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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

दो बूंद पप्पूमूत्र की कीमत तुम क्या जानो बाबूजी

आज प्रियंका गांधी सहित तमाम कांग्रेसी नेताओं द्वारा लखीमपुर खीरी कांड पर जो हायतौबा मचाई जा रही है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की मांग को लेकर जिस प्रकार से श्रीमती प्रियंका वाड्रा मौनव्रत धारण किये बैठी हैं। और तमाम कांग्रेसी नेता आशीष मिश्रा को दोषी साबित करने पर तुले हैं, उनकी सच्चाई क्या है उसे समझने के लिये थोड़ा फ्लैश बैक में जाना पड़ेगा। ताकि आपको मालूम हो कि कुछ लोगों की मानसिकता कितनी घिनौनी और निम्नस्तर की हो सकती है।

गृह मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी आर.वी.एस. मनी ने एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा था कि- *"इशरत जहां केस में इशरत को आतंकवादी ना साबित करने के लिए कांग्रेसी नेता कमलनाथ ने उनपर दबाव बनाया था, कमलनाथ ने उनसे बार-बार कहा कि इशरत जहाँ को निर्दोष बता दो, बाहर लोग राहुल गाँधी का मूत्र पीने को तैयार हैं और तुम इतना भी नहीं कर सकते."*
जिसका जवाब मणि ने वही दिया, जो किसी भी स्वाभिमानी भारतीय को देना चाहिए था। 
आर.वी.एस.मणि ने कहा, कि *‘आपलोग मूत्र का स्वाद जानते हैं, आप इसे पी सकते हैं, लेकिन मैं सच्चाई के लिए खड़ा रहूंगा’।*
गृह-मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी आर.वी.एस. मणि ने अपनी पुस्तक 'हिंदू आतंक" में उस समय की घटनाओं के बारे में विस्तार से लिखा है। जिससे यह पता चलता है, कि कैसे सोनिया गांधी की अध्यक्षता में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार का नेतृत्व,  वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने और 'हिंदू आतंक' की थ्योरी का प्रचार करने के लिए झूठी कहानियां गढ़ रहा था। दस्तावेजों और विवरणों के माध्यम से पुस्तक यह भी साबित करती है कि तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने किस तरह 'हिंदू आतंक' का शब्द उछाला था।
ट्विटर पर राजा खान नाम से आईडी चलाने वाले कांग्रेसी ने अपने ट्वीट में लिखा था - *"कमलनाथ जी ने ठीक कहा, राहुल जी का मूत्र पीना नसीब की बात है। कांग्रेस का हर कार्यकर्ता हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष का मूत्र पीने के लिए 24 घण्टे तैयार है, उस मूत्र को पीकर हममें जो ताकत आएगी उससे हम मोदी जी को नाको चने चबवा देंगे।"*
 राजा खान ने एक अन्य ट्वीट में कहा - *"राहुल गाँधी का मूत्र पीना हम कांग्रेसियों के लिये सम्मान की बात है, जो लोग कमलनाथ जी का मजाक उड़ा रहे है वो वे हैं जिन्हें कभी राहुल जी का मूत्र नसीब नहीं हुआ। उन लोगों के लिए यही कहूंगा, अंगूर खट्टे हैं।"*

अब आप स्वयं अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सत्ता के लिए कांग्रेसी किसी भी आतंकी को निर्दोष सिद्ध करने में माहिर हैं और "हिन्दू" शब्द से उनकी घृणा किस स्तर तक है। यह भी, कि कांग्रेसी नेता गांधी परिवार की चाटुकारिता के लिये किस हद तक जा सकते हैं।
*अब दो बूंद पप्पूमूत्र की कीमत तुम क्या जानो मोदी जी।* यह तो बस वही जान सकते हैं जो अपने राज्यों को छोड़कर उत्तरप्रदेश में छातियाँ कूट रहे हैं। बाकी समझदार को ईशारा ही काफी है।

(विभिन्न मीडिया सूत्रों से संकलित खबरों पर आधारित)

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट* - उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने का नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

उद्धव ठाकरे साहब ज़रा अपने गिरेबाँ में भी झांककर देख लेते

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के विरोध में महाराष्ट्र सत्तारूढ़ गठबंधन ने 11 अक्टूबर को यानी आज राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है. एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के सत्तारूढ़ गठबंधन महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) ने शनिवार को कहा था कि यह दिखाने के लिए बंद का आह्वान किया गया है कि राज्य देश के किसानों के साथ है. शिवसेना के राज्यसभा सदस्य संजय राउत ने शनिवार को कहा था कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के विरोध में 11 अक्टूबर को महाराष्ट्र में बंद में पूरी ताकत से भाग लेगी। 
अब ज़रा इस गठबंधन सरकार की तस्वीर का दूसरा रुख़ देखिए। 
16 अप्रैल 2020 को सैंकड़ों उपद्रवियों ने दो हिंदू साधुओं और उनके एक ड्राइवर की गडचिंचले गांव , पालघर जिला, महाराष्ट्र, में महाराष्ट्र पुलिस की उपस्थिति में लाठी-डंडों से पीट-पीटकर बेहद निर्मम हत्या कर दी थी। यह घटना इतनी दर्दनाक और भयावह थी कि एकबारगी पूरा देश हिल उठ गया था। औऱ उन निर्दोष और असहाय हिन्दू साधुओं की भीड़ से करुण पुकार और उनकी विवशता भरी मुस्कुराहट जैसे मानो कह रहे हों कि- "हे ईश्वर इन्हें क्षमा कर दे क्योंकि यह नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं।" आज भी हर किसी को वह मार्मिक दृश्य अंदर तक हिला देता है। किंतु इस सबके पश्चात भी महाराष्ट्र सरकार औऱ गठबंधन नेताओं ने उन निर्दोष हिन्दू साधुओं की निर्मम हत्या पर महाराष्ट्र बन्द तो छोड़िए, दो शब्द सहानुभूति के भी नहीं बोले थे। और तो और उद्धव सरकार हैवानियत के इस नंगे नाच को देख-समझकर भी अंजान बनने का ढोंग करती रही थी। और बहुत बेशर्मी के साथ दोषियों के इस घृणित कुकृत्य पर पर्दा डालने में लग गई थी।

