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सफल होने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध और अहंकार को पूर्णतयः त्याग देना चाहिए

क्रोध और अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े दो शत्रु हैं।क्रोध मनुष्य के विवेक अर्थात उसके सोचने-समझने की शक्ति को समाप्त कर देता है और अहंकार मनुष्य को सही मार्गदर्शन से विमुख कर देता है। क्रोध और अहंकार में डूबा हुआ व्यक्ति सदैव अपना और अपनों का ही अहित करता है।
क्रोध और अहंकार मनुष्य को अंधकार की ओर ले जाता है जहां पर मनुष्य अपने अच्छे-बुरे को नहीं देख पाता, वह न भूतकाल से कुछ सीख पाता है और न ही भविष्य को समझ पाता है, वह केवल वर्तमान में ही जीना चाहता है।

सफल होने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध और अहंकार को पूर्णतयः त्याग देना चाहिए, क्योंकि सफलता की राह में यह दोनों ही सबसे बड़ा रोड़ा बनते हैं।

रावण महा पराक्रमी योद्धा, राजनीति के प्रकांड पंडित, वेद-शास्त्र के महाज्ञाता और  सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ थे परन्तु क्रोध और अहंकार ने उन्हें श्रीराम का विरोधी  बना दिया और जिस रावण के सवा लाख नाती-पोते, सोने की लंका, औऱ उसकी सुरक्षा के लिए समुद्र जैसी खाई थी, वह रावण वानरों और भालुओं की सेना से हार गया। 
दुर्योधन जिसके पास भीष्म पितामह, महात्मा विदुर, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य और कर्ण जैसे महान पराक्रमी अजेय योद्धा थे, उसको भी पराजय का मुंह देखना पड़ा।

कंस जैसा मलयोद्धा और हिरण्यकश्यप जैसा महायोद्धा भी अपने अहंकार और क्रोध की अग्नि में जलकर भस्म हो गए।

इसलिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे जी को भी यह भलीभांति समझना और स्वीकारना होगा कि क्रोध और सत्ता का अहंकार उनके लिए कतई हितकारी नहीं है। उन्हें चाहिए कि वह इनका सर्वथा त्याग करें और न्याय और धर्म के मार्ग का अनुसरण करते हुए, पालघर हत्याकांड पर गम्भीर चिंतन करते हुए उचित और न्यायपूर्ण कार्यवाही कराएं।

-मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री"

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