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रविवार, 23 फ़रवरी 2020

बहनजी के सताए-रावण की शरण में आये

राजनीतिक गलियारों में ख़बर है कि "रावण" एक राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिशों में लगे हैं, और उनकी उन कोशिशों को वह सारे लोग सहारा देने में लगे हैं, जो "हाथी" से उतर गए या उतार दिए गए दूसरे शब्दों में कहिए तो जो नेता "बहनजी" के द्वारा सताए गए हैं, वह सब एक नए लेकिन मजबूत और टिकाऊ प्लेटफार्म पर आने की जुगत में लगे हुए हैं। इनमें कई दिग्गजों के नाम शामिल हैं। इन सबकी समस्या यह है कि इन्होंने एक लंबे समय तक दलित-मुस्लिम भाईचारे का चारा डालकर सत्ताएं हासिल की हैं। अब इन्हें वही पार्टी भायेगी जो दलित-मुस्लिम एकता का ढिंढोरा पीटे और सीधेतौर पर बहनजी को चुनौती दे सके। एक और दिक़्क़त यह भी है कि इस पार्टी का मुखिया भी कोई दलित चेहरा ही होना चाहिए, क्योंकि "जय भीम-जय मीम" का नारा तो हैदराबाद वाले "बैरिस्टर भाईजान" भी ख़ूब लगा रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी दाल गलने वाली नहीं है, वह तो बस 15 करोड़ तक ही सीमित रह गए। बाकी के 100 करोड़ उन्हें घास नहीं डाल रहे, इसलिए उनके साथ इन दिग्गज़ों की पटरी नहीं बैठेगी।
अब ये "बहनजी हटाओ बिग्रेड" जो कि अपने को पीड़ित मान रही है, "रावण शरणम गच्छामि" की माला जप रही है। उधर कुछ ऐसे नेताओं का एक खेमा जिसे कोई और दल लेने को तैयार नहीं है, उसमें भी रावण को लेकर काफी जोशोखरोश है। उन्हें लगता है कि उनकी डूबती हुई राजनीति को केवल "रावण" ही बचा सकता है। हालांकि अभी तक इन लोगों में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि "रावण" के साथ दलित वोट जुड़ेगा भी या नहीं, क्योंकि "हाथी" से मुकाबला करना कोई बाल-बच्चों का खेल तो है नहीं। इसी बात को लेकर अभी चिंतन-मनन चल रहा है।
कुल मिलाकर यह कहिए कि इस "रावण बिग्रेड" में शामिल होने वालों को ऐसे कहिए- इन्हें कोई ठौर नहीं, रावण को कोई और नहीं। फ़िलहाल अभी तो हमें इस तमाम क़वायद का कोई ठोस नतीजा निकलता नज़र नहीं आ रहा है, क्योंकि जो लोग इस बिग्रेड को तैयार करने में लगे हैं, उनमें ही इस  बिग्रेड की सफलता को लेकर सन्देह है और कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी उनके पास नहीं हैं।

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