आज भी कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी का वह बेशर्मी भरा और संवेदनहीन रवैया ज्यों का त्यों बना हुआ है। इनमें से किसी ने भी उन चार नौजवानों की हत्या पर कोई शोक प्रकट नहीं किया जिन्हें लखीमपुर खीरी में किसानों की आड़ में कुछ उपद्रवियों और भिंडरवाला समर्थकों ने बड़ी बेहरमी के साथ लाठी-डंडों, तलवारों और बल्लम आदि से पीट-पीटकर मार डाला था।
प्रश्न उठता है कि क्या केवल किसान ही इंसान हैं, बाकी सभी को हैवान मान लिया जाएगा। क्या इस देश का अन्नदाता एक आम किसान इतना हैवान हो सकता है। शायद कदापि नहीं।

लखीमपुर खीरी के किसानों की आड़ लेकर अपनी राजनीति चमकाने वाली कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी गठबंधन महाराष्ट्र सरकार अपने गिरेबाँ में झांकने को बिल्कुल तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2018 में देशभर में किसानी से जुड़े 10,349 लोगों ने खुदकुशी की, जिसमें से महाराष्ट्र के 3,594 किसान थे. साल 2017 में देशभर में 10655 किसानों ने खुदकुशी की जिसमें से महाराष्ट्र से 3701 किसान थे.
लेकिन लाशों पर राजनीति करने वालों को इन आंकड़ों पर नज़र डालने की फुर्सत ही कहाँ है, साहब।

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रविवार, 10 अक्टूबर 2021

मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को मुआवजे देने में पक्षपात करने पर जब सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फटकार

आज लखीमपुर खीरी कांड पर राजनीति कर रही समाजवादी पार्टी भले ही प्रदेश की योगी सरकार पर पक्षपात के आरोप लगा रही हो। लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में  तत्कालीन सपा सरकार पर मुआवजे को लेकर पक्षपात का आरोप लगा था और इसपर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी तत्कालीन सपा सरकार को कड़ी फ़टकार लगाई थी।

मुजफ्फरनगर दंगों की शुरुआत 27 अगस्त 2013 को कवाल गाँव में कथिततौर पर एक जाट समुदाय की लड़की के साथ एक मुस्लिम युवक द्वारा छेड़खानी की शिकायत पर हुई थी. पीड़ित युवती मलिकपुरा गांव की थी, जिसके द्वारा जानसठ पुलिस में कई बार अपने साथ छेड़खानी की शिकायत की गई थी, लेकिन माना जाता है कि सपा नेताओं के दबाव के चलते इस मामले में पुलिस द्वारा पीड़िता की कोई मदद नहीं की गई। इस घटना के बाद लड़की के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन और उस मुस्लिम युवक के आपसी संघर्ष में मुस्लिम युवक की मौत हो गई। जिसके बदले हुई जवाबी हिंसा में  दोनों युवकों सचिन और गौरव की जान चली गई।

इसके बाद पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम मुजफ्फरनगर सुरेंद्र सिंह जाट के द्वारा कुछ मुस्लिम युवकों को कव्वाल से गिरफ्तार कर लिया गया। उसी रात कथितरूप से तत्कालीन सपा सरकार के एक वरिष्ठ नेता के दबाव में पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम सुरेंद्र सिंह जाट का मुजफ्फरनगर से तबादला कर दिया गया और सभी मुस्लिम युवकों को थाने से ही छोड़ दिया गया।
 
माना जाता है कि इस घटना के बाद सपा नेताओं द्वारा की गई कथित एकतरफा कार्रवाई ने दंगे की आग में घी का काम किया। इसके बाद इस मामले में राजनीति शुरू हो गई. और दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी महापंचायत बुलाई. 

07 सितंबर 2013 को महापंचायत से लौट रहे किसानों पर जौली नहर के पास दंगाइयों ने घात लगाकर हमला किया. इस दंगे में एक फोटोग्राफर और पत्रकार समेत 62 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद इस दंगे ने विकराल रूप धारण कर लिया था। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मुजफ्फरनगर के हर गांव को इस दंगे की आग ने अपनी चपेट में ले लिया था। और बताया जाता है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से दलित समाज और जाट बाहुल्य इलाकों से मुस्लिम समाज का पलायन बहुत तेजी से हुआ था। जिसके परिणामस्वरूप हजारों निर्दोष लोगों को अपने घर से बेघर होना पड़ा था।

मुजफ्फरनगर के इन दंगा पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए 26 अक्तूबर 2013 को एक अधिसूचना जारी की गई थी। जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवारों के मुआवजे के लिए 90 करोड़ रुपये जारी कर रही है। इस राशि से हर दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवारों को पुनर्वास के लिए पांच-पांच लाख रुपये दिए जाएंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्कालीन राज्य सरकार के अधिवक्ता राजीव धवन से पूछा कि- क्या सिर्फ एक समुदाय को मुआवजा देने की अधिसूचना जारी की गई है। इस सवाल के जवाब पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरा असंतोष जताते हुए कहा कि *"दंगा पीडितों के लिए तय मुआवजे में भेदभाव क्यों किया जा रहा है। राज्य सरकार को सभी समुदायों के लिए मुआवजे की घोषणा करनी चाहिए थी। मुआवजे की अधिसूचना में केवल एक ही समुदाय के दंगा पीडितों को शामिल किया गया है, जबकि इसके शिकार अन्य समुदाय के लोग भी हैं। बेहतर होगा कि राज्य सरकार इस अधिसूचना को वापस ले और नई अधिसूचना जारी कर उसमें हर समुदाय के दंगा पीड़ितों को शामिल करें।*

