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मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को मुआवजे देने में पक्षपात करने पर जब सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फटकार

आज लखीमपुर खीरी कांड पर राजनीति कर रही समाजवादी पार्टी भले ही प्रदेश की योगी सरकार पर पक्षपात के आरोप लगा रही हो। लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में  तत्कालीन सपा सरकार पर मुआवजे को लेकर पक्षपात का आरोप लगा था और इसपर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी तत्कालीन सपा सरकार को कड़ी फ़टकार लगाई थी।

मुजफ्फरनगर दंगों की शुरुआत 27 अगस्त 2013 को कवाल गाँव में कथिततौर पर एक जाट समुदाय की लड़की के साथ एक मुस्लिम युवक द्वारा छेड़खानी की शिकायत पर हुई थी. पीड़ित युवती मलिकपुरा गांव की थी, जिसके द्वारा जानसठ पुलिस में कई बार अपने साथ छेड़खानी की शिकायत की गई थी, लेकिन माना जाता है कि सपा नेताओं के दबाव के चलते इस मामले में पुलिस द्वारा पीड़िता की कोई मदद नहीं की गई। इस घटना के बाद लड़की के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन और उस मुस्लिम युवक के आपसी संघर्ष में मुस्लिम युवक की मौत हो गई। जिसके बदले हुई जवाबी हिंसा में  दोनों युवकों सचिन और गौरव की जान चली गई।

इसके बाद पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम मुजफ्फरनगर सुरेंद्र सिंह जाट के द्वारा कुछ मुस्लिम युवकों को कव्वाल से गिरफ्तार कर लिया गया। उसी रात कथितरूप से तत्कालीन सपा सरकार के एक वरिष्ठ नेता के दबाव में पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम सुरेंद्र सिंह जाट का मुजफ्फरनगर से तबादला कर दिया गया और सभी मुस्लिम युवकों को थाने से ही छोड़ दिया गया।
 
माना जाता है कि इस घटना के बाद सपा नेताओं द्वारा की गई कथित एकतरफा कार्रवाई ने दंगे की आग में घी का काम किया। इसके बाद इस मामले में राजनीति शुरू हो गई. और दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी महापंचायत बुलाई. 

07 सितंबर 2013 को महापंचायत से लौट रहे किसानों पर जौली नहर के पास दंगाइयों ने घात लगाकर हमला किया. इस दंगे में एक फोटोग्राफर और पत्रकार समेत 62 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद इस दंगे ने विकराल रूप धारण कर लिया था। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मुजफ्फरनगर के हर गांव को इस दंगे की आग ने अपनी चपेट में ले लिया था। और बताया जाता है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से दलित समाज और जाट बाहुल्य इलाकों से मुस्लिम समाज का पलायन बहुत तेजी से हुआ था। जिसके परिणामस्वरूप हजारों निर्दोष लोगों को अपने घर से बेघर होना पड़ा था।

मुजफ्फरनगर के इन दंगा पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए 26 अक्तूबर 2013 को एक अधिसूचना जारी की गई थी। जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवारों के मुआवजे के लिए 90 करोड़ रुपये जारी कर रही है। इस राशि से हर दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवारों को पुनर्वास के लिए पांच-पांच लाख रुपये दिए जाएंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्कालीन राज्य सरकार के अधिवक्ता राजीव धवन से पूछा कि- क्या सिर्फ एक समुदाय को मुआवजा देने की अधिसूचना जारी की गई है। इस सवाल के जवाब पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरा असंतोष जताते हुए कहा कि *"दंगा पीडितों के लिए तय मुआवजे में भेदभाव क्यों किया जा रहा है। राज्य सरकार को सभी समुदायों के लिए मुआवजे की घोषणा करनी चाहिए थी। मुआवजे की अधिसूचना में केवल एक ही समुदाय के दंगा पीडितों को शामिल किया गया है, जबकि इसके शिकार अन्य समुदाय के लोग भी हैं। बेहतर होगा कि राज्य सरकार इस अधिसूचना को वापस ले और नई अधिसूचना जारी कर उसमें हर समुदाय के दंगा पीड़ितों को शामिल करें।*

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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