमुर्ग की तरह आने वाले खतरों से अनभिज्ञ रहे जो रेत में मुहं देकर बैठ जाता है। हम कबूतर की तरह अपनी आंख मूंदकर यह सोचकर बैठे रहे कि बिल्ली हमें नहीं देख पाएगी। हम कभी इतिहास से यह सीख ही नहीं पाए कि हमारे पूर्वजों ने कब-कब औऱ क्या गलतियां की हैं, जिनकी सज़ाएं हम आजतक भुगत रहे हैं।
शायद इसीलिए किसी महान व्यक्ति ने लिखा कि-
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई है।।*
विडम्बना देखिये कि आज भी हम इस मुग़ालते में जी रहे हैं कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में न जाने कितनी बार हमने अपनी मातृभूमि को खण्ड-खण्ड होते देखा है। आज पश्चिम बंगाल, केरल, आसाम, हैदराबाद, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों में अपेक्षाकृत हम काफ़ी कमज़ोर हो चुके हैं, हद तो यहां तक है कि हमारे दलित भाइयों को मस्जिदों के सामने से बारात निकालने पर प्रताड़ित किया जाता है। मेवात में वाल्मीकि भाइयों के साथ जुल्म और अत्याचार की कहानी कोई पुरानी नहीं है, कैराना सहित कई मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में किस प्रकार से लोग अपने मकान बेचकर भागने को मजबूर हो रहे हैं, यह सत्य किसी से छुपा नहीं है। कश्मीर में कैसे हिंदुओं के साथ जुल्मों-सितम किये गए, उसके बाद दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा को कैसे चाकुओं से गोदा गया, देवी दुर्गा और भगवान हनुमान के मंदिरों में तोडफ़ोड़ की गई, महाराष्ट्र में दो निर्दोष और निहत्थे साधु-संतों की निर्मम हत्या, उत्तरप्रदेश में कमलेश तिवारी सहित कई अन्य हिन्दू नेताओं की हत्या और नरेशानन्द सरस्वती सहित कई अन्य साधु-संतों पर हमले क्या किसी से छुपे हैं? 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों में हुई तबाही का वह भयावह मंजर , उसके तुरन्त बाद दिल्ली दंगों का दंश अभी देश भुला भी नहीं पाया था कि पश्चिम बंगाल में हुई बर्बरता और वहशीपन ने एकबार फिर से हमें अंदर तक झकझोर कर रख दिया।
लेकिन जल्दी ही हम सबकुछ भूलकर फिर से पेट्रोल, सब्ज़ी, राशन और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करने और महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के जाल में उलझ गए। 
हम अपनी संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, रीति-रिवाजों से पल-पल दूर होते जा रहे हैं।  छद्म-सेक्युलिरिज्म के इस दलदल में हमारी संस्कृति और परम्पराएं धीमे-धीमे अंदर और अंदर धँसती जा रही हैं, और हम बेबस और लाचार किनारे पर खड़े होकर उनको दम तोड़ता हुआ देख रहे हैं। 

इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि हमारे ही देश में हमारे आदर्श और प्रभु श्रीराम को काल्पनिक और हमारे पवित्र ग्रन्थों को कपोल-कल्पित बताया जाता है। और तो और हमें अपनी संस्कृति और परम्पराओं को जीवित रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालयों की आज्ञा लेनी होती है। हम अपने ही देश में अपनी हिन्दू संस्कृति का प्रचार-प्रसार नहीं कर सकते, हम वैदिक शिक्षा का ज्ञान नहीं दे सकते, हमें अपने पवित्र धार्मिक ग्रन्थों के पठन-पाठन की अनुमति नहीं है। इससे अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि हम सांवले रंग को गोरा बनाने के लिए दुनिया भर की गन्दगी को अपने चेहरों पर लगाये घूमते हैं जबकि हमारे प्रभु श्रीराम और श्री कृष्ण दोनों ही सांवले थे। हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी और दैवीय भाषा संस्कृत को गंवारों और रूढ़िवादियों की भाषा मानते हैं, जबकि विदेशी भाषाओं का ज्ञान बांटते हुए गर्व से अपना सीना चौड़ा करते घूमते हैं। क्या यह सब उचित है?