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शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वास्तव में किसानों के खलनायक हैं

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार सुश्री मायावती के शासनकाल में गोरखपुर मंडल की नौ चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचा गया था।
उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन प्रदेश की 21 चीनी मिलों को सुश्री मायावती सरकार के कार्यकाल में 2010-11 में बेचा गया था। इनमें से 10 मिलें उस समय चालू हालत में थीं, 11 मिलें बंद थीं।
सीएजी की रिपोर्ट में मिलों को गलत तरीके से औने-पौने दाम में बेचे जाने की पुष्टि भी हुई थी। हालांकि बसपा के बाद सत्ता में आई अखिलेश सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

मिलों की वर्तमान कीमत से 15 गुना कम कीमत पर इन्हें बेचा गया था। सर्किल रेट और स्टांप ड्यूटी की अनदेखी कर भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान कराया गया था। साथ ही मिलों की मशीनों, आवासों, गोदामों का भी मनमाना रेट निर्धारित किया गया था। 
इसमें अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, सकौती टाडा, रोहाना कला, खड्डा की चीनी मिलें चालू हालत में थी।
जबकि बरेली, हरदोई, बाराबंकी, शाहगंज, बैतालपुर, देवरिया, भटनी, घुघली, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला की चीनी मिलें बंद थी। इनमें सिसवा बाजार और घुघली महराजगंज में थीं। खड्डा, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला कुशीनगर तथा बैतालपुर, देवरिया व भटनी मिलें देवरिया में थीं। खड्डा चीनी मिल चालू हालत में थी।

7 जुलाई 2021 को पत्रिका.डॉटकाम में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार श्री योगी सरकार ने 4 साल में 45.44 लाख से अधिक गन्ना किसानों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया है। यह बसपा सरकार से दोगुना और सपा सरकार के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक बताया जाता है। इस खबर के अनुसार बसपा सरकार में गन्‍ना किसानों को 55,000 करोड़ का कुल भुगतान किया गया था, जबकि सपा सरकार के पांच साल में गन्‍ना किसानों को 95,000 करोड़ रुपये का कुल भुगतान किया गया था। *अखिलेश सरकार के कार्यकाल में गन्‍ना किसानों के 10659.42 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान भी योगी सरकार ने किसानों को किया है।*

2007 से 2017 तक जितना कुल भुगतान किसानों को हुआ था उतना योगी सरकार ने सिर्फ 4 साल में कर दिया।

इस खबर के एक भाग में लेखक लिखता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में एक के बाद एक बंद होती चीनी मिलों को योगी सरकार ने न सिर्फ दोबारा शुरू कराया गया बल्कि यूपी को देश में चीनी उत्‍पादन में नंबर वन बना दिया । राज्‍य सरकार ने तीन पेराई सत्रों एवं वर्तमान पेराई सत्र 2020-21 समेत यूपी में कुल 3,868 लाख टन से अधिक गन्ने की पेराई कर 427.30 लाख टन चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन किया है । वर्ष 2017-18 से 31 जनवरी, 2021 तक 54 डिस्टिलरीज के माध्यम से प्रदेश में कुल 261.72 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ है। जो कि एक रिकार्ड है।
प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान एक भी चीनी मिल बंद नहीं हुई। सभी 119 चीनी मिलें चलीं । प्रदेश में 45.44 लाख से अधिक गन्ना आपूर्तिकर्ता किसान हैं और लगभग 67 लाख किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं। आज देश में 47% चीनी का उत्पादन यूपी में हो रहा है और गन्ना सेक्टर का प्रदेश की जीडीपी में 8.45 प्रतिशत एवं कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 20.18 प्रतिशत का योगदान है। (पत्रिका.डॉटकाम)

25 सालों में पहली बार 243 नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी किये गए। जिनमें से 133 इकाइयां संचालित हो चुकी हैं। 

इसके बावजूद भी श्रीमान राकेश टिकैत सहित तमाम विपक्षी दल श्री योगी सरकार को "किसानों का खलनायक" बनाने पर तुले हुए हैं। किसानों की आड़ में श्री टिकैत बन्धु और तमाम विपक्ष अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने में लगा है। कोई भी सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता है। जानबूझकर सरकार के खिलाफ किसानों के मन में ज़हर घोला जा रहा है। उधर किसान श्री राकेश टिकैत को "अन्ना हजारे" समझ बैठे हैं, उन्हें लगता है कि वह सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सच इससे बिल्कुल परे है। श्री टिकैत बंधुओं की सारी लड़ाई उनके निजी स्वार्थ, राजनीतिक हित और अपनी पहचान बनाने तक सीमित है। इस आंदोलन से पहले उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति यह थी कि वह दो बार चुनाव लड़े औऱ दोनों ही बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करा बैठे। विपक्ष टिकैत का सहारा लेकर किसानों के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहा है। उसको भी अपना उल्लू सीधा करना है।

बर्तमान में किसानों के नाम पर हो रही सारी लड़ाइयां और आंदोलन केवल और केवल सत्ता के लिए हैं, किसान तो केवल मोहरा बने हुए हैं। यह बात किसानों को समझनी ही होगी।

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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी में गिद्धों की जमात : लाशों को नोचने में लगे हैं

