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बुधवार, 22 जनवरी 2020

क्या भारत में इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है : २०२० से १९४७ की ओर (भाग -२)

अलाउद्दीन खिलजी ने जब एक क़ाज़ी से सवाल किया- इस्लामी क़ानून के अंतर्गत हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी?

क़ाज़ी ने उत्तर दिया-
"उन्हें (हिन्दुओं को ) लगान भरने वाला कहा जाता है, और जब कोई लगान अधिकारी उनसे चांदी मांगे, उन्हें बिना कोई प्रश्न उठाये पूरी विनम्रता और सम्मान के साथ सोना भेंट करना चाहिए। यदि अधिकारी उनके मुहं में गंदगी फेंकें तो उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी उसे लेने के लिए मुहं चौड़ा खोल देना चाहिए। धिम्मी (गैर-मुस्लिम) की असली नीच स्थिति इस प्रकार विनम्रता से धन भेंट करने और अपने मुहं में गंदगी स्वीकारने से ही प्रकट होती है. इस्लाम का महिमा गान ही कर्तव्य है और मज़हब के प्रति उपेक्षा भाव ओछापन है. खुदा उन्हें हिक़ारत से देखता है, जैसा कि उसने कहा है, उन्हें दबाकर रखो". हिन्दुओं को अपमानित बनाकर रखना तो ख़ासकर ही मज़हब का कर्तव्य है, क्योंकि वे पैगंबर के सबसे पुराने जिद्दी दुश्मन हैं, और क्योंकि पैगंबर ने हमें उनको क़त्ल करने का हुक्म यह कहकर दिया है कि 'उन्हें इस्लाम कबूल कराओ या मार दो' और गुलाम बनाओ तथा उनकी धन-सम्पत्ति लूट लो'. कोई और नहीं बल्कि स्वयं महान सिद्धांतकार हनीफाह ने, जिनके मत के हम सब अनुयायी हैं, हिन्दुओं पर जज़िया लगाने की सहमति दी है. अन्य विचारशाखाओं के उलेमा तो किसी अन्य मार्ग की अनुमति नहीं देते, सिवाय "मौत या इस्लाम" के।"  

       (डॉ. टाइटस की पुस्तक "इंडियन इस्लाम" में उद्घृत)

हमारा दुर्भाग्य है कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक़ नहीं सीखा। हजारों वर्षों की ग़ुलामी के बावजूद भी हम अपने इतिहास से कुछ सीखने की कोशिश कभी नहीं करते। हम हमेशा वर्तमान में ही जीते हैं, हमने कभी अपनी ऐतिहासिक भूलों से सबक़ लेकर अपने भविष्य को सुधारने की चेष्टा नहीं की. हम हमेशा से ही अहिंसा, नैतिकता और कर्तव्यों का पाठ पढ़ते और पढ़ाते रहे, लेकिन 'शठे शाठ्यम समाचरेत'  के सिद्धांत को हमने भुला दिया। हमने गांधीवाद को पढ़ा लेकिन चाणक्यनीति को कभी समझने की कोशिश नहीं की.

इतिहास सही मायने में शायद इसीलिए लिखा जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां उससे कुछ सीख सकें, लेकिन हमारा एक और दुर्भाग्य देखिये कि वामपंथियों और कांग्रेस ने हमारे सामने जो इतिहास रखा उसने हमें हमारे ही दुश्मनों का गुणगान करने पर मजबूर कर दिया। हम अकबर को महान और राणा प्रताप को बागी समझने लगे.
आज की पीढ़ी को यह जानने का पूरा हक़ है कि वामपंथी और कांग्रेस ने जो इतिहास हमें पढ़ाया है वह गुलाम मानसिकता पर झूठ का मुलम्मा है, जबकि सच्चाई अभी भी हमसे कोसों दूर है.

हमें जिस छद्म धर्म-निरपेक्षता की चाशनी पिलाई जाती है उसे हम कभी समझ ही नहीं सके. कांग्रेसियों और वामपंथियों ने सेक्युलरिज्म की आड़ में इस्लामिक कटटरपंथी विचारधारा को सुरक्षा-चक्र ही प्रदान किया है. और हमने सेक्युलरिज्म की इस विचारधारा को खाद-पानी देकर इसी आशा में पालने-पोसने का कार्य किया है, और उसे बढ़ते हुए देखकर भी इसी आशा में जी रहे हैं कि शायद कभी इस पेड़ पर मानवता, शांति और सौहार्द के फल-फूल भी लगेंगे और हम अपने देश को फलता-फूलता हुआ देख सकेंगे। क्रमशः 

भाग तीन कल पढ़िए 

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