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| जब सत्ता ने मोड़ लिया मुंह: वोट बैंक के लिए गोवंश की बलि चढ़ाने वाली सपा सरकार की नीतियों का काला चिट्ठा |
सपा शासन के दौरान गो-तस्करी एक संगठित उद्योग बन गया था। स्थानीय प्रशासन और पुलिस पर राजनैतिक दबाव के कारण तस्करों के हौसले बुलंद थे, और थानों से ही 'पर्ची' सिस्टम के तहत अवैध ट्रकों को पास कराया जाता था
उसी उत्तर प्रदेश की छाती पर एक ऐसा भी स्याह कालखंड गुजरा है, जब स्वघोषित यदुवंशियों के सत्ता संरक्षण में आस्था का लहू बहाया गया। यह प्रशासनिक विफलता नहीं थी — यह एक सुनियोजित राजनीतिक संविदा थी जिसकी कीमत लाखों गायों ने और पश्चिमी UP के किसानों ने चुकाई।
वर्ष 2014, रात के दो बजे। शामली जिले की एक सड़क पर गायों से भरा ट्रक बेरोकटोक निकल रहा है। एक होमगार्ड जवान ने रोकने की कोशिश की — अगले सप्ताह उसका तबादला हो गया। यह घटना भले ही कपोल-कल्पित हो लेकिन यह उस पूरे पाँच साल का नमूना था जब उत्तर प्रदेश में सपा सरकार ने गो-तस्करी को न रोका, न रुकने दिया। क्योंकि रोकना उनकी वोटबैंक राजनीति के विरुद्ध था। यह लापरवाही नहीं यह तुष्टिकरण की राजनीतिक पराकाष्ठा थी।
चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा —
जो राजा अपराधी को संरक्षण देता है, वह स्वयं उस अपराध का भागीदार है।
— मनोज चतुर्वेदी शास्त्री, राष्ट्रचिंतनसंरक्षण की राजनीति — FIR से तबादले तक का दस्तावेज़
सपा शासनकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले गो-तस्करी का सबसे सक्रिय गलियारा बन गये थे। यह संयोग नहीं था। इन जिलों में एक pattern स्पष्ट था — जो अधिकारी तस्करों पर कार्रवाई करते, उनका तत्काल तबादला होता था। जो थानेदार FIR दर्ज करने में आनाकानी करते, वे कथिततौर पर पदोन्नति पाते थे।
2012-17 के बीच पश्चिमी UP में गो-तस्करी के दर्ज मामलों में दोषसिद्धि की दर एक अंक में रही। कारण सरल था — गवाह मुकर जाते थे, FIR कमज़ोर होती थी, और अभियोजन पक्ष के वकील "तकनीकी आधारों" पर मामले गँवाते थे।
स्थानीय सपा नेताओं और तस्करों का Nexus इतना खुला था कि पत्रकार इसे Record करते थे लेकिन राज्य मीडिया में यह खबर दबती रहती थी। कई मामलों में तस्करों की रिहाई के लिए सपा विधायकों के कार्यालयों से फोन आने की रिपोर्टें उस दौर के स्थानीय अखबारों में दर्ज हैं। यह अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं — यह एक व्यवस्था थी।
वोट-बैंक की गणित — गाय की जान, सत्ता का सौदा
सपा की चुनावी रणनीति को समझे बिना गो-तस्करी के संरक्षण को नहीं समझा जा सकता। सपा का वोट-बैंक एक विशेष समुदाय पर टिका था जिसका एक बड़ा वर्ग गोमांस व्यापार और तस्करी के आर्थिक चक्र से जुड़ा था। यह आर्थिक चक्र केवल बूचड़खानों तक सीमित नहीं था — इसमें ट्रांसपोर्ट, स्थानीय राजनेता, पुलिस और निर्यात माफिया — सब शामिल थे।
उत्तर प्रदेश ने तुष्टिकरण की राजनीति का वह स्याह दौर झेला है, जिसने राज्य के स्वाभिमान को गहरे घाव दिए हैं। आज जब हम सुशासन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह कौन सी राजनीतिक मानसिकता थी जिसने प्रदेश को उस गर्त में धकेला था।
यह चक्र उत्तर प्रदेश से बाहर भी जाता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गायें पहले बांग्लादेश सीमा की ओर जाती थीं, वहाँ से अंतरराष्ट्रीय गो-मांस निर्यात का हिस्सा बनती थीं। उस दौर में भारत का गो-मांस निर्यात तेज़ी से बढ़ा था — और उत्तर प्रदेश इस "उद्योग" का सबसे बड़ा केंद्र था। सत्ता और तस्करी का यह गठजोड़ वोटबैंक की राजनीति के बिना संभव नहीं था।
2017 के बाद का दर्पण — वही पुलिस, वही कानून, परिणाम भिन्न क्यों?
यह तुलना किसी राजनीतिक प्रचार की ज़रूरत नहीं — यह स्वयं बोलती है।
| मानदंड | सपा सरकार (2012–17) | योगी सरकार (2017+) |
|---|---|---|
| अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई | नगण्य | ९०० से अधिक बंद (प्रथम वर्ष) |
| गो-तस्करी में दोषसिद्धि दर | एकल अंक | उल्लेखनीय वृद्धि |
| तस्करों पर FIR का अनुसरण | अधिकांश बंद | सक्रिय अभियोजन |
| कार्रवाई करने वाले अधिकारी | तबादला | पुरस्कार / प्रोत्साहन |
| पशु-तस्करी का NCRB trend | लगातार वृद्धि | गिरावट दर्ज |
वही IPS अधिकारी, वही पुलिस बल, वही कानून — लेकिन परिणाम पूरी तरह भिन्न। यह अंतर किसी कानूनी संशोधन से नहीं आया। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक अनुमति के बीच का अंतर है। और यह तुलना सपा सरकार पर किसी भी भाषण से बड़ा आरोप है।
ग्रामीण UP का खामोश नुकसान — जो कभी मीडिया में नहीं आया
मुज़फ्फरनगर, बागपत और शामली का वह किसान जिसकी गाय रात को चुरा ली गई — उसकी कहानी किसी राष्ट्रीय चैनल ने नहीं दिखाई। उसके पास न बीमा था, न मुआवज़ा था, न कोई नेता जो उसकी आवाज़ बने। वह चुपचाप उठा, अगले दिन खेत पर गया — और उस नुकसान को भीतर ही भीतर झेलता रहा।
सपा सरकार के पाँच वर्षों में पश्चिमी UP के उस छोटे किसान की कमर टूटी जिसकी खेती गौवंश पर टिकी थी।
गौवंश केवल आस्था नहीं — वह उत्तर प्रदेश की कृषि-पारिस्थितिकी का जीवित आधार है। गोबर की खाद, कृषि-श्रम, दूध आधारित आजीविका — यह पूरा चक्र उस दौर में जानबूझकर तोड़ा गया। और जब यह चक्र टूटा, तो छोटा किसान रासायनिक खाद और कर्ज़ के जाल में फँसता चला गया। सपा सरकार की गो-तस्करी नीति के आर्थिक पीड़ितों की गिनती कभी नहीं हुई — लेकिन वे असंख्य हैं।
जो दल आज "किसान हितैषी" होने का दावा करता है — क्या वह बता सकता है कि 2012 से 2017 के बीच पश्चिमी UP के उन किसानों की गायें कहाँ गईं जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था उन गायों पर टिकी थी?

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