लखीमपुर खीरी में गिद्धों की जमात एकत्रित हो रही है। लाल, नीले, सफेद कपड़े पहने कई जवान और बूढ़े गिद्ध वहां मंडरा रहे हैं, लाशों को नोचने को तैयार हैं। उन गिद्धों में होड़ सी मची है कौन ज़्यादा नोचकर ले जाएगा। यह मांसाहार नहीं सत्ताधारी गिद्ध हैं जिन्हें मांस नहीं भाता है बल्कि वोट की लालसा रहती है। इतनी गर्मियों में भी यह गिद्ध उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में डेरा डाले पड़े हैं, कोई श्रीनगर जाने को तैयार नहीं है। लाशें तो वहां भी हैं, दो-दो मासूम और निर्दोष शिक्षकों की, लेकिन समस्या यह है कि उन लाशों को नोचने से वोट नहीं मिल सकते। वहां गोलियां मिलती हैं, गद्दियां नहीं। वहां "शांतिदूत" रहते हैं इसलिए यह "क्रांतिदूत" वहां जाने को तैयार नहीं है। क्योंकि यह जानते हैं कि अगर वहां गए तो सीधे गोलियां मिलेंगी, गद्दियां नहीं। और अगर इन्हें किसी ने गोली मार दी तो इनकी लाशों पर कोई रोने वाला भी नहीं मिलेगा। इनके अपने ही इनकी।लाशों को नोचने लगेंगे, क्योंकि गिद्धों को तो लाश चाहिए नोचने के लिए, भले ही वह उनके अपनों की ही क्यों न हो। इसलिए उत्तरप्रदेश में आराम फरमा रहे हैं, छातियाँ पीट रहे हैं।
एक लोमड़ी ने आवाज़ लगाई और हजारों गिद्ध पहुंच गए दावत के लिए। लोमड़ी धूर्त और मक्कार है, वह जानती है कि श्रीनगर में रोने से कुछ नहीं मिलेगा, लेकिन उत्तरप्रदेश में विलाप करने से "कुछ" मिल सकता है। इस लोमड़ी ने जिस बूढ़े गिद्ध को कंधे पर बैठा रखा है उसके पंख और नाखून भी झड़ने लगे हैं, लेकिन शायद लखीमपुर खीरी में उसे पुनर्जीवन मिल जाये। लखीमपुर खीरी उस बूढ़े गिद्ध के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकती है, बस इसी आशा में लोमड़ी वहाँ साफ-सफाई कर रही है।
लाल-नीले गिद्ध भी ख़ूब शोर मचा रहे हैं, लेकिन लोमड़ी की चीख-चिल्लाहट के सामने भला इन लाल-नीले कमज़ोर गिध्दों की फुसफुसाहट का क्या मोल है। उधर एक भेड़िया भी बहुत परेशान है, क्योंकि सारी दावत पर तो उस ही का अधिकार था। वही तो है जिसने सारा चक्रव्यूह रचा था। पिछले कई माह से वह लाशों से ही तो पेट भर रहा है। कहाँ से नई लाश का इंतज़ाम हो, बस इसी को लेकर यह भेड़िया हमेशा परेशान रहता है। नित नई लाश का सौदा जो करना है।
गिद्ध, लोमड़ी और भेड़िया कभी किसी की मौत का मातम नहीं मनाते बल्कि यह तो सदैव जश्न मनाते हैं, केवल जश्न। क्योंकि मौत पर जश्न मनाना ही इनकी फ़ितरत है। लाशों पर नृत्य करते यह लोमड़ी, भेड़िए और गिद्ध अब धीरे-धीरे उड़ने लगेंगे, किसी नए शिकार की तलाश में, किसी नए श्मशान के आसपास, यह आपको फिर से मंडराते मिल जाएंगे।

लेकिन श्रीनगर नहीं जायेंगे क्योंकि वहां नोचने को कुछ नहीं है। 

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गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

इंदिरा के नक्शेकदम पर चलने वाली प्रियंका गांधी शायद अंजाम पढ़ना भूल गईं

1977 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी पूरे देश में चुनाव हारने के साथ ही पंजाब में भी चुनाव हार गई थी। इस समय भी कांग्रेस की स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी कि 1977 में थी, अंतर केवल इतना है कि उस समय नेतृत्व स्व. इंदिरा गांधी के पास था और आज नेतृत्व श्रीमती सोनिया गांधी के पास है। इंदिरा गांधी किसी दूसरे की सरकार को बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं। इसलिए उन्होंने पंजाब में प्रकाश सिह बादल की सरकार को अस्थिर करने के लिए भिंडरावाले को खड़ा किया था।

इंदिरा गांधी ने ही जनरैल सिंह भिंडरावाले को एक संत से आतंकवादी बनाया था। यह खुलासा प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइन’ में किया था। उनकी आत्मकथा के कुछ अंश इंडिया टुडे ने प्रकाशित किये हैं। इंडिया टुडे में ‘बियॉन्ड द लाइन’ के प्रकाशित अंश के अनुसार संजय गांधी और ज्ञानी जैल सिंह ने मिलकर जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया था। जिसके पुरुस्कार स्वरूप  ज्ञानी जैलसिंह को भारत का राष्ट्रपति बना दिया गया था।  
कुलदीप नैयर ने अपनी
किताब में लिखा है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी स्वीकार किया था कि अपने काम करने के लिए भिंडरावाले को कांग्रेस पैसे दिया करती थी। उन्होंने कहा था *“जब हमने पहली बार भिंडरावाले का इंटरव्यू लिया था तो वह ‘साहसी टाइप’ बिल्कुल नहीं लगा था, हां, वह अक्खर लगा था और लगा था कि वह हमारे उद्देश्य पूरा करने में सही साबित होगा। हम उसे अक्सर अपने काम के लिए पैसे दिया करते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा था कि वह आतंकवादी बन जाएगा।”*
जनरैल सिंह भिंडरवाला एक संत था जिसे इंदिरा गांधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने एक साधु से शैतान बना दिया था। दरअसल, भिंडरवाला एक बेहद महत्वाकांक्षी व्यक्ति था जो कि भारत का सबसे शक्तिशाली इंसान बनना चाहता था और दूसरी तरफ कांग्रेस पूरे भारत पर दोबारा अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती थी। सच तो यह है कि कांग्रेस और भिंडरवाला दोनों ही अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने हेतु एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे थे। 

