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क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वास्तव में किसानों के खलनायक हैं

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार सुश्री मायावती के शासनकाल में गोरखपुर मंडल की नौ चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचा गया था।
उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन प्रदेश की 21 चीनी मिलों को सुश्री मायावती सरकार के कार्यकाल में 2010-11 में बेचा गया था। इनमें से 10 मिलें उस समय चालू हालत में थीं, 11 मिलें बंद थीं।
सीएजी की रिपोर्ट में मिलों को गलत तरीके से औने-पौने दाम में बेचे जाने की पुष्टि भी हुई थी। हालांकि बसपा के बाद सत्ता में आई अखिलेश सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

मिलों की वर्तमान कीमत से 15 गुना कम कीमत पर इन्हें बेचा गया था। सर्किल रेट और स्टांप ड्यूटी की अनदेखी कर भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान कराया गया था। साथ ही मिलों की मशीनों, आवासों, गोदामों का भी मनमाना रेट निर्धारित किया गया था। 
इसमें अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, सकौती टाडा, रोहाना कला, खड्डा की चीनी मिलें चालू हालत में थी।
जबकि बरेली, हरदोई, बाराबंकी, शाहगंज, बैतालपुर, देवरिया, भटनी, घुघली, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला की चीनी मिलें बंद थी। इनमें सिसवा बाजार और घुघली महराजगंज में थीं। खड्डा, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला कुशीनगर तथा बैतालपुर, देवरिया व भटनी मिलें देवरिया में थीं। खड्डा चीनी मिल चालू हालत में थी।

7 जुलाई 2021 को पत्रिका.डॉटकाम में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार श्री योगी सरकार ने 4 साल में 45.44 लाख से अधिक गन्ना किसानों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया है। यह बसपा सरकार से दोगुना और सपा सरकार के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक बताया जाता है। इस खबर के अनुसार बसपा सरकार में गन्‍ना किसानों को 55,000 करोड़ का कुल भुगतान किया गया था, जबकि सपा सरकार के पांच साल में गन्‍ना किसानों को 95,000 करोड़ रुपये का कुल भुगतान किया गया था। *अखिलेश सरकार के कार्यकाल में गन्‍ना किसानों के 10659.42 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान भी योगी सरकार ने किसानों को किया है।*

2007 से 2017 तक जितना कुल भुगतान किसानों को हुआ था उतना योगी सरकार ने सिर्फ 4 साल में कर दिया।

इस खबर के एक भाग में लेखक लिखता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में एक के बाद एक बंद होती चीनी मिलों को योगी सरकार ने न सिर्फ दोबारा शुरू कराया गया बल्कि यूपी को देश में चीनी उत्‍पादन में नंबर वन बना दिया । राज्‍य सरकार ने तीन पेराई सत्रों एवं वर्तमान पेराई सत्र 2020-21 समेत यूपी में कुल 3,868 लाख टन से अधिक गन्ने की पेराई कर 427.30 लाख टन चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन किया है । वर्ष 2017-18 से 31 जनवरी, 2021 तक 54 डिस्टिलरीज के माध्यम से प्रदेश में कुल 261.72 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ है। जो कि एक रिकार्ड है।
प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान एक भी चीनी मिल बंद नहीं हुई। सभी 119 चीनी मिलें चलीं । प्रदेश में 45.44 लाख से अधिक गन्ना आपूर्तिकर्ता किसान हैं और लगभग 67 लाख किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं। आज देश में 47% चीनी का उत्पादन यूपी में हो रहा है और गन्ना सेक्टर का प्रदेश की जीडीपी में 8.45 प्रतिशत एवं कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 20.18 प्रतिशत का योगदान है। (पत्रिका.डॉटकाम)

25 सालों में पहली बार 243 नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी किये गए। जिनमें से 133 इकाइयां संचालित हो चुकी हैं। 

इसके बावजूद भी श्रीमान राकेश टिकैत सहित तमाम विपक्षी दल श्री योगी सरकार को "किसानों का खलनायक" बनाने पर तुले हुए हैं। किसानों की आड़ में श्री टिकैत बन्धु और तमाम विपक्ष अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने में लगा है। कोई भी सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता है। जानबूझकर सरकार के खिलाफ किसानों के मन में ज़हर घोला जा रहा है। उधर किसान श्री राकेश टिकैत को "अन्ना हजारे" समझ बैठे हैं, उन्हें लगता है कि वह सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सच इससे बिल्कुल परे है। श्री टिकैत बंधुओं की सारी लड़ाई उनके निजी स्वार्थ, राजनीतिक हित और अपनी पहचान बनाने तक सीमित है। इस आंदोलन से पहले उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति यह थी कि वह दो बार चुनाव लड़े औऱ दोनों ही बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करा बैठे। विपक्ष टिकैत का सहारा लेकर किसानों के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहा है। उसको भी अपना उल्लू सीधा करना है।

बर्तमान में किसानों के नाम पर हो रही सारी लड़ाइयां और आंदोलन केवल और केवल सत्ता के लिए हैं, किसान तो केवल मोहरा बने हुए हैं। यह बात किसानों को समझनी ही होगी।

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🖋️ *मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"*
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

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*विशेष नोट* - उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने का नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

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