अब ये "बहनजी हटाओ बिग्रेड" जो कि अपने को पीड़ित मान रही है, "रावण शरणम गच्छामि" की माला जप रही है। उधर कुछ ऐसे नेताओं का एक खेमा जिसे कोई और दल लेने को तैयार नहीं है, उसमें भी रावण को लेकर काफी जोशोखरोश है। उन्हें लगता है कि उनकी डूबती हुई राजनीति को केवल "रावण" ही बचा सकता है। हालांकि अभी तक इन लोगों में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि "रावण" के साथ दलित वोट जुड़ेगा भी या नहीं, क्योंकि "हाथी" से मुकाबला करना कोई बाल-बच्चों का खेल तो है नहीं। इसी बात को लेकर अभी चिंतन-मनन चल रहा है।
कुल मिलाकर यह कहिए कि इस "रावण बिग्रेड" में शामिल होने वालों को ऐसे कहिए- इन्हें कोई ठौर नहीं, रावण को कोई और नहीं। फ़िलहाल अभी तो हमें इस तमाम क़वायद का कोई ठोस नतीजा निकलता नज़र नहीं आ रहा है, क्योंकि जो लोग इस बिग्रेड को तैयार करने में लगे हैं, उनमें ही इस बिग्रेड की सफलता को लेकर सन्देह है और कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी उनके पास नहीं हैं।
कुल मिलाकर यह कहिए कि इस "रावण बिग्रेड" में शामिल होने वालों को ऐसे कहिए- इन्हें कोई ठौर नहीं, रावण को कोई और नहीं। फ़िलहाल अभी तो हमें इस तमाम क़वायद का कोई ठोस नतीजा निकलता नज़र नहीं आ रहा है, क्योंकि जो लोग इस बिग्रेड को तैयार करने में लगे हैं, उनमें ही इस बिग्रेड की सफलता को लेकर सन्देह है और कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी उनके पास नहीं हैं।
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