13 अप्रैल 1978 को बैसाखी के दिन सिखों का एक दस्ता निरंकारियों से भिड़ गया। इस हमले में 16 सिखों की मौत हो गई थी। इसी वाकये को लेकर भिंडरावाले ने अकाली दल के खिलाफ सिखों को भड़काना शुरू कर दिया था (यह ठीक ऐसा ही है जैसे कि लखीमपुर खीरी कांड को लेकर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस स्यापा कर रही है)
जब यह घटना घटी तब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मुंबई में थे। वहां से आते ही कई पुलिस वालों को निलंबित कर दिया था तथा निरंकारी के मुखिया गुरबचन सिंह को गिरफ्तार किया। इतना सब करने के बावजूद सिखों के गुस्सा को शांत नहीं कर पाए। इस घटना का खामियाजा बादल को अगले चुनाव में हारकर चुकाना पड़ा।

यहां से भिंडरावाले ने खालसा के नाम पर जो दौर शुरू किया वह खालिस्तान की मांग पर जाकर खत्म हुआ। एक अक्खड़ संत भिंडरावाला देश का सबसे ख़तरनाक़ आतंकी बन गया। हद तो तब हो गई जब भिंडरवाला ने इंदिरा सरकार को ही ललकारना शुरू कर दिया था। तब
3 जून को इंदिरा गांधी के आदेश पर भारतीय सेना द्वारा हरमिंदर साहब परिसर, अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया जिसमें भिंडरावाले को उसके समर्थकों सहित मौत के घाट उतार दिया गया। भिंडरावाले की मौत के 5 माह पश्चात 31 अक्टूबर 1984 को भिंडरावाले के समर्थकों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

लेकिन लगता है कि सत्तालोलुप कांग्रेस ने अपने ही इतिहास से कोई सबक़ लेने का प्रयास नहीं किया है। और शायद वह एक बार फिर से इतिहास को दोहराने को तैयार बैठी है। 
1977 में इंदिरा कांग्रेस की सत्तालोलुपता ने सम्पूर्ण भारत को भिंडरावाले के रूप में जो एक ज़ख्म दिया था, अब 44 वर्षों पश्चात 2021 में उसे सोनिया कांग्रेस फिर से कुरेदकर नासूर बनाने पर तुली है। लेकिन लगता है कि इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलने वाली प्रियंका गांधी शायद  अंजाम पढ़ना भूल गई हैं।
 

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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*विशेष नोट* - उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमाप्रार्थी हैं।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी कांड की तुलना जलियांवाला बाग कांड से करने वालो अपने गिरेबां में भी तो झांक लो

पंजाब के निवर्तमान मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता चरण जीत सिंह चन्नी सहित कुछ विपक्षी नेताओं,  पप्पूजीवियों, आन्दोलजीवियों, टुकड़े-टुकड़े गैंग और जिहादियों का आरोप है कि लखीमपुर खीरी कांड ने जलियांवाला बाग कांड की याद ताज़ा कर दी।

*२१ जुलाई १९९३* को पश्चिम बंगाल में तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ कलकत्ता में राइटर्स बिल्डिंग तक एक विरोध मार्च का आयोजन किया गया था। उनकी मांग थी कि सीपीएम की "वैज्ञानिक धांधली" को रोकने के लिए वोटर आईडी कार्ड को वोटिंग के लिए एकमात्र आवश्यक दस्तावेज बनाया जाए। विरोध के दौरान पुलिस ने १३ लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी और कई अन्य घायल हो गए। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कहा था कि "पुलिस ने अच्छा काम किया है।" २०१४ की जांच के दौरान, उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी ने पुलिस की प्रतिक्रिया को *"अकारण और असंवैधानिक" बताया। न्यायमूर्ति चटर्जी ने कहा, *"आयोग इस नतीजे पर पहुंचा है कि यह मामला जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी बदतर है।"* 
 
*7 नवम्बर 1966* को हरियाणा के करनाल ज़िले से जनसंघ के सांसद स्वामी रामेश्वरानंद उस एक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. उनकी मांग थी कि देश में एक क़ानून बने जिसके अनुसार गोहत्या को अपराध माना जाए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस माँग का समर्थन कर रहा था. इस माँग को लेकर हज़ारों साधु-संत अपनी गायों के साथ दिल्ली चले आए। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तत्कालीन कांग्रेस सरकार के आदेश पर इन निहत्थे और निर्दोष साधु-संतों पर पुलिस बल ने सीधे गोली चलाई थी, जिसमें आधिकारिक तौर पर 10 लोगों की मृत्यु हुई थी। हालांकि अन्य स्रोतों ने इस गोलीबारी में मरे लोगों की संख्या सैंकडों में बताई है। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने अपनी क़िताब 'बैलेट: टेन एपिसोड्स देट हैव शेप्ड इंडियन डेमोक्रेसी' में 1966 की उस घटना का वर्णन किया है. उस समय देश की प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी थीं जोकि  प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी की दादी हैं। 

*31 अक्टूबर 1984* को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी और इसके अगले रोज़ से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे.

