सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नहीं तो हिन्दू, जो 700 वर्षों तक मुसलमानों के ग़ुलाम रहे, मुसलमानों को अपना ग़ुलाम मान लेंगे

महमूद प्राचा सहित कई नौटंकीबाज अक्सर टीवी डिबेट्स में अपने पीछे बाबा साहेब के पोस्टर लगाकर बैठते हैं, शाहीन बाग़ सहित तमाम CAA-NRC विरोध-प्रदर्शनों  में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के पोस्टर लेकर बैठा जा रहा है। उन्हीं बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक "पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया" नामक पुस्तक में 1920 और '30 के दशकों में मुस्लिम नेताओं के राजनीतिक विचार औऱ व्यवहार को उजागर करने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने अनेक महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं के विचारों के उदाहरण दिए हैं. उनमें से कुल दो नेताओं के विचार यहां प्रस्तुत हैं।

मौलाना आज़ाद सोभानी ने सिल्हट में सन 1938 में एक बयान दिया था- 
"अंग्रेज धीरे-धीरे निर्बल होते जा रहे हैं और निकट भविष्य में हिंदुस्तान से चले जायेंगे। इसलिए, यदि हमने इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हिंदुओं से अभी से संघर्ष करके उन्हें कमज़ोर न किया, तो वे न केवल हिंदुस्तान में रामराज्य स्थापित कर देंगे, बल्कि धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल जाएंगे। यह हिंदुस्तान के 9 करोड़ (उस समय भारत में मुसलमानों की जनसंख्या) पर निर्भर है कि वे हिंदुओं को शक्तिशाली बनाएं या कमज़ोर। इसलिए, हर सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वह मुस्लिम लीग में शामिल होकर संघर्ष जारी रखे, ताकि हिन्दू यहां न जम पाएं और अंग्रेजों के जाते ही हिंदुस्तान के आज़ाद होने से  पहले ही हिंदुओं के साथ किसी न किसी प्रकार की समझदारी, ताक़त से या दोस्ताना अंदाज़ में क़ायम की जानी चाहिए, नहीं तो हिन्दू, जो 700 वर्षों तक मुसलमानों के ग़ुलाम रहे, मुसलमानों को अपना ग़ुलाम बना लेंगे"।

डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू ने 1925 में लाहौर में एक भाषण दिया था-
"यदि इस देश से ब्रिटिश राज हटाकर हम यहाँ स्वराज्य स्थापित करते हैं और अफगान या और कोई मुस्लिम भारत पर हमला करते हैं, तो हम मुसलमान इसका विरोध करेंगे और देश को आक्रमण से बचाने के लिए अपने सारे बेटों को कुर्बान कर देंगे। लेकिन, मैं एक बात का साफ-साफ ऐलान कर देना चाहता हूं। सुनो, मेरे हिन्दू भाइयों बहुत ध्यान सुनो! यदि आप लोग हमारे तंज़ीम आंदोलन में बाधा डालोगे और हमारे हक हमें नहीं दोगे तो हम अफगानिस्तान या दूसरी किसी मुस्लिम ताक़त से एकता कर लेंगे और इस देश में अपनी हुक़ूमत कायम कर लेंगे।"
 ( पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया, पृष्ठ 265-6)

श्रीमती एनी बेसेंट लिखती हैं : - 
"एक अन्य प्रश्न भारत के मुसलमानों के विषय में बारे में उठता है। यदि हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी सम्बन्ध (सन 1916 के) लखनऊ समझौते के दिनों के जैसे रहते तो यह प्रश्न उतना आवश्यक न होता, यद्यपि स्वतंत्र भारत में कभी न कभी उठता अवश्य। परन्तु ख़िलाफ़त आंदोलन (सन 1919) के बाद से बहुत कुछ बदल गया है, और ख़िलाफ़त आंदोलन को प्रोत्साहन मिलने से भारत के लिए उत्पन्न हुए अनेक दुष्परिणामों में से एक यह है कि इस्लाम में विश्वास न रखने वालों के विरुद्ध मुसलमानों की घृणा की अंदरूनी भावना पूरी निर्लज्जता के साथ नग्न रूप में उभर आई है, जैसी कि वह बीते समय में थी। हमने सक्रिय राजनीति में तलवार के बल पर बढ़ने वाले इस्लाम के प्राचीन रूप को पुनर्जीवित होते देख लिया है।"