 हमें माननीय उच्च न्यायालय की टिप्पणी की गम्भीरता और उसमें छुपे भविष्य के संकेत को समझना ही होगा, अन्यथा आपका सबकुछ यहीं रह जायेगा और एक दिन आप भी हवाई जहाज पर लटकते नज़र आओगे।

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रविवार, 5 सितंबर 2021

मानो "गिद्धों का कोई झुंड" शाकाहार की उपयोगिता पर व्याख्यान दे रहा हो

आज कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत के फोटो भेजे, यह उन्हीं लोगों के समर्थक हैं जिन्होंने 2013 में उन दो निर्दोष भाइयों को मौत के घाट उतार दिया था, जो अपनी बहन की लाज बचाने के लिए अकेले ही जूझ गए थे। किसानों की आड़ में अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की क्षतिपूर्ति करने वाले आज महापंचायत में उमड़ी भीड़ को देखकर बहुत प्रसन्न हैं। 
कल तक जिन लोगों को गंगा में बहती लाशें दिखाई दे रही थीं, आज उन्हें निर्दोष अफगानी नागरिकों के कटे हुए सरों से फुटबॉल खेलते वहशी और दरिंदे तालिबानी आतंकी नज़र नहीं आ रहे। इन्हें 2013 में मुज्जफरनगर दंगों में मारे गए निर्दोष और लाचार लोगों की लाशें नहीं दिखाई दी थीं। तब यह लोग महोत्सवों में चैन की बंसी बजा रहे थे और फिल्मी कलाकारों और विदेशी नृतकियों के ठुमकों पर ठहाके लगा-लगाकर तालियां बजा रहे थे। पश्चिमी बंगाल में जब "जय श्रीराम" का उदघोष करने वालों को सरेआम मौत के घाट उतारा जा रहा था, माताओं-बहनों की आबरू लूटी जा रही थी, तब यही लोग ममता बानो के साथ गलबहियां कर रहे थे। आज "किसानों" के कंधों पर बंदूक रखकर अपने क्षुद्र राजनीतिक लक्ष्यों को साधने वाले यह लोग क्यों भूल जाते हैं कि 2013 में भी मुजफ्फरनगर में किसान ही रहा करते थे। 
भाईचारे की दुहाई देने वाले लोग कब अपने ही  भाइयों को "चारा" बनाना आरम्भ कर देते हैं, इसका सबसे ताज़ा और स्पष्ट उदाहरण अफगानिस्तान में देखा जाता है। जिन लोगों ने वहशी तालिबानी विचारधारा को प्रोत्साहित करने का हरसम्भव प्रयास किया, वही लोग जब महापंचायत के फोटो-वीडियोज सोशल मीडिया पर भेजकर खुश हो रहे हैं, तब वह यह क्यों भूल जा रहे हैं कि जिन्होंने साम्प्रदायिक दंगों और आतंकी हमलों में "अपनों" को खोया है, वह उस दर्द को कैसे भूल सकते हैं। "भाईचारा" के छद्म नारों पर विश्वास करने वालों को जो ज़ख्म मिले हैं, उन जख्मों को कोई भी राजनैतिक मरहम सुखा नहीं सकता है। पश्चिम बंगाल, केरल, आसाम और दिल्ली में हुए कत्लेआम ने उन जख्मों को अब नासूर बना दिया है।

अफगानिस्तान में तालिबानी क्रूरता, वहशत और हैवानियत को मज़हबी कानूनों की आड़ में न्यायसंगत सिद्ध करने का दुष्प्रयास करने वाले "बौद्धिक दिवालिये" जब सहिष्णुता, शांति, सद्भावना और सौहार्द की दुहाई देते हैं तब ठीक ऐसा प्रतीत होता है कि मानो "गिद्धों का कोई झुंड" शाकाहार की उपयोगिता पर व्याख्यान दे रहा हो।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां आज भी जयचंद जीवित हैं, और पृथ्वीराज चौहान की तरह कुछ लोग बार-बार मौहम्मद गौरी जैसे झूठे,मक्कार और वहशियों पर विश्वास करने लगते हैं।

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