कुछ साल पहले इन दंगों पर नज़र डालने वाली एक किताब 'व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही' छपी थी. इसमें दंगे की भयावहता, हताहतों और उनके परिजनों के दर्द और राजनेताओं के साथ पुलिस के गठजोड़ का सिलसिलेवार ब्यौरा है. इस भयावह घटना पर टिप्पणी करते हुए 19 नवंबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री और इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों के हुजूम के सामने कहा था- 
*"जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे. हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है. जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है."*
यह बयान हजारों बेघर, बेसहारा सिख परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा था, जिनके स्वजन इन दंगों में जिंदा जलाए दिए गए, तलवारों से बड़ी बेरहमी से काट दिए गए थे।

*30 अक्टूबर 1990* को क़रीब 1 लाख लोग अयोध्या पहुँच चुके थे, जिसमें 20,000 साधु-संत ही थे। सरयू नदी के पुल पर जब कारसेवक जमा हुये, तब प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सरकार के आदेश पर पुलिस ने गोली चलाई। मंदिर परिसर में गुम्बद पर चढ़े कारसेवकों पर गोलियाँ चलाई गईं। नींव की खुदाई कर रहे लोगों पर गोली चलाई गई। जब कारसेवक गुम्बद पर चढ़े हुए थे, तब सीआरपीएफ ने भी गोली चलाई थी, सीमा सुरक्षा बल ने भी फायरिंग की। कारसेवा करते हुए क़रीब 11 लोग मौके पर ही शहीद हो गए थे। इसके विरोध में भड़के दंगों में कई लोग मारे गए थे। क़रीब 30 शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। सुरक्षा बलों की इस सीधी गोलीबारी में मस्जिद के गुम्बद पर झंडा फहराने वाले *कोठारी बन्धु* भी शहीद हो गए थे। 
माननीय मुलायम सिंह यादव ने नवंबर 2017 में अपने 79वें जन्मदिन के मौके पर सपा कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए अपने इस कृत्य को जायज ठहराया था। श्री मुलायम ने इस गोलीकांड के 27 वर्षों बाद कहा था कि देश की *"एकता और अखंडता’ के लिए अगर सुरक्षा बलों को गोली चला कर लोगों को मारना भी पड़े तो ये सही था। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा था कि अगर इसके लिए और भी लोगों को मारना पड़ता तो सुरक्षा बल ज़रूर मारते।* यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उस समय देश के गृहमंत्री मुफ़्ती मौहम्मद सईद थे।

और तो और जब लखीमपुर खीरी कांड कक लेकर कांग्रेसी छाती पीट रहे हैं, तभी राजस्थान के हनुमानगढ में अशोक गहलौत सरकार के आदेश पर प्रदेश के किसानों पर लाठीचार्ज किया जा रहा था।

समझ नहीं आता कि कांगी, वामी और उनके पिछलग्गू दलों के नेता अपने गिरेबान में क्यों नहीं झांकते।

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
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मुनीश साहब, औलाद तो राहुल गांधी की भी नहीं है, तो क्या वह भी......

लखीमपुर खीरी कांड पर विपक्ष विशेष रूप से कॉंग्रेस खुलकर राजनीति कर रहा है,  इसी क्रम में बिजनौर कांग्रेस कमेटी के  जिला उपाध्यक्ष श्रीमान मुनीश त्यागी जी ने मीडिया को दिए अपने एक वक्तव्य में कहा कि - "जनता का दर्द वह क्या समझेगा जिसके कोई औलाद नहीं है। ये बे-औलादों की सरकार है।" यह पहला मौका नहीं है जब किसी विपक्षी नेता ने श्री योगी-मोदी की सरकार को बे-औलादों की सरकार बताया है। इससे पहले भी विपक्ष इस तरह के घटिया और शर्मनाक बयान देता रहा है। सोशल मीडिया पर भी अक्सर श्री योगी-मोदी पर इस प्रकार की घोर आपत्तिजनक टिप्पणियां होती रहती हैं।
लेकिन कांग्रेसियों को यह कहते हुए ख़ुद के गिरेबान में भी झांककर देखना चाहिए कि वह जिन श्री राहुल गांधी साहब को देश की राजगद्दी सौंपना चाहते हैं, उनके ख़ुद की कितनी औलादें हैं, तो क्या वह भी जनता के दर्द को नहीं समझते? जिन ममता दीदी और मायावती बहनजी की कांग्रेस गलबहियां कर रही है, उनके कितने पुत्र-पुत्रियां हैं?
कांग्रेस को यह समझना चाहिये कि राजनीति में परिवार की जरूरत उन्हें होती है, जो परिवारवाद की राजनीति करते हैं। गांधी परिवार, लालू परिवार, मुलायम परिवार, ठाकरे परिवार सभी परिवारवाद की राजनीति कर रहे हैं। श्री मुनीश त्यागी साहब, यह अच्छा ही है कि श्री नरेन्द्र मोदी और श्री योगी आदित्यनाथ जी के कोई पुत्र नहीं है, वरना वह भी पुत्रमोह में धृष्टर्राष्ट बन जाते, और भाजपा का भी वही हश्र होता जो आजकल कांग्रेस का हो रहा है। किसी ने सही कहा है कि "कुपुत्र" जनने से अच्छा है कि बांझ रह जा। 
रहा जनता के दर्द का प्रश्न, तो महोदय बहुत विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि 1966 में निहत्थे और निर्दोष गौभक्तों और साधु-संतों पर गोलियां चलवाने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी के दो सुपुत्र थे, 1984 में निर्दोष सिखों की नृशंस हत्या पर जिन स्व. राजीव गांधी साहब ने कहा था कि "जब बड़े पेड़ गिरते हैं, तब धरती थोड़ा हिलती ही है", उनके भी एक सुपुत्र है, 1990 में निर्दोष श्रीरामभक्तों पर गोलियां चलवाने वाले माननीय मुलायम सिंह यादव के भी ईश्वर की कृपा से दो सुयोग्य पुत्र हैं, उस सबके बावजूद उन्होंने जनता के दर्द को क्यों नहीं समझा था? इस प्रश्न का उत्तर हर कांग्रेसी, समाजवादी को देना ही चाहिए।
श्रीमान मुनीश त्यागी जी ने अपने बयान में यह भी कहा कि- "जब देश आज़ाद हुआ था तब 100 बीघे के काश्तकार पर लंगोटी नहीं जुड़ती थी, आज देश का किसान कार से चरी लेकर जाता है, कार से दूध लेकर जाता है, आज मजदूर मोटरसाइकिल से मजदूरी करने जाता है।"
श्रीमान मुनीश त्यागी जी से हम बहुत विनम्रतापूर्वक जानना चाहते हैं कि साहब जब देश का किसान कार से चरी लाता है तो उसे कार से कौन रौंद सकता है? ऐसे सम्पन्न किसानों के लिए मुफ़्त बिजली और खाद की आवश्यकता भला क्यों पड़ती है? मोटरसाइकिल पर जाकर मजदूरी करने वाला मजदूर और कार से चलने वाला किसान गरीब कैसे हो सकता है? शायद इसीलिए श्रीमान राहुल गांधी ने कहा था कि "गरीबी दिमाग़ का वहम है"।

