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क्या मोदी ने ईरान के साथ विश्वासघात किया है?

एक प्रतीकात्मक शतरंज की बिसात जिस पर एक चमकता हुआ केसरिया सिंह भारत के कूटनीतिक वर्चस्व को दर्शा रहा है। आसपास काले मोहरे गिरे हुए हैं और कुछ आकृतियां शोक मना रही हैं, जो खामनेई के अंत पर भारतीय विपक्ष के विलाप और 'चयनात्मक संवेदना' के पाखंड को प्रदर्शित करता है। पृष्ठभूमि में मध्य-पूर्व का नक्शा और सामने चाणक्य का 'अर्थशास्त्र' रखा है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की बिसात पर कोई जन्मजात मित्र या शत्रु नहीं होता। नए भारत की विदेश नीति केवल 'अर्थशास्त्र' के यथार्थवाद और नितांत राष्ट्रहित से संचालित होती है, न कि किसी कृत्रिम 'भावुकता' से।

खामनेई का अंत और विपक्ष का विलाप

वैश्विक समीकरणों में 'भावुकता' का स्थान नहीं होता। भारत की विदेश नीति केवल नितांत राष्ट्रहित का अनुष्ठान है।

ध्य-पूर्व की तप्त रेत पर जब भू-राजनीतिक समीकरणों का रक्तपात हो रहा है, तब अली खामनेई के पतन ने, न केवल इस्लामी गणराज्य ईरान की सत्ता की चूलें हिलाई हैं, अपितु दिल्ली के वातानुकूलित राजनीतिक गलियारों में एक विचित्र प्रकार के 'विधवा विलाप' को भी जन्म दिया है। भारतीय विपक्ष—विशेषकर वामपंथी और कांग्रेस—का यह हाहाकार और मोदी सरकार पर 'ईरान से विश्वासघात' के आरोप, उस वैचारिक शून्यता और कूटनीतिक अपरिपक्वता का निकृष्टतम साक्ष्य हैं, जहाँ विदेश नीति को राष्ट्रहित के स्थान पर 'भावुक मित्रताओं' और घरेलू तुष्टीकरण के चश्मे से देखा जाता है।

कूटनीतिक यथार्थवाद बनाम कृत्रिम 'विश्वासघात'

आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र अत्यंत निर्मम और स्पष्ट घोष करता है— राज्यों के मध्य कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मंच पर नैतिकता का कोई स्थान नहीं होता; यहाँ केवल शक्ति और अस्तित्व का नियम काम करता है। भारत ने चाबहार बंदरगाह, 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) या ऊर्जा व्यापार के लिए ईरान से जो संधियां कीं, वे विशुद्ध रूप से भू-सामरिक (Geo-strategic) आवश्यकताएं थीं, कोई वैचारिक बंधन नहीं।

विपक्ष का यह रुदन कि "हमने संकट के समय ईरान का साथ छोड़ दिया", एक आत्मघाती कुतर्क है। जब ईरान अपनी विस्तारवादी नीतियों और 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के अहंकार में अमेरिका और इज़राइल के सीधे निशाने पर आकर स्वयं एक धधकती हुई चिता बन गया है, तो क्या भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और मध्य-पूर्व में निवास-रत ९० लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों के प्राणों को दांव पर लगा देना चाहिए था? जब किसी का विनाश सन्निकट हो, तो स्वयं को उसके साथ भस्म कर लेना मित्रता नहीं, मूर्खता है। मोदी सरकार की वर्तमान नीति इसी कूटनीतिक यथार्थवाद का निर्भीक प्रमाण है।

विपक्ष की 'चयनात्मक संवेदना' का क्षुद्र पाखंड

अब प्रश्न यह उठता है कि फलीस्तीन और ईरान के लिए वामपंथी और कांग्रेसी खेमों में इतनी असीमित पीड़ा क्यों उमड़ रही है? इस 'चयनात्मक संवेदना' (Selective Empathy) की शल्य-चिकित्सा अत्यंत आवश्यक है। यह किसी सार्वभौमिक मानवाधिकार की चिंता का प्रति-फलन नहीं है, अपितु घरेलू राजनीति के एक विशेष 'वोट-बैंक' को साधने का निर्लज्ज उपकरण है।

जो राजनीतिक गिद्ध बलूचिस्तान के नरसंहार, तिब्बत के सांस्कृतिक दमन, बांग्लादेशी हिंदुओं की दुर्दशा और कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर अत्यंत सुविधापूर्ण मौन धारण कर लेते हैं, उनका खामनेई के लिए यह विधवा विलाप वैचारिक दासता और तुष्टिकरण की राजनीतिक पराकाष्ठा है। जैसा कि हमने पूर्व में भी Manoj Chaturvedi Official पर 'भारत की बदलती भू-राजनीतिक धुरी' के संदर्भ में स्पष्ट किया था— विपक्ष की यह रणनीति वस्तुतः भारत के स्वतंत्र कूटनीतिक हितों को अपने तुष्टीकरण के एजेंडे का बंधक बनाने का एक आंतरिक षड्यंत्र मात्र है।

