सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बहनजी के सताए-रावण की शरण में आये

राजनीतिक गलियारों में ख़बर है कि "रावण" एक राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिशों में लगे हैं, और उनकी उन कोशिशों को वह सारे लोग सहारा देने में लगे हैं, जो "हाथी" से उतर गए या उतार दिए गए दूसरे शब्दों में कहिए तो जो नेता "बहनजी" के द्वारा सताए गए हैं, वह सब एक नए लेकिन मजबूत और टिकाऊ प्लेटफार्म पर आने की जुगत में लगे हुए हैं। इनमें कई दिग्गजों के नाम शामिल हैं। इन सबकी समस्या यह है कि इन्होंने एक लंबे समय तक दलित-मुस्लिम भाईचारे का चारा डालकर सत्ताएं हासिल की हैं। अब इन्हें वही पार्टी भायेगी जो दलित-मुस्लिम एकता का ढिंढोरा पीटे और सीधेतौर पर बहनजी को चुनौती दे सके। एक और दिक़्क़त यह भी है कि इस पार्टी का मुखिया भी कोई दलित चेहरा ही होना चाहिए, क्योंकि "जय भीम-जय मीम" का नारा तो हैदराबाद वाले "बैरिस्टर भाईजान" भी ख़ूब लगा रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी दाल गलने वाली नहीं है, वह तो बस 15 करोड़ तक ही सीमित रह गए। बाकी के 100 करोड़ उन्हें घास नहीं डाल रहे, इसलिए उनके साथ इन दिग्गज़ों की पटरी नहीं बैठेगी।
अब ये "बहनजी हटाओ बिग्रेड" जो कि अपने को पीड़ित मान रही है, "रावण शरणम गच्छामि" की माला जप रही है। उधर कुछ ऐसे नेताओं का एक खेमा जिसे कोई और दल लेने को तैयार नहीं है, उसमें भी रावण को लेकर काफी जोशोखरोश है। उन्हें लगता है कि उनकी डूबती हुई राजनीति को केवल "रावण" ही बचा सकता है। हालांकि अभी तक इन लोगों में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि "रावण" के साथ दलित वोट जुड़ेगा भी या नहीं, क्योंकि "हाथी" से मुकाबला करना कोई बाल-बच्चों का खेल तो है नहीं। इसी बात को लेकर अभी चिंतन-मनन चल रहा है।
कुल मिलाकर यह कहिए कि इस "रावण बिग्रेड" में शामिल होने वालों को ऐसे कहिए- इन्हें कोई ठौर नहीं, रावण को कोई और नहीं। फ़िलहाल अभी तो हमें इस तमाम क़वायद का कोई ठोस नतीजा निकलता नज़र नहीं आ रहा है, क्योंकि जो लोग इस बिग्रेड को तैयार करने में लगे हैं, उनमें ही इस  बिग्रेड की सफलता को लेकर सन्देह है और कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी उनके पास नहीं हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

गंगा स्नान का वैज्ञानिक महत्व : एक प्रमाणिक और गहन विश्लेषण

  गंगा स्नान को धार्मिक आस्था का विषय माना जाता है — लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी है, जिसे आधुनिक शोधों ने प्रमाणित किया है। 1. प्राकृतिक एंटीबायोटिक जल गंगाजल में Bacteriophage नामक वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं। इसलिए यह पानी सड़ता नहीं, बल्कि शुद्ध बना रहता है — यह आधुनिक माइक्रोबियल साइंस द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है।  इसे भी पढ़ें : कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व  2. स्किन एवं इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी गंगाजल में विद्यमान खास खनिज (Mineral Salts) व प्राकृतिक माइक्रोब्स त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाते हैं और त्वचा रोगों में उपचारकारी पाए गए हैं। इससे शरीर की immune response क्षमता बढ़ती है — विशेषकर जल-ज्वर, फंगल और फोड़े-फुंसियों जैसे संक्रमणों से लड़ने में। 3. नेगेटिव आयन एनर्जी थैरेपी (Negative Ion Therapy) जब व्यक्ति सूर्योदय या प्रातःकालीन मौसम में गंगा में स्नान करता है, तब उसे नेगेटिव आयन (−IONs) प्राप्त होते हैं — यह वही आयन हैं जो हिमालय, झरनों और बारिश के बाद की हवा में होते हैं। विज्ञान...