श्रीमान मुनीश त्यागी जी ने आगे कहा कि- "श्रीमती प्रियंका गांधी को एक गन्दी कोठरी में कैद किया गया जिसमें मिट्टी के ढेर लगे हुए थे, प्रियंका गांधी ने खुद झाड़ू लगाकर बैठने  का काम किया है।"

माननीय मुनीश त्यागी जी को हम बताना चाहते हैं कि "कारों से चलने वाले "गरीब" किसान की मौत पर छाती पीटने वाली "शाही परिवार" की बेटी को अगर एक दिन झाड़ू लगानी भी पड़ गई तो कोई आसमान नहीं टूट गया, *मुनीश साहब "बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।"*

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मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी कांड- ब्राह्मण समाज के विरुद्ध कोई सोचा-समझा षड्यंत्र तो नहीं है

कल तक एक कुख्यात अपराधी विकास दुबे की हत्या पर छाती पीटकर विधवा विलाप करने वाले, श्रीमान योगी का ख़ौफ़ दिखाकर ब्राह्मणों पर कथित अत्याचारों का हवाला देकर घड़ियाली आंसू बहाने वाले, ब्राह्मण समाज को वोटबैंक समझकर उनका इस्तेमाल करने वाले और ब्राह्मणों को अपने पाले में करने के लिए "प्रबुद्ध सम्मेलन" करने वाले तमाम स्वयम्भू "ब्राह्मण नेता" और "ब्राह्मण हितैषी विपक्षी दल" अब कहाँ चले गए?
क्या इन्हें मालूम नहीं है कि लखीमपुर खीरी में भोलेभाले किसानों की आड़ लेकर कुछ बेरहम लोगों ने शुभम मिश्र पुत्र विजय कुमार मिश्र और हरिओम मिश्र पुत्र परसेहरा, फरधान (अजय मिश्रा का ड्राइवर) की बड़ी निर्दयता से पीट-पीटकर हत्या कर दी। जो लोग बात-बात पर समुदाय विशेष पर  मॉबलिंचिंग की दुहाई देते रहते हैं, क्या वह इस नृशंस हत्याकांड को मॉबलिंचिंग नहीं मानेंगे?
हम इस बात से कदापि इंकार नहीं कर रहे कि लखीमपुर खीरी में जो कुछ भी हुआ वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता। परन्तु प्रश्न यह है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि किन्हीं परिस्थितियों में तथाकथित रूप से कुछ किसान दुर्घटनाग्रस्त हो भी गए थे, तो क्या वहां उपस्थित भीड़ का न्याय और कानून व्यवस्था से विश्वास उठ गया था? क्या पुलिस-प्रशासन से मदद नहीं ली जा सकती थी? भीड़ द्वारा चार नौजवानों को निर्दयतापूर्वक पीट-पीटकर मार देना क्या जंगलराज का उदाहरण नहीं है?
प्रश्न यह भी है कि यदि इन ब्राह्मण नौजवानों के स्थान पर दलित समाज के नौजवान होते, तो भी क्या  विपक्ष इसी प्रकार से लाशों पर राजनीतिक रोटियां सेंकने पहुंच जाता? 
जो लोग कल तक जनेऊ धारण करके अपने को दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण बताकर जनता को गुमराह कर रहे थे, जो लोग भगवान परशुरामजी की ऊंची-ऊंची प्रतिमाएं लगवाने के दावे कर रहे थे, जो ब्राह्मणों के हमदर्द बन रहे थे, वह सब अब कहाँ हैं? वह सामने क्यों नहीं आते? 
क्या भाजपा में जाने से ब्राह्मणत्व समाप्त हो जाता है। क्या भाजपा का कार्यकर्ता होने से कोई ब्राह्मण नहीं रहता?

या फिर "ब्राह्मण विरोधी मानसिकता" के राजनीतिक दलों द्वारा यह ब्राह्मण समाज के विरुद्ध कोई घिनौना राजनीतिक षडयंत्र रचा गया है, जिसे लखीमपुर खीरी में अमली जामा पहनाया गया है। उल्लेखनीय है कि लखीमपुर खीरी से भाजपा सांसद अजय मिश्र टेनी पश्चिमी उत्तरप्रदेश में लगातार कई वर्षों से ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और फिलहाल वह पार्टी की ओर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज को पार्टी के पक्ष में एकजुट करने का प्रयास भी कर रहे थे। यहां यह भी समझना होगा कि अजय मिश्र टेनी का ब्राह्मण समाज में बहुत आदर और सम्मान किया जाता है। ऐसे में हो सकता है कि विपक्षी नेताओं द्वारा अजय मिश्र टेनी की बढ़ती लोकप्रियता औऱ ब्राह्मण समाज का उनके प्रति झुकाव देखते हुए उनके पुत्र पर मनघड़ंत आरोप लगाकर उनकी साफ-सुथरी छवि पर दाग लगाने का भी षड्यंत्र रचा जा सकता है। इस सम्भावना से भी कोई इंकार नहीं किया जा सकता है। 

श्री योगी सरकार को चाहिए कि वह लखीमपुर खीरी की घटना की जांच बड़ी गहनता और निष्पक्षता से कराए ताकि सच्चाई सामने आ सके। इस घटना से ब्राह्मण समाज बेहद आहत और व्यथित है। और ब्राह्मण समाज को श्री योगी सरकार की निष्पक्षता और ईमानदारी पर पूरा भरोसा है।

