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मानो "गिद्धों का कोई झुंड" शाकाहार की उपयोगिता पर व्याख्यान दे रहा हो

आज कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत के फोटो भेजे, यह उन्हीं लोगों के समर्थक हैं जिन्होंने 2013 में उन दो निर्दोष भाइयों को मौत के घाट उतार दिया था, जो अपनी बहन की लाज बचाने के लिए अकेले ही जूझ गए थे। किसानों की आड़ में अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की क्षतिपूर्ति करने वाले आज महापंचायत में उमड़ी भीड़ को देखकर बहुत प्रसन्न हैं। 
कल तक जिन लोगों को गंगा में बहती लाशें दिखाई दे रही थीं, आज उन्हें निर्दोष अफगानी नागरिकों के कटे हुए सरों से फुटबॉल खेलते वहशी और दरिंदे तालिबानी आतंकी नज़र नहीं आ रहे। इन्हें 2013 में मुज्जफरनगर दंगों में मारे गए निर्दोष और लाचार लोगों की लाशें नहीं दिखाई दी थीं। तब यह लोग महोत्सवों में चैन की बंसी बजा रहे थे और फिल्मी कलाकारों और विदेशी नृतकियों के ठुमकों पर ठहाके लगा-लगाकर तालियां बजा रहे थे। पश्चिमी बंगाल में जब "जय श्रीराम" का उदघोष करने वालों को सरेआम मौत के घाट उतारा जा रहा था, माताओं-बहनों की आबरू लूटी जा रही थी, तब यही लोग ममता बानो के साथ गलबहियां कर रहे थे। आज "किसानों" के कंधों पर बंदूक रखकर अपने क्षुद्र राजनीतिक लक्ष्यों को साधने वाले यह लोग क्यों भूल जाते हैं कि 2013 में भी मुजफ्फरनगर में किसान ही रहा करते थे। 
भाईचारे की दुहाई देने वाले लोग कब अपने ही  भाइयों को "चारा" बनाना आरम्भ कर देते हैं, इसका सबसे ताज़ा और स्पष्ट उदाहरण अफगानिस्तान में देखा जाता है। जिन लोगों ने वहशी तालिबानी विचारधारा को प्रोत्साहित करने का हरसम्भव प्रयास किया, वही लोग जब महापंचायत के फोटो-वीडियोज सोशल मीडिया पर भेजकर खुश हो रहे हैं, तब वह यह क्यों भूल जा रहे हैं कि जिन्होंने साम्प्रदायिक दंगों और आतंकी हमलों में "अपनों" को खोया है, वह उस दर्द को कैसे भूल सकते हैं। "भाईचारा" के छद्म नारों पर विश्वास करने वालों को जो ज़ख्म मिले हैं, उन जख्मों को कोई भी राजनैतिक मरहम सुखा नहीं सकता है। पश्चिम बंगाल, केरल, आसाम और दिल्ली में हुए कत्लेआम ने उन जख्मों को अब नासूर बना दिया है।

अफगानिस्तान में तालिबानी क्रूरता, वहशत और हैवानियत को मज़हबी कानूनों की आड़ में न्यायसंगत सिद्ध करने का दुष्प्रयास करने वाले "बौद्धिक दिवालिये" जब सहिष्णुता, शांति, सद्भावना और सौहार्द की दुहाई देते हैं तब ठीक ऐसा प्रतीत होता है कि मानो "गिद्धों का कोई झुंड" शाकाहार की उपयोगिता पर व्याख्यान दे रहा हो।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां आज भी जयचंद जीवित हैं, और पृथ्वीराज चौहान की तरह कुछ लोग बार-बार मौहम्मद गौरी जैसे झूठे,मक्कार और वहशियों पर विश्वास करने लगते हैं।

🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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