इन सब वक्तव्यों को पढ़ने के बाद आप क्या प्रतिक्रिया देंगे या आप क्या समझ पाए हैं यह हम आप पर छोड़ते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना

संविधान निर्माण की प्रक्रिया, प्रमुख बहसें, और उन विवादों का विश्लेषण जो आज भी प्रासंगिक हैं संविधान सभा की बहसों में छिपा भारत का असली सपना  एक राष्ट्र की नींव 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक नवजात राष्ट्र का सामूहिक सपना था। इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। संविधान सभा में कुल 165 बैठकें हुईं, जिनमें से 114 दिन केवल संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श में व्यतीत हुए। यह विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक संविधान निर्माण की सबसे लंबी और सबसे गहन बहस थी। संविधान सभा की बहसों में भारत का वास्तविक स्वरूप उभरकर आया। यहाँ केवल कानूनी धाराएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक समाज की कल्पना को मूर्त रूप दिया गया। इन बहसों में जो तर्क-वितर्क हुए, जो असहमतियाँ व्यक्त हुईं, और जो समझौते किए गए, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान सभा की संरचना: प्रतिनिधित्व का गणित संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना 1946 के...

UGC विनियम 2026: उच्च शिक्षा में समानता का नया ढांचा (भाग-1)

UGC विनियम 2026 ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव का दौर भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज की सबसे गहरी जड़ों में छिपे भेदभाव और असमानता से निपटने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है। यह लेख श्रृंखला इन नए नियमों की गहन पड़ताल करती है - न केवल उनकी संरचना और प्रावधानों की, बल्कि उनके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ, संभावित परिणामों और विवादास्पद पहलुओं की भी। 2012 से 2026 तक का सफर: तीन चरणों में बदलाव भारतीय परिसरों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। 2012 में UGC ने पहली बार 'SC/ST के छात्रों के खिलाफ भेदभाव की रोकथाम के लिए विनियम' जारी किए थे। उस समय का फोकस मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों तक सीमित था। 2024 में एक ड्राफ्ट सामने आया जिसमें पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उस ड्...

हर शाख पे उल्लू बैठा है —अंजाम-ए-कांग्रेस क्या होगा?

'हर शाख पे उल्लू बैठा है' के परिप्रेक्ष्य में पार्टी के वैचारिक पतन की एक तीखी राष्ट्रवादी पड़ताल। राष्ट्रचिन्तन — अंजाम-ए-कांग्रेस राजनीतिक विश्लेषण · कांग्रेस का पतन · विशेष आलेख · अप्रैल 2026 ▶ अप्रैल 2026 · राष्ट्रीय राजनीति विशेषांक जो दल अपने बयानों से अपने शत्रु को संजीवनी देता रहे "हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा" — मिर्ज़ा ग़ालिब उसका भविष्य इतिहास पहले ही लिख चुका है म.च. शास्त्री मनोज चतुर्वेदी शास्त्री Rashtra-Chintan · राष्ट्रचिन्तन · अप्रैल 2026 'हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?' मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर जब लिखा गया था, तब शायद उन्हें यह नहीं पता था कि डेढ़ सौ वर्ष बाद यह भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी पर इतना सटीक बैठेगा। कांग्रेस का गुलिस्तां आज वह है, जहाँ हर शाख पर एक ऐसा नेता विराजमान है जो अपने ही दल की जड़ें काट रहा है — और भाजपा को घर बैठे संजीवनी दे रहा है। हा...