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रविवार, 3 अक्टूबर 2021

कांग्रेस का सबसे बड़ा शत्रु मोदी नहीं बल्कि ममता, मुलायम, लालू जैसे सेक्युलर हैं

कांग्रेस शासित प्रदेशों पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार की स्थिति डांवाडोल है। पंजाब के हालात तो अब असामान्य से होने लगे हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग के चीफ़ कन्हैया कुमार के "शुभ कदमों" के पड़ते ही कांग्रेस पार्टी का टुकड़े-टुकड़े होना आरम्भ हो गया है। इसे कुछ यूं कहिये कि "जहां गए दास मलूका, वहीं पड़ गया सूखा।।" उधर उत्तरप्रदेश में "बोटी-बोटी गैंग" के मुखिया कहे जाने वाले इमरान मसूद साहब ने भी सुर बदलते हुए कांग्रेस को सपा के समक्ष आत्मसमर्पण करने की सी नसीहत दे डाली है। दूसरे शब्दों में कहें तो कन्हैया कुमार की तरह ही इमरान मसूद साहब ने भी कांग्रेस के जहाज को डूबता हुआ बताना शुरू कर दिया है। उल्लेखनीय है कि यह वही इमरान मसूद साहब हैं जिन्हें कांग्रेस आलाकमान ने ज़मीन से उठाकर एकदम से आसमान पर बैठा लिया था। उसका कारण केवल इतना भर था कि इमरान मसूद साहब ने कथितरूप से देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की "बोटी-बोटी" अलग करने का दम भरा था। और कांग्रेस हर उस व्यक्ति को गले लगाने के लिए एकदम से तैयार रहती है, जो श्री मोदी-योगी का अन्धविरोधी है। सच पूछिए तो गांधी परिवार हमेशा ही अपनी लकीर बड़ा करने के स्थान पर मोदी की लकीर को छोटा करने के लिए उतावला रहता है।
अब ख़बर मिली है कि जल्दी ही इमरान मसूद साहब सपा में शामिल हो सकते हैं। कहते हैं कि जब जहाज डूबता है तो सबसे पहले उसमें से चूहे कूदकर भागते हैं। और कन्हैया कुमार तो पहले ही कह चुके हैं कि कांग्रेस का जहाज डूब रहा है। 
दरअसल वर्तमान में कांग्रेस नेतृत्वविहीन और दिशाहीन हो चुकी है। वर्तमान में कांग्रेस चार धड़ों में बंटी हुई है। पहला सोनिया धड़ा, दूसरा राहुल धड़ा, तीसरा वाड्रा धड़ा और चौथा असंतुष्ट दिग्जजों का धड़ा। असंतुष्टों का धड़ा अर्थात वह तमाम लोग जो किसी ज़माने में गांधी परिवार के "विश्वासपात्र" माने जाते थे, वह सभी दिग्गज आज गांधी परिवार की जड़ों में मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।
कहते हैं कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। यहां कोई किसी का वफ़ादार नहीं है। कपिल सिब्बल साहब से लेकर आनन्द शर्मा और मनीष तिवारी से लेकर शशि थरूर तक सभी "पीवी नरसिंघा राव" बनने की तैयारियां करने में लगे हैं। यूं भी शतरंज और राजनीति में कौन सा प्यादा कब वज़ीर बन जाये, कोई नहीं जानता। कल तक जो लोग गांधी परिवार के प्यादे हुआ करते थे। आज वही लोग वज़ीर बनने की कोशिशों में लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है गांधी परिवार का आपसी बिखराव और विरासत को लेकर भीतरघात। इसका एक बड़ा कारण श्री राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता, अदूरदर्शिता और अपने उत्तरदायित्वों के प्रति उदासीनता है। श्रीमान राहुल गांधी कभी अपनी राजनीतिक योग्यता सिद्ध नहीं कर पाए, और न ही उन्होंने कभी श्रीमान नरेंद्र मोदी जी की नेतृत्व कुशलता, राजनीतिक सूझबूझ और दूरंदेशी से कुछ सीखने की कोई कोशिश ही की है। विद्वानों का मत है कि यदि शत्रु से भी कुछ सीखने को मिलता है तो जरूर सीख लेना चाहिए।

लेकिन हमेशा चाटुकारों और श्री मोदी विरोधियों से घिरे रहने वाले श्री गांधी को विद्वानों से सीख लेने की कभी फुर्सत ही नहीं मिली। उधर प्रियंका जी कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन केवल इंदिरा जैसी नाक के बल पर वह कभी गांधी परिवार की वारिस नहीं बन सकती हैं। वह वाड्रा परिवार की बहू हैं और उससे ज़्यादा कुछ नहीं। 
श्रीमती सोनिया गांधी ढलता हुआ सूरज हैं और अब उनके कंधों में इतनी क्षमता नहीं कि वह राहुल गांधी को सहारा दे सकें। 
इन सब बातों का फायदा उठाते हुए ही गांधी परिवार को मोदी और आरएसएस का कट्टर विरोधी बना दिया गया। जबकि सही मायने में देखा जाए तो कांग्रेस की जड़ें खोखली करने में ममता बनर्जी, शरद पवार,  लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और कुछ हद तक अरविंद केजरीवाल जैसे "सो कॉल्ड सेक्युलर्स" शामिल हैं। जिस प्रकार लोहे को हमेशा लोहा ही काटता है, ठीक उसी प्रकार सेक्युलर का चोला ओढ़े कांग्रेस को इन कथित सेक्युलर दलों ने ही सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। लेकिन गांधी परिवार को यह सच्चाई न तो किसी ने कभी बताई और न ही ख़ुद गांधी परिवार ने उसे कभी समझने की कोई कोशिश ही की है।


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