'प्रतिरोध की धुरी' का पतन और भारत का मौन लाभ

भावुकता से परे हटकर यदि सामरिक दृष्टि से देखा जाए, तो इज़राइल और अमेरिका द्वारा मध्य-पूर्व में हमास, हिजबुल्लाह और अंततः ईरानी नेतृत्व जैसे कट्टरपंथी ढांचों (Radical Architectures) का विध्वंस, परोक्ष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक बड़ा सामरिक वरदान है। 'प्रतिरोध की धुरी' (Axis of Resistance) के नाम पर जो वैश्विक आतंकवादी पारिस्थितिकी तंत्र फलता-फूलता था, उसकी जड़ें कटने से भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ ही होगी। किसी अन्य के प्रज्वलित किए गए युद्ध में अपनी सामरिक ऊर्जा नष्ट न करना ही श्रेष्ठतम युद्धनीति है।

नया भारत केवल 'भारत' के साथ खड़ा है

विपक्षी दलों द्वारा बार-बार उछाला जाने वाला यह प्रश्न कि "इस वैश्विक ध्रुवीकरण में भारत किसके साथ खड़ा है?" अपने आप में शीत-युद्ध की उस दास्तावादी मानसिकता से उपजा है, जो मानती है कि भारत को किसी न किसी गुट का पिछलग्गू होना ही चाहिए।

यह नया, सभ्यतागत भारत (Civilizational India) है। यह न तो अमेरिका का अंधभक्त है और न ही ईरान के पतन का साझीदार। यह भारत केवल अपनी अर्थव्यवस्था, अपनी सीमाओं की अजेयता, अपनी सैन्य शक्ति और अपने नितांत स्वार्थी राष्ट्रहित के साथ खड़ा है। गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) की पुरानी रक्षात्मक नीतियों का युग अब भस्म हो चुका है; यह बहु-गुटीय यथार्थवाद (Multi-Alignment) का वह कालखंड है जहाँ भारत अपने हितों के अनुसार गोटियां चलता है। यदि राष्ट्रहित का तकाज़ा है कि किसी मोहरे को पिटता हुआ देखा जाए, तो भारत उस बिसात पर शांति से बैठकर अपनी अगली चाल की तैयारी करेगा। यही सत्य है, और यही राष्ट्रनीति है।

नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते।
व्यवहारश्च जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥
(इस संसार में न तो कोई जन्म से शत्रु है और न ही कोई मित्र। केवल परिस्थितियों, व्यवहार और सामरिक आवश्यकताओं से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।) - महाभारत, शांतिपर्व

बौद्धिक विमर्श: ज्वलंत प्रश्न

प्रश्न १: क्या ईरान संकट के समय तटस्थ रहकर भारत ने 'कूटनीतिक विश्वासघात' किया है?
उत्तर: कदापि नहीं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में मित्रता सामरिक होती है, वैचारिक नहीं। चाबहार और ऊर्जा व्यापार भारत की आवश्यकताएं थीं। जब ईरान अमेरिका और इज़राइल से सीधे युद्ध में उलझ गया, तब भारत अपनी अर्थव्यवस्था और मध्य-पूर्व में रह रहे 90 लाख भारतीयों के प्राणों को दांव पर नहीं लगा सकता। यह विश्वासघात नहीं, 'कूटनीतिक यथार्थवाद' है।
प्रश्न २: विपक्ष को फलीस्तीन और ईरान से इतनी गहरी सहानुभूति क्यों है?
उत्तर: यह सहानुभूति वैश्विक मानवाधिकारों के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से घरेलू 'वोट-बैंक' और तुष्टीकरण की राजनीति से प्रेरित है। जो विपक्ष बलूचिस्तान, तिब्बत या बांग्लादेशी हिंदुओं पर मौन रहता है, उसका यह क्रंदन चयनात्मक संवेदना (Selective Empathy) का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
प्रश्न ३: ईरान और 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के कमजोर होने से भारत को क्या लाभ है?
उत्तर: हमास, हिजबुल्लाह और कट्टरपंथी ईरानी नेतृत्व का पतन परोक्ष रूप से वैश्विक आतंकवादी पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करता है। इसके कमजोर होने से भारतीय उप-महाद्वीप में भी कट्टरपंथी तत्वों को मिलने वाला वैचारिक और आर्थिक पोषण घटेगा, जो भारत की सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से लाभदायक है।

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